Friday, 20 June 2014

सरकार और संगठन के बीच सेतु बने किशोर


उत्तराखंड कांग्रेस को आगे बढ़ाने के लिए और संगठन को पहले से अधिक मजबूत बनाने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने श्री किशोर उपाध्याय को प्रदेष कांग्रेस कमेटी का नया अध्यक्ष बनाया है। नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष श्री किशोर उपाध्याय का कहना है कि उनकी प्राथमिकता त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों और विधानसभा उपचुनाव में पार्टी को जीत दिलाना है। इसके लिए संगठन को और अधिक मजबूत व चुस्त-दुरुस्त किया जाएगा। वरिष्ठ नेताओं के साथ विचारिवमर्श कर पार्टी को मजबूत करने के लिए रणनीति तैयार की जाएगी। सरकार और संगठन के बीच सही तालमेल किया जाएगा, ताकि प्रदेश को विकास की राह पर आगे ले जाने में मदद मिल सके। उनका यह भी कहना है कि कार्यकर्ता पार्टी की रीढ होते हैं और उनको पार्टी में पूरा मान-सम्मान दिया जाएगा।
उत्तराखंड कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद किशोर उपाध्याय पहली बार जब चंबा पहुंचे, तो चंबा में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने किशोर उपाध्याय का स्वागत किया, साथ ही किशोर उपाध्याय ने कहा जब भी मैं कोई शुभ कार्य शुरू करता हूं तो सबसे पहले अपनी कुलदेवी के पास आर्शीवाद लेने जाता हूं। मैं औपचारिक तौर पर 22 जून को 3 बजे प्रदेश कार्यालय में कार्यभार ग्रहण करूंगा। उल्लेखनीय है कि एनडी तिवारी शासनकाल में राज्य मंत्री रह चुके किशोर उपाध्याय प्रदेश संगठन में पदाधिकारी रहने के साथ ही राज्य आंदोलन से भी जुडे रहे हैं।
हम आपको बता दें कि एनडी तिवारी शासनकाल में राज्य मंत्री रह चुके किशोर उपाध्याय प्रदेश संगठन में पदाधिकारी रहने के साथ ही राज्य आंदोलन से भी जुडे रहे हैं। पिछले वर्ष वरिष्ठ कांग्रेसी यशपाल आर्य ने जब अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था तभी से संगठन के लिए नए सिपहसालार की तलाश शुरु हो गई थी। हालांकि नए मनोनयन तक यशपाल आर्य को ही अध्यक्ष पद पर बने रहने को कहा गया था। बताया जाता है कि नरेंद्र नगर के विधायक और विधानसभा उपाध्यक्ष अनुसूया प्रसाद मैख्ुारी अध्यक्ष पद के लिए प्रबल दावेदार के रुप में सामने आए थे। केद्रिय आलाकमान ने इन दोनों नेताओं के नाम को खारिज करते हुए किशोर उपाध्याय पार भरोसा जताया है और उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। श्री उपाध्याय काफी सुलझे हुए इंसान है। आम आदमी और जमीन से जुड़े लोगों के बीच उनकी काफी अच्छी पैठ है। साथ ही उनका मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ भी काफी अच्छे ताल्लुकात हैं। 

Wednesday, 18 June 2014

धारा 370 पर हाय-तौबा क्यों ?


प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जीतेंद्र सिंह के अनुच्देछ 370 पर सवाल उठाए जाने के बाद यह पूरा मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस मामले में नेशनल कांफ्रेंस व पीडीपी के आक्रामक  तेवर को देखने के बाद अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने सीधे मोर्चा संभाल लिया है। संघ की ओर से जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर यह कहते हुए पलटवार किया कि राज्य से संविधान की धारा 370 हटे या न हटे, लेकिन यह राज्य भारत का अभिन्न अंग रहेगा। आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, जम्मू एवं कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं होगा? क्या उमर इसे अपनी पैतृक संपत्ति समझ रहे हैं? धारा 370 रहे या न रहे जम्मू-कश्मीर रहेगा और हमेशा भारत का अभिन्न अंग रहेगा।
इससे पहले भी लगातार हमारे संविधान का यह अनुच्छेद राजनीतिक प्रोपेगैंडा का हथियार बनता रहा है। हम भारत के लोग इसी प्रोपेगैंडा के आधार पर ही अपनी राय कश्मीर और अनुच्छेद 370 को लेकर बनाते रहे हैं। लिहाजा हम भारत के लोग भी जाने-अनजाने में इन्हीं स्वार्थो में से किसी एक को समस्या व समाधान मानते हैं। अब डॉ जितेंद्र सिंह के बयान और उन पर आ रहीं प्रतिक्रियाओं पर नजर डालिए, तो क्या किसी ऐसे नतीजे पर पहुंचा जा सकता है जो पूरे मामले को सही परिप्रेक्ष्य में देख पाने मददगार हो सके। कोई कह रहा है कि यह जम्मू-कश्मीर और भारत को जोड़ने वाला सेतु है और यदि यह अनुच्छेद नहीं रहेगा तो यह सेतु खत्म हो जायेगा। कोई कह रहा है कि अलगाववाद के मूल में यह अनुच्छेद ही है और इसे हटा दिया जाये तो समस्या के समाधान में मदद मिलेगी। कोई इसे जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की शर्त बता रहा है, तो कोई इसे पंडित नेहरू द्वारा शेख अब्दुल्ला को खुश करने के लिए दिये गये अधिकार के रूप में परिभाषित कर रहा है। सच तो यह भी है कि इस राज्य का नाम लेने से दो ही तस्वीरें हमारे दिमाग में बनती हैं। पहली, एके 47 यानी आतंकवाद की और दूसरी खूबसूरती की। हां, अमरनाथ यात्र और वैष्णोदेवी की भी याद आ जाती है। इसके अलावा, वहां के बारे में हम कितना जानते हैं? आम लोगों के बीच अनुच्छेद 370, जम्मू-कश्मीर के इतिहास, उसके भारत में विलय, उसकी सूफी परंपरा आदि को लेकर जानकारी का स्तर शून्य है। वे शायद यह भी नहीं जानते कि कबायली हमले के समय कश्मीरियों की भूमिका क्या रही और कश्मीर घाटी का मुंह प्राकृतिक रूप से मुजफ्फराबाद की ओर ही खुलता है या आजादी से पहले कश्मीर को सड़क मार्ग से देश को जोड़ने वाली सड़क श्रीनगर से मुजफ्फराबाद व रावलपिंडी होते हुए लाहौर पहुंचती थी।
दिलचस्प बात तो यह है कि मुस्लिम बहुल कष्मीर घाटी में राजग की जीत पर लोगों ने खूब खुषियां मनाई। कारण जगजाहिर है कि कांगे्रस कष्मीर मसले को राजनीतिक रूप से सुलझाने में पूरी तरह नाकाम रही। इसके साथ ही लोगों को यह भरोसा होने लगा कि केंद्र में मोदी की सरकार होगी, तो सबका भला होगा। जिस प्रकार से नरेंद्र मोदी ने अपने षपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज षरीफ को बुलाया। अगले दिन नवाज षरीफ और नरेंद्र मोदी की द्विपक्षीय वार्ता हुई, उससे कष्मीरी आवाम और नेताओं के भरोसे को और भी बल मिला। घाटी के अलगाववादी वरिष्ठ नेता मीरवाइज उमर फारूक कहते हैं, ‘ यह एक अच्छी षुरूआत है। जिस प्रकार से दोनों देषों के प्रधानमंत्री ने मुलाकात की है, उससे परस्पर विष्वास को बल मिलेगा। भारत और पाकिस्तान के बीच कष्मीर मसले के समाधान में यह कारगर पहल साबित होगा।‘ दरअसल, मीरवाइज ऐसे पहले कष्मीरी अलगाववादी नेता हैं, जिन्होंने भाजपा द्वारा मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए जाने का स्वागत किया था। वे कहते हैं, ‘ जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग की सरकार बनी थी, उस समय भी कष्मीर मसले को लेकर सकारात्मक पहल की गई थी। मुझे उम्मीद है कि मोदी भी वाजपेयी के पदचिन्हों का अनुसरण करेंगे। कष्मीर के आवाम को उनसे काफी उम्मीदें हैं।‘
हालांकि, मीरवाइज के इस प्रकार के बयानों और कदमों की काफी आलोचना की गई थी। कष्मीर के कई हिस्सों में इसको लेकर खूब चर्चाएं भी हुईं। इसके बावजूद मीरवाइज अपनी सोच को लेकर दृढ़ रहे। आखिरकार, कष्मीर की आवाम ने भी उनसे इत्तेफाक रखते हुए मोदी पर भरोसा जताया। न्यूज बेंच से बात करहे हुए मीरवाइज कहते हैं, ‘ मोदी ने खुद को गुजरात में एक अच्छे प्रषासक के रूप में साबित कर दिया है। मुझे पूरा भरोसा है कि प्रधानमंत्री के रूप में भी वे लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरेंगे और कष्मीर समस्या का समाधान कराने में सफल होंगे।‘
आखिर, भाजपा के नेता पर भरोसा क्यों ? जिस पार्टी के घोषणापत्र में संविधान द्वारा दिए गए विषेषाधिकार धारा 370 को खत्म करने की बात हो, उससे भला कष्मीर की अस्मिता और समस्याओं के समाधान की उम्मीद करना कहां तक उचित है ? मीरवाइज कहते हैं, ‘समस्या का समाधान षांति से होगा। बात केवल कष्मीर की ही नहीं, पूरे दक्षिण एषिया की है। मोदी ने षांतिपूर्ण परिस्थिति में देष के विकास और प्रगति की बात की है। भारत आर्थिक रूप से समृद्ध हो रहा है। हमारे देष का रक्षा बजट 37 अरब तक पहुंच चुका है। मुझे भरोसा है कि किसी भी समस्या के समाधान के लिए परस्पर विष्वास और स्थिरता सबसे अहम है।‘
ऐसा नहीं है कि मोदी के आने से अलगावादियों के बीच खुषी है। मुख्य धारा की राजनीति करने वाले नेताओं में भी उम्मीद जगी है। जम्मू-कष्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला और विधानसभा मंे प्रतिपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती ने भी नवाज षरीफ को हिंदुस्तान बुलाने के निर्णय का स्वागत किया। उमर अब्दुला, जो किसी भी मौके पर मोदी के विरोध करने का मौका नहीं छोड़ते, कहते हैं, ‘ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज षरीफ की मुलाकात जम्मू-कष्मीर के लिए षुभ संकेत है। हमें दोनों देषों के खराब रिष्तों की कीमत चुकानी पड़ती है। जब-जब दोनों देषों के रिष्ते बहेतर हुए हैं, जम्मू-कष्मीर को लाभ होता है।‘
बहरहाल, अलगावादी नेता केंद्र सरकार से बात करने की उम्मीद पाले हुए हैं। वरिष्ठ हुर्रियत नेता बिलाल गनी लोन कहते हैं, ‘ हमें पूरी उम्मीद है कि केंद्र की नई सरकार से हमंे बातचीत करने का अवसर मिलेगा और हम सकारात्मक बात करेंगे।‘ उल्लेखनीय है कि साल 2004 में जब तत्कालीन उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से कष्मीरी नेताओं के एक दल ने मुलाकात की थी, उस दल में बिलाल गनी लोन भी षामिल थे।  जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि अगर संविधान की धारा 370 हटाई गई तो जम्मू एवं कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि यह धारा राज्य को विशेष दर्जा देती है। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने मंगलवार को यह घोषणा करते हुए हड़कंप मचा दिया कि नई सरकार ने धारा 370 हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। हालांकि, बाद में उन्होंने कहा कि मीडिया ने उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि धारा 370 के मुद्दे को फिर से उठाने से जम्मू एवं कश्मीर के संघ के साथ विलय का मुद्दा भी फिर से उठेगा। अब्दुल्ला ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री नजमा हेपतुल्ला के बयान पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने कहा था कि आरक्षण भारतीय मुसलमानों की समस्या का समाधान नहीं है।

आखिर क्या है अनुच्छेद 370.
1. संविधान का अनुच्छेद 370 अस्थायी प्रबंध के जरिए जम्मू और कश्मीर को एक विशेष स्वायत्ता वाले राज्य का दर्जा देता है.
2. 370 का खाका 1947 में शेख अब्दुल्ला ने तैयार किया था, जिन्हें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था.
3. शेख अब्दुल्ला ने 370 को लेकर यह दलील दी थी कि संविधान में इसका प्रबंध अस्थायी रूप में ना किया जाए. उन्होंने राज्य के लिए मजबूत स्वायत्ता की मांग की थी, जिसे केंद्र ने ठुकरा दिया था.
4. 370 के प्रावधानों के अनुसार संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है. लेकिन अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू कराने के लिए केंद्र को राज्य का अनुमोदन चाहिए.
5. इसी विशेष दर्जे के कारण जम्मू-कश्मीर पर संविधान का अनुच्छेद 356 लागू नहीं होता. राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है.
6. भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते हैं. यहां के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है. एक नागरिकता जम्मू-कश्मीर की और दूसरी भारत की होती है.
7. यहां दूसरे राज्य के नागरिक सरकारी नौकरी नहीं कर सकते.
8. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता.
9. अनुच्छेद 370 की वजह से ही जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा और प्रतीक चिन्ह भी है.
10. 1965 तक जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल की जगह सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री हुआ करता था।

Tuesday, 10 June 2014

आजाद के अनुभवों से मिलेगा लाभ





कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद के संसदीय अनुभवों को देखते हुए कांग्रेस पार्टी की ओर से उन्हें राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है। गुलाम नबी आजाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक तेज-तर्रार नेता हैं। वह एक कुशल राजनेता हैं। कांग्रेस को उनके अनुभवों से लाभ मिलेगा।
गुलाम नबी आजाद का जन्म 7 मार्च, 1949 को जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में हुआ था। इनके पिता का नाम रहमतुल्लाह था। गुलाब नबी आजाद ने जम्मू-कश्मीर विश्वविद्यालय से प्राणि विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढाई संपन्न की। गुलाम नबी आजाद ने वर्ष 1980 में कश्मीर की एक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित गायिका शमीन देव आजाद के साथ विवाह संपन्न किया। इनके परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं। वर्ष 1973 में कांग्रेस के सदस्य के तौर गुलाम नबी आजाद ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। वर्ष 1973-1975 के बीच वह ब्लेस्सा  कांग्रेस समिति के ब्लॉक सचिव रहे।
 यहीं से उनके राजनैतिक जीवन को सही दिशा मिलनी प्रारंभ हो गई। वर्ष 1975 में गुलाम नबी आजाद जम्मू-कश्मीर युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और फिर 1977 में डोडा जिले के कांग्रेस अध्यक्ष बने। इसके बाद जल्द ही वह अखिल भारतीय युवा कांग्रेस के महासचिव बनाए गए। वर्ष 1982 में गुलाम नबी आजाद ने पहले केन्द्रीय उपमंत्री के तौर पर कानून, न्याय और कंपनी मामलों का मंत्रालय संभाला फिर कुछ ही समय बाद राज्य मंत्री बने। वर्ष 1985 में गुलाम नबी आजाद वशिम निर्वाचन क्षेत्र से दोबारा लोकसभा चुनाव जीतने के बाद गृह राज्य मंत्री बनाए गए। लेकिन उन्हें जल्द ही खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय सौंप दिया गया। इन सब के अलावा वर्ष 1978 से 1981 तक गुलाम नबी आजाद अखिल भारतीय मुस्लिम युवा कांग्रेस के भी अध्यक्ष रहे। 1986 में कांग्रेस कार्य समिति के भी सदस्य बनाए गए। इसके बाद वर्ष 1987 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव बने। गुलाम नबी आजाद नौ बार इस पद पर काबिज रहे। वर्ष 1990 में राज्यसभा में चयनित होने के बाद वह पी.वी. नरसिंह राव सरकार में संसदीय मामलों के केन्द्रीय मंत्री और बाद में पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्री बनाए गए। गुलाम नबी आजाद के जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष पद पर रहते हुए कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में 21 सीटों पर जीत हासिल हुई जिसके बाद वह प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनकर उभरी। मनमोहन सरकार में गुलाम नबी आजाद संसदीय मामलों के मंत्री रहे, लेकिन 2007 में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री पद के कारण उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में उन्हें स्वास्थ्य मंत्री का पद प्रदान किया गया था। स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए उन्होंने कई प्रकार के सुझाव दिए। जैसे लड़कियों का विवाह अगर 25-30 वर्ष के बीच किया जाए तो इससे जनसंख्या वृद्धि को रोका जा सकता है आदि बहुत प्रशंसनीय रहे।
उल्लेखनीय है कि इसके साथ ही यूपीए-2 में एक अन्य मंत्री रहे आनंद शर्मा को पार्टी ने उपनेता बनाया है। कांग्रेस के पास राज्य सभा (उच्च सदन) में विपक्ष के नेता का दावा करने के लिए अपेक्षित संख्या बल है। उच्च सदन में 245 सदस्य हैं और कांग्रेस की सदस्य संख्या 67 है। इस प्रकार सदन की कुल संख्या का 10 फीसदी अपेक्षित आंकड़ा कांग्रेस के पास है जो विपक्ष का नेता पद पाने के लिए जरूरी है। लोकसभा में कांग्रेस ने मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी का नेता बनाया है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को निचले सदन में कांग्रेस का उपनेता बनाया गया है। कांग्रेस की ओर से लोकसभा के लिए चीफ व्हिप और व्हिप के पदों का ऐलान कर दिया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को लोकसभा में कांग्रेस का चीफ व्हिप बनाया गया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिन्दर सिंह हुड्डा के सांसद बेटे दीपेंदर सिंह हुड्डा और केरल से सांसद केसी वेणुगोपाल को व्हिप नियुक्त किया गया है।

Saturday, 24 May 2014

क्यों बढ़ रहे हैं तलाक ?



सात फेरों में लिया गया जनम जनम का बंधन अब दरकने लगा है, परंपराए टूटने लगी है, संस्कार बिखरने लगे हैं। जी हां महानगर तलाक की राजधानी बनकर उभर रहे हैं। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसे महानगरों में हर रोज हजारों तलाक होते हैं। मुंबई और दिल्ली जैसे महानगर में तो रोजाना 10 हजार से ज्यादा तलाक होते हैं। जबकि देश में हर 100 वीं शादी का अंत तलाक पर होता है। आज के आधुनिक समाज में दंपत्तियों के बीच मन मुटाव और फिर तलाक काफी आम हो गया है। जिसे कभी बुरा माना जाता था उसे आज एक अच्छा निर्णय कहा जाता है।यह कहना गलत नहीं होगा कि जीवन की जितनी बड़ी सच्चाई शादी है उतना ही बड़ा सच तलाक भी है। हालांकि, इसे लेने से पहले लोग पर्सनल फाइनेंस के बारे में बेहद कम सोचते हैं।  बदलती जीवनशैली और आजाद सोच के कारण शादियों का अंत तलाक के साथ हो रहा है। करीब 5 साल पहले 1000 शादियों में 1 तलाक का मामला आता था और अब प्रत्येक 1000 शादियों में यह मामले 13 हो चुके हैं।
देश में तलाक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कई बार तो अजीबोगरीब वजह बताते हुए तलाक मांगा जाता है। वैसे, शारीरिक हिंसा तलाक का सबसे बड़ा कारण है। जबकि शादी के बाद भी पर पुरुष या स्त्री से शारीरिक संबंध, नशे की लत, जीवन साथी  को लेकर बहुत अधिक पजेसिव (उस पर अधिकार जमाना) होने जैसे कारण भी रिश्तों में दरार के लिए जिम्मेदार हैं। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, जैसे महानगरों में तलाक की जो दर है, वह छोटे शहरों से कहीं ज्यादा है। मुंबई और दिल्ली जैसे महानगर तलाक की ‘राजधानी’ बनकर उभर रहे हैं। एक आकलन के मुताबिक इन दोनों शहरों में हर साल 10 हजार से अधिक तलाक होते हैं। जबकि देश में होने वाली हर 100वीं शादी का अंत तलाक पर जाकर होता है। केरलाज मेंटल ब्लॉक रिपोर्ट के अनुसार, ‘देश की कुल आबादी में तलाक का प्रतिशत 1.1 है तो केरल में यह दर 3.3 फीसदी है। केरल सबसे अधिक साक्षरता वाला राज्य है। यहां पिछले एक दशक में तलाक की दर 350 फीसदी बढ़ी है। जबकि कृषि आधारित राज्य, पंजाब और हरियाणा में एक दशक में 150 फीसदी की बढ़त देखने को मिली है।’ राष्ट्रीय स्तर पर बीते पांच-छह सालों में तलाक की दर सौ फीसदी बढ़ गई है।
एक-दूसरे पर विश्वास की कमी  तलाक की सबसे बड़ी वजहों में से एक हैं। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो फेसबुक जैसी सोशल साइटों पर फर्जी आईडी के माध्यम से अपने हमसफर पर नजर रखते हैं। फर्जी प्रोफाइल से खुद की ही पत्नी या पति से चैट किया जाता है और नतीजा तू-तू, मैं-मैं से शुरू होकर तलाक तक पहुंच जाता है। शारीरिक हिंसा तलाक का सबसे बड़ा कारण है। एकल परिवार, शादी के बाद भी दूसरे पुरुष या स्त्री से शारीरिक संबंध, नशे की लत, जीवन साथी को लेकर बहुत अधिक पजेसिव होने जैसे कारण भी रिश्तों में दरार के लिए जिम्मेदार हैं। कई बार तलाक के पीछे अजीबोगरीब कारण होते हैं। अब तक तलाक की अर्जी के बाद कोर्ट पति पत्नी को थोड़ा वक्त देता था ताकि शादी को बचाया जा सके लेकिन नए सुधार के बाद अब तलाक की अर्जी देने के बाद महीनों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
हाल ही में केन्द्रीय केबिनेट ने हिन्दुओं में तलाक को सरल बनाने के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन को मंजूरी दी। तलाक के मामलों में जल्द निपटारा करने के लिए सरकार पर हिन्दू मैरिज एक्ट में संशोधन करने का दबाव था जिसे अंततरू सरकार ने स्वीकार कर लिया। संशोधन के अनुसार अगर पत-िपत्नी परस्पर सहमति से एक-दूसरे से अलग रहना चाहते हैं तो ऎसे मामले को अधिक समय तक बिना किसी वजह के लंबित नहीं रखा जा सकेगा। उन्हें शीघ्र अलग कर दिया जाएगा। इस संशोधन के साथ ही प्रश्नों के असंख्य चेहरे उभरते हैं और गौर से देखें तो 99 प्रतिशत चेहरे भय, पीड़ा, तकलीफ, बिछोह, टूटन और अलगाव की ही त्रासदी बयान करते हैं। कहीं गलत बंधन की वजह से छुटकारा पाने की तीव्र इच्छा होगी तब भी जब छुटे तब कितने-कितने टूटे यह उनका ही मन जानता है।
तलाक के कारण पर्सनल फाइनेंस के सभी कारकों पर प्रभाव पड़ता है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि तलाक सर्वसम्मति के साथ हो रहा है तो सलाहकार दोनों जीवन साथियों के लिए मैत्रीपूर्ण समझौता बनाते हैं। इस समझौते पर पहुंचने के बाद कानूनी खर्चो के बोझ को हलका कर दिया जाता है।तलाक के कारण फाइनेंशियल प्लानिंग के संबंध में बच्चे के संरक्षण पर असर नहीं पड़ना चाहिए। यदि किसी ने श्चाइल्ड प्लानश् ले रखा है और इसे संयुक्त रूप से फंडिड किया जा रहा है तो उसे बंद नहीं करना चाहिए। बंद करने से आप पर जुर्माना लग सकता है।  परिवार की सभी परिसंपत्तियों जैसे प्रॉपर्टी, इंवेस्टमेंट, इंश्योरेंस आदि की एक सूची बनाएं। कानूनी सलाह लेने से पहले यह सूची मददगार साबित हो सकती है। यदि दंपत्ति किसी समझौते पर नहीं पहुंचे हैं तो भागीदारी के हिसाब से परिसंपत्तियों को प्रत्येक जीवनसाथी के बीच बांटना चाहिए। संयुक्त जिम्मेदारी को व्यक्तिगत कर्ज से अलग रखना चाहिए।

राजनीति में वकीलों का दम

देश में करियर बनाने के विकल्पों पर बात हो, तो शायद ही कोई युवा होगा जो ये कहेगा कि हमें तो वकील बनना है। ऐसी हालत तब है जब देश में कम से कम 900 विधि (यानी लॉ) कॉलेज हैं और 14 उच्चस्तरीय केंद्रीय विधि संस्थान हैं। अगर कुछ साल पहले (दस साल) तक की बात करें तो लॉ कॉलेजों का ये आंकड़ा देश में मौजूद कुल इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेजों की संख्या पर भी बीस पड़ता था...(इन दो विभागों से तुलना इसीलिए क्योंकि देश में कैरियर के तौर पर इन्हीं दो विकल्पों को रामबाण माना जाता रहा है)। लेकिन समय के साथ मान्यताएं बदली हैं। लोग अब अपने बच्चों को वकील भी बना रहे हैं। इसके पीछे एक कारण राजनीति भी है। कई वकील जितना नाम वकालत में नहीं कमा पाए, उससे अधिक उनके नामों की चर्चा लोगों की जुबान पर है।
गौर करने योग्य यह भी है कि देश को आजाद कराने में वकीलों ने अहम भूमिका निभाई थी। आज भी समाज को आगे बढ़ाने तथा समाज को जागृत करने में वकील अपनी भूमिका निभा रहे हैं। देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने और आजादी के आंदोलन में वकीलों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, उनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। आंदोलन के सूत्रधार महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू ने विदेश से कानून की पढ़ाई वकील बनने के लिए ही किया था। दोनों ने लंदन, इलाहाबाद और मुंबई में प्रैक्टिस भी शुरू कर दी थी, लेकिन देश को आजाद कराने के लिए उन्होंने कांग्रेस से जुड़कर काम  करना शुरू किया।
आज भी राजनीति में दर्जनों वकील संगठन और सरकार में अच्छा खासा दखल रखते हैं, लेकिन उन्होंने कभी उस व्यवसाय के लिए कोई ठोस काम करने की पहल तक नहींकी, जिसके कारण उनकी राजनीति में पकड़ बनी। राजनैतिक दलों ने जिस मकसद से वकीलों को संगठन से जोड़ा था वह काफी हद तक पूरी हुई, लेकिन उसकेबाद वकीलों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गई कि उन्होंने सत्ता के गलियारे में इतनी पैठ बना ली है कि आने वाले समय में राजनीति में उनके वर्चस्व को तोड़ पाना मुश्किल है। बीते कार्यकाल के दौरान राजग ने राम जेठमलानी और उसके बाद अरुण जेटली को यह सोच कर कानून मंत्री बनाया था, कि दोनों सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील हैं और कननू को जानने वाले हैं। इसलिए कुछ ऐसा करेंगे, जिससे देश की न्याय व्यवस्था में सुधार आएगा, लेकिन दोनों ने कोई ऐतिहासिक फैसला करने की जगह न्यायिक प्रक्रिया में उलटफेर करने में ही समय बिता दिया। यूपीए ने हंसराज भारद्वाज को इसलिए कानून मंत्री बनाया कि वे कानून के जानकार हैं, लेकिन उन्होंने भी वैसा ही काम किया, जैसे दूसरे कांग्रेसी मंत्री कर रहे हैं। भाजपा में रविशंकर प्रसाद और सुषमा स्वराज दो बड़े नेता भी वकालत से जुड़े रहे हैं। कांग्रेस में कपिल सिब्बल को पार्टी ने मंत्रिमंडल में जगह देकर पार्टी के प्रति उनकी वफादारी का इनाम दे दिया है। अभिषेक मनु सिंघवी और मनीष तिवारी को पार्टी ने प्रवक्ता बना कर उनको महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है। मनीष को टिकट देकर उनके काम का भी इनाम दे दिया गया है। एक जमाने में कांग्रेस ने आरके आनंद को चुनाव लड़वाया था और पार्टी में उन्हें बहुत ताकतवर माना जाता था, लेकिन नरसिम्हा राव के करीबी होने के कारण इस समय वे संगठन में हाशिए पर हैं, लेकिन माना जा रहा है कि इस समय आरके आनंद मायावती के करीब आ चुके हैं और आने वाले समय में बसपा में शामिल हो सकते हैं। बसपा में सतीश चंद्र मिश्र बसपा सुप्रीमो के बाद सबसे ताकतवर स्थिति में माने जाते हैं। वकीलों को बड़े पैमाने पर जोडने के लिए कांगे्रस और भाजपा ने जिला स्तर तक अपने-अपने प्रकोष्ठ का गठन किया है। इसके पीछे पार्टी की मंशा यह रहती है कि केंद्र में सुप्रीम कोर्ट, राज्यों में हाईकोर्ट और जिलों में जिला अदालतों में काम करने वाले वकीलों को संगठन से जुड़ जाने पर एक तो संगठन को आराम से अदालती काम करने वाला वकील मिल जाएगा और दूसरा इसके माध्यम से पढ़े-लिखे लोगों में पार्टी का आधार खड़ा हो जाएगा, लेकिन दिल्ली में संगठन का काम करने वाले वकील पार्टी से सबसे ज्यादा फायदा ले जाते हैं। कई बार राज्यों में काम करने वाले वकीलों का भी नंबर लग जाता है, लेकिन जिलों में काम करने वाले अधिकांश वकीलों को कुछ नहीं मिल पाता है। छोटे और मझोले नेताओं की तरह वे न तो वकालत कर पाते हैं और न ही नेता बन पाते हैं।
ऐसा नहीं है कि यह नया सिलसिला है। भारतीय राजनीति में वकील नेताओं का शुरुआत से ही बोलबाला रहा है। इस समय भी राजनीति में वकील ही छाए हुए हैं। लोकसभा के मौजूदा 544 सदस्यों में से 76 वकालत के पेशे से जुड़े हुए हैं। राज्यसभा के 243 सदस्यों में 39 वकील हैं। 15वीं लोकसभा के अध्यक्ष मीरा कुमार के साथ ही यूपी सरकार में रक्षा मंत्री ए के एंटनी, वित्त मंत्री पी चिदंबरम, गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे, पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली, कानून मंत्री कपिल सिब्बल, वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा, रेल मंत्री मल्लिकार्जुन खडगे और विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद वकालत करते रहे हैं। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय से संबद्ध राज्यमंत्री वी नारायण स्वामई और सूचना व प्रसारण राज्यमंत्री मनीश तिवारी भी वकील रहे। बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायवती और और उनके नंबर दो सतीश मिश्र भी एडवोकेट हैं। राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने भी वकालत की पढाई  की। इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिस्ठ अधिवक्ता केशरीनाथ त्रिपाठी ने भाजपा की सरकार में मंत्री पद के अलावा विधानसभा अध्यक्ष जैसा अहम पद संभाला। बतौर विधानसभा अध्यक्ष वह सूबे ही नहीं देश की राजनीति में भी चर्चित रहे और राजनीति के चाणक्य माने गए।
कुछ समय पहले तक कामयाब लोग राजनीति में नहीं आना चाहते थे, लेकिन अब बदलाव की बयार चल रही है। इन दिनों गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के लोग, पत्रकार, बड़ी कंपनियों से जुड़े लोग, पूर्व नौकरशाह, आईआईएम-आईआईटी से पढ़े-लिखे पेशेवर, खिलाड़ी, वकील, बॉलीवुड हस्तियां, कला क्षेत्र के बड़े नाम, सेना में रहे लोग राजनीतिक दलों से जुड़ते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता जाएगा, इसमें और तेजी आएगी। हाल ही में पूर्व थलसेनाध्यक्ष वी.के. सिंह, टीवी पत्रकार आशुतोष, मुंबई के पूर्व कमिश्नर सत्यपाल सिंह, डेक्कन एयर के गोपीनाथ, नृत्यांगना मल्लिका साराभाई, समाजसेवी मेधा पाटकर, आरबीएस की पूर्व चेयरपर्सन मीरा सान्याल, एनडीटीवी के पूर्व सीईओ समीर नायर, इंफोसिस के वी. बालाकृष्णन, संगीतकार बप्पी लाहिड़ी आदि प्रमुख हैं।

Sunday, 4 May 2014

वाणी पर संयम है जरूरी

हाल के ही मामलों को देखें तो चुनाव आयोग ने समाज में कटुता फैलाने एवं उन्मादी भाषणों पर भाजपा नेता अमित शाह और समाजवादी नेता आजम खान की रैलियों पर रोक लगा दी। यानी ये दोनों नेता उत्तर प्रदेश में लोकसभा के बाकी बचे चरणों में रैली, भाषण, जुलूस आदि में हिस्सा नहीं ले सकेंगे। लेकिन, चुनाव आयोग कार्रवाई करे या फिर चेतावनी दे, नेताओं के भड़काउ बोल रुकने का नाम नहीं ले रहे। एक के बाद एक नेताओं के बेतुके बयान सामने आ रहे हैं। डॉक्टर प्रवीण तोगडि़या और बिहार भारतीय जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता द्वारा की गई टिप्पणियों ने पुनः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के असली चेहरे को उजागर कर दिया है। डाक्टर प्रवीण तोगडि़या ने गुजरात के एक शहर के हिन्दू मोहल्ले में एक मुसलमान द्वारा मकान खरीदने पर सख्त ऐतराज जाहिर किया और उस क्षेत्र के हिन्दुओं से कहा कि वे मुसलमान द्वारा खरीदे जा रहे मकान पर कब्जा कर लें या उसमें आग लगा दें। इसी तरह, बिहार के गिरिराज सिंह ने कहा है कि जो भी नरेन्द्र मोदी का विरोध करता है उसे पाकिस्तान चले जाना चाहिए। डाक्टर प्रवीण तोगड़िया, संघ परिवार के एक बहुत ही महत्वपूर्ण सदस्य हैं। संघ परिवार की अनेक शाखाएं हैं,जिनमें एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण शाखा विश्व हिन्दू परिषद है। इस समय डाक्टर तोगड़िया विश्व हिन्दू परिषद के मुखिया हैं। इसी तरह, गिरिराज सिंह,जो भाजपा के लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार हैं, बिहार  मंत्रिपरिषद के सदस्य रहे हैं, नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद में वे भाजपा के प्रतिनिधि के रूप में शामिल रहे हैं। उनके पास महत्वपूर्ण विभाग रहे हैं।
सच तो यह भी है कि देश में लोकतांत्रिक इतिहास में यह लोकसभा चुनाव शायद सबसे ज्यादा अभ्रद भाषा के इस्तेमाल के लिए जाना जाएगा। विभिन्न दलों के नेता निरंतर एक-दूसरे के खिलाफ आपत्तिजतनक और अभद्र शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। राजनीतिक विरोध का स्तर पर इतना नीचे गिर गया है कि केंद्रीय मंत्री भी अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा निशाने पर रहे हैं। मोदी भी अपने विरोधियों के खिलाफ हमले करते निजी स्तर तक चले जाते हैं। हालांकि मोदी ने भी रक्षा मंत्री एके एंटनी और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को ‘पाकिस्तान का एजेंट’ कहा। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढते जा रहे हैं नेताओं की जुबान और भी ज्यादा तल्ख होती जा रही है। विरोधियों पर वार करने में नेता कब मर्यादा की सीमा लांघ जा रहे हैं पता ही नहीं चल रहा। कभी अमित शाह, आजम खान तो कभी गिरिराज शाह, मानो हर नेता में दूसरे से ज्यादा तीखे और बेतुके बयान देने की होड़ लगी है। इसी कड़ी में एक और नाम जुड़ गया है राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष अजित सिंह का। अलीगढ़ की एक सभा में बोलते हुए अजित सिंह ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की तुलना बकरे से कर डाली। और उसके बाद राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने मोदी से बेहतर तो कसाई को बता दिया।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी की सरकार पर आरोप लगाया कि वह किसानों की जमीन चुरा रहे हैं। उन्होंने मोदी का नाम लिए बगैर कहा वह ‘नाजी तानाशाह एडोल्फ हिटलर’ की तरह काम करते हैं। वैसे, मोदी राहुल को अक्सर ‘शहजादा’ कहते रहे हैं और उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ इतालवी मरीन के मुद्दे को लेकर निशाना साधा। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद ने मोदी को ‘टुकडे-टुकडे करने’ वाला बयान देकर विवाद खडा किया। इस बयान को लेकर उन्हें जेल की हवा खानी पडी. विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा, ‘हम तुमको (मोदी) लोगों की हत्या करने का आरोपी नहीं बता रहे हैं। हमारा आरोप है कि तुम नपुंसक हो।’ केंद्रीय कृषि मंत्री और राकांपा प्रमुख शरद पवार ने कहा कि मोदी को मानसकि अस्पताल में उपचार कराने की जरूरत है।
भाजपा नेता और पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस वोटरों को भाजपा का नाम ले ले कर धमका रही है, तो दूसरी तरफ आरएलडी अध्यक्ष अजित सिंह ने मोदी को बकरा बता दिया। वहीं बिहार के भागलपुर में एक रैली में बोलते हुए जेडीयू नेता शकुनि चैधरी ने मोदी को वहीं गाड़ देने की बात कही। गिरिराज सिंह अकेले नहीं हैं, जो इस बार के चुनाव में भड़काऊ बोल बोल रहे हैं। इससे पहले भी कई नेता इस तरह के बोल बोल चुके हैं। शिकायतों पर चुनाव आयोग ने कार्रवाई भी की है, लेकिन फिर भी चुनावी समर में अपनी-अपनी जीत देख रहे ये नेता जोश में जनता के सामने बेतुके बोल बोलने का सिलसिला जारी रखे हुए हैं।
नेताओं की बदजुबानी की कहानी यहीं नहीं रुकती। हाल ही में राजद छोड़ जेडीयू में शामिल हुए शकुनी चैधरी एक कदम और आगे बढ़कर मोदी पर हमला बोलते हैं। बिहार के भागलपुर में नीतीश कुमार के सामने मंच पर खड़े शकुनी चैधरी जोश में जनता से वादा करते हैं कि अगर उनका साथ मिला तो वो मोदी को भागलपुर में ही गाड़ देंगे। बीजेपी नेता नितिन गडकरी भी विरोधियों पर निशाना साध रहे हैं। नेताओं की बदजुबानी को लेकर चुनाव आयोग में लगातार शिकायतें हो रही हैं। आयोग चेतावनी देने से लेकर रैलियों, जनसभाओं, रोड शो पर रोक तक लगा दे रहा है। लेकिन लगता है कि ऐसे बेतुके बयान देने वालों नेताओं को चुनाव आयोग की इन कार्रवाइयों का भी कोई डर नहीं। तभी तो तमाम कोशिशों के बाद भी नेताओं की जबान पर लगाम नहीं लग रही है।
राजनीति में लोग एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते रहते हैं लेकिन कोई मंत्री या नेता अपनी मर्यादा को भूल जाए..बड़ी शर्मनाक बात है। चुनाव आयोग ने सही समय पर कदम उठाया नहीं तो आने वाले दिनों में अमित शाह और आजम खान दोनों अपने-अपने वोटों के ध्रुवीकरण के लिए आपत्तिजनक, उकसावे और उन्मादी बयानों का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं भय रहित चुनाव संपन्न कराने का पूरा दारोमदार चुनाव आयोग पर होता है। लेकिन कई बार ऐेसा भी देखने में आता है कि नेता आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करते हैं लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती। उन्हें नोटिस जारी कर महज कागजी खाना-पूर्ति की जाती है। चुनाव आयोग को बिना भेद-भाव किए आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले नेताओं पर कार्रवाई करनी चाहिए। हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कुछ अधिकारियों का तबादला करने से इंकार कर दिया था, लेकिन जैसे ही चुनाव आयोग सख्त हुआ ममता को झुकना पड़ा। चुनाव आयोग को कुछ इसी तरह की कार्रवाई आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले सभी मामलों में करनी चाहिए। कार्रवाई का भय होगा तभी नेता आपत्तिजनक, भड़काऊ और उन्मादी बयान देने से परहेज करेंगे।



Saturday, 5 April 2014

कांग्रेस में है दम


भारतीय राजनीति में कांग्रेस का हमेशा दबदबा रहा है और ज्यादातर समय यही पार्टी सत्तारुढ़ रही है। पिछले दस वर्षों से भी यही सत्ता पर काबिज है। हालंाकि, वर्तमान लोकसभा चुनाव 2014 में पार्टी को थोडे़ मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अमूमन यह होता है, जब आप सत्ता में लंबे समय तक रहते हैं। दिल्ली में बैठकर कुछ लोगों को यही लगता है कि कांग्रेस का तो इस बार पूरा सूपड़ा हो जाएगा ? इसको वे भरसक प्रचारित भी करते हैं। जबकि वास्तविकता के धरातल पर ऐसा नहीं है।
दिल्ली से तो यही बात फैलाई जा रही है कि कांग्रेस विरोधी लहर हवा में है और ज्यादातर लोगों का मानना है कि मनमोहन सरकार नाकाम रही है। जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर है। कांग्रेस आज भी सर्वधर्म समभाव का भाव लेकर चलती है। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर। यही तो हमारा सिद्धांत रहा है। हम कहने से अधिक करने में विष्वास रखते हैं। तमाम विरोधी राजनीतिक दल भ्रष्टाचार को लेकर बावेला काटने पर उतारू हैं, क्या उन्हें यह नहीं पता है कि यह कांग्रेस और यूपीए की ही सरकार थी, जिसे सूचना के अधिकार के रूप में एक अचूक हथियार जनता को दिया है भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए। हाल के वर्षों में जितने भी घोटालों का पर्दाफाष हुआ है, क्या यह सूचना के अधिकार के बदौलत नहीं है? कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन ने दस साल में देश का विकास किया है। कांग्रेस ने नरेगा के माध्यम से देश के 82 करोड़ लोगों को रोजगार देने का काम किया है।यूपीए ने गरीब और किसानों के लिए जो ग्रामीण रोजगार योजना, उपज के दामों में वृद्धि व कर्ज माफी की आर्थिक प्रक्रिया चलाई थी, उसी अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए एक बार फिर यूपीए को मौका मिलेगा। सर्वशिक्षा अभियान, मिड डे मील योजना, ग्राणीम स्वाथ्य सेवा योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी योजनाओं को भला आप कैसे दरकिनार कर सकते हैं ? साथ ही सूचना के अधिकार और लोकपाल बिल को संसद में पेश किए जाने का श्रेय मनमोहन सिंह सरकार को नहीं दिया जाना चाहिए ? जब हम गठबंधन के दौर में होते हैं, तो कई तरह की परेषानियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन जिस प्रकार से यूपीए सरकार ने भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया, चाहे वह कितना भी रसूखदार हो, वह काबिलेतारीफ है। कांग्रेस ने हमेषा भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसा है। आज भी कई आरोपों की जांच हो रही है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
ऐसा नहीं है कि हम सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं। कांग्रेस का सबसे बुरा प्रदर्शन 1999 में रहा था जब यह पार्टी मात्र 114 सीट जीत पाई थी, इसकी सफलता का प्रतिशत मात्र 20.91 था। जहां तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का सवाल है तो 1984 में हुए आम चुनाव में इस पार्टी ने 415 सीट जीत कर ऐतिहासिक सफलता रची थी। उस वक्त इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और इससे उपजी सहानुभूति की लहर का लाभ कांग्रेस को मिला था। इसकी सफलता का प्रतिशत 77.86 था। इतनी सफलता तो कांग्रेस को पहले चुनाव में भी नहीं मिली थी। अब तक यह पार्टी चार सौ सीटों का आंकड़ा एक बार, तीन सौ सीटों का आंकड़ा पांच बार, दो सौ सीटों का आंकड़ा तीन बार और सौ का आंकड़ा छरू बार पार कर चुकी है। 114 सीट इसका न्यूनतम स्कोर है। बेषक, कुछ लोग तमाम हथकंडे का प्रयोग करके हवा बनाने की जुगत कर रहे हांे, लेकिन देष की जनता जानती है कि कौन उनके लिए बेहतर सरकरा लाएगा ? कौन बेहतर सुविधा मुहैया कराएगा? कांग्रेस की काबिलियत से पूरे देष की जनता वाकिफ है।