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Friday, 3 April 2015

अन्नदाता का हित सर्वोपरि


कांग्रेस केवल सत्ता के लिए केवल राजनीति नहीं करती है। कांग्रेस ने हमेशा ही किसानों के लिए काम किया है। काम करती रहेगी। 60 हजार करोड़ किसानों का कर्ज माफ किया। कांग्रेस की जो नीति रही है और है, उस पर हमारी पार्टी की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी अमल कर रही है। जब भी किसी देश की जनता को दर्द हुआ है, कांग्रेस ने आगे आकर उसका दर्द बांटा है। आज भी वही किया जा रहा है।
हर बात में राजनीति हमलोग नहीं करते हैं। हमारे लिए राजनीति सेवा का माध्यम है। श्रीमती सोनिया गांधी संगठन को मजबूत करने के लिए पूरे देश का दौरा कर रही हैं। हमारी सरकार जब केंन्द्र में थी, तो महिला सशक्तीकरण और भूमि अधिग्रहण के लिए काम किया। जो भी अब तक वंचित रहा है, उसे सशक्त करने की हमारी कोशिश होती है। कांग्रेस ने तमाम मानदण्डों के आधार पर कोई भी निर्णय लिया है, लेकिन वर्तमान सरकार तो केवल अध्यादेश का सहारा लेती है। हमारी नेता सोनिया गांधी का साफ कहना है कि ‘अदूरदर्शी’ मोदी सरकार उद्योगपतियों को लाभ देने के लिए झुकी पड़ी है। उन्होंने मांग की कि संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर 2013 में यूपीए द्वारा लाए गए भूमि अधिग्रहण कानून को समग्रता में वापस लाया जाए। किसान हमारे देश की रीढ़ हैं और हर हाल में उनके हितों की रक्षा होनी ही चाहिए और इस पर कांग्रेस कोई समझौता नहीं कर सकती। हम इस देश की रीढ़ तोड़ने वाले किसी कानून का कभी समर्थन नहीं कर सकते। इसलिए मैं आपसे आग्रह करती हूं कि संकीर्ण पक्षपातपूर्ण राजनीति से ऊपर उठें और 2013 के उस कानून को समग्रता में वापस लाएं जो कि हमारे किसान भाइयों एवं बहनों की भावनाओं और आकांक्षाओं के अनुकूल था। सरकार द्वारा मनमाने ढंग से किसान विरोधी कानून थोप देने के बाद बहस की बातें करना राष्ट्रीय महत्व की नीतियां लागू करने के पहले सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सर्वानुमति बनाने की परंपरा का उपहास करने के बाराबर है।
देखिए, मंत्री नितीन गडकरी ने अपने पत्र में भूमि अधिग्रहण में प्रस्तावित बदलावों को यह कह कर जायज ठहराने की कोशिश की है कि इससे गांव, गरीबों, किसानों और मजदूरों का फायदा होगा.. आपके तर्क यह जताने के लिए दिए गए हैं कि ये सब बातें यूपीए सरकार के विपरीत जैसे नरेन्द्र मोदी सरकार का नया योगदान है, और आपके कानून का विरोध करने वाले किसान विरोधी और राष्ट्र विरोधी हैं।  किसानों की जाने वाली आजीविका और उन्हें होने वाली पीड़ा को समझने के कांग्रेस और बीजेपी के तरीकों में बुनियादी अंतर है। यह खेदजनक है कि गरीब किसानों और जरूरतमंद श्रमिकों के हित में आवाज उठाने वालों को मोदी सरकार राष्ट्र विरोधी बता रही है और कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए पूरा जोर लगा रही है।
किसान नहीं रहेगा, तो देश नहीं रहेगा। इस सच को क्या हम या आप नहीं जानते हैं। हमारे देश के अन्नदाता को बार-बार दैवीय प्रकोप को सहन करना पड़ता है। हमारे देश का अन्नदाता यानी भारतीय किसान वैसे तो लगभग प्रत्येक वर्ष देश के किसी न किसी हिस्से में आने वाली बाढ़ अथवा सूखे के कारण संकट का सामना करता ही रहता है। खासतौर पर गरीब व मध्यमवर्गीय किसान तो ऐसे हालात से प्रायरू प्रभावित ही रहता है। परंतु इस वर्ष मार्च के महीने में हुई बेतहाशा बारिश व इसी के साथ-साथ आने वाले आंधी-तूफान व ओलावृष्टि ने तो मानो देश के किसानों विशेषकर उत्तर व मध्य भारत के ‘अन्नदाता’ की तो कमर ही तोड़ कर रख दी। किसानों के खेतों में रबी की फसलों के रूप में तैयार हो रही गेहूं,सरसों,अरहर,चना,लाही के अतिरिक्त मटर,टमाटर,आलू जैसी और भी कई सब्जियां व तंबाकू,तिलहन व दलहन की कई किस्में जो तैयारी के कगार पर थीं लगभग नष्ट हो गई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार वेस्टर्न डिस्टर्बेंस ने बंगाल की खाड़ी तथा हिंद महासागर से अर्थात् देश के पूर्वी और पश्चिमी देानों ही छोर से एक साथ नमी उठाई जोकि इतने बड़े पैमाने पर होने वाली बारिश का कारण बनी। दिल्ली व आसपास के क्षेत्रों में तो मार्च के महीने में होने वाली इस बारिश ने पिछले सौ वर्षों की बारिश का रिकार्ड तोड़ दिया। बताया जाता है कि इसके पूर्व 1915 में दिल्ली में इतनी वर्षा रिकॉर्ड की गई थी। बारिश के साथ-साथ सक्रिय रही चक्रवाती हवाओं ने भी किसानों की आजीविका पर भारी कहर बरपा किया है।
देश के विभिन्न भागों से किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने, अपनी तबाह फसल को देखकर हृदयगति रुक जाने से उनका देहांत होने जैसे हृदयविदारक समाचार भी सुनाई देने लगे हैं। जाहिर है विभिन्न राज्यों की सरकारें ऐसे संकट के समय में किसानों के साथ उनका दुरूख बांटने हेतु सहायतार्थ आर्थिक पैकेज घोषित करती भी नजर आ रही हैं। किसानों पर टूटे इस प्राकृतिक कहर के प्रभाव से आम नागरिक भी अछूता नहीं रहने वाला। विशेषज्ञों के अनुसार शीघ्र ही दलहन,तिलहन और तत्काल रूप से विभिन्न सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में आम देशवासियों को इस मौसम का भुगतान करना पड़ सकता है। इससे उनकी कमर टूट जाती है। उसे अभी मदद की जरूरत है। उसे संवारना देश के हर जिम्मेदार और सक्षम नागरिक का कर्तव्य है। कांग्रेस ने हमेशा ही किसानों की हित की बात की। बैंकों के द्वारा कर्ज, खाद, बीज संबंधी सहूलियत प्रदान करवाई। किसान इस देश की रीढ़ हैं। इस सच को हर देशवासी को समझना होगा। यदि अन्नदाता अनाज पैदा नहीं करेगा, तो लोग खाएंगे क्या ? देश का जवान तैयार होगा कैसे ?








Saturday, 5 April 2014

कांग्रेस में है दम


भारतीय राजनीति में कांग्रेस का हमेशा दबदबा रहा है और ज्यादातर समय यही पार्टी सत्तारुढ़ रही है। पिछले दस वर्षों से भी यही सत्ता पर काबिज है। हालंाकि, वर्तमान लोकसभा चुनाव 2014 में पार्टी को थोडे़ मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अमूमन यह होता है, जब आप सत्ता में लंबे समय तक रहते हैं। दिल्ली में बैठकर कुछ लोगों को यही लगता है कि कांग्रेस का तो इस बार पूरा सूपड़ा हो जाएगा ? इसको वे भरसक प्रचारित भी करते हैं। जबकि वास्तविकता के धरातल पर ऐसा नहीं है।
दिल्ली से तो यही बात फैलाई जा रही है कि कांग्रेस विरोधी लहर हवा में है और ज्यादातर लोगों का मानना है कि मनमोहन सरकार नाकाम रही है। जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर है। कांग्रेस आज भी सर्वधर्म समभाव का भाव लेकर चलती है। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर। यही तो हमारा सिद्धांत रहा है। हम कहने से अधिक करने में विष्वास रखते हैं। तमाम विरोधी राजनीतिक दल भ्रष्टाचार को लेकर बावेला काटने पर उतारू हैं, क्या उन्हें यह नहीं पता है कि यह कांग्रेस और यूपीए की ही सरकार थी, जिसे सूचना के अधिकार के रूप में एक अचूक हथियार जनता को दिया है भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए। हाल के वर्षों में जितने भी घोटालों का पर्दाफाष हुआ है, क्या यह सूचना के अधिकार के बदौलत नहीं है? कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन ने दस साल में देश का विकास किया है। कांग्रेस ने नरेगा के माध्यम से देश के 82 करोड़ लोगों को रोजगार देने का काम किया है।यूपीए ने गरीब और किसानों के लिए जो ग्रामीण रोजगार योजना, उपज के दामों में वृद्धि व कर्ज माफी की आर्थिक प्रक्रिया चलाई थी, उसी अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए एक बार फिर यूपीए को मौका मिलेगा। सर्वशिक्षा अभियान, मिड डे मील योजना, ग्राणीम स्वाथ्य सेवा योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी योजनाओं को भला आप कैसे दरकिनार कर सकते हैं ? साथ ही सूचना के अधिकार और लोकपाल बिल को संसद में पेश किए जाने का श्रेय मनमोहन सिंह सरकार को नहीं दिया जाना चाहिए ? जब हम गठबंधन के दौर में होते हैं, तो कई तरह की परेषानियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन जिस प्रकार से यूपीए सरकार ने भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया, चाहे वह कितना भी रसूखदार हो, वह काबिलेतारीफ है। कांग्रेस ने हमेषा भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसा है। आज भी कई आरोपों की जांच हो रही है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
ऐसा नहीं है कि हम सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं। कांग्रेस का सबसे बुरा प्रदर्शन 1999 में रहा था जब यह पार्टी मात्र 114 सीट जीत पाई थी, इसकी सफलता का प्रतिशत मात्र 20.91 था। जहां तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का सवाल है तो 1984 में हुए आम चुनाव में इस पार्टी ने 415 सीट जीत कर ऐतिहासिक सफलता रची थी। उस वक्त इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और इससे उपजी सहानुभूति की लहर का लाभ कांग्रेस को मिला था। इसकी सफलता का प्रतिशत 77.86 था। इतनी सफलता तो कांग्रेस को पहले चुनाव में भी नहीं मिली थी। अब तक यह पार्टी चार सौ सीटों का आंकड़ा एक बार, तीन सौ सीटों का आंकड़ा पांच बार, दो सौ सीटों का आंकड़ा तीन बार और सौ का आंकड़ा छरू बार पार कर चुकी है। 114 सीट इसका न्यूनतम स्कोर है। बेषक, कुछ लोग तमाम हथकंडे का प्रयोग करके हवा बनाने की जुगत कर रहे हांे, लेकिन देष की जनता जानती है कि कौन उनके लिए बेहतर सरकरा लाएगा ? कौन बेहतर सुविधा मुहैया कराएगा? कांग्रेस की काबिलियत से पूरे देष की जनता वाकिफ है।

Wednesday, 22 January 2014

प्रवक्ताओं की संख्या में विस्तार

कांग्रेस पार्टी ने आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियों को ध्यान में रखते हुए को अपने प्रवक्ताओं की संख्या में विस्तार किया। कांग्रेस ने केंद्रीय मंत्रियों पी. चिदंबरम और सलमान खुर्शीद को वरिष्ठ प्रवक्ता, जबकि केंद्रीय राज्यमंत्री शशि थरूर को प्रवक्ता नियुक्त किया। एक अधिकृत घोषणा में बताया गया है कि पार्टी ने पांच वरिष्ठ प्रवक्ता और 13 प्रवक्ताओं की नियुक्ति की है। अधिकृत वक्तव्य में कहा गया है कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने नियुक्तियों को अपनी मंजूरी दे दी है।
लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी की मीडिया रणनीति को और धारदार बनाने की राहुल गांधी की योजना के तहत वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री पी चिदम्बरम, सलमान खुर्शीद, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, शशि थरुर और ज्यरोतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस प्रवक्ता बनाया गया।चार मंत्रियों चिदम्बरम, आजाद, शर्मा और खुर्शीद तथा एआईसीसी महासचिव मुकुल वासनिक को कांग्रेस पार्टी का वरिष्ठ प्रवक्ता बनाया गया जबकि थरुर और सिंधिया को प्रवक्ताओं की 13 सदस्यीय नई टीम में शामिल किया गया है। पार्टी ने अपने प्रवक्ताओं और टेलिविजन पैनलिस्टों की अलग अलग टीमें बनाई है जिसमें अनेक ऐसे चेहरों को शामिल किया गया है जो राहुल गांधी के करीबी सहयोगी माने जाते हैं और युवक कांग्रेस या एनएसयूआई पृष्ठभूमि के हैं।
राज्यसभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी को फिर से प्रवक्ताओं की जमात में शामिल किया गया है। उड़ीसा के प्रमुख नेता भक्त चरण दास को प्रवक्ताओं की नई सूची में जगह नहीं दी गयी है। उसी तरह मीम अफजल को भी बाहर कर दिया गया है लेकिन उन्हें टेलिविजन पर पार्टी की तरफ से बात रखने वाले नेताओं के 24 सदस्यीय दल में शामिल किया गया है। एआईसीसी के महासचिव संचार विभाग के प्रमुख अजय माकन ने कहा कि पार्टी की नियमित प्रेस ब्रीफिंग तीन दिन के बजाय अब सप्ताह में पांच दिन होगी और उसका समय भी अब शाम सवा चार बजे के बजाय दो बजे होगा।
कांग्रेस ने अपनी मीडिया टीम में फेरबदल करते हुए केंद्रीय मंत्री पी चिदम्बरम, सलमान खुर्शीद, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा और एआईसीसी महासिचव मुकुल वासनिक को पार्टी का वरिष्ठ प्रवक्ता बनाया। पार्टी ने अपने प्रवक्ताओं और टेलिविजन पैनलिस्टों की अलग अलग टीमें बनाई। कांग्रेस द्वारा बनाये गये प्रवक्ताओं के 13 सदस्यीय दल में शशि थरुर, अभिषेक मनु सिंघवी और ज्योतिरादित्य सिंधिया शामिल गया है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, महिला कांग्रेस की अध्यक्ष शोभा ओझा, उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूर्व प्रमुख रीता बहुगुणा जोशी, हरियाणा के मत्री रणदीप सिंह सुरजेवाला, गुजरात के कांग्रेस विधायक दल के पूर्व नेता शक्ति सिंह गोहिल, सांसद सतयव्रत चतुर्वेदी और संजय झा को नया प्रवक्ता बनाया गया है जबकि पी सी चाको, राज बब्बर और संदीप दीक्षित को प्रवक्ता बनाये रखा गया है। केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी और राजीव शुक्ला को टेलिविजन पर पार्टी की तरफ से बात रखने वाले नेताओं के 24 सदस्यीय टीम में शामिल किया गया है। इस टीम में अशोक तंवर और मीनाक्षी नटराजन को भी जगह दी गई है। पार्टी ने इसके अलावा राज्यों के मुद्दे पर टेलिविजन में बात रखने के लिए 30 सदस्यों की एक टीम बनायी है।
 पार्टी ने मंगलवार को इसके अलावा 24 मीडिया प्रभारियों की नियुक्ति भी की। इसके अलावा 30 अन्य प्रभारियों को राष्ट्रीय मीडिया में राज्यों से संबंधित मुद्दों पर पार्टी का पक्ष रखने के लिए नियुक्त किया गया। वरिष्ठ प्रवक्ताओं में केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम, सलमान खुर्शीद, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा के अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री मुकुल वासनिक शामिल हैं। प्रवक्ताओं में थरूर और सिंघवी के अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया, पी.सी. चाको, राज बब्बर, रणदीप सुरजेवाला, रीता बहुगुणा जोशी, संदीप दीक्षित, संजय झा, सत्यव्रत चतुर्वेदी, शकील अहमद, शक्ति सिंह गोहिल और शोभा ओझा शामिल हैं। पार्टी में इससे पहले पांच प्रवक्ता होते थे। मीडिया प्रभारियों में सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी सहित केंद्रीय गृह राज्यमंत्री आर.पी.एन. सिंह और संसदीय कार्य राज्यमंत्री राजीव शुक्ला भी शामिल हैं। अन्य मीडिया प्रभारियों में अखिलेश प्रताप सिंह, अनंत गाडगिल, अशोक तंवर, बालचंद्र मुंगेकर, बृजेश कालप्पा, चंदन यादव, सी.आर. केशवन, दीपक अमीन, दीपेंदर हुडा, कृष्णा बायरे गौड़ा, मीम अफजल, मिनाक्षी नटराजन, मुकेश नायक, नदीम जावेद, पी.एल. पुनिया, प्रेम चंद्र मिश्रा, प्रीयंका चतुर्वेदी, रागिनी नायक, राजीव गौड़ा और सलमान सोज तथा संजय निरूपम शामिल हैं। पार्टी सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस विभिन्न मीडिया के जरिए लोगों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की इच्छुक है।

Tuesday, 7 January 2014

प्रियंका , नाम ही काफी


प्रियंका गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की निःसन्देह एक संभावनाशील महिला हैं। लोग अपने नेता के किसी गुण से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं, तो वह उसके द्वारा करिश्मा पैदा करने की क्षमता से होते हैं। 1999 के संसदीय चुनाव में किस तरह से प्रियंका गांधी के मात्र एक चुनावी संबोधन से रायबरेली लोकसभा में कांग्रेस ने भाजपा के प्रत्याशी अरुण नेहरू को हरा दिया था। प्रियंका गांधी के व्यक्तित्व में यदि कोई गुण सर्वाधिक प्रभावित करता है, तो वह उनके द्वारा लोगों से सहज संवाद स्थापित करने की क्षमता है, बोली-वाणी, पहनावे एवं रहन-सहन से लोगों को सीधे प्रभावित करती हैं।


प्रियंका गांधी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने की ओर बढ़ सकती हैं। कहा जा रहा है कि उनका अपनी मां तथा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली का प्रभार संभालना तय-सा है। इस बारे में आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन कांग्रेस महासचिवों सहित अन्य पदाधिकारियों ने जोर देते हुए कहा कि प्रियंका राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश की इस सीट के लोगों से हमेशा मिलती रही हैं और उनके इस कदम में कुछ भी नया नहीं है। कांग्रेस में राहुल को चुनावी कमान सौंपने से पहले ही पार्टी की ओर से प्रियंका गांधी को सक्रिय कर दिया गया। यूं तो पार्टी के लिए वे उतना तैयार नहीं होती, लेकिन अपनी मां सोनिया गांधी और अपने भाई राहुल गांधी के चुनावी क्षेत्रों का हमेशा ही वह ख्याल रखती आई हैं। लिहाजा, कांग्रेस ने आगामी लोकसभा चुनाव में रायबरेली और अमेठी में संगठन मजबूत करने की जिम्मेदारी प्रियंका को सौंप दी। पिछले लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली में तकरीबन दो लाख और राहुल गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी में करीब पौने दो लाख वोटों से जीत दर्ज की थी, लेकिन मौजूदा हालात में देश और प्रदेश के दूसरे हिस्सों की तरह रायबरेली और अमेठी के लोगों में भी कांग्रेस को लेकर आक्रोश व्याप्त है। पार्टी कार्यकर्ता अलग से संगठन में गुटबाजी और बड़े नेताओं की उपेक्षा को लेकर रोष में हैं।
रायबरेली और अमेठी में संगठन को दुरुस्त करने का जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेने वाली प्रियंका अब लोकसभा चुनाव तक लगभग हर महीने यहां का दौरा करेंगी। इसी योजना के तहत वह रायबरेली और अमेठी के ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ताओं से कई बार अलग-अलग बैठक कर चुकी हैं।
प्रियंका अब तक पारिवारिक जिम्मेदारियों के नाम पर सक्रिय राजनीति से दूर रही हैं। सच तो यह भी है कि  पार्टी का एक तबका प्रियंका में उनकी दादी इंदिरा गांधी की झलक देखता है और वह चाहता है कि प्रियंका सक्रिय भूमिका निभाएं। इस तबके का मानना है कि उत्तर प्रदेश और अन्यत्र पार्टी के बेहतर भविष्य के लिए ऐसा किया जाना अनिवार्य है। पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने राहुल की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन किया था और उसे 22 सीटें मिली थीं, लेकिन विधानसभा चुनावों के दौरान प्रदर्शन अपेक्षित नहीं रहा और पार्टी के गढ़ माने जाने वाले अमेठी एवं रायबरेली जैसे स्थानों पर भी पार्टी ने खराब प्रदर्शन किया। चुनावों में प्रदर्शन खराब रहने के कारणों को लेकर राहुल ने खुद ही पार्टी विधायकों, सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों से बातचीत की थी। गौर करने योग्य यह भी है कि पहले राजनीति में आने के सवाल पर प्रियंका कहती थीं कि राजनीति में बिना आए भी समाज की सेवा की जा सकती है, लेकिन अब माहौल बदल गया लगता है। प्रियंका ने राजनीति में आने के संकेत कई महीने पहले ही देने शुरू कर दिए थे। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान जब मीडिया ने प्रियंका गांधी से पूछा था कि वे राजनीति में कब आएंगी, तो इसके जवाब में उन्होंने कहा था, जब राहुल भैया चाहेंगे तब राजनीति में आएंगी। हालांकि कांगे्रस के प्रवक्ता अब भी इसकी पुष्टि नहीं कर रहे कि प्रियंका सक्रिय राजनीति में आएंगी और यह कह कर सवालों को टाल देते हैं कि आखिरी निर्णय तो प्रियंका को ही करना है। इससे साफ जाहिर है कि कांग्रेस उन्हें आगे लाने को आतुर है। कुछ दिग्गज तो साफ कह भी चुके हैं कि प्रियंका को आगे आना चाहिए। सच तो यह है कि कांग्रेस के दिग्गज नेता व कार्यकर्ताओं में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि चूंकि राहुल गांधी खारिज होते नजर आ रहे हैं, ऐसे में प्रियंका को ही आखिरी दाव के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। वे ही राजनीति के खेल में कांग्रेस का आखिरी ‘तुरूप का पत्ता’ साबित हो सकती हैं। मगर संभवतरू सोनिया गांधी इस राय से इत्तफाक नहीं रखतीं। जाहिर सी बात है कि वंश परंपरा को कायम रखने के लिए सोनिया की रुचि बेटे राहुल गांधी में है। प्रियंका दूसरा विकल्प हैं।
दरअसल, कांग्रेस में गांधी परिवार का बड़ा ही योगदान रहा है। जब-जब कांग्रेस कमजोर हुई है या कमजोर की गई है, गांधी परिवार का कोई न कोई व्यक्तित्व इसको उबारने में महती भूमिका निभाया है। जिसमें उनके बलिदान तक की बातें निहित हैं। 20वीं सदी के अंत में जब कांग्रेस कई टुकड़ों में विभाजित हो गई थी ओर देश में भाजपा की सरकार चल रही थी। उस समय कांग्रेस की अपील पर गांधी परिवार की मुखिया श्रीमती सोनिया गांधीजी अपने पुत्र राहुल गांधी के साथ राजनीति में सक्रिय होकर भारतीय कांग्रेस का नेतृत्व संभाला। इसमें संदेह नहीं की गांधी परिवार ने अपने नेतृत्व क्षमता और साफ सुथरी छवि के आधार पर 2004 के आम चुनाव में आम जनमानस के सहयोग से विखंडित कांग्रेस को संगठित एवं जोड़कर भारत की सत्ता में पुनः वापसी की। प्रियंका गांधी का राजनीतिक योगदान इस चुनाव में काफी बढ़ गया, वे कांग्रेसियों को जोड़ने में सफल रही। उनके सक्रिय राजनीति में आने का प्रश्न अब महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि उन्हे तो अब इसका विस्तारीकरण करना है। अमेठी और रायबरेली में वह लगाार समय देती आ रही हैं। उनके आने से निश्चित रूप से कांग्रेस को फायदा होगा, क्योंकि वह इंदिरा गांधी की प्रतिरूप मानी जाती हैं। साथ ही उनकी छवि संवेदनशील एवं ईमानदार राजनीतिज्ञ की है। रही बात वंशवाद की तो अगर किसी के पूर्वज राजनीति में थे, तो उसमें उसका क्या दोष?
प्रियंका गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की निःसन्देह एक संभावनाशील महिला हैं। लोग अपने नेता के किसी गुण से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं, तो वह उसके द्वारा करिश्मा पैदा करने की क्षमता से होते हैं। 1999 के संसदीय चुनाव में किस तरह से प्रियंका गांधी के मात्र एक चुनावी संबोधन से रायबरेली लोकसभा में कांग्रेस ने भाजपा के प्रत्याशी अरुण नेहरू को हरा दिया था। प्रियंका गांधी के व्यक्तित्व में यदि कोई गुण सर्वाधिक प्रभावित करता है, तो वह उनके द्वारा लोगों से सहज संवाद स्थापित करने की क्षमता है, बोली-वाणी, पहनावे एवं रहन-सहन से लोगों को सीधे प्रभावित करती हैं। भीड़ में विषेशतया महिलाओं में अपने घुलने मिलने की क्षमता के कारण वह लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लेती है। जो लोग कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप लगाते हैं, वह अन्य राजनीतिक दलों के वंशवाद की तरफ से आंखे फेरे हुए हैं। अन्य दलों से विपरीत कांग्रेस का परंपरा से प्राप्त नेतृत्व सदैव जनता द्वारा बड़े इम्तिहान पास कर आता है। वह चाहे इंदिरा जी की ‘इन्डीकेट बनाम सिण्डीकेट’ की लड़ाई हो, संजय गांधी द्वारा 1977 के आम चुनाव से पस्त मृतप्राय कांग्रेस में जान फूंकने का काम हो, राजीव गांधी द्वारा इंदिरा जी की हत्या से उपजे शून्य को भरना रहा हो, या श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा 2004 में साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता से अप्रत्याशित तौर पर बाहर करना हो। इस तरह नेहरू - गांधी परिवार का नेतृत्व जनता द्वारा कठिनतम परीक्षा पास करता आ रहा है। प्रियंका गांधी निरूसन्देह कांग्रेस का भविष्य हैं उनके आने से कांग्रेस को मजबूती मिलेगी एवं समाज को भी एक सक्षम नेतृत्व मिलेगा।

Thursday, 2 January 2014

मोदी को लताड़ा प्रधानमंत्री ने



आज का दिन, यानी 3 जनवरी, 2014,  नेशनल मीडिया सेंटर में हुई प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री डॉ। मनमोहन सिंह ने पत्रकारों के सवालों के बखूबी जवाब दिए। खासकर भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के सवाल पर उनका जवाब बेहद सख्त था। उन्होंने मोदी को गुजरात में हुए नरसंहार की याद दिला दी। देश के अगले पीएम और नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच मुकाबले की बात पर उन्होंने कहा कि मुझे पूरा विश्वास है कि अगला पीएम यूपीए से ही होगा। नरेंद्र मोदी का पीएम बनना देश के लिए बहुत घातक होगा। नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि अहमदाबाद की सड़कों पर लोगों का कत्लेआम ताकत का प्रतीक नहीं है। उन्होंने कहा कि कहा कि मजबूत नेता का यह मतलब नहीं होता है कि अहमदाबाद में लोगों का कत्लेआम हो। यह पहला मौका है, जब प्रधानमंत्री डॉ। मनमोहन सिंह ने मोदी पर इतनी सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है। मनमोहन ने इससे पहले कभी भी मोदी के लिए ‘कत्लेआम’ और ‘घातक’ जैसा शब्द इस्तेमाल नहीं किया। इससे पहले उन्होंने ने गुजरात में एक कार्यक्रम के दौरान सरदार पटेल के मुद्दे पर मोदी को उनके सामने ही जवाब दिया था, लेकिन इस तरह का सख्त रुख पहली बार नजर आया।


दरअसल, प्रधानमंत्री आज अकेले नहीं थे। इससे पहले भी नहीं थे। उनके पीछे पूरी कांग्रेस है। कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमति सोनिया गांधी हैं। उनका साथ है। अपने संबोधन में भी स्वयं प्रधानमंत्री ने इस सच को बखूबी स्वीकारा कि कांग्रेस अध्यक्षा का निर्णय देशहित में होता और सरकार उनकी सलाहों पर गौर फरमाती हैं। सही मायने में व्यक्तियों के नहीं, बल्कि विचारों के सहारे कांग्रेस राजनीति में महानदी के रूप में प्रवाहित हुई। उसने सभी दृष्टियों की छोटी-बड़ी विकृतियों को आत्मसात कर लिया। करोड़ों लोगों की प्रतिनिधि कांग्रेस बुनियादी तौर पर सोच की पार्टी रही ह।उसके निमार्ताओं का विचारों, बहस मुबाहिसों और किताबों से गहरा सरोकार रहा ह।कांग्रेस बनिए का बहीखाता या जैन डायरी नहीं रही है जिसमें सफेद और काले धन का हिसाब लिखा जाता रहा हो। पार्टी के शुरूआती दौर के सबसे बड़े नेता लोकमान्य तिलक सबसे बड़े विचारक थे। जो व्यक्ति ह्णस्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार हैह्ण का नारा अंग्रेज की छाती पर उगाता ह।काले पानी के दिनों में बैठकर ह्णगीता रहस्यह्ण जैसी अद्भुत कृति की रचना भी वही करता ह।प्रागैतिहासिक काल की उपपत्ति ह्णदी आर्कटिक होम इन दी वेदाजह्ण तिलक ने स्थापित की थी। ऐसा श्रेष्ठ बुद्धिजीवी जननेता भी हो सकता था-यह कांग्रेस ने सम्भव कर दिखाया। तिलक के बाद गांधी ने साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में जितना अधिक लिखा, वह विश्व इतिहास में बेमिसाल ह।महात्मा गांधी अंग्रेजी और गुजराती के अप्रतिम रचनाकार थे और कालजयी रचना ह्यहिन्द स्वराजह्य के लेखक। राजनीति से हटकर भी वे महानता की ऊँचाई तक पहुँच सकते थे। गांधी के बाद नेहरू ने विश्व लेखकों के बीच अपनी सम्मानजनक जगह सुरक्षित कर ली ह।बहुत कम लोगों को यह पता रहा है कि नेहरू परिवार के खर्च का मुख्य स्त्रोत जवाहरलाल नेहरू की किताबों से मिली रॉयल्टी ही रहा ह।मौलाना आजाद उर्दू, फारसी और अरबी के युग प्रवर्तक विद्वानों में से एक रहे हैं। डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद का अंग्रेजी भाषा पर इतना एकाधिकार था कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के वाद विवाद का निचोड़ प्रस्ताव की शक्ल में जब भी वे लिखते थे, उसमें एक शब्द का हेरफेर भी देखने और करने की जरूरत नहीं पड़ती थी।


आज से ज्यादा मुश्किल हालात में इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री रहते हुए घेरी गईं थीं। देश के सामने भारी आर्थिक संकट था। पर्याप्त खाद्यान्न नहीं था। दवाओं की कमी थी। खजाना खाली हो रहा था। पी।एल। 480 जैसा बदनाम सौदा अमेरिका से हो चुका था। आज भारतीय कारपोरेट जगत मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी खेमों में बंटकर जनभावनाओं का मजाक उसी तर्ज पर उड़ा रहा ह।तब कांग्रेस में ह्यसिंडिकेटह्य के नाम से उभरे स्वार्थी वर्ग ने इन्दिरा गांधी को ह्यमोम की गुड़ियाह्य कहा था। नेहरू की बेटी ने पलटवार कर वामपंथी पार्टियों से सहयोग लेकर सिंडिकेट के पूंजीपरस्तों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया। कोयला, बैंकिंग, बीमा, अल्यूमीनियम वगैरह कई उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। एटमी ताकत बढ़ाने के प्रयत्न किए गए।
 सच तो यही है कि इतिहास मंथन की प्रक्रिया से करोड़ों निस्तेज भारतीयों को आजादी के अणु से सम्पृक्त करने के लिए एक ऐतिहासिक जरूरत के रूप में वक़्त के बियाबान में कांग्रेस पैदा हुई। कांग्रेस उन्नीसवीं सदी की अंधेरी रात में जन्मी। बीसवीं सदी की भोर में उसने घुटनों से उठकर अपने पुख्ता पैरों पर चलना सीखा। प्रतिनिधिक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में इक्कीसवीं सदी की ओर वह मुखातिब हुई। कांग्रेस देश की राजनीति में घूमती हुई नहीं आई। कांग्रेस-संस्कृति इतिहास की दुर्घटना नहीं है।उसकी किशोरावस्था का परिष्कार भारतीय राजनीति के धूमकेतु लोकमान्य तिलक ने उसकी शिराओं में गर्म खून लबालब भरकर किया। उसकी जवानी गांधी के जिम्मे थी जिसने उसकी छाती को अंग्रेज की तोप के आगे अड़ाने का जलजला दिखाया। उसकी प्रौढ़ावस्था की जिम्मेदारियों के समीकरण जवाहरलाल ने लिखे। शतायु की ओर बढ़ती उसकी बूढ़ी हड्डियों को इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने आराम लेने नहीं दिया। कांग्रेस अपने जन्म से ही कर्मप्रधान पार्टी रही है। उसका जन्म वैसे तो एक अंगरेज द्वारा अंगरेजी सरकार को भारतीयों के लिए ज्ञापन वगैरह देने के नाम पर हुआ था। धीरे धीरे कांग्रेस गंगा की तरह भारतीय राजनीति की केन्द्रीय वाहिका बनी। उसने देश को आजाद कराया और उस पर हुकूमत की। यह अलग बात है कि गंगा में हरिद्वार अर्थात आजादी आते ही प्रदूषण आना शुरू हो गया। कानपुर, इलाहाबाद, बनारस और पटना जैसे शहरों के रासायनिक और चमड़े के कारखानों की मितली गंगा में प्रवाहित की जाती रही। वाराणसी में तो शव ही बहा दिए जाते हैं। कुछ लोगों को गलतफहमी है कि तृतीय श्रेणी में परीक्षा पास करना गांधी क्लास पाना ह।बीसवीं सदी ने सिद्ध किया है कि हिंदुस्तान की आत्मा, जे़हन और भविष्य को लेकर गांधी से बड़ा विचारक कोई नहीं हुआ। यदि वे बुद्धिजीवी नहीं होते तो अंग्रेज की काट नहीं होती। गांधी केवल कूटनीति के सहारे अंग्रेज प्रधानमंत्रियों और वाइसराय से बहस मुबाहिसा नहीं करते थे। वे अधिकृत चर्च के सबसे बड़े पादरी को यह चमत्कृत करने में समर्थ हुए थे कि बाइबिल की षिक्षाओं को किसी भी ईसाई के मुकाबले बेहतर आत्मसात कर चुके थे। कांग्रेस के बड़े दफ्तर से लेकर ब्लाक मुख्यालयों तक जिस भाषा में राजनीतिक चिंतन होता है, अब उस कागज के फूल में गांधी गंध नहीं होती। गांधी ने भारत के संविधान के लिए अपना ड्राफ्ट और विचार दिए थे।

Friday, 20 December 2013

नजर 17 जनवरी, 2014 पर


हाल ही में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने जैसे ही कहा कि लोकसभा चुनाव से पूर्व पार्टी अपना चेहरा जाहिर कर सकती है, मीडिया में कयासों का दौर शुरू हो गया। उसके बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी ने कार्यसमिति की बैठक 17 जनवरी को होने की बात कही और साथ ही कहा कि उसमें कई अहम फैसले लिए जा सकते हैं। बस, क्या था? कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी को लेकर हर तरफ कयास लगाए जाने लगे।
यकीन मानिए, जैसे पार्टी की ओर से कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी को आगे के लिए प्रोजेक्ट किया जाता है, हर कांग्रेसी का उत्साह दोगुना हो जाएगा। याद कीजिए, बीते जयपुर में पार्टी का चिंतन शिविर का दृश्य। चिंतन शिविर के नतीजों से पार्टी के तमाम नेता, कार्यकर्ता, प्रशंसक और समर्थक खासे उत्साहित दिखे थे। दरअसल, उत्साहित होने की वजह भी थी। वजह यह कि चिंतन शिविर के समापन के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी को पदोन्नत कर एक अहम जिम्मेदारी का पद (पार्टी उपाध्यक्ष) सौंपने का फैसला लिया गया। उसके बाद श्री राहुल गांधी पार्टी महासचिव नहीं, बल्कि पार्टी उपाध्यक्ष की हैसियत से कामकाज देखने के लिए अधिकृत हुए थे।
अब सबकी नजर 17 जनवरी, 2014 पर है। कांग्रेस नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में पहुंचने वाले पार्टी के ‘यूथ आइकन’ एवं भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में देखे जा रहे राहुल गांधी के नाम का ऐलान हो सकता है। इसके साथ ही उनके समक्ष पार्टी का जनाधार बढ़ाने और युवा मतदाताओं की बढ़ती संख्या को पार्टी के पक्ष में करने का चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। हमें जेहन में कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का वह वक्तव्य भी याद रखना होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश बदल रहा है और इस बदलाव में युवाओं की आवाज की अनदेखी कर हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं। युवा बढ़ रहे हैं। भारत बदल रहा है। हमें भी खुद को बदलना होगा। यह पीढ़ी चाहती है कि उसकी आवाज सुनी जाए।
निश्चित रूप से हाल के दिनों में 128 साल पुरानी और देश की सबसे बड़ी व ऐतिहासिक कांग्रेस पार्टी में इस पदोन्नति के साथ राहुल गांधी की जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों में इजाफा होगा। कांग्रेस उपाध्यक्ष बनाए जाने से पहले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव राहुल गांधी ने वर्ष 2009 में संप्रग को सत्ता में लाने और उत्तर प्रदेश में पार्टी के पुनरुत्थान में मदद करने लिए अपने अभिभावक नेताओं की छत्रछाया से उबरते हुए खुद के राजनीतिक कद में बढ़ोतरी की थी। उन्होंने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को अप्रत्याशित खुशी दिलाई और अब पार्टी केंद्र में तीसरी बार सत्ता में लौटने के लिए उनकी ओर देखने की जुगत भिड़ा रही है। कहते हैं कि बड़े ओहदे के साथ बड़ी जिम्मेदारियां भी आती हैं।
कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी पहले दागी नेताओं को बचाने के लिए ऑर्डिनेंस को नॉनसेंस बताकर सरकार को झुकने को मजबूर किया, तो अब लोकपाल को संसद में पास कराने में अपनी सक्रियता दिखाई। इतना ही नहीं, करप्शन के तमाम लंबित बिल को पास कराने की मांग को लेकर संसद का सत्र बढ़ाने तक का आग्रह किया। 

Wednesday, 18 December 2013

10 साल के काम की हो तारीफ



बेशक यह कहा जाए कि कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव की तैयारियों के लिए कमर कसते हुए पिछले दस सालों में अपनी सरकार के काम का बखान किया है। लेकिन सच तो यह है कि कांग्रेस हमेशा से आम आदमी और देशहित के लिए काम किया है। कांग्रेस ने संसदीय दल की बैठक में एक बुकलेट जारी की है। इस बुकलेट में कांग्रेस सरकार के कामकाज का ब्यौरा है। इस मौके पर सोनिया गांधी ने कहा कि हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव नतीजों से निराश होने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस को विधानसभा के चुनाव में सामने आए इन नतीजों से उबरना होगा। यह भी चिंता का विषय है कि संसद में महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो सका, लेकिन लोकपाल बिल पास होने पर हमें खुशी है।
अपने दस साल के रिपोर्ट कार्ड में कांग्रेस ने कहा कि पिछले 10 साल में सरकार के काम की तारीफ करनी चाहिए। कांग्रेस के शासन में मनरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसी योजनाएं लागू हुईं। कांग्रेस के शासन में गरीबी घटी है। सरकार ने किसानों के हित में काम किया। शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार पर सरकार ने जोर दिया। कांग्रेस कार्यकाल में साक्षरता दर बढ़कर 74% हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने यहां कांग्रेस संसदीय दल (सीपीपी) की बैठक में कहा कि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय के लिए अनेक कारण हैं। यह जाहिर है कि हम जनता को अपनी नीतियों कार्यक्रमों और उपलब्धियों के बारे में बताने में सफल नहीं हो पाए। ऐसा लगता है कि हम उनकी आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाए। उन्होंने कहा कि हमें मायूस नहीं होना चाहिए, हमारे सामने एक और संग्राम है, मई 2014 में, जिसके लिए हमें अपने आप को तैयार करना होगा। कांग्रेस पार्टी ने अनेक चुनाव जीते हैं और हारे हैं। जीत हो या हार, हमें यह याद रखना चाहिए कि जनता की सेवा करना हमारा सर्वोपरि दायित्व है। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा हमें उन लोगों के खिलाफ बोलते समय डरना नहीं चाहिए जो केवल संकीर्ण एवं विनाशकारी विकल्प पेश करते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विपक्ष ने प्रधानमंत्री सहित कांग्रेस और सरकार पर निंदात्मक और पूरी तरह से निराधार व्यक्तिगत हमले करने के लिए अपना ज्यादातर समय और उर्जा का इस्तेमाल किया। इस मौके पर पार्टी ने अपने सांसदों को एक पुस्तिका भी वितरित की, जिनमें संप्रग सरकार की उपलब्धियां गिनाई गयी हैं तथा सांसदों से इन उपलब्धियों का और ज्यादा कारगर तरीके से मतदाताओं के बीच प्रचार करने को कहा गया है।
इस दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंहगाई नहीं रोक पाने को अपनी सरकार की एक कमजोरी माना है। उन्होंने कहा कि कि मुद्रास्फीति नियंत्रित रखने में राज्यों की भी अहम भूमिका है और उनका अधिक से अधिक सहयोग लेने की जरुरत है। कांग्रेस संसदीय दल की बैठक को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि मुद्रास्फीति हमारी एक कमजोरी रही है और इसके लिए हमारी आलोचना भी हुई है। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा बहुत जटिल है जिस पर सरकार की आलोचना करना तो आसान है, लेकिन उसे समझना और उससे निपटना बहुत कठिन है। मनमोहन सिंह ने महंगाई से जुड़े विभिन्न पहलुओं की चर्चा करते हुए कहा कि इसे लेकर चिंतित होना लाजिमी है, लेकिन इस बात पर भी गौर करना होगा कि लोगों की आमदनी मुद्रास्फीति की दर से अधिक तेजी से बढ़ी है। इसी वजह से प्रति व्यक्ति खपत और वास्तविक वेतन में बढोतरी हुई है। अपने भाषण में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि हाल के विधानसभा चुनाव के नतीजे बेहद निराशाजनक हैं, लेकिन हमें वर्ष 2014 में होने जा रहे आम चुनाव को लेकर हताश नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन ने यह भी कहा कि कांग्रेस ऐसे वायदे नहीं करती जो पूरे ना हो सके। हमने अगले 20 साल का एजेंडा सेट किया है। हमने अपने कार्यकाल में गंभीर समस्याओं को सुलझाया है। हम अब भी कई गंभीर समस्याएं झेल रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव के परिणाम निश्चितरूप से इस बात के संकेत नहीं हैं कि कुछ महीनों के बाद हो होने जा रहे आम चुनावों में क्या होगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि अगले साल होने वाले आम चुनाव राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर लड़े जायेंगे। इनमें से कुछ मुद्दे विधानसभा चुनावों में भी रहे होंगे, लेकिन मई में होने वाले चुनावों में इस बात को लेकर हमारा आकलन होगा कि राष्ट्रीय मुद्दों पर हमारी कैसी प्रतिक्रिया रही है।

Thursday, 3 October 2013

इंदिरा गांधी की राह पर सोनिया गांधी



लोकसभा चुनाव के अब चंद माह रह गए हैं। कांग्रेस खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण विधेयकों के जरिये लोगों तक यह संदेश लेकर जाने की योजना बना रही है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ नारे को उनकी बहु सोनिया गांधी आगे बढ़ा रही हैं। हाल में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआइसीसी) ने खाद्य सुरक्षा विधेयक पर यही उपाय किया था। दोनों विधेयक संसद में पारित हो चुके हैं। कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री की टिप्पणी है कि इंदिरा गांधी ने गरीब और समाज के सबसे दबे कुचले लोगों की भूख और कुपोषण की समस्या समाप्त करने के लिए ‘गरीबी हटाओ’ नारे पर अमल शुरू किया था। उनके अधूरे काम को उनकी बहु सोनिया गांधी पूरा करने की कोशिश कर रही हैं।
1969 में इंदिरा गांधी ने जब बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और रजवाड़ों का प्रीवि पर्स और विशेषाधिकार खत्म किए थे, तब भी विपक्ष उन कदमों का राजनीतिक निहितार्थ समझे बिना इंदिरा के विरोध में लगा रहा। इंदिरा सरकार ने जब प्रीवि पर्स खत्म करने की खातिर संसद में संविधान संशोधन बिल पेश किया तो विपक्ष ने उसे राज्यसभा में एक वोट से गिरा दिया। कांग्रेस संसद में कामयाब नहीं हो पाई मगर उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में उसने विपक्ष को करारी शिकस्त देते हुए 352 सीटें जीती थीं। इंदिरा गांधी हमेशा अपनी पिच पर खेलती थीं और विपक्ष के पास कोई विकल्प नहीं बचने देती थीं। वह विपक्ष को अपने अजेंडे का समर्थन या विरोध करने पर मजबूर कर देती थीं।
यह कहने की जरूरत नहीं कि जब यूपीए सरकार ने फूड सिक्युरिटी बिल पर अध्यादेश लाने का फैसला कर एकबार फिर देश का राजनीतिक अजेंडा अपने हाथ में लेने की कोशिश की थी, तब विपक्ष खास तौर से भाजपा इस पर जिस तरह के सवाल उठा रही है, वह कांग्रेस के पक्ष में जा रहा है। सच तो यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अब इंदिरा गांधी की तरह चुनाव से पहले सटीक राजनीतिक फैसले लेना सीख गई हैं। फूड अध्यादेश उन्हीं के निदेर्शों पर लाया गया है। इंदिरा जी की कार्यशैली के बारे में एकबार अटल बिहारी वाजपेयी बता रहे थे कि वह आपसे पूछती थीं कि चाय लेंगे या कॉफी। हंसते हुए उन्होंने कहा था कि इंदिरा किसी तीसरी चीज की गुंजाइश नहीं छोड़ती थीं। सोनिया ने भी अब देश में बहस का विषय फूड बिल और उसके लिए लाए जाने वाले अध्यादेश को बना दिया है। बीजेपी जिन मुद्दों पर चुनाव चाहती थी, कांग्रेस उन्हें हाशिये पर धकेल कर फिर गरीब और उनका हमदर्द कौन पर बहस को लाना चाहती है। इंदिरा ने जब 1971 में गरीबी हटाओ का नारा दिया था तो उन्होंने कहा था कि मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, ये (विपक्ष) कहते हैं इंदिरा हटाओ। कांग्रेस भी अब कह रही है कि हम कहते हैं कि भूख मिटाओ, ये कहते हैं भूखों को भूल जाओ।
खाद्य सुरक्षा बिल में देश की 80 फीसदी आबादी को भोजन मुहैया कराने की गारंटी, तो भूमि अधिग्रहण बिल से किसानों की इच्छा के बगैर जमीन लेने पर रोक की तैयारी है। कांग्रेसी हलके में चर्चा है कि दोनों ही बिल कांग्रेस को उसी तरह से जीत के दर्शन कराएंगे, जैसे मनरेगा और किसानों की कर्ज माफी ने 2009 में कांग्रेस की राह आसान की थी। खबर यह भी है कि कांग्रेस का ही एक आर्थिक सुधारवादी तबका यह सोचता है कि इससे आर्थिक विकास की गति थमेगी और संकट बढ़ेगा। लेकिन शायद सोनिया गांधी को यकीन है कि महंगाई, घोटालों और नेतृत्वहीनता के गंभीर आरोपों से जूझ रही सरकार के पास चुनाव जीतने का कोई कारगर मंत्र नहीं है, लिहाजा लोक-लुभावन योजनाओं से ही आम आदमी का दिल जीता जा सकता है।
सोनिया गांधी के इस मूड ने एक बार फिर इंदिरा गांधी की याद दिलाई है। इंदिरा गांधी हवा के खिलाफ दो टूक फैसले लेने के लिए जानी जाती थीं। उनकी निर्णय क्षमता पर आलोचक भी सवाल नहीं खड़े करते थे। 1967 के बाद चाहे वह पार्टी के आधिकारिक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी की जगह वी वी गिरि को समर्थन देना हो, या फिर बैंक राष्ट्रीयकरण करना और प्रिवी पर्स खत्म करना हो, या 1971 में बांग्लादेश को आजाद कराने के लिए सेना भेजना हो, या फिर 1984 में स्वर्ण मंदिर से चरमपंथियों को निकालना हो, एक बार तय करने के बाद इंदिरा गांधी हिचकी नहीं। किसी मामूली नेता के लिए सत्तर के दशक में आपातकाल लागू करने का फैसला आसान नहीं होता। इंदिरा गांधी ने न केवल फैसला किया, बल्कि गलती का एहसास होते ही आपातकाल उठा भी लिया। सोनिया गांधी के करीबी लोगों का कहना है कि राजनीति में दिलचस्पी नहीं होने के बाद भी उन्होंने इंदिरा गांधी को काफी करीब से देखा और उनसे काफी कुछ सीखा।यह सच है कि सोनिया गांधी के सामने इंदिरा जैसी चुनौती कभी नहीं रही। न ही उन्हें पार्टी पर नियंत्रण के लिए जद्दोजहद करनी पड़ी। शरद पवार ने जरूर विदेशी मूल का मुद्दा उठाया, पर यह मसला परवान नहीं चढ़ा और हारकर पवार को उनसे ही गठबंधन करना पड़ा, जबकि इंदिरा गांधी को शुरूआती दिनों में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा था। पार्टी पर पुराने दिग्गज और क्षेत्रीय क्षत्रप हावी थे। कामराज, एस निजलिंग्प्पा, मोरारजी देसाई, जगजीवन राम, एस के पाटिल, अतुल्य घोष जैसे लोगों की तूती बोला करती थी। ये सभी लोग जवाहरलाल नेहरू के समकक्ष और सहयोगी थे। इंदिरा गांधी ने इन सबका मुकाबला करने और पार्टी को दक्षिणपंथी नेताओं के चंगुल से बाहर लाने के लिए रातोंरात समाजवादी एजेंडे को आगे किया। लेफ्ट का समर्थन लेकर मोरारजी जैसे तगड़े प्रतिद्वंद्वी और पुराने दिग्गजों को किनारे लगा दिया।यूपीए-दो के समय सोनिया गांधी की तबियत बेहतर नहीं थी और साथ ही राहुल को पार्टी की बागडोर संभालने की ऊहापोह ने पार्टी को काफी समय तक अनिर्णय की स्थिति में डाले रखा। यह ऐसा वक्त था, जब पार्टी और सरकार को लकवा मारने की बात कही जाने लगी। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। कई मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। अर्थव्यवस्था डांवांडोल हुई। पार्टी में निराशा का भाव जगा। चुनाव के पहले ही तमाम नेता कहने लगे कि पार्टी सौ सीट भी ले आए, तो बड़ी बात होगी। सोनिया फिर सक्रिय हुईं। पूरी इंडस्ट्री, बुद्धिजीवी वर्ग और सरकार-पार्टी के एक बड़े तबके के विरोध के बावजूद दोनों बिलों को लाने का फैसला किया।