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Tuesday, 14 July 2015

जनता को छला है भाजपा ने


चुनावी वादे केवल हवा हवाई होते हैं। यह एक बार फिर साबित हो गया है। अच्छे दिन अच्छे दिन की रट लगाने वाली भाजपा और उसके नेताओं की पोल अब खुलने लगी है। साल भर से अधिक का समय हो गया, लेकिन अच्छे दिन नहीं आए। भाजपा अध्यक्ष अमित षाह ने भोपाल में कहा कि अच्छे दिन आने में 25 साल लगेंगे। शाह ने यह भी कहा कि इंडिया को नंबर वन बनाने के लिए भाजपा को इन 25 साल में पंचायत से लेकर लोकसभा तक हर चुनाव जीतना होगा। देश को दुनिया के सर्वोच्च स्थान पर बैठाना है तो पांच साल की सरकार कुछ नहीं कर सकती।  अच्छे दिनों का मतलब भारत को दुनिया में वैसा ही सम्मान दिलाना है जैसा कि अंग्रेजों के शासन से पहले था। पहले पांच साल के शासन में भाजपा सरकार महंगाई कम कर सकती है, सीमाओं को सुरक्षित कर सकती है, मजबूत विदेश नीति बना सकती है, देश की आर्थिक तरक्की सुनिश्चित कर सकती है, नौकरियां दिला सकती है और गरीबी हटा सकती है।
जाहिर सी बात है कि भाजपा यदि यह बात पहले कहती तो चुनावी में सफलता नहीं मिलती। एक के बाद एक कई मामले खुलते जा रहे हैं। पारदर्शी नीति अपनाने का दावा करने वाली नरेंद्र मोदी सरकार भी भ्रष्टाचार के घेरे में आ गई है। भ्रष्टाचार का यह आरोप किसी विपक्षी पार्टी ने नहीं बल्कि केंद्र और महाराष्ट्र की भाजपानीत सरकार में शामिल शिवसेना ने ही लगाया है। शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में कार्यकारी संपादक संजय राउत ने ‘सच्चाई’ नामक शीर्षक के तहत एलईडी बल्ब में भारी घोटाले का पर्दाफाश किया है। राउत ने लिखा है कि केंद्र सरकार ने एलईडी बल्ब लगाने का ठेका एक मृत कंपनी को दिया है, जिसमें करीब 25 हजार करोड़ रुपये का गैर-व्यवहार हुआ है।
मोदी सरकार काला धन वापस लाने की बात की थी। सौ दिन में 80 लाख करोड़ लाने की बात थी। सरकार में आने के बाद मोदी सरकार कानून के ऽभगौड़े और काला धन पैदा करने वाले ललित मोदी की मदद कर रही है। अमित शाह अब कह रहे हैं कि काला धन लाने और हरेक के खाते में 15 लाख रुपये देने की बात तो चुनावी जुमला था। सच्चाई क्या है, आखिर कहां है काला धन ? किसके आए अच्छे दिन। 36 हजार करोड़ का पीडीएस घोटाला छत्तीसगढ़ में रमन सिंह करते हैं, जिसमें उनके पूरे परिवार की मिलीभगत है। डायरियों में यह बात उजागर हो चुकी है। मध्य प्रदेश में व्यापमं घोटाले भाजपा की सरकार कर रही है। बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। अब तक 49 लोगों की मौत हो चुकी है। राजस्थान में वसुंधरा राजे और ललित मोदी की मिलीऽागत पूरी दुनिया देख रही है। महाराष्ट्र में बच्चों की खाने वाली गुड़ की चिक्की तक भाजपा के लोग खा गए। मंत्री पंकजा मुंडे की सच्चाई लोगों के सामने आ चुकी है। महाराष्ट्र के एक और मंत्री हैं तावड़े जी, वो भी दो-दो घोटाले में शामिल हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी जी ने तीन-तीन शपथ पत्र दिए हैं, अपनी शिक्षा को लेकर। तीनों विरोधाऽाासी हैं। एक और हैं शिक्षा राज्य मंत्री रामशंकर कटारिया, जिन पर फर्जी डिग्री का मुकदमा चल रहा है। जी सिद्धेश्वर और नितिन गडकरी पर घपले का आरोप है। कैग ने ऽा्रश्टाचार में संलिप्तता की बात कही है। मोदी जी के एक और मंत्री हैं निहाल चंद, जिनको पुलिस बलात्कार के मामले में तलाश रही है।
इतना ही नहीं, लगता है मोदी सरकार को पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जय जवान जय किसान का नारा याद नहीं तभी तो जमीन अधिग्रहण (लैंड बिल) मुद्दे पर किसान तो पहले से ही रुठे हुए है और अब श्वन रैंक वन पेंशनश् के मुद्दे पर जवान भी नाराज हो गए हैं। गुस्सा इस कदर है कि 1971 लड़ाई के हीरो विंग कमांडर सुरेश दामोदर कार्णिक ने 26 मई को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के हाथों सम्मान लेने से मना कर दिया। 80 साल के वीर चक्र से सम्मानित विंग कमांडर कहते हैं कि जब सरकार श्वन रैंक वन पेंशनश् का सम्मान नहीं कर पा रही है तो वो मेरा क्या करेगी। हर कोई केवल बात करता है, एक्शन कुछ नहीं करता। ये लड़ाई सिर्फ पैसों के लिए नहीं है बल्कि इज्जत के लिए है। मोदी सरकार बनने के बाद ये पहला मौका है जब जवानों ने खुलकर सरकार के खिलाफ नाराजगी दिखाई है। ध्यान रहे बीजेपी ने चुनावी घोषणा पत्र में देश के 25 लाख पूर्व सैनिकों से वादा किया था कि वो वन रैंक वन पेंशन लागू करेगी। इस मुद्दे पर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर कहते है कि हमें जो करना था हमने कर दिया, थोड़ा इंतजार कीजिए और यही बात नौसेना प्रमुख एडमिरल रोबिन धवन भी कह रहे हैं कि पूर्व सैनिक थोड़ा धैर्य रखे। यहां तक कि प्रधानमंत्री ने भी मीडिया से बातचीत में इस बात को दोहराया है कि वे इस मुद्दे पर संजीदा हैं और जल्दी ही इसे अमल में ले आएंगे, लेकिन सवाल वही है कब तक?

Friday, 3 April 2015

अन्नदाता का हित सर्वोपरि


कांग्रेस केवल सत्ता के लिए केवल राजनीति नहीं करती है। कांग्रेस ने हमेशा ही किसानों के लिए काम किया है। काम करती रहेगी। 60 हजार करोड़ किसानों का कर्ज माफ किया। कांग्रेस की जो नीति रही है और है, उस पर हमारी पार्टी की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी अमल कर रही है। जब भी किसी देश की जनता को दर्द हुआ है, कांग्रेस ने आगे आकर उसका दर्द बांटा है। आज भी वही किया जा रहा है।
हर बात में राजनीति हमलोग नहीं करते हैं। हमारे लिए राजनीति सेवा का माध्यम है। श्रीमती सोनिया गांधी संगठन को मजबूत करने के लिए पूरे देश का दौरा कर रही हैं। हमारी सरकार जब केंन्द्र में थी, तो महिला सशक्तीकरण और भूमि अधिग्रहण के लिए काम किया। जो भी अब तक वंचित रहा है, उसे सशक्त करने की हमारी कोशिश होती है। कांग्रेस ने तमाम मानदण्डों के आधार पर कोई भी निर्णय लिया है, लेकिन वर्तमान सरकार तो केवल अध्यादेश का सहारा लेती है। हमारी नेता सोनिया गांधी का साफ कहना है कि ‘अदूरदर्शी’ मोदी सरकार उद्योगपतियों को लाभ देने के लिए झुकी पड़ी है। उन्होंने मांग की कि संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर 2013 में यूपीए द्वारा लाए गए भूमि अधिग्रहण कानून को समग्रता में वापस लाया जाए। किसान हमारे देश की रीढ़ हैं और हर हाल में उनके हितों की रक्षा होनी ही चाहिए और इस पर कांग्रेस कोई समझौता नहीं कर सकती। हम इस देश की रीढ़ तोड़ने वाले किसी कानून का कभी समर्थन नहीं कर सकते। इसलिए मैं आपसे आग्रह करती हूं कि संकीर्ण पक्षपातपूर्ण राजनीति से ऊपर उठें और 2013 के उस कानून को समग्रता में वापस लाएं जो कि हमारे किसान भाइयों एवं बहनों की भावनाओं और आकांक्षाओं के अनुकूल था। सरकार द्वारा मनमाने ढंग से किसान विरोधी कानून थोप देने के बाद बहस की बातें करना राष्ट्रीय महत्व की नीतियां लागू करने के पहले सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सर्वानुमति बनाने की परंपरा का उपहास करने के बाराबर है।
देखिए, मंत्री नितीन गडकरी ने अपने पत्र में भूमि अधिग्रहण में प्रस्तावित बदलावों को यह कह कर जायज ठहराने की कोशिश की है कि इससे गांव, गरीबों, किसानों और मजदूरों का फायदा होगा.. आपके तर्क यह जताने के लिए दिए गए हैं कि ये सब बातें यूपीए सरकार के विपरीत जैसे नरेन्द्र मोदी सरकार का नया योगदान है, और आपके कानून का विरोध करने वाले किसान विरोधी और राष्ट्र विरोधी हैं।  किसानों की जाने वाली आजीविका और उन्हें होने वाली पीड़ा को समझने के कांग्रेस और बीजेपी के तरीकों में बुनियादी अंतर है। यह खेदजनक है कि गरीब किसानों और जरूरतमंद श्रमिकों के हित में आवाज उठाने वालों को मोदी सरकार राष्ट्र विरोधी बता रही है और कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए पूरा जोर लगा रही है।
किसान नहीं रहेगा, तो देश नहीं रहेगा। इस सच को क्या हम या आप नहीं जानते हैं। हमारे देश के अन्नदाता को बार-बार दैवीय प्रकोप को सहन करना पड़ता है। हमारे देश का अन्नदाता यानी भारतीय किसान वैसे तो लगभग प्रत्येक वर्ष देश के किसी न किसी हिस्से में आने वाली बाढ़ अथवा सूखे के कारण संकट का सामना करता ही रहता है। खासतौर पर गरीब व मध्यमवर्गीय किसान तो ऐसे हालात से प्रायरू प्रभावित ही रहता है। परंतु इस वर्ष मार्च के महीने में हुई बेतहाशा बारिश व इसी के साथ-साथ आने वाले आंधी-तूफान व ओलावृष्टि ने तो मानो देश के किसानों विशेषकर उत्तर व मध्य भारत के ‘अन्नदाता’ की तो कमर ही तोड़ कर रख दी। किसानों के खेतों में रबी की फसलों के रूप में तैयार हो रही गेहूं,सरसों,अरहर,चना,लाही के अतिरिक्त मटर,टमाटर,आलू जैसी और भी कई सब्जियां व तंबाकू,तिलहन व दलहन की कई किस्में जो तैयारी के कगार पर थीं लगभग नष्ट हो गई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार वेस्टर्न डिस्टर्बेंस ने बंगाल की खाड़ी तथा हिंद महासागर से अर्थात् देश के पूर्वी और पश्चिमी देानों ही छोर से एक साथ नमी उठाई जोकि इतने बड़े पैमाने पर होने वाली बारिश का कारण बनी। दिल्ली व आसपास के क्षेत्रों में तो मार्च के महीने में होने वाली इस बारिश ने पिछले सौ वर्षों की बारिश का रिकार्ड तोड़ दिया। बताया जाता है कि इसके पूर्व 1915 में दिल्ली में इतनी वर्षा रिकॉर्ड की गई थी। बारिश के साथ-साथ सक्रिय रही चक्रवाती हवाओं ने भी किसानों की आजीविका पर भारी कहर बरपा किया है।
देश के विभिन्न भागों से किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने, अपनी तबाह फसल को देखकर हृदयगति रुक जाने से उनका देहांत होने जैसे हृदयविदारक समाचार भी सुनाई देने लगे हैं। जाहिर है विभिन्न राज्यों की सरकारें ऐसे संकट के समय में किसानों के साथ उनका दुरूख बांटने हेतु सहायतार्थ आर्थिक पैकेज घोषित करती भी नजर आ रही हैं। किसानों पर टूटे इस प्राकृतिक कहर के प्रभाव से आम नागरिक भी अछूता नहीं रहने वाला। विशेषज्ञों के अनुसार शीघ्र ही दलहन,तिलहन और तत्काल रूप से विभिन्न सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में आम देशवासियों को इस मौसम का भुगतान करना पड़ सकता है। इससे उनकी कमर टूट जाती है। उसे अभी मदद की जरूरत है। उसे संवारना देश के हर जिम्मेदार और सक्षम नागरिक का कर्तव्य है। कांग्रेस ने हमेशा ही किसानों की हित की बात की। बैंकों के द्वारा कर्ज, खाद, बीज संबंधी सहूलियत प्रदान करवाई। किसान इस देश की रीढ़ हैं। इस सच को हर देशवासी को समझना होगा। यदि अन्नदाता अनाज पैदा नहीं करेगा, तो लोग खाएंगे क्या ? देश का जवान तैयार होगा कैसे ?








Thursday, 30 October 2014

‘लौह महिला’ थीं इंदिरा गांधी



भारतीय राजनीति के फलक पर श्रीमती इंदिरा गांधी का उभार ऐसे समय में हुआ था, जब देश नेतृत्व के संकट से जूझ रहा था। शुरू में ‘गूंगी गुड़िया’ कहलाने वाली इंदिरा ने अपने चमत्कारिक नेतृत्व से न केवल देश को कुशल नेतृत्व प्रदान किया, बल्कि विश्व मंच पर भी भारत की धाक जम दी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह के अनुसार, इंदिरा एक कुशल प्रशासक थीं। उनके सक्रिय सहयोग से बांग्लादेश अस्तित्व में आया। जिससे इतिहास और भूगोल दोनों बदल गए। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि बचपन से ही इंदिरा में नेतृत्व के गुण मौजूद थे। भारत की आजादी के आंदोलन को गति प्रदान करने के लिए इंदिरा ने बचपन में ही ‘वानर सेना’ का गठन किया था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर कलीम बहादुर के अनुसार, इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्रित्व काल बहुत अच्छा था। उन्होंने बहुत से ऐसे काम किए, जिससे विश्व में भारत का सम्मान बढ़ा। उन्होंने भारत की विदेश नीति को नए तेवर दिए, बांग्लादेश का बनना उनमें से एक उदाहरण है। इससे उन्होंने विश्व मानचित्र पर देश का दबदबा कायम किया। जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू के घर इंदिरा का जन्म 19 नवंबर 1917 को हुआ था। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ओर से स्थापित शांति निकेतन में पढ़ाई करने वाली इंदिरा बचपन में काफी संकोची स्वभाव की थीं। इनका जन्म 19 नवम्बर, 1917 को इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश के आनंद भवन में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। इनका पूरा नाम है- श्इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधीश्। इनके पिता का नाम जवाहरलाल नेहरु और दादा का नाम मोतीलाल नेहरु था। पिता एवं दादा दोनों वकालत के पेशे से संबंधित थे और देश की स्वाधीनता में इनका प्रबल योगदान था। इनकी माता का नाम कमला नेहरु था जो दिल्ली के प्रतिष्ठित कौल परिवार की पुत्री थीं। इंदिराजी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जो आर्थिक एवं बौद्धिक दोनों दृष्टि से काफी संपन्न था। अतरू इन्हें आनंद भवन के रूप में महलनुमा आवास प्राप्त हुआ। इंदिरा जी का नाम इनके दादा पंडित मोतीलाल नेहरु ने रखा था। यह संस्कृतनिष्ठ शब्द है जिसका आशय है कांति, लक्ष्मी, एवं शोभा। इनके दादाजी को लगता था कि पौत्री के रूप में उन्हें मां लक्ष्मी और दुर्गा की प्राप्ति हुई है। पंडित नेहरु ने अत्यंत प्रिय देखने के कारण अपनी पुत्री को प्रियदर्शिनी के नाम से संबोधित किया जाता था। चूंकि जवाहरलाल नेहरु और कमला नेहरु स्वयं बेहद सुंदर तथा आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे, इस कारण सुंदरता के मामले में यह गुणसूत्र उन्हें अपने माता-पिता से प्राप्त हुए थे। इन्हें एक घरेलू नाम भी मिला जो इंदिरा का संक्षिप्त रूप श्इंदुश् था।
इंदिरा गांधी कभी भी अमेरिका जैसे राष्ट्रों के सामने झुकी नहीं। विकीलिक्स की ओर से किए गए खुलासों में यह बात सामने आई है कि निक्सन जैसे शक्तिशाली राष्ट्रपति भी उनसे काफी नाराज थे। लेकिन उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की। अपनी राजनीतिक पारी के शुरुआती दिनों में ‘गूंगी गुड़िया’ के नाम से जानी जाने वाली इंदिरा बाद के दिनों में बहुत बड़ी ‘जननायक’ बन कर उभरीं। उनके व्यक्तित्व में अजीब सा जादू था, जिससे लोग खुद ब खुद उनकी तरफ खिंचे चले आते थे। वह एक प्रभावी वक्ता भी थीं, जो अपने भाषणों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती थीं।
रूसी क्रांति के साल 1917 में 19 नवंबर को पैदा हुईं इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध में विश्व शक्तियों के सामने न झुकने के नीतिगत और समयानुकूल निर्णय क्षमता से पाकिस्तान को परास्त किया और बांग्लादेश को मुक्ति दिलाकर स्वतंत्र भारत को एक नया गौरवपूर्ण क्षण दिलवाया। दृढ़ निश्चयी और किसी भी परिस्थिति से जूझने और जीतने की क्षमता रखने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने न केवल इतिहास, बल्कि पाकिस्तान को विभाजित कर दक्षिण एशिया के भूगोल को ही बदल डाला और 1962 के भारत चीन युद्ध की अपमानजनक पराजय की कड़वाहट धूमिल कर भारतीयों में जोश का संचार किया।
यदि यह कहा जाए कि हमारे देश में इंदिरा गांधी आखिरी जन नायक थीं, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनके बाद कभी उन जैसे राजनेता नहीं हुआ। आपातकाल लगाने के बाद उन्हें चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा, लेकिन फिर से चुनाव में वह विजयी होकर लौटीं और अकेले अपने दम पर सरकार का गठन किया। आज गठबंधन की सरकारें बन रही हंै। आज के किसी भी राजनेता में इंदिरा गांधी की तरह वह जादुई ताकत नहीं है कि अपने अकेले दल के दम पर सरकार बना सके। पंजाब में आतंकवाद का सामना करते हुए अपने प्राणों की आहूति देने वाली इंदिरा गांधी को अपने छोटे बेटे संजय गांधी के आकस्मिक निधन से काफी दुख पहुंचा था। इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में लगभग 10 सालों तक शामिल रहे कर्ण सिंह ने कहा कि संजय के निधन से उन्हें काफी दुख पहुंचा था, लेकिन राजीव गांधी से उन्हें काफी संबल मिला।
1957 के आम चुनाव के समय पंडित नेहरू ने जहाँ श्री लालबहादुर शास्त्री को कांग्रेसी उम्मीदवारों के चयन की जिम्मेदारी दी थी, वहीं इंदिरा गाँधी का साथ शास्त्रीजी को प्राप्त हुआ था। शास्त्रीजी ने इंदिरा गाँधी के परामर्श का ध्यान रखते हुए प्रत्याशी तय किए थे। लोकसभा और विधानसभा के लिए जो उम्मीदवार इंदिरा गाँधी ने चुने थे, उनमें से लगभग सभी विजयी हुए और अच्छे राजनीतिज्ञ भी साबित हुए। इस कारण पार्टी में इंदिरा गाँधी का कद काफी बढ़ गया था। लेकिन इसकी वजह इंदिरा गाँधी के पिता पंडित नेहरू का प्रधानमंत्री होना ही नहीं था इंदिरा में व्यक्तिगत योग्यताएं भी थीं। इंदिरा गाँधी को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने के आरोप उस समय पंडित नेहरू पर लगे। 1959 में जब इंदिरा को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तो कई आलोचकों ने दबी जुबान से पंडित नेहरू को पार्टी में परिवारवाद फैलाने का दोषी ठहराया था। लेकिन वे आलोचना इतने मुखर नहीं थे कि उनकी बातों पर तवज्जो दी जाती। वस्तुतः इंदिरा गाँधी ने समाज, पार्टी और देश के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किए थे। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्राप्त थी। विदेशी राजनयिक भी उनकी प्रशंसा करते थे। इस कारण आलोचना दूध में उठे झाग की तरह बैठ गई। कांग्रेस अध्यक्षा के रूप में इंदिरा गाँधी ने अपने कौशल से कई समस्याओं का निदान किया। उन्होंने नारी शाक्ति को महत्त्व देते हुए उन्हें कांग्रेस पार्टी में महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किए। युवा शक्ति को लेकर भी उन्होंने अभूतपूर्व निर्णय लिए। इंदिरा गाँधी 42 वर्ष की उम्र में कांग्रेस अध्यक्षा बनी थीं।
भारत के जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, उन सभी की अनेक विशेषताएँ हो सकती हैं, लेकिन इंदिरा गाँधी के रूप में जो प्रधानमंत्री भारत भूमि को प्राप्त हुआ, वैसा प्रधानमंत्री अभी तक दूसरा नहीं हुआ है क्योंकि एक प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने विभिन्न चुनौतियों का मुकघबला करने में सफलता प्राप्त की। युद्ध हो, विपक्ष की गलतियाँ हों, कूटनीति का अंतर्राष्ट्रीय मैदान हो अथवा देश की कोई समस्या हो- इंदिरा गाँधी ने अक्सर स्वयं को सफल साबित किया। इंदिरा गाँधी, नेहरू के द्वारा शुरू की गई औद्योगिक विकास की अर्द्ध समाजवादी नीतियों पर कघयम रहीं। उन्होंने सोवियत संघ के साथ नजदीकी सम्बन्ध कघयम किए और पाकिस्तान-भारत विवाद के दौरान समर्थन के लिए उसी पर आश्रित रहीं। जिन्होंने इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल को देखा है, वे लोग यह मानते हैं कि इंदिरा गाँधी में अपार साहस, निर्णय शक्ति और धैर्य था।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’, ‘लौह महिला’, ‘भारत की साम्राज्ञी’ और भी न जाने कि कितने विशेषण दिए गए थे जो एक ऐसी नेता की ओर इशारा करते थे, जो आज्ञा का पालन करवाने और डंडे के जोर पर शासन करने की क्षमता रखती थी। मौजूदा जटिल दौर में देश के कई कोनों से नेतृत्व संकट की आवाज उठ रही है। कठिन चुनौतियों का सामना करते हुए उन्हें मजबूती से कुछ चीजों के, कुछ मूल्यों के पक्ष में खड़ा होना होता है और कुछ की उतनी ही तीव्रता से मुखालफत करनी होती है। आज भारत के इतिहास में इंदिरा गांधी की छवि कुछ ऐसे ही संकल्पशील नेता की है। इंदिरा गांधी 16 वर्ष देश की प्रधानमंत्री रहीं और उनके शासनकाल में कई उतार-चढ़ाव आए। अंतरिक्ष, परमाणु विज्ञान, कंप्यूटर विज्ञान में भारत की आज जैसी स्थिति की कल्पना इंदिरा गांधी के बगैर नहीं की जा सकती थी। हर राजनेता की तरह इंदिरा गांधी की भी कमजोरियां हो सकती हैं, लेकिन एक राष्ट्र के रूप में भारत को यूटोपिया से निकालकर यथार्थ के धरातल पर उतारने का श्रेय उन्हें ही जाता है। आॅपरेशन ब्लू स्टार के बाद उपजे तनाव के बीच उनके निजी अंगरक्षकों ने ही 31 अक्टूबर 1984 को गोली मार कर इंदिरा गांधी की हत्या कर दी थी।

Tuesday, 16 September 2014

मैजिक नहीं, धोखा था



लोकतंत्र में आप किसी को कुछ पल के लिए धोखा दे सकता है, आज न कल सच सामने आ ही जाता है। कुछ ऐसा ही रहा बीते दिनों हमारे यहां। भाजपा की ओर से मोदी लहर के नाम पर जनता को कुछ पल के लिए बरगलाने की कोशिश की गई। लंबे-चैड़े कोरे वादे किए गए, जो पूरे नहीं किए। सौ दिन के कार्यकाल की जमकर प्रोपगंडा की गई, लेकिन सच आखिर सच होता है। जनता को बार-बार कोई भी राजनीतिक दल भ्रमित नहीं कर सकता है। उपचुनावों के परिणामों में एक बार फिर से मोदी मैजिक की कलई खोल दी है। गुजरात में भाजपा की हार। राजस्थान में भाजपा की हार। उत्तर प्रदेश में भाजपा की हार। इससे पहले बिहार में हार। उत्तराखंड में हार। अव्वल तो यह भी कि जिस अमित शाह को मैन आॅफ द मैच से नवाजाने की पुरजोर कोशिश की, वह तो अपने पहले ही मैच में हार गए। उत्तर प्रदेश के उपचुनाव के नतीजों ने बता दिया लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से जितने भी वादे किए गए, केंद्र की मोदी सरकार उस पर खरा नहीं उतर सकी। जनता करने वाली सरकार को पसंद करती है न कि कहने वाले। भला कोरे आश्वासनों पर कौन भरोसा करेगा ?
सम की तीन सीटों में एक सीट पर बीजेपी, एक पर कांग्रेस जबकि एक सीट पर ।प्न्क्थ् को जीत हासिल हुई है। नौ राज्यों में तीन लोकसभा सीट और 33 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे आ गए हैं। लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली ऐतिहासिक जीत में बड़ी भूमिका यूपी से पार्टी को मिलीं 73 सीटों की थी। तत्कालीन यूपी प्रभारी अमित शाह को इस करिश्माई प्रदर्शन का इनाम पार्टी का अध्यक्ष बनाकर दिया गया। मोदी के खास सिपहसालार अमित शाह अपने पहले ही इम्तेहान में ही फेल हो गए। जिन राज्यों में गैर बीजेपी सरकारें थीं वहां तो बीजेपी फिसली ही, अपने राज्यों में भी उसकी भद पिट गई। जानने की कोशिश करते हैं कि किन 5 बड़ी वजहों से बीजेपी को करारी हार मिली।
 पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को चुनाव का प्रभारी बनाकर प्रदेश की जनता के बीच एक खास संदेश देने की कोशिश की। बीएसपी के चुनाव मैदान से हटने के बाद मुकाबला सीधे-सीधे सपा और भाजपा के बीच था लेकिन आज आए नतीजे ने जैसे पार्टी के दिग्गजों की बोलती बंद कर दी है। 13 सितंबर को राज्य की जिन 11 सीटों पर उपचुनाव हुए थे, उनमें से भाजपा को महज 4 सीटें मिलीं जबकि सपा के खाते में बाकी की सातों सीटें चली गईं। पार्टी के लिए ये इसलिए भी बहुत बड़ा झटका है क्योंकि चुनाव से पहले ये सभी सीटें बीजेपी की ही थीं।
उपचुनाव में बीजेपी के लिए बड़ा झटका है। यूपी में एसपी को 7 सीटों पर जीत मिली है, जबकि बीजेपी को 3 सीट मिली है। एक सीट के नतीजे आने बाकी हैं। गौरतलब है कि ये सभी 11 सीटें बीजेपी के पास थीं ऐसे में उपचुनाव के नतीजे बीजेपी के लिए बड़ा झटका माने जा रहे हैं। राजस्थान में भी बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा है। राजस्थान की चार में से तीन सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली है। वहीं बीजेपी को सिर्फ एक सीट मिली है। पहले ये चारों सीटें बीजेपी के पास थी। राजस्थान के सूरजगढ़, नसीराबाद और वैर सीट पर कांग्रेस का कब्जा हो गया है। बीजेपी के खाते में सिर्फ कोटा दक्षिण की सीट आई है। वहीं गुजरात में बीजेपी ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की। 3 पर कांग्रेस ने कब्जा कर लिया है। वडोदरा लोकसभा सीट बीजेपी ने जीत ली है। बीजेपी उम्मीदवार रंजन बेन भट्ट ने यहां से जीत हासिल की है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने अपना खाता खोला है। बशीरहाट सीट पर बीजेपी उम्मीदवार ने जीत हासिल की है। वहीं एक सीट पर टीएमसी की जीत हुई है। सम की तीन सीटों में एक सीट पर बीजेपी, एक पर कांग्रेस जबकि एक सीट पर ।प्न्क्थ् को जीत हासिल हुई है।
27 मई को नरेंद्र मोदी ने जोर-शोर के साथ देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली लेकिन उनकी पार्टी को महज दो महीने बाद ही 26 जुलाई को उत्तराखंड ने तगड़ा झटका लगा। जिस उत्तराखंड में वोटरों ने मोदी लहर पर सवार होकर पांचों लोकसभा सीट भाजपा को सौंप दी थीं, वहीं की धारचूला, डोईवाला और सोमश्वर सीट से कमल की बजाय पंजे को जीत मिली। उत्तराखंड के झटके के ठीक एक महीने बाद यानी 25 अगस्त को बीजेपी को बिहार में तगड़ा झटका लगा। यहां मोदी लहर की आंधी में नेस्तनाबूद हो चुके लालू यादव, नीतीश कुमार और कांग्रेस ने राज्य में अपना अस्तित्व बचाने के लिए हाथ मिला लिए। बीजेपी इस एकजुटता के सामना नहीं कर पाई और औंधे मुंह गिरी। उसे 10 में से महज 4 सीटें मिलीं। लालू-नीतीश गठबंधन को 6 सीटों पर जीत मिली जिसमें आरजेडी 3, जेडीयू 2 और कांग्रेस 1 सीट पर विजयी रही। खास बात ये है कि पिछले चुनाव में बीजेपी के पास इन 10 में से छह सीटें थीं।

Tuesday, 9 September 2014

चेहरा ही नहीं, चरित्र भी बदल रहा

चाल, चेहरा और चरित्र की बात करते थकने नहीं वाली भारतीय जनता पार्टी में सबकुछ बदल रहा है। पहले चेहरा बदला और अब चरित्र बदल रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित षाह ने तो सरेआम ऐलान कर दिया कि भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही नेतृत्व में चार राज्यों की विधानसभा चुनाव लड़ेगी। मुख्यमंत्री का निर्णय चुनाव परिणाम आने के बाद किए जाएंगे।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा बदल गई ? जो कांग्रेस पर आरोप लगाती रही है कि कांग्रेस ने मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम चुनाव के दौरान घोषित नहीं किया, उस भाजपा को अब क्या हो गया है ? विधानसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। ये बयान किसी स्थानीय नेता का नहीं बल्कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़ने और जीतने के बाद अब देखना होगा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी के नेतृत्व में किस तरह से विधानसभा चुनाव लड़ा जाता है।
ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ है। कई पुराने प्रसंग भी हैं। भाजपा के नेतृत्व में भी बदलाव आ रहा है। इनमें से कुछ बदलाव धीमे हैं, तो कुछ तेज। मगर तय है कि आने वाले वर्षों में राजनीति और समाज पर इनका गहरा असर पड़ेगा। विचारधारा के नजरिये से देखें, तो धर्मनिरपेक्षता के मामले में नेहरू के मॉडल में बदलाव दिख रहा है और उस नजरिये में, जिससे अब तक देश में सांप्रदायिकता की समस्या को परिभाषित किया जाता रहा है। नेहरू के समय में भारतीय राष्ट्रवाद एक क्षेत्र आधारित अवधारणा समझ्णी जाती थी, वर्तमान राजनीतिक व्यवस्?था में इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तौर पर देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। मोहन भागवत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे बड़े नेताओं का मानना है कि भारत की संस्कृति ही उसे राष्ट्र बनाती है, जो मुख्यतरू हिंदू संस्कृति ही है। उनका यह भी मानना है कि हिंदू संस्कृति केवल हिंदुओं तक सीमित नहीं है, सभी तरह की आस्?थाएं इसमें समाहित हैं। सुनने में यह भले अटपटा लगे, मगर संघ परिवार के अनेक नेता कहते आए हैं कि हिंदू संस्कृति और हिंदुत्व देश और उसके लोगों को पारिभाषित करता है। कुछ इसी सोच का उल्लेख नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में करते आए हैं। मगर भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में राष्ट्रीयता को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तौर पर देखने की कुछ सीमाएं भी हैं। यहां किसी खास संस्कृति के प्रभुत्व को धार्मिक अल्पसंख्यक अपनी पहचान और अस्तित्व के लिए खतरे के तौर पर देखते हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने अल्पसंख्यक समूहों को साफ संदेश दिया है कि चुनावी प्रक्रिया में उनके वोटों का अब उतना महत्व नहीं रह गया है, और उनके समर्थन के बगैर भी भाजपा पूर्ण बहुमत पा सकती है। इससे मुसलमानों और हिंदुओं में यह संकेत गया कि तमाम राजनीतिक दल द्वारा पहले की गई समुदाय आधारित गणनाओं की जरूरत नहीं थी।आज जरूरत इसकी है कि सरकार अल्पसंख्यकों को यह भरोसा दिलाए कि इस देश पर उनका भी बराबर हक है। बीते तीन महीनों में ऐसे कई मौके आए, जब प्रधानमंत्र्णी और उनके सहयोगी यह कर सकते थे। पुणे में मुस्लिम सॉफ्टवेयर इंजीनियर की हत्या और महाराष्ट्र सदन में शिवसेना के सांसद का रोजादार वेटर के मुंह में रोटी ठूंसने जैसी घटना का उपयोग भाजपा नेतृत्व मुसलमानों में पैठ बनाने में कर सकता था।
यह समझना होगा कि आबादी के एक बड़े तबके को दरकिनार करने की कोशिश देश के लिए अच्छी नहीं। इसके अलावा एक बड़ा बदलाव गवर्नेंस की कैबिनेट पद्धति में हो रहा है, जो अध्यक्ष्णीय प्रणाली में तब्दील होती दिख रही है। गुजरात के मुख्यमंत्र्णी रहते हुए नरेंद्र मोदी की यही शैली रही है। इसके अलावा प्रधानमंत्र्णी कार्यालय का बढ़ता प्रभुत्व, कैबिनेट सचिवालय का कम होता महत्व, नतीजतन नौकरशाही का बढ़ता प्रभाव व मंत्रियों के राजनीतिक प्रभाव में कटौती, ये कुछ ऐसी प्रवृत्तियां हैं, जो पहले भी इंदिरा गांधी के समय में देखी जा चुकी हैं। मगर जिस तरह कैबिनेट की बैठकें स्वतंत्र विचार के बजाय महज निर्देश ग्रहण करने का मंच बन गई हैं, उससे कैबिनेट की भूमिका का, और अंततरू पूरी राजनीतिक प्रक्रिया का क्षय होता दिख रहा है। नरेंद्र मोदी मानते हैं कि सहमति आधारित दृष्टिकोण से सरकार के कामकाज में कुशलता को बढ़ावा नहीं मिल सकता। उनके मुताबिक, निरंकुश व्यवस्था के जरिये ही सरकारी तंत्र से भ्रष्टाचार को दूर रखा जा सकता है।
भाजपा पहले ही एक पीढ़ीगत बदलाव कर चुकी है। हालांकि इसके पक्ष-विपक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं, पर इससे इन्कार नहीं कि उदारता मोदी की पहचान नहीं है। पर भाजपा की पुरानी पीढ़ी को भी, चाहे वह लालकृष्ण आडवाण्णी हों या मुरली मनोहर जोश्णी, समझना चाहिए कि उनका समय खत्म हो चुका है। अलबत्ता पचहत्तर से अधिक उम्र के लोगों को सक्रिय राजनीति से बाहर करने पर जोर एक नजीर की तरह लगता है। कया भारत भी चीन की तरह हर पांच-दस साल में पीढ़ीगत राजनीतिक बदलाव की राह पर चल पड़ा है?

कहीं हो न जाए मर्यादाओं की अनदेखी


दिल्ली में जो आजकल हो रहा है, वह नहीं होना चाहिए। जब हम या आप क्षमता नहीं होते हुए किसी चीज को पाने की कोषिष करते हैं, तो जाहिर है कि अनैतिक आचरण करते हैं। दिल्ली में सरकार के गठन को लेकर जिस प्रकार की कवायद हो रही है, उसने कई सवाल खड़े किए हैं। उस पर आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल का स्टिंग। जाहिर है जनता के मन में कई प्रकार के सवालों का उठना लाजिमी है।
असल में, सरकार का गठन कौन करे, लोकतंत्र में यह फैसला जनता मतदान के जरिये करती है। परंतु, सरकार गठन के तरीके पर जनता का अख्तियार नहीं होता। हां, उसे यह भरोसा होता है कि लोकतंत्र में सरकार गठन के लिए भी नियम-कायदे हैं, सो उनका पालन किया जायेगा। मुश्किल तब खड़ी होती है जब किसी एक दल के पक्ष में स्पष्ट जनादेश न हो। भारत जैसे बहुदलीय लोकतंत्र में ऐसा होना हरचंद संभव है। इसलिए अहम सवाल यह है कि क्या ऐसी स्थिति में सरकार बनाने में जुटे दल स्थापित मर्यादाओं की अनदेखी करेंगे? और, अगर ऐसी अनदेखी हो, तब इन मर्यादाओं की बहाली का दायित्व कौन संभालेगा?
दिल्ली में सरकार गठन को लेकर खींचतान से झांकती विद्रुपताओं की असल वजह किसी व्यक्ति या पार्टी में नहीं, बल्कि सरकार गठन से जुड़ी मर्यादाओं की बहाली और उसकी निगरानी से जुड़े तंत्र की विफलताओं में ही तलाशी जानी चाहिए। जिस पार्टी (भाजपा) ने दिल्ली विधानसभा में सर्वाधिक सीटें जीतीं, उसने जनादेश के बाद पूर्ण बहुमत नहीं होने का हवाला देते हुए स्वयं को सरकार गठन या जोड़-तोड़ की राजनीति से दूर रखा। लेकिन अब एक स्टिंग में उसी पार्टी के एक नेता को सरकार गठन के लिए विधायकों की बोली लगाते देखना-सुनना दुखद है। उधर, जिस पार्टी (आप) ने काफी हिचक के बाद सरकार बनायी और फिर जिम्मेवारियों से कन्नी काटते हुए बेहिचक इस्तीफा दे दिया, वह अब खुद को सरकार गठन की मर्यादाओं की प्रवक्ता के तौर पर पेश कर रही है।
दिल्ली के उप-राज्यपाल के पास किसी पार्टी ने बहुमत की दावेदारी या सरकार गठन के आमंत्रण के लिए कोई अनुरोध नहीं किया है और पहले गठित सरकार का हश्र उनके सामने है, फिर भी वे सरकार गठन के मोरचे पर सक्रिय हो गये हैं। राष्ट्रपति के फैसले का अभी इंतजार है। उधर, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई व्यवस्था देने से इनकार कर दिया है। दिल्ली में सरकार बनाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार हफ्ते का समय दिया है। केंद्र सरकार ने मंगलवार को कोर्ट को बताया कि ये मामला फिलहाल राष्ट्रपति के पास है। सरकार उनके आदेश का इंतजार कर रही है। कोर्ट ने सरकार को ये मोहलत देते हुए विधायकों की खरीद-फरोख्त की खबरों पर चिंता जताई। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में विधायकों की खरीद-फरोख्त पर चिंता जताई लेकिन चूंकि मामला राष्ट्रपति के पास है इसलिए चार हफ्तों का समय देना उचित समझा। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता आम आदमी पार्टी ने एक स्टिंग ऑपरेशन का हवाला देते हुए विधायकों की खरीद-फरोख्त का मामला उठाया और दिल्ली में जल्द चुनाव कराने की मांग की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभी राष्ट्रपति की राय का इंतजार करना चाहिए और इन आरोपों पर अगली सुनवाई में विचार किया जाएगा। उधर सुप्रीम कोर्ट के बाहर भी सरकार बनाने को लेकर बीजेपी और आम आदमी पार्टी में जंग जारी है।
यह चैतरफा बेचारगी की सूरत है, जिसका संकेत साफ है कि ऐसी स्थिति में सरकार गठन की मर्यादाओं की रक्षा को लेकर सर्वसम्मति से कोई रास्ता तलाशा जाये। सिर्फ दलबदल कानून या राज्यपाल के विवेक के भरोसे रह कर यह मान लेना कि सरकार गठन से जुड़ी मर्यादाओं का पालन हो जायेगा। एक ख्याली पुलाव ही बना रहेगा।

Tuesday, 10 June 2014

आजाद के अनुभवों से मिलेगा लाभ





कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद के संसदीय अनुभवों को देखते हुए कांग्रेस पार्टी की ओर से उन्हें राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है। गुलाम नबी आजाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक तेज-तर्रार नेता हैं। वह एक कुशल राजनेता हैं। कांग्रेस को उनके अनुभवों से लाभ मिलेगा।
गुलाम नबी आजाद का जन्म 7 मार्च, 1949 को जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में हुआ था। इनके पिता का नाम रहमतुल्लाह था। गुलाब नबी आजाद ने जम्मू-कश्मीर विश्वविद्यालय से प्राणि विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढाई संपन्न की। गुलाम नबी आजाद ने वर्ष 1980 में कश्मीर की एक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित गायिका शमीन देव आजाद के साथ विवाह संपन्न किया। इनके परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं। वर्ष 1973 में कांग्रेस के सदस्य के तौर गुलाम नबी आजाद ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। वर्ष 1973-1975 के बीच वह ब्लेस्सा  कांग्रेस समिति के ब्लॉक सचिव रहे।
 यहीं से उनके राजनैतिक जीवन को सही दिशा मिलनी प्रारंभ हो गई। वर्ष 1975 में गुलाम नबी आजाद जम्मू-कश्मीर युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और फिर 1977 में डोडा जिले के कांग्रेस अध्यक्ष बने। इसके बाद जल्द ही वह अखिल भारतीय युवा कांग्रेस के महासचिव बनाए गए। वर्ष 1982 में गुलाम नबी आजाद ने पहले केन्द्रीय उपमंत्री के तौर पर कानून, न्याय और कंपनी मामलों का मंत्रालय संभाला फिर कुछ ही समय बाद राज्य मंत्री बने। वर्ष 1985 में गुलाम नबी आजाद वशिम निर्वाचन क्षेत्र से दोबारा लोकसभा चुनाव जीतने के बाद गृह राज्य मंत्री बनाए गए। लेकिन उन्हें जल्द ही खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय सौंप दिया गया। इन सब के अलावा वर्ष 1978 से 1981 तक गुलाम नबी आजाद अखिल भारतीय मुस्लिम युवा कांग्रेस के भी अध्यक्ष रहे। 1986 में कांग्रेस कार्य समिति के भी सदस्य बनाए गए। इसके बाद वर्ष 1987 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव बने। गुलाम नबी आजाद नौ बार इस पद पर काबिज रहे। वर्ष 1990 में राज्यसभा में चयनित होने के बाद वह पी.वी. नरसिंह राव सरकार में संसदीय मामलों के केन्द्रीय मंत्री और बाद में पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्री बनाए गए। गुलाम नबी आजाद के जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष पद पर रहते हुए कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में 21 सीटों पर जीत हासिल हुई जिसके बाद वह प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनकर उभरी। मनमोहन सरकार में गुलाम नबी आजाद संसदीय मामलों के मंत्री रहे, लेकिन 2007 में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री पद के कारण उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में उन्हें स्वास्थ्य मंत्री का पद प्रदान किया गया था। स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए उन्होंने कई प्रकार के सुझाव दिए। जैसे लड़कियों का विवाह अगर 25-30 वर्ष के बीच किया जाए तो इससे जनसंख्या वृद्धि को रोका जा सकता है आदि बहुत प्रशंसनीय रहे।
उल्लेखनीय है कि इसके साथ ही यूपीए-2 में एक अन्य मंत्री रहे आनंद शर्मा को पार्टी ने उपनेता बनाया है। कांग्रेस के पास राज्य सभा (उच्च सदन) में विपक्ष के नेता का दावा करने के लिए अपेक्षित संख्या बल है। उच्च सदन में 245 सदस्य हैं और कांग्रेस की सदस्य संख्या 67 है। इस प्रकार सदन की कुल संख्या का 10 फीसदी अपेक्षित आंकड़ा कांग्रेस के पास है जो विपक्ष का नेता पद पाने के लिए जरूरी है। लोकसभा में कांग्रेस ने मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी का नेता बनाया है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को निचले सदन में कांग्रेस का उपनेता बनाया गया है। कांग्रेस की ओर से लोकसभा के लिए चीफ व्हिप और व्हिप के पदों का ऐलान कर दिया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को लोकसभा में कांग्रेस का चीफ व्हिप बनाया गया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिन्दर सिंह हुड्डा के सांसद बेटे दीपेंदर सिंह हुड्डा और केरल से सांसद केसी वेणुगोपाल को व्हिप नियुक्त किया गया है।

Sunday, 4 May 2014

वाणी पर संयम है जरूरी

हाल के ही मामलों को देखें तो चुनाव आयोग ने समाज में कटुता फैलाने एवं उन्मादी भाषणों पर भाजपा नेता अमित शाह और समाजवादी नेता आजम खान की रैलियों पर रोक लगा दी। यानी ये दोनों नेता उत्तर प्रदेश में लोकसभा के बाकी बचे चरणों में रैली, भाषण, जुलूस आदि में हिस्सा नहीं ले सकेंगे। लेकिन, चुनाव आयोग कार्रवाई करे या फिर चेतावनी दे, नेताओं के भड़काउ बोल रुकने का नाम नहीं ले रहे। एक के बाद एक नेताओं के बेतुके बयान सामने आ रहे हैं। डॉक्टर प्रवीण तोगडि़या और बिहार भारतीय जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता द्वारा की गई टिप्पणियों ने पुनः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के असली चेहरे को उजागर कर दिया है। डाक्टर प्रवीण तोगडि़या ने गुजरात के एक शहर के हिन्दू मोहल्ले में एक मुसलमान द्वारा मकान खरीदने पर सख्त ऐतराज जाहिर किया और उस क्षेत्र के हिन्दुओं से कहा कि वे मुसलमान द्वारा खरीदे जा रहे मकान पर कब्जा कर लें या उसमें आग लगा दें। इसी तरह, बिहार के गिरिराज सिंह ने कहा है कि जो भी नरेन्द्र मोदी का विरोध करता है उसे पाकिस्तान चले जाना चाहिए। डाक्टर प्रवीण तोगड़िया, संघ परिवार के एक बहुत ही महत्वपूर्ण सदस्य हैं। संघ परिवार की अनेक शाखाएं हैं,जिनमें एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण शाखा विश्व हिन्दू परिषद है। इस समय डाक्टर तोगड़िया विश्व हिन्दू परिषद के मुखिया हैं। इसी तरह, गिरिराज सिंह,जो भाजपा के लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार हैं, बिहार  मंत्रिपरिषद के सदस्य रहे हैं, नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद में वे भाजपा के प्रतिनिधि के रूप में शामिल रहे हैं। उनके पास महत्वपूर्ण विभाग रहे हैं।
सच तो यह भी है कि देश में लोकतांत्रिक इतिहास में यह लोकसभा चुनाव शायद सबसे ज्यादा अभ्रद भाषा के इस्तेमाल के लिए जाना जाएगा। विभिन्न दलों के नेता निरंतर एक-दूसरे के खिलाफ आपत्तिजतनक और अभद्र शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। राजनीतिक विरोध का स्तर पर इतना नीचे गिर गया है कि केंद्रीय मंत्री भी अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा निशाने पर रहे हैं। मोदी भी अपने विरोधियों के खिलाफ हमले करते निजी स्तर तक चले जाते हैं। हालांकि मोदी ने भी रक्षा मंत्री एके एंटनी और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को ‘पाकिस्तान का एजेंट’ कहा। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढते जा रहे हैं नेताओं की जुबान और भी ज्यादा तल्ख होती जा रही है। विरोधियों पर वार करने में नेता कब मर्यादा की सीमा लांघ जा रहे हैं पता ही नहीं चल रहा। कभी अमित शाह, आजम खान तो कभी गिरिराज शाह, मानो हर नेता में दूसरे से ज्यादा तीखे और बेतुके बयान देने की होड़ लगी है। इसी कड़ी में एक और नाम जुड़ गया है राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष अजित सिंह का। अलीगढ़ की एक सभा में बोलते हुए अजित सिंह ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की तुलना बकरे से कर डाली। और उसके बाद राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने मोदी से बेहतर तो कसाई को बता दिया।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी की सरकार पर आरोप लगाया कि वह किसानों की जमीन चुरा रहे हैं। उन्होंने मोदी का नाम लिए बगैर कहा वह ‘नाजी तानाशाह एडोल्फ हिटलर’ की तरह काम करते हैं। वैसे, मोदी राहुल को अक्सर ‘शहजादा’ कहते रहे हैं और उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ इतालवी मरीन के मुद्दे को लेकर निशाना साधा। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद ने मोदी को ‘टुकडे-टुकडे करने’ वाला बयान देकर विवाद खडा किया। इस बयान को लेकर उन्हें जेल की हवा खानी पडी. विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा, ‘हम तुमको (मोदी) लोगों की हत्या करने का आरोपी नहीं बता रहे हैं। हमारा आरोप है कि तुम नपुंसक हो।’ केंद्रीय कृषि मंत्री और राकांपा प्रमुख शरद पवार ने कहा कि मोदी को मानसकि अस्पताल में उपचार कराने की जरूरत है।
भाजपा नेता और पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस वोटरों को भाजपा का नाम ले ले कर धमका रही है, तो दूसरी तरफ आरएलडी अध्यक्ष अजित सिंह ने मोदी को बकरा बता दिया। वहीं बिहार के भागलपुर में एक रैली में बोलते हुए जेडीयू नेता शकुनि चैधरी ने मोदी को वहीं गाड़ देने की बात कही। गिरिराज सिंह अकेले नहीं हैं, जो इस बार के चुनाव में भड़काऊ बोल बोल रहे हैं। इससे पहले भी कई नेता इस तरह के बोल बोल चुके हैं। शिकायतों पर चुनाव आयोग ने कार्रवाई भी की है, लेकिन फिर भी चुनावी समर में अपनी-अपनी जीत देख रहे ये नेता जोश में जनता के सामने बेतुके बोल बोलने का सिलसिला जारी रखे हुए हैं।
नेताओं की बदजुबानी की कहानी यहीं नहीं रुकती। हाल ही में राजद छोड़ जेडीयू में शामिल हुए शकुनी चैधरी एक कदम और आगे बढ़कर मोदी पर हमला बोलते हैं। बिहार के भागलपुर में नीतीश कुमार के सामने मंच पर खड़े शकुनी चैधरी जोश में जनता से वादा करते हैं कि अगर उनका साथ मिला तो वो मोदी को भागलपुर में ही गाड़ देंगे। बीजेपी नेता नितिन गडकरी भी विरोधियों पर निशाना साध रहे हैं। नेताओं की बदजुबानी को लेकर चुनाव आयोग में लगातार शिकायतें हो रही हैं। आयोग चेतावनी देने से लेकर रैलियों, जनसभाओं, रोड शो पर रोक तक लगा दे रहा है। लेकिन लगता है कि ऐसे बेतुके बयान देने वालों नेताओं को चुनाव आयोग की इन कार्रवाइयों का भी कोई डर नहीं। तभी तो तमाम कोशिशों के बाद भी नेताओं की जबान पर लगाम नहीं लग रही है।
राजनीति में लोग एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते रहते हैं लेकिन कोई मंत्री या नेता अपनी मर्यादा को भूल जाए..बड़ी शर्मनाक बात है। चुनाव आयोग ने सही समय पर कदम उठाया नहीं तो आने वाले दिनों में अमित शाह और आजम खान दोनों अपने-अपने वोटों के ध्रुवीकरण के लिए आपत्तिजनक, उकसावे और उन्मादी बयानों का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं भय रहित चुनाव संपन्न कराने का पूरा दारोमदार चुनाव आयोग पर होता है। लेकिन कई बार ऐेसा भी देखने में आता है कि नेता आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करते हैं लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती। उन्हें नोटिस जारी कर महज कागजी खाना-पूर्ति की जाती है। चुनाव आयोग को बिना भेद-भाव किए आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले नेताओं पर कार्रवाई करनी चाहिए। हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कुछ अधिकारियों का तबादला करने से इंकार कर दिया था, लेकिन जैसे ही चुनाव आयोग सख्त हुआ ममता को झुकना पड़ा। चुनाव आयोग को कुछ इसी तरह की कार्रवाई आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले सभी मामलों में करनी चाहिए। कार्रवाई का भय होगा तभी नेता आपत्तिजनक, भड़काऊ और उन्मादी बयान देने से परहेज करेंगे।



Saturday, 5 April 2014

कांग्रेस में है दम


भारतीय राजनीति में कांग्रेस का हमेशा दबदबा रहा है और ज्यादातर समय यही पार्टी सत्तारुढ़ रही है। पिछले दस वर्षों से भी यही सत्ता पर काबिज है। हालंाकि, वर्तमान लोकसभा चुनाव 2014 में पार्टी को थोडे़ मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अमूमन यह होता है, जब आप सत्ता में लंबे समय तक रहते हैं। दिल्ली में बैठकर कुछ लोगों को यही लगता है कि कांग्रेस का तो इस बार पूरा सूपड़ा हो जाएगा ? इसको वे भरसक प्रचारित भी करते हैं। जबकि वास्तविकता के धरातल पर ऐसा नहीं है।
दिल्ली से तो यही बात फैलाई जा रही है कि कांग्रेस विरोधी लहर हवा में है और ज्यादातर लोगों का मानना है कि मनमोहन सरकार नाकाम रही है। जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर है। कांग्रेस आज भी सर्वधर्म समभाव का भाव लेकर चलती है। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर। यही तो हमारा सिद्धांत रहा है। हम कहने से अधिक करने में विष्वास रखते हैं। तमाम विरोधी राजनीतिक दल भ्रष्टाचार को लेकर बावेला काटने पर उतारू हैं, क्या उन्हें यह नहीं पता है कि यह कांग्रेस और यूपीए की ही सरकार थी, जिसे सूचना के अधिकार के रूप में एक अचूक हथियार जनता को दिया है भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए। हाल के वर्षों में जितने भी घोटालों का पर्दाफाष हुआ है, क्या यह सूचना के अधिकार के बदौलत नहीं है? कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन ने दस साल में देश का विकास किया है। कांग्रेस ने नरेगा के माध्यम से देश के 82 करोड़ लोगों को रोजगार देने का काम किया है।यूपीए ने गरीब और किसानों के लिए जो ग्रामीण रोजगार योजना, उपज के दामों में वृद्धि व कर्ज माफी की आर्थिक प्रक्रिया चलाई थी, उसी अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए एक बार फिर यूपीए को मौका मिलेगा। सर्वशिक्षा अभियान, मिड डे मील योजना, ग्राणीम स्वाथ्य सेवा योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी योजनाओं को भला आप कैसे दरकिनार कर सकते हैं ? साथ ही सूचना के अधिकार और लोकपाल बिल को संसद में पेश किए जाने का श्रेय मनमोहन सिंह सरकार को नहीं दिया जाना चाहिए ? जब हम गठबंधन के दौर में होते हैं, तो कई तरह की परेषानियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन जिस प्रकार से यूपीए सरकार ने भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया, चाहे वह कितना भी रसूखदार हो, वह काबिलेतारीफ है। कांग्रेस ने हमेषा भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसा है। आज भी कई आरोपों की जांच हो रही है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
ऐसा नहीं है कि हम सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं। कांग्रेस का सबसे बुरा प्रदर्शन 1999 में रहा था जब यह पार्टी मात्र 114 सीट जीत पाई थी, इसकी सफलता का प्रतिशत मात्र 20.91 था। जहां तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का सवाल है तो 1984 में हुए आम चुनाव में इस पार्टी ने 415 सीट जीत कर ऐतिहासिक सफलता रची थी। उस वक्त इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और इससे उपजी सहानुभूति की लहर का लाभ कांग्रेस को मिला था। इसकी सफलता का प्रतिशत 77.86 था। इतनी सफलता तो कांग्रेस को पहले चुनाव में भी नहीं मिली थी। अब तक यह पार्टी चार सौ सीटों का आंकड़ा एक बार, तीन सौ सीटों का आंकड़ा पांच बार, दो सौ सीटों का आंकड़ा तीन बार और सौ का आंकड़ा छरू बार पार कर चुकी है। 114 सीट इसका न्यूनतम स्कोर है। बेषक, कुछ लोग तमाम हथकंडे का प्रयोग करके हवा बनाने की जुगत कर रहे हांे, लेकिन देष की जनता जानती है कि कौन उनके लिए बेहतर सरकरा लाएगा ? कौन बेहतर सुविधा मुहैया कराएगा? कांग्रेस की काबिलियत से पूरे देष की जनता वाकिफ है।

Monday, 17 February 2014

कांग्रेस में सम्मान, संघ में नहीं स्थान


कांग्रेस हमेशा से बिना किसी भेदभाव के समाज के हर तबके की बात की है। उसके विकास और सम्मान की बात की है। न तो जाति का भेद और न ही जाति का। न तो लिंग का भेद और न ही प्रदेश का। हमेशा आम आदमी और उसके विकास के लिए नीतियां बनाती रही है कांग्रेस। वहीं, दूसरे कई राजनीति दल और उनके मातृसंगठन के लिए महिला मानो अछूत हों। क्या आपने कभी सुना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक के रूप में किसी महिला का नाम आया है? आखिर, मातृशक्ति से ऐसा दुराव क्यों? आखिर कथनी और करनी में अंतर क्यों?
कांग्रेस पार्टी ने हमेशा से महिला सशक्तीकरण की बात की है। जब से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभाली इस ओर और भी अधिक प्रयास किए। 16 फरवरी को अपनी नीति पर अमल करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने महिला सशक्तिकरण का वादा किया और कहा कि कांग्रेस का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया में ज्यादा महिलाओं को आगे लाने की है। उन्होंने भाजपा और आरएसएस पर प्रत्यक्षत: हमला करते हुए कहा कि विपक्ष महिलाओं का सम्मान नहीं करता और उनके विचारधारात्मक संगठन में महिलाओं के लिए जगह नहीं है। राहुल गांधी ने कहा है कि जब तक हम महिलाओं को सशक्त नहीं करेंगे, भारत महाशक्ति नहीं बन सकता। जहां-जहां महलाओं को सशक्त किया गया और उन्हें अवसर दिए गए, वे देश तेजी से आगे बढ़े। हम महिलाओं को सियासत में बराबरी देना चाहते हैं..पंचायतों में, विधानसभाओं में, संसद में ज्यादा महिलाएं दिखनी चाहिए। राहुल गांधी ने महिलाओं से अपील करते हुए कहा कि हम इस देश की प्रगति में आपकी शक्ति का उपयोग करना चाहते हैं। हम महिलाओं के लिए स्कूलों, अस्पतालों और संसद का दरवाजा खोलना चाहते हैं, क्योंकि आपके बगैर कोई प्रगति नहीं है।
सच तो यही है कि राहुल गांधी की यही तमन्ना है कि ऐसे दिन आएं जब महिलाएं बिना किसी डर-भय के शाम में, रात में निकल सकें, बसों में सफर कर सकें। इससे पूर्व भी महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध की पृष्ठभूमि में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा था कि उनके सशक्तीकरण के लिए कानून बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें जमीनी स्तर पर उचित ढंग से लागू करना भी जरूरी है। श्रीमति सोनिया गांधी ने कहा था कि हम महसूस करते हैं कि बस कानून बना देना एवं नीतियां घोषित कर देना ही महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काफी नहीं होगा। इसके साथ ही नीतियों एवं कानूनों को जमीनी स्तर पर उचित ढंग से लागू भी करना होगा। हमें महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार की हिंसा खत्म करनी चाहिए और ऐसे सभी कदम उठाने चाहिए, जिससे महिलाएं सुरक्षित महसूस कर सकें, बेखौफ बनें, सशक्त बनें तथा उन्हें सम्मान प्राप्त हो।
महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए सामाजिक क्रांति शुरू करने की अपील करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा था कि सबसे मूलभूत मुद्दा यह है कि हमारे समाज की मानसिकता एवं पुरानी सोच बदलनी चाहिए। पुरुषों की तरह ही महिलाओं को भी समान अधिकार देना एक बड़ी चुनौती है और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव की दीवार गिरनी चाहिए। हम सभी जानते हैं कि हमारे बच्चों के सामाजिक दृष्टिकोण का निर्माण अपने घरों की चारदीवारी के भीतर होता है। परिवार में लड़की को उसके भाई के समान ही दर्जा दिया जाना चाहिए। परिवार में लड़कियों को भी शिक्षा, विकास एवं सशक्तीकरण का अधिकार है जैसा कि लड़के को होता है।
दूसरी ओर भाजपा की मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महिलाओं से भेदभाव करता है। महिलाओं की आधी दुनिया से संघ की दूरी है। भले ही संघ के अनेक प्रकल्पों से महिलाएं जुड़ी हुई हों, मगर मूल संगठन में उन्हें कोई स्थान नहीं है। इस लिहाज से संघ को यदि पुरुष प्रधान कहा जाए, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। संघ ने महिलाओं की भी शाखाएं गठित करने पर कभी विचार नहीं किया। आज जब कि महिला सशक्तिकरण पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, महिलाएं हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं, संघ का महिलाओं से जुड़ाव नहीं हो रहा है। आखिर क्यों?
गौर करने योग्य यह भी है कि मानव-सभ्यता जब पृथ्वी पर पनपने लगी तो पुरुष ने अपनी शारीरिक सामर्थ्य का फायदा उठाते हुए पहला अधिकार स्त्री पर जताया था। महिलाओं के शोषण की कहानी वहीं से शुरू हो गई थी। संपत्ति पर अधिकार का सिलसिला उसके बाद शुरू हुआ। वर्ष 1848 में सोनेका फाल्स में आयोजित महिला-अधिकार सम्मेलन में जारी किए गए घोषणा-पत्र में कहा गया था कि मानवता का इतिहास पुरुष द्वारा स्त्री पर लगातार अत्याचार और उस पर आधिपत्य जमाने की गाथा मात्र है। प्राचीन रोमन साम्राज्य में महिलाओं को पुरुष के स्वामित्व वाला प्राणी समझा जाता था। फ्रांस में उन्हें आधी आत्मा वाला जीव समझा जाता था, जो समाज के विनाश के लिए जिम्मेदार था। चीनवासी महिलाओं में शैतान की आत्मा के दर्शन करते थे। इस्लाम के प्रचार से पहले अरबवासी लड़कियों को जिंदा दफ्न कर दिया करते थे। भारत में भी सीता से लेकर द्रौपदी तक स्त्रियां विभिन्न प्रकार की अग्नि-परीक्षा से गुजरती रही हैं। कन्या हत्या के पाप से जब भारतवासी मुक्त होने लगे थे तो सहज ही कन्या-भ्रूण हत्या सामाजिक व्यवस्था में स्थापित हो गई थी। मापदंड और तरीके भिन्न हो सकते हैं, पर महिलाओं के प्रति भेदभाव और शोषण एक विश्वव्यापी सामाजिक परिदृश्य है। इसे सभ्यता-दोष मान कर सभी को इसके निराकरण के उपाय ढूंढ़ने की जरूरत है। महिला सशक्तीकरण की बात करने से पहले इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ने की आवश्यकता है कि क्या वास्तव में महिलाएं अशक्त हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि अज्ञानवश या निहित स्वार्थों ने एक षड्यंत्र के तहत एक असत्य को बार-बार सत्य बता कर उसे सत्य के रूप में स्थापित कर दिया गया हो? मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक तथ्य यह साबित करते हैं कि वह प्राणी जिसे हम ह्यऔरतह्ण कहते हैं, जन्म से औरत नहीं होती, उसे समाज द्वारा ह्यऔरतह्ण बनाया जाता है। वह अशक्त नहीं, अशक्त बताई जाती है। प्रकृति ने स्त्री और पुरुष दोनों को अलग-अलग प्रकार की शक्तियां देकर एक समान रूप से सशक्त बनाया है। पुरुष में अगर शारीरिक सामर्थ्य थोड़ी ज्यादा है तो स्त्री में शारीरिक शक्ति का संवरण करने की शक्ति पुरुष से अधिक होती है। इसका प्रमाण है कि भारत में महिलाओं की औसत आयु पुरुषों की औसत आयु से लगभग पांच वर्ष अधिक है।  भावनात्मक रूप से महिलाएं पुरुषों से अधिक संतुलित होती हैं। विषम परिस्थितियों से शीघ्र बाहर निकल कर संयमित हो जाने और दर्द सहने की क्षमता स्त्रियों में पुरुषों से अधिक होती है। मानसिक प्रबलता और कार्य-निपुणता में महिलाएं अगर पुरुषों से इक्कीस नहीं तो उन्नीस भी नहीं हैं।
समाज में पुरुष के वर्चस्व की कीमत सभी सभ्यताओं ने सदैव चुकाई है। जनसंख्या के आधे भाग के योगदान के अभाव में समाज की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रगति की दर उतनी नहीं बढ़ पाई, जितनी शायद संभव थी। वर्ष 2011 के इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार प्रदान करते समय भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि राष्ट्र की आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की उचित भागीदारी के बिना सामाजिक प्रगति की अपेक्षा रखना तर्कसंगत नहीं होगा।
वर्ष 2009 में संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया की सबसे बड़ी पांच सौ कंपनियों (फारचून 500) में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक सर्वेक्षण कराया था। निष्कर्ष यह निकला था कि जिन कंपनियों के प्रबंधन में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिला था उनमें निवेशकों को तिरपन प्रतिशत अधिक लाभांश और चौबीस प्रतिशत अधिक बिक्री का फायदा मिला था। जाहिर है, महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करके आर्थिक प्रगति की रफ्तार बढ़ाई जा सकती है।
भारत सरकार महिला सशक्तीकरण के प्रति सदैव सकारात्मक रही है। वर्ष 2001 में महिला सशक्तीकरण से संबंधित राष्ट्रीय नीति की घोषणा की गई थी। इस बहुआयामी नीति में महिलाओं के विकास का वातावरण तैयार करने, समानता के साथ राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक विकास में भागीदारी सुनिश्चित करने, भेदभाव समाप्त करने, महिलाओं के प्रति हिंसा को रोकने और सभी क्षेत्रों में विकास और भागीदारी के एक समान अवसर उपलब्ध कराने का आह्वान किया गया है।
यह कांग्रेस और यूपीए की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के कुशल नेतृत्व का ही कमाल रहा था कि राष्ट्रीय नीति के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हुए वर्ष 2010 में महिला सशक्तीकरण राष्ट्रीय मिशन ‘मिशन पूर्ण शक्ति’ की स्थापना की गई थी। संयुक्त राष्ट्र ने भी महिला सशक्तीकरण के पांच-आयामी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन दिशा-निदेर्शों में महिलाओं को राष्ट्रीय मुद्दों पर निर्णायक भूमिका निभाने, विकास के समान अवसरों की उपलब्धता, व्यक्तित्व की महत्ता और स्वेच्छा से जीवन के फैसले करने के अधिकार को अधिमान दिया गया है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में महिला सशक्तीकरण के नियामकों को सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में निर्धारित करने की जरूरत है। दो तिहाई मजदूरी के कार्यों को करने के बाद भी महिलाएं केवल दस प्रतिशत संपत्ति और संसाधनों की मालिक हैं। भूमि पर मालिकाना हक से संबंधित अधिकारों में महिलाओं के हक को जमीनी सतह पर स्थापित करने की आवश्यकता है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन करके पुश्तैनी जमीन में लड़कियों को लड़कों के बराबर अधिकार दे दिया गया है। पर लड़कियों को इस अधिकार की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। इसके लिए एक सामाजिक क्रांति की जरूरत होगी।


Friday, 27 December 2013

सामाजिक सरोकार से सरोबार रही कांग्रेस


कांग्रेस के स्थापना दिवस 28 दिवस पर विशेष 



वर्ष 2010 की बात है। 19 दिसंबर को कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने लाखों पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, ‘हम लोगों की ऐसी पार्टी है जिसका गरिमापूर्ण भूतकाल है। हमारी पार्टी भविष्य की पार्टी है, इसलिए हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह हरेक भारतीय के बीच उम्मीद जगाए रखे। यह हमारी पुकार है और हमारा दायित्व भी है। इस महाधिवेशन से यह संदेश लोगों के बीच जाना चाहिए कि कांग्रेस को अपनी शक्ति, अपनी जिम्मेवारी का बोध है। हम सब मिलकर ही अपनी शक्ति बढ़ा सकेंगे। हम सब एकजुट होकर ही अपना दायित्व निभा सकेंगे। हम सब मिलकर ही आम लोगों द्वारा अपने प्रति कायम आस्था एवं विश्वास के अनुरूप अपने को साबित कर सकते हैं।’
मौका था कांग्रेस अधिवेशन का। इसी अधिवेशन में कांग्रेस के उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने कहा, ‘ भारत में ‘आम आदमी’ वह है, जो देश की प्रणाली से जुड़ा हुआ नहीं है। चाहे वह गरीब हो अथवा धनी, हिन्दू, मुसलमान, सिख या ईसाई हो, शिक्षित हो अथवा अशिक्षित, यदि वह देश की प्रणाली से जुड़ा हुआ नहीं है तो वह एक आम आदमी है। हम उन्हें आम आदमी कह सकते हैं, परन्तु वास्तव में वह अनोखा है। उनमें पर्याप्त क्षमता, बुद्धि एवं शक्ति है। वह अपने जीवन के हर दिन इस देश के निर्माण में लगा रहता है, परन्तु हमारी प्रणाली हर कदम पर उन्हें कुचलती रहती है....हम लोग तब तक किसी राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते जब तक कि हम एक ऐसी प्रणाली का निर्माण नहीं कर लेते, जिसमें किसी व्यक्ति की प्रगति इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि वह किस-किस को जानता है, बल्कि वह क्या जानता है। यह हमारी पीढ़ी के सामने एक चुनौती है।’
दरअसल, कांग्रस के दो वरिष्ठ नेताओं का वक्तव्य यह बताने के लिए काफी है कि कांग्रेस ने हमेशा ही आम आदमी और जन सरोकार से जुड़े मुद्दों को ही उठाया है। राजनीति पार्टी के लिए सेवा का सबसे सशक्त माध्यम रही है। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना, 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति के साथ 28 दिसम्बर 1885 को बॉम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में हुई थी। इसके प्रथम महासचिव (जनरल सेक्रेटरी) ए ओ ह्यूम थे एवं कोलकता के वोमेश चंद्र बैनर्जी प्रथम पार्टी अध्यक्ष थे। अपने शुरूवाती दिनों में कॉंग्रेस का दृष्टिकोण एक कुलीन वर्गीय संस्था का था। इसके शुरूवाती सदस्य मुख्य रूप से बॉम्बे और मद्रास प्रैजिÞडेंसी से थे। स्वराज का लक्ष्य सबसे पहले बाल गंगाधर तिलक ने अपनाया था। 1907 में काँग्रेस में दो दल बन चुके थे, गरम दल एवं नरम दल। गरम दल का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं बिपिन चंद्र पाल(जिन्हें लाल-बाल-पाल भी कहा जाता है) कर रहे थे। नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता एवं दादा भाई नौरोजी कर रहे थे। गरम दल पूर्ण स्वराज की मांग कर रहा था परन्तु नरम दल ब्रिटिश राज में स्वशासन चाहता था। प्रथम विश्व युद्ध के छिड़ने के बाद सन 1916 की लखनऊ बैठक में दोनों दल फिर एक हो गए और होम रूल आंदोलन की शुरूआत हुई जिसके तहत ब्रिटिश राज में भारत के लिए अधिराज्य अवस्था(डॉमिनियन स्टेटस) की माँग की जा रही थी। परन्तु 1916 में गांधी जी के भारत आगमन के साथ काँग्रेस में बहुत बड़ा बदलाव आया। चम्पारन एवं खेड़ा में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जन समर्थन से अपनी पहली सफलता मिली। 1919 में जालियाँवाला बाग हत्याकांड के पश्चात गांधी जी कॉंग्रेस के महासचिव बने। गांधीजी के मार्गदर्शन में कॉंग्रेस कुलीन वर्गीय संस्था से बदलकर एक जनसमुदाय संस्था बन गयी। तद्पश्चात राष्ट्रीय नेताओं की एक नयी पीढ़ी आई जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरु, डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई एवं सुभाष चंद्र बोस शामिल थे। गांधीजी के नेतृत्व में प्रदेश काँग्रेस कमेटियों का निर्माण हुआ, काँग्रेस में सभी पदों के लिए चुनाव की शुरूआत हुई, सभी भेद-भाव हटाए गए एवं कार्यवाहियों के लिए भारतीय भाषाओं का प्रयोग शुरू हुआ। काँग्रेस ने कई प्रान्तों में सामाजिक समस्याओं को हटाने के प्रयत्न किये जिसमें छुआछूत, पर्दाप्रथा एवं मद्यपान शामिल थे। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत के मुख्य राजनैतिक दलों में से एक रही है। इस दल के कई प्रमुख नेता भारत के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गांधी एवं राजीव गांधी इसी दल से थे। कांग्रेस भारत की वर्तमान गठबंधन सरकार का मुख्य दल है, एवं वर्तमान भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी इसी दल से हैं।
कांग्रेस का जन्म सिर्फ आर्थिक शोषण और राजनीतिक दासता के कारण ही नहीं हुआ। इसमें संदेह नहीं की कि कांग्रेस के राजनीतिक लक्ष्य भी थे, लेकिन वह राष्ट्रीय पुनर्जागरण आंदोलन का अंग और अभिव्यक्ति मंच भी बन गयी थी। कांग्रेस के जन्म से पचास साल से भी पहले से राष्ट्रीय पुनर्जागरण की शक्तियां काम कर रही थीं। वास्तव में राजा राम मोहन राय के समय से ही राजनीतिक जीवन में सुगबुगाहट शुरू हो गयी थी। एक तरह से राममोहन राय को भारतीय राष्ट्रवाद का मसीहा और आधुनिक भारत का जनक माना जाता है। उनका दृष्टिकोण बहुत व्यापक था और वे सच्चे अर्थों में युगद्रष्टा थे। यह सही है कि अपनी सुधारवादी गतिविधियों में उन्होंने सबसे अधिक ध्यान अपने समय की सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों पर दिया। लेकिन उन्हें अपने समय में देश पर हो रही भयंकर राजनीतिक ज्यादतियों का पूरा एहसास था और उन्होंने इन ज्यादतियों से जल्दी से जल्दी मुक्ति पाने के लिए अथक संषर्घ किया। १७७६ में जन्मे राममोहन राय का निधन  1833 में ब्रिस्टल में हुआ। उनका नाम भारत के दो प्रमुख सामाजिक सुधारों से जुड़ा हुआ है। यह है सतीप्रथा का अन्त, और देश में पश्चिमी शिक्षा की शुरूआत। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे इंग्लैंड गये। आजादी के लिए उनकी तड़प इनती अधिक थी कि उत्तमाशा अन्तरीप पहुंचाने पर उन्होंने आग्रह किया कि उन्हें फ्रांस के उस जहाज पर ले जाया जाए जिस पर उन्होंने आजादी का ध्वज फहराता देखा था ताकि वे उस ध्वज के प्रति सम्मान व्यक्त कर सकें। ध्वज को देखते ही वे चिल्ला पड़े, ''ध्वज ही जय हो'', ''जय हो'' यद्यपि वे इंग्लैंड मूल रूप से मुगल सम्राट के दूत के रूप में लंदन में उसके हितों की वकालत करने गये थे लेकिन हाउस आफ कामन्स की समिति के समक्ष भारतीयों की कुछ ज्वलंत समस्याओं का उल्लेख करने से नहीं चुके। उन्होंने भारत की राजस्व व्यवस्था, भारत की न्यायिक व्यवस्था और भारतीय माल की स्थिति के बारे में तीन पत्र समिति में पेश किए। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने उनके सम्मान में सार्वजनिक रूप से रात्रिभोज का आयोजन किया। 1832 में जब ब्रिटिश संसद में चार्टर कानून पर विचार हो रहा था तो उन्होंने कसम खाई कि यदि यह विधेयक पास न हुआ तो वे ब्रिटिश उपनिवेश छोड़कर अमरीका में रहने लगेंगे। 1858 में भारत में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गयी तथा 1861 और 1863 के बीच उच्च न्यायालय और विधान परिषदें कायम की गयीं। सैनिक क्रांति से कुछ ही दिन पहले 'विधवा पुनर्विवाह कानून' और ईसाई धर्म स्वीकार करने से सम्बद्ध कानून पास किए गए। 1860 के दशक में पश्चिमी शिक्षा और साहित्य में निकट सम्पर्क कायम हुआ। पश्चिमी कानूनी और संसदीय प्रक्रियाएं अपनाये जाने से कानून और विधान के क्षेत्र में नए युग का सूत्रापात हुआ। पूर्व पर पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव ने भारतीय जनता के विश्वासों और भावनाओं पर गहरा असर डाला।
केवल बंगाल, बम्बई और मद्रास प्रांतों में ही आधुनिक पद्धति पर थोड़ी बहुत शिक्षा उपलब्ध हुई। इस प्रांतों में भी शिक्षित लोगों की संख्या बहुत कम थी। सैनिक क्रांति के बाद की परिस्थितियों में इन शिक्षित लोगों को अपनी महत्वकाक्षाएं पूरी करने का काफी अवसर मिला। इन लोगों ने अपने अँग्रेज आकाओं की तरह सोचना शुरू कर दिया और पश्चिमी से आने वाली हर चीज का समर्थन और अनुसरण किया। अँग्रेजों के अंधानुकरण का यह दौर बंगाल में विशेष रूप से मुखर था। लेकिन जल्दी ही इस प्रक्रिया का विरोध होने लगा और यह विरोध कई रूपों में सामने आया। कभी पश्चिमी और पूर्व के समन्वय के रूप में और कभी अतीत को वापस लौटते पुनर्जागरण के रूप में। राममोहन राय के जीवन काल में बोए गए धार्मिक सुधारकों के बीज फलित होने लगे। राममोहन राय के उत्तराधिकारी केशव चन्द्र सेन ने ब्रह्म समाज का दूर-दूर तक प्रचार किया और उसके सिद्धांतों को नई समाजोपयोगी दिशा दी। उन्होंने आत्म संयम आंदोलन पर ध्यान केंद्रित किया और इंग्लैंड के सुधारकों का समर्थन किया। 1872 में कानूनी विवाह अधिनियम-३ पास कराने में उनका काफी बड़ा हाथ था। बंगाल में ब्रह्?म समाज के प्रसार का पूरे देश पर असर पड़ा। पूना में इस आंदोलन में एम.जी. रानाडे के नेतृत्व में प्रार्थना समाज बना। एम.जी. रानाडे को समाज सुधार आंदोलन के प्रणेता के रूप में याद किया जाता रहेगा। यह आंदोलन लम्बे समय तक कांग्रेस से जुड़ा रहा। इस सुधारवादी आंदोलन की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि यह अतीत की परंपराओं और देश में सदियों से चले आ रहे विश्वासों और मान्यताओं का विरोधी था। विरोध की यह भावना पश्चिमी संस्थाओं की अनावश्यक चकाचौंध से जन्मी थी और इससे जुड़ी हुई राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने इसे और प्रखर बना दिया। राष्ट्र की पारम्परिक मान्यताओं की विरोध की इस प्रवृत्ति का सुधारवादी आंदोलनों द्वारा विरोध होना स्वाभाविक ही था।
उत्तर पश्चिम में स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज और दक्षिण में थियोसोफिकल आंदोलन ने पश्चिमी शिक्षा और आचार के साथ आयी पाखंड और धर्मान्धता की भावना को पनपने से रोकने के लिए दीवार का काम किया। यह दोनों ही आंदोलन घोर राष्ट्रवादी थे। केवल दयानन्द सरस्वती की प्रेरणा से जन्में आर्य समाज का राष्ट्रवाद कुछ अधिक प्रखर था। आर्य समाज ने वेदों और वैदिक संस्कृति की श्रेष्ठता और आमोघता का प्रचार तो किया लेकिन साथ ही वह व्यापक सामाजिक सुधारकों का हिमायती नहीं था। इस प्रकार उसने राष्ट्र में एक प्रबल पौरुष की भावना पैदा की जो उसकी विरासत और वातावरण के सर्वोत्तम समन्वय का प्रतीक थी। उसने हिन्दू धर्म के धार्मिक अंधविश्वासों और उस समय की सामाजिक बुराइयों के खिलाफ उसी तरह से संघर्ष किया जैसे ब्रह्?म समाज ने बहुदेववाद, मूर्तिपूजा और बहुपत्नी प्रथा के खिलाफ संघर्ष किया था। थियोसोफिकल आंदोलन ने अपने अध्ययन और सहानुभूति का क्षेत्र तो विश्व व्यापी रखा लेकिन पूर्व की संस्कृति की शानदार और महान परम्पराओं की पुनर्स्थापना पर विशेष जोर दिया। इसी भावना से प्रेरित होकर श्रीमती एनीबेसेंट ने भारत के तीर्थ स्थल बनारस में एक कालेज की स्थापना की। थियोसोफिकल आंदोलन की गतिविधियों ने अंतर्राष्ट्रीय भाईचारे की भावना को बलवती करने के साथ-साथ पश्चिम की तार्किक श्रेष्ठता पर अंकुश लगाने में भी मदद की और भारत में एक नया सांस्कृतिक केंद्र विकसित किया जिसने पश्चिम के विद्वानों और पंडितों को एक बार फिर इस प्राचीन देश की ओर आकृष्ट किया।
भारत में कांग्रेस के जन्म से पहले राष्ट्रीय पुनर्जागरण का ताजा चरण महान्? संत रामकृष्ण परमहंस के नेतृत्व में बंगाल में शुरू हुआ। स्वामी रामकृष्ण ने बाद में स्वामी विवेकानन्द के माध्यम से पूर्व और पश्चिम तक अपना संदेश पहुंचाया। रामकृष्ण मिशन केवल एक ओर तंत्र मंत्र और दूसरी ओर यथार्थवाद से जुड़ा संगठन नहीं है, बल्कि यह गहन अतर्ज्ञानवाद से जुड़ा था जो लोक संघर्ष या समाजसेवा के सर्वोच्च कर्तव्य से कभी विमुख नहीं हुआ। अमरीका में 'तूफानी हिन्दू' के नाम से मशहूर स्वामी विवेकानन्द ने अमरीका, यूरोप, मिस्र, चीन और जापान में केवल भारत का संदेश ही नहीं पहुंचाया बल्कि वे स्वयं भी पश्चिम की संस्कृति से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने भारत में हिमालय से कन्याकुमारी तक पुनरुद्धार का नया संदेश दिया। उन्होंने मुक्ति और समानता के साथ-साथ जन-जागरण का विशेष जोर दिया। वे पश्चिमी की प्रगति और भारत के आध्यात्म का समन्वय चाहते थे। उनके भाषणों और लेखों का एक ही मूल मंत्र था ''निडर और मजबूत बनो क्योंकि कमजोरी पाप है। मृत्यु का द्वार है।'' विवेकानन्द के समकालीन लेकिन उनसे बहुत बाद की पीढ़ी के प्रतिनिधि थे रवीन्द्र नाथ टैगोर। टैगोर परिवार ने 19वीं वीं सदी में बंगाल में अनेक सुधारवादी आंदोलनों में प्रमुख भूमिका निभाई। इस परिवार ने देश को अनेक आध्यात्मिक नेता और कलाकार दिए। भारत के मानस पर टैगोर का प्रभाव और उसके साहित्य, कविता, नाटक, संगीत, सामाजिक और शैक्षिक पुनर्निर्माण तथा राजनीतिक विचारधारा पर टैगोर की छाप का सौंदर्य और गहनता अभूतपूर्व है। यह छाप मानव के व्यक्तित्व और मस्तिष्क का ऐसा अद्भुत उदाहरण है जो भावी पीढ़ियों को प्रभावित करता रहेगा और नए रंग देगा। वास्तव में टैगोर का योगदान पूर्व और पश्चिम, आधुनिक और प्राचीन तथा देश में उभरते राष्ट्रवाद तथा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच का अद्भुत समन्वय है। ये धाराएं और आंदोलन वास्तव में नई राष्ट्रीय चेतना और उमंग के प्राण थे और यही धीरे-धीरे कदम-दर-कदम आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में साकार हुए।


Monday, 16 December 2013

नहीं करें कन्फ्यूजन की राजनीति




क्या दिल्ली में दुबारा चुनाव होंगे? क्या दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगेगा या फिर अभी भी यहां सरकार बनने की कोई संभावना जीवित है? ऐसे कई सवाल हैं जिसने दिल्ली की सियासत को कन्फ्यूज कर रखा है। कैपिटल दिल्ली कन्फ्यूज है। कन्फ्यूजन में जनादेश का भी कबाड़ा हो गया। आम आदमी पार्टी के कमाल का ख्याल 28 के अंकों में उलझ गया। सत्ता के लिए ह्यआपह्ण का दरवाजा खोलने या बंद रखने पर खूब माथापच्ची हुई। आंकड़ों के अंकगणित की ये उलझन नेताओं को रात में भी कन्फ्यूज कर रही है। कोई कन्फ्यूज हो न हो कम से कम कांग्रेस कतई कन्फ्यूज नहीं। कन्फ्यूजन की इस किचकिच में कमल भी कन्फ्यूज है। विजय गोयल और नितीन गडकरी के बयानों के विरोधाभास ने तो कन्फ्यूजन और भी गहरा कर दिया। विजय गोयल ने ‘आप’ के समर्थन पर सोचने का इशारा किया तो नितिन गडकरी ने फौरन उनकी दुकान ही बंद करा दी।
राजनीति से परे रह कर आंदोलन तो हो सकता है, लेकिन उससे व्यवस्था नहीं बदल सकती। यही अब आम आदमी पार्टी के लिए भविष्य की चुनौती भी है। केजरीवाल की पार्टी दिल्ली विधानसभा की 28 सीटें जीतने में सफल रही है, लेकिन इस पार्टी का कोई राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक कार्यक्रम अब तक नहीं बन पाया है। आम जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त है, केजरीवाल ने उनमें एक उम्मीद जगाई है। लेकिन यदि वे सत्ता में आ भी गए, तो उन्हें संवैधानिक दायरे में रह कर ही काम करना पड़ेगा। उन्हें संविधान के अनुरूप कार्यनीति और योजनाएं तैयार करनी होगी। भारतीय राजनीति, समाज, अर्थशास्त्र और विकास की पेचीदगियों को भली प्रकार से समझना पड़ेगा और पार्टी की एक वैचारिक दिशा तय करनी होगी। यह भी देखना होगा कि आम आदमी को सहूलियतें देनेवाली सरकार चलाने के लिए साधन कहां से आये, इसका बोझ किन पर पड़े। इस संबंध में आम आदमी पार्टी की वैचारिक दिशा, नीति और कार्यक्रम अभी स्पष्ट नहीं है। आर्थिक असमानता और बेरोजगारी की समाप्ति के साथ-साथ भ्रष्टाचार से लड़ने और सूचना के अधिकार को बेहतर रूप प्रदान करने के लिए उन्हें नीतियां बनानी ही पड़ेंगी। यही उनके नेताओं और पार्टी का चरित्र भी निर्धारित करेगा और इसी से लोग जान पायेंगे कि केजरीवाल के वादों और दावों में कितना दम है। दिल्ली पहले केंद्रशासित प्रदेश था। वहां विधानसभा बन गयी,  मुख्यमंत्री का पद भी सृजित हो गया, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था अब भी राज्य सरकार के पास नहीं है, जबकि संविधान में अधिकारों का जो विभाजन किया गया है, उसमें कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है। इस संबंध में ‘आप’ का दृष्टिकोण क्या होगा, इसकी घोषणा अभी नहीं हुई है। आंध्र प्रदेश में तेलुगूदेशम पार्टी के संस्थापक अभिनेता नंदमूरि तारक रामाराव गैर-कांग्रेसवाद के नायक रहे हैं। उन्होंने तेलुगू अस्मिता की आवाज बुलंद की। लेकिन राज्य की जनता ने उनकी पार्टी को तीन बार इसलिए मौका दिया, क्योंकि उन्होंने राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास की नीतियां बनायीं और उन पर अमल भी किया। वे देश की वृहत्तर राजनीति से अलग नहीं थे। इसलिए उन्होंने चुनाव की राजनीति में दोस्त और दुश्मन की पहचान भी की। गंठबंधन की राजनीति के दौर में यह तय करना जरूरी माना जाता है।
गांधीजी को लोग संत मानते हैं, लेकिन वे भी राजनीतिक संत थे। उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में क्या करना है और क्या नहीं करना है, यह तय कर रखा था। उनका अपना राजनीतिक और आर्थिक दर्शन था। उन्हें राजनीति से परहेज नहीं था। उन्होंने देश-विदेश में जो आंदोलन किये, वह भी राजनीति थी। जाहिर है, आंदोलन कोई भी हो, उसे जीवन और समाज के सभी पहलुओं को समेटना पड़ेगा, उससे भाग कर कोई हल नहीं हो सकता। आंदोलन के जरिये केवल भीड़ बटोर कर ही निर्णय होंगे, तो उससे व्यवस्था नहीं, बल्कि भीड़तंत्र ही पनपेगा और यह भीड़तंत्र व्यवस्था का संचालक नहीं हो सकता। इसलिए यदि केजरीवाल भी अन्ना के दलविहीन राजनीति की कल्पना पर आधारित विचार और कार्यक्रमविहीन दल की ओर बढ़ेंगे, तो उनकी कठिनाइयां ही बढ़ेंगी।



Thursday, 12 December 2013

जनादेश सबसे अहम : सरफराज सिद्दीकी


दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव सरफराज अहमद सिद्दीकी तेज तर्रार अधिवक्ता हैं। साथ ही दिल्ली की राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव के  परिणाम और उसके बाद की स्थिति सहित कई अहम मुद्दों पर उन्होंने बेबाक राय रखी। पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंश :


0 दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम को किस रूप में देखते हैं?
जनता ने जो जनादेश दिया है, हम उसका सम्मान करते हैं। आखिर, हमारी पार्टी के हार के कौन-कौन से कारण रहे, इस पर विचार-विमर्श हो रहा है।

0 ‘आप’ ने जिस प्रकार का प्रदर्शन किया है, उसकी उम्मीद थी आपको?
राजनीति में कई बातें अनायास ही होती हैं। लेकिन यह सार्वभौमिक सत्य है कि लोकतंत्र में जनादेश सबसे अहम होता है। हमारी पार्टी ने 15 वर्षों तक दिल्ली की जनता का सेवा किया है। दिल्ली की जनता ने जो जनादेश दिया है, हम उसका सम्मान करते हैं।

0 कहा जा रहा है कि 1998 में प्याज के मुद्दे पर सुषमा स्वराज की सरकार चली गई थी। 2013 में शीला दीक्षित का हाल भी उसी तर्ज पर हुआ?
देखिए, प्याज और महंगाई एक मुद्दा जरूर था। लेकिन इसके साथ ही आपको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जिन्होंने प्याज स्टोर कर रखे थे, वे भारतीय जनता पार्टी के ही लोग थे। सुषमा स्वराज के हारने के कई और कारण थे। आपको याद होगा, उस समय भाजपा ने तीन-तीन मुख्यमंत्री बदले थे। इस बार भी कांग्रेस केवल महंगाई और प्याज के मुद्दे पर नहीं हारी है। चुनाव के दौरान प्याज आदि के दाम कुछ ताकतों ने जानबूझकर बढ़ाए। कुछ तो ऐसा था, नहीं तो चुनाव के एक दिन बाद ही प्याज कैसे सस्ता हो गया? जो चुनाव से पहले 100 रुपये किलो तक पहुंच गया था।

0 तो आपकी नजर में कौन-कौन से कारण थे?
वर्तमान में फौरी तौर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। पार्टी के भीतर मंथन जारी है। तमाम बातें आपके सामने होगी।

0 क्या ‘आप’ सरकार बनाएगी या भाजपा?
आखिर इस बारे में हम कैसे तय कर सकते हैं? सच तो यही है कि किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। यह तय दोनों पार्टियों को तय करना होगा।

0 आपकी पार्टी के कई नेता आप के साथ सरकार बनाने की बात कह रहे हैं?
हमन जनसरोकार की राजनीति करते आ रहे हैं। दिल्ली की जनता के हित में जो भी फैसला होगा, उसके लिए कांग्रेस पार्टी विचार कर रही है।

0 कांग्रेस की दिल्ली में आगे की रणनीति क्या होगी?
आज की तारीख में बात करूं तो पार्टी रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएगी और फिर से जनता का विश्वास हासिल करने के लिए काम करेगी। कांग्रेस हमेशा आम जनता से जुड़ी रही है। कांग्रेस ने आम आदमी के लिए काम किया है।  पार्टी द्वारा जनता की भावनाओं को समझने में अगर कोई कसर रह गई होगी, तो उसका आंकलन किया जाएगा। इस बात का भी पता लगाया जाएगा कि पार्टी कहीं विरोधियों की चुनावी तकनीकों का शिकार तो नहीं हुई है।

0 दिल्ली को लोग बीते कुछ अरसे से ‘रेप कैपिटल’ भी कहने लगे हैं, आप इससे सहमत हैं?
यह राजधानी के साथ अन्याय है। हम इससे सहमत नहीं हैं।

0 चूंकि आप अधिवक्ता भी हैं, इसलिए आपसे एक सवाल यह कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जो धारा 377 को लेकर आदेश दिया है, उसे किस रूप में देखते हैं?
देखिए, दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 में दिए गए फैसले के विपरीत सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को बदलने के लिए कोई संवैधानिक गुंजाइश नहीं है। धारा 377 के तहत दो व्यस्कों के बीच समलैंगिक रिश्ते को अपराध माना गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 377 के तहत समलैगिक रिश्ते को गैरआपराधिक कृत्य करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद सरकार धारा 377 में बदलाव को लेकर गंभीर है। केंद्र सरकार इस मामले को गैर आपराधिक बनाने पर विचार कर रही है। कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने भी इस मामले को संसद में उठाने की बात कही है। पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने भी कहा है कि अब संसद में धारा 377 में बदलाव करना ही एकमात्र उपाय है। सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने भी कहा कि जरूरत पड़ने पर संसद में इस पर चर्चा की जाएगी।

0 आप दो दशक से अधिक समय से राजधानी दिल्ली में निवास कर रहे हैं। शहर में अक्सर जाम की स्थिति भी तो बनी रहती है?
देखिए, जिस हिसाब से दिल्ली की आबादी बढ़ रही है और राजनीतिक दलों की वजह से रोज-रोज होने वाले धरने प्रदर्शन भी टैÑफिक जाम के महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं।

0 आगामी चुनाव में आपकी लड़ाई सीधे-सीधे भाजपा से है या आम आादमी पार्टी से?
हमारी लड़ाई सीधे-सीधे राष्टÑीय स्वयं सेवक संघ से है। भाजपा से अपनी कोई लड़ाई नहीं है। 2014 में न कहीं मोदी हैं और न ही कहीं भाजपा है। अगर है तो सिर्फ और सिर्फ आर एस एस।

0 लेकिन नरेंद्र मोदी की जनसभाओं में उमड़ रही भीड़ को आप लोग नजर अंदाज कैसे कर सकते हैं?
वह भीड़ सुनियोजित और प्रायोजित होती है, उसका वोटों से कोई लेना-देना नहीं होता।

0 क्या चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद भी नरेंद्र मोदी को आप लोग हलके में क्यों ले रहे हैं?
नरेंद्र मोदी की और उनके गुजरात मॉडल की पोल खुल चुकी है। वास्तविकता के धरातल जिन राज्यों में भाजपा ने सत्ता हासिल की है, वहां सच्चाई कुछ और है।