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Friday, 29 May 2015

वादों को हकीकत में बदलिए जनाब


कोष आबंटित किए बिना ही बस लोगों से किए गए अपने वादों के आधार पर मोदी सरकार अपना एक साल मना रही है। नरेंद्र मोदी सरकार के इस एक साल में नया कुछ भी नहीं हुआ। मोदी सरकार ने कई राज्यों के साथ भेदभाव किया है। यदि हम बिहार की बात करें, तो पटना में कच्ची दरगाह पर गंगा पर छह लेन वाले पुल के निर्माण के लिए तमाम तैयारियां पूरी हो चुकी हैं, लेकिन वादे के अनुरुप कोष उपलब्ध कराने के बजाय केंद्र अब परियोजना उसके हवाले करने की बात कह रही है। इसी तरह गंगा पर गांधी सेतु के लिए सिर्फ वादे ही किए गए हैं जबकि यह उत्तर बिहार के लिए जीवन रेखा माना जाता है। 
मोदी सरकार सिवाय डेंटिंग-पेंटिंग के कुछ नहीं कर रही। रक्षा क्षेत्र में यूपीए सरकार द्वारा मंजूर किया गया 27 हजार करोड़ रुपया वापस लौट गया। मोदी सरकार ने उसका इस्तेमाल तक नहीं किया। ये सत्ता में आने से पहले बोलते थे कि सेना की अनदेखी की जा रही है, जबकि इन्होंने सेना के लिए कुछ नहीं किया। सीजफायर उल्लंघन के मुद्दे पर आएं तो यूपीए के आखिरी एक साल में 96 बार पाकिस्तान ने सीजफायर का उल्लंघन किया था, जबकि मोदी सरकार के आते ही ये आंकड़ा 746 तक पहुंच गया है। अब, ये आंकड़े बताते हैं कि कौन विरोधियों से बेहतर ढंग से निपटा ? 
सरकार ने जो कुछ भी किया है, वह टेलीविजन कैमरे के सामने ही किया। सारी योजनाओं का श्रीगणेश भारी-भरकम कार्यक्रम करके ही किया गया। इसके बावजूद प्रधानमंत्री को खुद और उनके मंत्रियों को गांव-गांव तक जाकर प्रेस कांफ्रेंस करके लोगों को बताना पड़ रहा है कि उन्होंने क्या-क्या किया है तो इसका मतलब है कि नतीजे अभी लोगों तक पहुंचने नहीं शुरू हुए हैं। जो उम्मीदें पहले बिना संकोच और दुविधा के थीं,  उनके पूरे होने में कुछ संदेह होने लगा है। असल में यह समस्या बहुत अधिक उम्मीदें पैदा होने के कारण हुई है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रचार करते हुए अपने को हर मर्ज की दवा की तरह पेश किया था। यूपीए सरकार में जो कुछ भी बुरा होने की खबर आ रही थी, मोदी उसकी काट के तौर पर अपने को पेश कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वे भ्रष्टाचार मिटा देंगे, काला धन वापस ला देंगे, पाकिस्तान और चीन को सबक सिखा देंगे, आतंकवाद खत्म कर देंगे, गरीबी दूर कर देंगे, नौजवानों को रोजगार देंगे, अयोध्या में राममंदिर बना देंगे, अनुच्छेद 370 खत्म हो जाएगा, पेट्रोल-डीजल सस्ता हो जाएगा, डॉलर 40 रुपए में बिकने लगेगा, मोदी भारत को विश्वगुरू बना देंगे, और न जाने क्या-क्या कर देंगे। नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान अपने को करोड़ों लोगों की उम्मीदों के एवरेस्ट पर खड़ा कर लिया था। अब वहां से उनका उतरना मुश्किल है और उतनी उम्मीदों को पूरा करना तो लगभग नामुमकिन है। 
हैरानी की बात है कि प्रधानमंत्री मोदी अब भी व्यावहार धरातल पर नहीं उतर रहे हैं। वे और उनके मंत्री अब भी लोगों को सुंदर सपनों की सैर करा रहे हैं। प्रधानमंत्री का देश-विदेश का हर कार्यक्रम चुनावी दौरे की तरह होता है। वे अब भी लोगों की उम्मीदें जगाते हैं। दूसरी ओर कड़वी सचाई है, जिससे लोग रोज रूबरू हो रहे हैं। सपने और हकीकत का यह फर्क है, नरेंद्र मोदी की सरकार के एक साल को बिगाड़ने वाला है।

Wednesday, 18 June 2014

धारा 370 पर हाय-तौबा क्यों ?


प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जीतेंद्र सिंह के अनुच्देछ 370 पर सवाल उठाए जाने के बाद यह पूरा मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस मामले में नेशनल कांफ्रेंस व पीडीपी के आक्रामक  तेवर को देखने के बाद अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने सीधे मोर्चा संभाल लिया है। संघ की ओर से जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर यह कहते हुए पलटवार किया कि राज्य से संविधान की धारा 370 हटे या न हटे, लेकिन यह राज्य भारत का अभिन्न अंग रहेगा। आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, जम्मू एवं कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं होगा? क्या उमर इसे अपनी पैतृक संपत्ति समझ रहे हैं? धारा 370 रहे या न रहे जम्मू-कश्मीर रहेगा और हमेशा भारत का अभिन्न अंग रहेगा।
इससे पहले भी लगातार हमारे संविधान का यह अनुच्छेद राजनीतिक प्रोपेगैंडा का हथियार बनता रहा है। हम भारत के लोग इसी प्रोपेगैंडा के आधार पर ही अपनी राय कश्मीर और अनुच्छेद 370 को लेकर बनाते रहे हैं। लिहाजा हम भारत के लोग भी जाने-अनजाने में इन्हीं स्वार्थो में से किसी एक को समस्या व समाधान मानते हैं। अब डॉ जितेंद्र सिंह के बयान और उन पर आ रहीं प्रतिक्रियाओं पर नजर डालिए, तो क्या किसी ऐसे नतीजे पर पहुंचा जा सकता है जो पूरे मामले को सही परिप्रेक्ष्य में देख पाने मददगार हो सके। कोई कह रहा है कि यह जम्मू-कश्मीर और भारत को जोड़ने वाला सेतु है और यदि यह अनुच्छेद नहीं रहेगा तो यह सेतु खत्म हो जायेगा। कोई कह रहा है कि अलगाववाद के मूल में यह अनुच्छेद ही है और इसे हटा दिया जाये तो समस्या के समाधान में मदद मिलेगी। कोई इसे जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की शर्त बता रहा है, तो कोई इसे पंडित नेहरू द्वारा शेख अब्दुल्ला को खुश करने के लिए दिये गये अधिकार के रूप में परिभाषित कर रहा है। सच तो यह भी है कि इस राज्य का नाम लेने से दो ही तस्वीरें हमारे दिमाग में बनती हैं। पहली, एके 47 यानी आतंकवाद की और दूसरी खूबसूरती की। हां, अमरनाथ यात्र और वैष्णोदेवी की भी याद आ जाती है। इसके अलावा, वहां के बारे में हम कितना जानते हैं? आम लोगों के बीच अनुच्छेद 370, जम्मू-कश्मीर के इतिहास, उसके भारत में विलय, उसकी सूफी परंपरा आदि को लेकर जानकारी का स्तर शून्य है। वे शायद यह भी नहीं जानते कि कबायली हमले के समय कश्मीरियों की भूमिका क्या रही और कश्मीर घाटी का मुंह प्राकृतिक रूप से मुजफ्फराबाद की ओर ही खुलता है या आजादी से पहले कश्मीर को सड़क मार्ग से देश को जोड़ने वाली सड़क श्रीनगर से मुजफ्फराबाद व रावलपिंडी होते हुए लाहौर पहुंचती थी।
दिलचस्प बात तो यह है कि मुस्लिम बहुल कष्मीर घाटी में राजग की जीत पर लोगों ने खूब खुषियां मनाई। कारण जगजाहिर है कि कांगे्रस कष्मीर मसले को राजनीतिक रूप से सुलझाने में पूरी तरह नाकाम रही। इसके साथ ही लोगों को यह भरोसा होने लगा कि केंद्र में मोदी की सरकार होगी, तो सबका भला होगा। जिस प्रकार से नरेंद्र मोदी ने अपने षपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज षरीफ को बुलाया। अगले दिन नवाज षरीफ और नरेंद्र मोदी की द्विपक्षीय वार्ता हुई, उससे कष्मीरी आवाम और नेताओं के भरोसे को और भी बल मिला। घाटी के अलगाववादी वरिष्ठ नेता मीरवाइज उमर फारूक कहते हैं, ‘ यह एक अच्छी षुरूआत है। जिस प्रकार से दोनों देषों के प्रधानमंत्री ने मुलाकात की है, उससे परस्पर विष्वास को बल मिलेगा। भारत और पाकिस्तान के बीच कष्मीर मसले के समाधान में यह कारगर पहल साबित होगा।‘ दरअसल, मीरवाइज ऐसे पहले कष्मीरी अलगाववादी नेता हैं, जिन्होंने भाजपा द्वारा मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए जाने का स्वागत किया था। वे कहते हैं, ‘ जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग की सरकार बनी थी, उस समय भी कष्मीर मसले को लेकर सकारात्मक पहल की गई थी। मुझे उम्मीद है कि मोदी भी वाजपेयी के पदचिन्हों का अनुसरण करेंगे। कष्मीर के आवाम को उनसे काफी उम्मीदें हैं।‘
हालांकि, मीरवाइज के इस प्रकार के बयानों और कदमों की काफी आलोचना की गई थी। कष्मीर के कई हिस्सों में इसको लेकर खूब चर्चाएं भी हुईं। इसके बावजूद मीरवाइज अपनी सोच को लेकर दृढ़ रहे। आखिरकार, कष्मीर की आवाम ने भी उनसे इत्तेफाक रखते हुए मोदी पर भरोसा जताया। न्यूज बेंच से बात करहे हुए मीरवाइज कहते हैं, ‘ मोदी ने खुद को गुजरात में एक अच्छे प्रषासक के रूप में साबित कर दिया है। मुझे पूरा भरोसा है कि प्रधानमंत्री के रूप में भी वे लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरेंगे और कष्मीर समस्या का समाधान कराने में सफल होंगे।‘
आखिर, भाजपा के नेता पर भरोसा क्यों ? जिस पार्टी के घोषणापत्र में संविधान द्वारा दिए गए विषेषाधिकार धारा 370 को खत्म करने की बात हो, उससे भला कष्मीर की अस्मिता और समस्याओं के समाधान की उम्मीद करना कहां तक उचित है ? मीरवाइज कहते हैं, ‘समस्या का समाधान षांति से होगा। बात केवल कष्मीर की ही नहीं, पूरे दक्षिण एषिया की है। मोदी ने षांतिपूर्ण परिस्थिति में देष के विकास और प्रगति की बात की है। भारत आर्थिक रूप से समृद्ध हो रहा है। हमारे देष का रक्षा बजट 37 अरब तक पहुंच चुका है। मुझे भरोसा है कि किसी भी समस्या के समाधान के लिए परस्पर विष्वास और स्थिरता सबसे अहम है।‘
ऐसा नहीं है कि मोदी के आने से अलगावादियों के बीच खुषी है। मुख्य धारा की राजनीति करने वाले नेताओं में भी उम्मीद जगी है। जम्मू-कष्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला और विधानसभा मंे प्रतिपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती ने भी नवाज षरीफ को हिंदुस्तान बुलाने के निर्णय का स्वागत किया। उमर अब्दुला, जो किसी भी मौके पर मोदी के विरोध करने का मौका नहीं छोड़ते, कहते हैं, ‘ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज षरीफ की मुलाकात जम्मू-कष्मीर के लिए षुभ संकेत है। हमें दोनों देषों के खराब रिष्तों की कीमत चुकानी पड़ती है। जब-जब दोनों देषों के रिष्ते बहेतर हुए हैं, जम्मू-कष्मीर को लाभ होता है।‘
बहरहाल, अलगावादी नेता केंद्र सरकार से बात करने की उम्मीद पाले हुए हैं। वरिष्ठ हुर्रियत नेता बिलाल गनी लोन कहते हैं, ‘ हमें पूरी उम्मीद है कि केंद्र की नई सरकार से हमंे बातचीत करने का अवसर मिलेगा और हम सकारात्मक बात करेंगे।‘ उल्लेखनीय है कि साल 2004 में जब तत्कालीन उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से कष्मीरी नेताओं के एक दल ने मुलाकात की थी, उस दल में बिलाल गनी लोन भी षामिल थे।  जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि अगर संविधान की धारा 370 हटाई गई तो जम्मू एवं कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि यह धारा राज्य को विशेष दर्जा देती है। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने मंगलवार को यह घोषणा करते हुए हड़कंप मचा दिया कि नई सरकार ने धारा 370 हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। हालांकि, बाद में उन्होंने कहा कि मीडिया ने उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि धारा 370 के मुद्दे को फिर से उठाने से जम्मू एवं कश्मीर के संघ के साथ विलय का मुद्दा भी फिर से उठेगा। अब्दुल्ला ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री नजमा हेपतुल्ला के बयान पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने कहा था कि आरक्षण भारतीय मुसलमानों की समस्या का समाधान नहीं है।

आखिर क्या है अनुच्छेद 370.
1. संविधान का अनुच्छेद 370 अस्थायी प्रबंध के जरिए जम्मू और कश्मीर को एक विशेष स्वायत्ता वाले राज्य का दर्जा देता है.
2. 370 का खाका 1947 में शेख अब्दुल्ला ने तैयार किया था, जिन्हें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था.
3. शेख अब्दुल्ला ने 370 को लेकर यह दलील दी थी कि संविधान में इसका प्रबंध अस्थायी रूप में ना किया जाए. उन्होंने राज्य के लिए मजबूत स्वायत्ता की मांग की थी, जिसे केंद्र ने ठुकरा दिया था.
4. 370 के प्रावधानों के अनुसार संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है. लेकिन अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू कराने के लिए केंद्र को राज्य का अनुमोदन चाहिए.
5. इसी विशेष दर्जे के कारण जम्मू-कश्मीर पर संविधान का अनुच्छेद 356 लागू नहीं होता. राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है.
6. भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते हैं. यहां के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है. एक नागरिकता जम्मू-कश्मीर की और दूसरी भारत की होती है.
7. यहां दूसरे राज्य के नागरिक सरकारी नौकरी नहीं कर सकते.
8. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता.
9. अनुच्छेद 370 की वजह से ही जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा और प्रतीक चिन्ह भी है.
10. 1965 तक जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल की जगह सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री हुआ करता था।

Wednesday, 18 December 2013

जनता को मिला नया हथियार

 सड़क से संसद तक चली लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार लोकपाल विधेयक पास हो गया। बिल पास होने के बाद गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने अपना अनशन तोड़ दिया। इससे पहले 17 दिसंबर को राज्यसभा से लोकपाल विधेयक पास होने पर इस आंदोलन की अगुवाई करते रहे अन्ना हजारे ने सांसदों और सरकार का शुक्रिया अदा किया, तो वहीं डॉ. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे एक ऐतिहासिक कदम करार दिया। आठ दिन से उपवास पर बैठे अन्ना हजारे ने राज्यसभा में लोकपाल विधेयक पारित कराने में मदद करने के लिए विभिन्न दलों को धन्यवाद दिया और लोकसभा के सदस्यों से कल वहां भी इस विधेयक को पारित कराने की अपील की, जिसके बाद वह अपना उपवास खत्म कर लेंगे। कमजोर पर उत्साह से लबरेज दिख रहे हजारे ने विधेयक पारित होने पर तिरंगा लहराकर और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाकर अपनी खुशी प्रकट की। राज्यसभा में विधेयक पारित होने के बाद हजारे ने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि यह एक क्रांतिकारी कदम है। पिछले 40 साल में विधेयक आठ बार पेश किया गया, लेकिन कभी पारित नहीं हुआ। मैं सभी दलों को, उस हर (दल) को धन्यवाद देता हूं, जिन्होंने राज्यसभा में इस विधेयक का समर्थन किया, समाजवादी पार्टी उसका अपवाद रही है। यह विधेयक केवल अन्ना की मांग नहीं है, बल्कि देश यही चाहता है। अन्ना हजारे का कहना था कि हमारे नेता यह अहसास करने लगे हैं कि जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून चाहती है। मैं यह नहीं कहता कि इससे शत-प्रतिशत भ्रष्टाचार का नष्ट हो जाएगा, लेकिन इससे निश्चित तौर पर इसमें 40-50 फीसदी कमी आएगी।
इस विधेयक के प्रावधानों के मुताबिक विधेयक के पारित होने के एक साल के भीतर सभी राज्यों के इस कानून के आधार पर अपने यहां लोकायुक्त की नियुक्ति करना अनिवार्य होगा। लोकपाल से जुड़े मामले में सीबीआई लोकपाल के अधीन काम करेगी। सरकार लोकपाल की जांच से जुड़े सीबीआई अधिकारियों का ट्रांसफर नहीं कर सकेगी। राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति का अधिकार राज्य विधानसभा के पास होगा। हालांकि, उनके लिए एक साल के भीतर लोकायुक्त की नियुक्ति करना अनिवार्य है. इसके लिए केंद्रीय लोकपाल कानून को मॉडल कानून माना जाएगा। लोकपाल की नियुक्ति करने वाली समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में नेता विपक्ष, मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। धार्मिक संस्थाओं को छोड़कर अन्य सभी ऐसी स्वयंसेवी संस्थाएं लोकपाल के दायरे में आएंगी, जिन्हें सरकारी मदद मिलती है। लोकपाल को हटाने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास होगा। समिति में 50 प्रतिशत सदस्य अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिला वर्ग से होंगे। प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में हैं, हालांकि उनको लेकर शिकायतों के निपटान के लिए विशेष प्रक्रिया है। सभी श्रेणियों के सरकारी अधिकारी लोकपाल के दायरे में शामिल और साथ ही तय समयसीमा के भीतर जांच का प्रावधान।
हालांकि, यूपीए सरकार के लिए विधेयक पास करवाने की यह कवायद आसान नहीं रही, क्योंकि समाजवादी पार्टी विधेयक का पुरजोर विरोध कर रही थी। संसद शुरू होने से पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने केंद्रीय मंत्री कमलनाथ और पी. नारायणसामी को अपने घर तलब कर सरकार की रणनीति की जानकारी ली। इसके बाद मुलायम सिंह और रामगोपाल यादव की प्रधानमंत्री से मुलाकात हुई। इस मुलाकात में समाजवादी पार्टी को विरोध जताने के लिए हंगामा करने के जगह सदन से ‘वॉक आउट’ करने पर मना लिया गया और लोकपाल विधेयक शांति से पास होने का रास्ता साफ हो गया। वैसे, लेफ्ट समेत कुछ पार्टियों ने विधेयक के कुछ संशोधनों पर मत विभाजन भी करवाया, लेकिन भाजपा की रजामंदी के चलते वोटिंग भी विधेयक के पक्ष में ही रही।
अब बिल हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा उसके पश्चात यह कानून का रूप ले लेगा। हालांकि यह बिल लोकसभा से पहले ही पारित किया जा चुका है, लेकिन संशोधन बिल राज्यसभा में पेश किए जाने के चलते इसे दोबारा लोकसभा पारित किया गया है। इससे पहले, कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने लोकसभा में जैसे ही लोकपाल बिल पेश किया सपा के सदस्य हंगामा करने लगे। हंगामा के बीच चर्चा की शुरुआत में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि सत्ता पक्ष के लोग हंगामा कर रहे हैं, हम पहले से ही इस बिल के पक्ष में हैं। उन्होंने सशक्त लोकपाल के लिए सरकार का समर्थन किया है। सुषमा ने कहा कि लोकपाल के लिए श्रेय लेने की होड़ न लगे। इस बीच, राहुल गांधी ने कहा कि इस मौके का पिछले 45 साल से इंतजार था, इसका पूरा श्रेय वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे को जाता है।
दूसरी ओर, सच यह भी है कि यदि कांग्रेस इस विधेयक को लेकर पूरा जोर नहीं लगाती, तो शायद इस बार भी लोकपाल सदन में पास नहीं होता। हां, इसके साथ मुख्य विपक्षी दल भाजपा के रचनात्मक सहयोग को भी नहीं भुलाया जा सकता है, जिसने जनहित में कांग्रेस का साथ दिया है। सही मायने में यह कहा जाए कि यह राहुल गांधी के कारण संभव हुआ है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्हीं की मेहनत के कारण सभी दलों के बीच समन्वय बन सका है और यह विधेयक पारित हुआ है। सच तो यह है कि लोकपाल बिल संसद में तीन साल पहले लाया गया था, इन तीन सालों में जितना गंगा में पानी नहीं बहा, उतनी इस बिल को लेकर देश में राजनीति हुई। राजनीति इस बिल को लेकर चरम पर तब पहुंची, जब अन्ना के शिष्य और लोकपाल के आंदोलन से निकले अरविन्द केजरीवाल ने अन्ना से अलग होकर अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन किया और दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ा। इस बिल के स्वरूप को लेकर अन्ना और उनके प्रिय शिष्य के बीच बीते नौ दिनों से बयानबाजियों का लंबा दौर भी चला। अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम ने जहां बिल में खामियां बताई, वहीं अन्ना हजारे और उनके साथियों ने संसद में रखे गए बिल को उसी स्वरूप में स्वीकार किया। केंद्र सरकार ने सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई लेकिन इस बैठक में केंद्र सरकार को समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी नहीं आई और उसने लोकपाल और लोकायुक्त बिल 2011 के स्वरूप पर आपत्ति उठा दिया। कांग्रेस ने इस बिल को पास कराने के लिए कमर कस ली थी, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस लोकपाल बिल को देश की जरूरत बताया। दो दिनों तक राज्यसभा और लोकसभा में इस बिल को लेकर बहस चली, लेकिन कांग्रेस ने सबकुछ पहले से तय कर रखा था। राज्यसभा में 17 दिसंबर को देर शाम बिल पास होते ही देश में भ्रष्टाचार खत्म करने वाले इस बिल के कानून बनने कि सबसे बड़ी बाधा पार हो चुकी थी। वजह साफ थी बिल को लोकसभा में रोड़ा अटकाने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पहले ही साफ कर दिया था कि अगर राज्यसभा से बिल पास हो गया तो वह लोकसभा में इस बिल के पास होने पर रोड़ा नहीं अटकाएंगे। करीब 32 महीने बाद आज समाजवादी पार्टी के लोकसभा से बहिर्गमन के बाद देश को वो बहुप्रतीक्षित बिल मिल गया, जिसे हथियार बनाकर अब देश का कोई भी नागरिक बड़े से बड़े अधिकारी, नेता, और मंत्रियों के खिलाफ भी आवाज बुलंद कर सकेगा।



Wednesday, 30 October 2013

राजनीति में दुर्गा थीं इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व में अजीब-सा जादू था। लोग खुद ब खुद उनकी तरफ खिंचे चले आते थे। वह एक प्रभावी वक्ता भी थीं, जो अपने भाषणों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती थीं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’, ‘लौह महिला’, ‘भारत की साम्राज्ञी’ और भी न जाने कि कितने विशेषण दिए गए थे।


भारतीय राजनीति के फलक पर श्रीमती इंदिरा गांधी का उभार ऐसे समय में हुआ था, जब देश नेतृत्व के संकट से जूझ रहा था। शुरू में ‘गूंगी गुड़िया’ कहलाने वाली इंदिरा ने अपने चमत्कारिक नेतृत्व से न केवल देश को कुशल नेतृत्व प्रदान किया, बल्कि विश्व मंच पर भी भारत की धाक जम दी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह के अनुसार, इंदिरा एक कुशल प्रशासक थीं। उनके सक्रिय सहयोग से बांग्लादेश अस्तित्व में आया। जिससे इतिहास और भूगोल दोनों बदल गए। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि बचपन से ही इंदिरा में नेतृत्व के गुण मौजूद थे। भारत की आजादी के आंदोलन को गति प्रदान करने के लिए इंदिरा ने बचपन में ही ‘वानर सेना’ का गठन किया था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर कलीम बहादुर के अनुसार, इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्रित्व काल बहुत अच्छा था। उन्होंने बहुत से ऐसे काम किए, जिससे विश्व में भारत का सम्मान बढ़ा। उन्होंने भारत की विदेश नीति को नए तेवर दिए, बांग्लादेश का बनना उनमें से एक उदाहरण है। इससे उन्होंने विश्व मानचित्र पर देश का दबदबा कायम किया। जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू के घर इंदिरा का जन्म 19 नवंबर 1917 को हुआ था। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ओर से स्थापित शांति निकेतन में पढ़ाई करने वाली इंदिरा बचपन में काफी संकोची स्वभाव की थीं। इनका जन्म 19 नवम्बर, 1917 को इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश के आनंद भवन में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। इनका पूरा नाम है- श्इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधीश्। इनके पिता का नाम जवाहरलाल नेहरु और दादा का नाम मोतीलाल नेहरु था। पिता एवं दादा दोनों वकालत के पेशे से संबंधित थे और देश की स्वाधीनता में इनका प्रबल योगदान था। इनकी माता का नाम कमला नेहरु था जो दिल्ली के प्रतिष्ठित कौल परिवार की पुत्री थीं। इंदिराजी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जो आर्थिक एवं बौद्धिक दोनों दृष्टि से काफी संपन्न था। अतरू इन्हें आनंद भवन के रूप में महलनुमा आवास प्राप्त हुआ। इंदिरा जी का नाम इनके दादा पंडित मोतीलाल नेहरु ने रखा था। यह संस्कृतनिष्ठ शब्द है जिसका आशय है कांति, लक्ष्मी, एवं शोभा। इनके दादाजी को लगता था कि पौत्री के रूप में उन्हें मां लक्ष्मी और दुर्गा की प्राप्ति हुई है। पंडित नेहरु ने अत्यंत प्रिय देखने के कारण अपनी पुत्री को प्रियदर्शिनी के नाम से संबोधित किया जाता था। चूंकि जवाहरलाल नेहरु और कमला नेहरु स्वयं बेहद सुंदर तथा आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे, इस कारण सुंदरता के मामले में यह गुणसूत्र उन्हें अपने माता-पिता से प्राप्त हुए थे। इन्हें एक घरेलू नाम भी मिला जो इंदिरा का संक्षिप्त रूप श्इंदुश् था।
इंदिरा गांधी कभी भी अमेरिका जैसे राष्ट्रों के सामने झुकी नहीं। विकीलिक्स की ओर से किए गए खुलासों में यह बात सामने आई है कि निक्सन जैसे शक्तिशाली राष्ट्रपति भी उनसे काफी नाराज थे। लेकिन उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की। अपनी राजनीतिक पारी के शुरुआती दिनों में ‘गूंगी गुड़िया’ के नाम से जानी जाने वाली इंदिरा बाद के दिनों में बहुत बड़ी ‘जननायक’ बन कर उभरीं। उनके व्यक्तित्व में अजीब सा जादू था, जिससे लोग खुद ब खुद उनकी तरफ खिंचे चले आते थे। वह एक प्रभावी वक्ता भी थीं, जो अपने भाषणों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती थीं।
रूसी क्रांति के साल 1917 में 19 नवंबर को पैदा हुईं इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध में विश्व शक्तियों के सामने न झुकने के नीतिगत और समयानुकूल निर्णय क्षमता से पाकिस्तान को परास्त किया और बांग्लादेश को मुक्ति दिलाकर स्वतंत्र भारत को एक नया गौरवपूर्ण क्षण दिलवाया। दृढ़ निश्चयी और किसी भी परिस्थिति से जूझने और जीतने की क्षमता रखने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने न केवल इतिहास, बल्कि पाकिस्तान को विभाजित कर दक्षिण एशिया के भूगोल को ही बदल डाला और 1962 के भारत चीन युद्ध की अपमानजनक पराजय की कड़वाहट धूमिल कर भारतीयों में जोश का संचार किया।
यदि यह कहा जाए कि हमारे देश में इंदिरा गांधी आखिरी जन नायक थीं, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनके बाद कभी उन जैसे राजनेता नहीं हुआ। आपातकाल लगाने के बाद उन्हें चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा, लेकिन फिर से चुनाव में वह विजयी होकर लौटीं और अकेले अपने दम पर सरकार का गठन किया। आज गठबंधन की सरकारें बन रही हंै। आज के किसी भी राजनेता में इंदिरा गांधी की तरह वह जादुई ताकत नहीं है कि अपने अकेले दल के दम पर सरकार बना सके। पंजाब में आतंकवाद का सामना करते हुए अपने प्राणों की आहूति देने वाली इंदिरा गांधी को अपने छोटे बेटे संजय गांधी के आकस्मिक निधन से काफी दुख पहुंचा था। इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में लगभग 10 सालों तक शामिल रहे कर्ण सिंह ने कहा कि संजय के निधन से उन्हें काफी दुख पहुंचा था, लेकिन राजीव गांधी से उन्हें काफी संबल मिला।
1957 के आम चुनाव के समय पंडित नेहरू ने जहाँ श्री लालबहादुर शास्त्री को कांग्रेसी उम्मीदवारों के चयन की जिम्मेदारी दी थी, वहीं इंदिरा गाँधी का साथ शास्त्रीजी को प्राप्त हुआ था। शास्त्रीजी ने इंदिरा गाँधी के परामर्श का ध्यान रखते हुए प्रत्याशी तय किए थे। लोकसभा और विधानसभा के लिए जो उम्मीदवार इंदिरा गाँधी ने चुने थे, उनमें से लगभग सभी विजयी हुए और अच्छे राजनीतिज्ञ भी साबित हुए। इस कारण पार्टी में इंदिरा गाँधी का कद काफी बढ़ गया था। लेकिन इसकी वजह इंदिरा गाँधी के पिता पंडित नेहरू का प्रधानमंत्री होना ही नहीं था इंदिरा में व्यक्तिगत योग्यताएं भी थीं। इंदिरा गाँधी को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने के आरोप उस समय पंडित नेहरू पर लगे। 1959 में जब इंदिरा को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तो कई आलोचकों ने दबी जुबान से पंडित नेहरू को पार्टी में परिवारवाद फैलाने का दोषी ठहराया था। लेकिन वे आलोचना इतने मुखर नहीं थे कि उनकी बातों पर तवज्जो दी जाती। वस्तुतः इंदिरा गाँधी ने समाज, पार्टी और देश के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किए थे। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्राप्त थी। विदेशी राजनयिक भी उनकी प्रशंसा करते थे। इस कारण आलोचना दूध में उठे झाग की तरह बैठ गई। कांग्रेस अध्यक्षा के रूप में इंदिरा गाँधी ने अपने कौशल से कई समस्याओं का निदान किया। उन्होंने नारी शाक्ति को महत्त्व देते हुए उन्हें कांग्रेस पार्टी में महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किए। युवा शक्ति को लेकर भी उन्होंने अभूतपूर्व निर्णय लिए। इंदिरा गाँधी 42 वर्ष की उम्र में कांग्रेस अध्यक्षा बनी थीं।
भारत के जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, उन सभी की अनेक विशेषताएँ हो सकती हैं, लेकिन इंदिरा गाँधी के रूप में जो प्रधानमंत्री भारत भूमि को प्राप्त हुआ, वैसा प्रधानमंत्री अभी तक दूसरा नहीं हुआ है क्योंकि एक प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने विभिन्न चुनौतियों का मुकघबला करने में सफलता प्राप्त की। युद्ध हो, विपक्ष की गलतियाँ हों, कूटनीति का अंतर्राष्ट्रीय मैदान हो अथवा देश की कोई समस्या हो- इंदिरा गाँधी ने अक्सर स्वयं को सफल साबित किया। इंदिरा गाँधी, नेहरू के द्वारा शुरू की गई औद्योगिक विकास की अर्द्ध समाजवादी नीतियों पर कघयम रहीं। उन्होंने सोवियत संघ के साथ नजदीकी सम्बन्ध कघयम किए और पाकिस्तान-भारत विवाद के दौरान समर्थन के लिए उसी पर आश्रित रहीं। जिन्होंने इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल को देखा है, वे लोग यह मानते हैं कि इंदिरा गाँधी में अपार साहस, निर्णय शक्ति और धैर्य था।


पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’, ‘लौह महिला’, ‘भारत की साम्राज्ञी’ और भी न जाने कि कितने विशेषण दिए गए थे जो एक ऐसी नेता की ओर इशारा करते थे, जो आज्ञा का पालन करवाने और डंडे के जोर पर शासन करने की क्षमता रखती थी। मौजूदा जटिल दौर में देश के कई कोनों से नेतृत्व संकट की आवाज उठ रही है। कठिन चुनौतियों का सामना करते हुए उन्हें मजबूती से कुछ चीजों के, कुछ मूल्यों के पक्ष में खड़ा होना होता है और कुछ की उतनी ही तीव्रता से मुखालफत करनी होती है। आज भारत के इतिहास में इंदिरा गांधी की छवि कुछ ऐसे ही संकल्पशील नेता की है। इंदिरा गांधी 16 वर्ष देश की प्रधानमंत्री रहीं और उनके शासनकाल में कई उतार-चढ़ाव आए। अंतरिक्ष, परमाणु विज्ञान, कंप्यूटर विज्ञान में भारत की आज जैसी स्थिति की कल्पना इंदिरा गांधी के बगैर नहीं की जा सकती थी। हर राजनेता की तरह इंदिरा गांधी की भी कमजोरियां हो सकती हैं, लेकिन एक राष्ट्र के रूप में भारत को यूटोपिया से निकालकर यथार्थ के धरातल पर उतारने का श्रेय उन्हें ही जाता है। आॅपरेशन ब्लू स्टार के बाद उपजे तनाव के बीच उनके निजी अंगरक्षकों ने ही 31 अक्टूबर 1984 को गोली मार कर इंदिरा गांधी की हत्या कर दी थी।




Tuesday, 15 October 2013

रक्षा के लिए सदा तत्पर

कुर्बानी को हर धर्म और शास्त्र में भगवान को पाने का सबसे प्रबल हथियार माना जाता है। हिंदू धर्म में जहां हम कुर्बानी को त्याग से जोड़ कर देखते हैं, वहीं मुस्लिम धर्म में कुर्बानी का अर्थ है खुद को खुदा के नाम पर कुर्बान कर देना। यानी अपनी सबसे प्यारी चीज का त्याग करना। इसी भावना को उजागर करता है मुस्लिम धर्म का महत्वपूर्ण त्योहार ईद-उल-जुहा, जिसे हम बकरीद के नाम से भी जानते हैं। ईद-उल-जुहा मुसलमान कैलेंडर का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है।

दरअसल, इस्लामी साल में दो ईदों में से एक है बकरीद। ईद-उल-जुहा और ई-उल-फितर। ईद-उल-फिरत को मीठी ईद भी कहा जाता है। इसे रमजान को समाप्त करते हुए मनाया जाता है। एक और प्रमुख त्योहार है ईद-उल-मीनाद-उन-नबी, लेकिन बकरीद का महत्व अलग है। इसे बड़ी ईद भी कहा जाता है। हज की समाप्ति पर इसे मनाया जाता है। इस्लाम के पांच फर्ज माने गए हैं, हज उनमें से आखिरी फर्ज माना जाता है। मुसलमानों के लिए जिंदगी में एक बार हज करना जरूरी है। हज होने की खुशी में ईद-उल-जुहा का त्योहार मनाया जाता है। यह बलिदान का त्योहार भी है। इस्लाम में बलिदान का बहुत अधिक महत्व है। कहा गया है कि अपनी सबसे प्यारी चीज रब की राह में खर्च करो। रब की राह में खर्च करने का अर्थ नेकी और भलाई के कामों में। जिस तरह ईद-उल-फितर को गरीबों में पैसा दान के रूप में बांटा जाता है, उसी तरह बकरीद को गरीबों में मांस बांटा जाता है। यह इस्लाम की खासियत है कि वह अपने किसी भी पर्व में समाज के कमजोर और गरीब तबके को भूलते नहीं हैं, बल्कि उनकी मदद करना उनके धर्म का एक अभिन्न अंग है। यह पर्व जहां सबको साथ लेकर चलने की सीख देता है, वहीं बकरीद यह भी सिखाती है कि सच्चाई की राह में अपना सब कुछ कुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
इस त्योहार को मनाने के पीछे भी एक कहानी है, जो दिल को छू जाती है। हजरत इब्राहिम द्वारा अल्लाह के हुक्म पर अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए तत्पर हो जाने की याद में इस त्योहार को मनाया जाता है। हजरत इब्राहिम को पैगंबर के रूप में जाना जाता है, जो अल्लाह के सबसे करीब हैं। उन्होंने त्याग और कुर्बानी का जो उदाहरण विश्व के सामने पेश किया वह अद्वितीय है। इस्लाम के विश्वास के मुताबिक, अल्लाह हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेना चाहते थे और इसीलिए उन्होंने उनसे अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने के लिए कहा। हजरत इब्राहिम को लगा कि उन्हें सबसे प्रिय तो उनका बेटा है, इसलिए उन्होंने अपने बेटे की ही बलि देना स्वीकार किया। हजरत इब्राहिम को लगा कि कुर्बानी देते समय उनकी भावनाएं आड़े आ सकती हैं, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। जब अपना काम पूरा करने के बाद पट्टी हटाई, तो उन्होंने अपने पुत्र को अपने सामने जिंदा खड़ा हुआ देखा। बेदी पर कटा हुआ मेमना पड़ा हुआ था। तभी से इस मौके पर बकरे और मेमनों की बलि देने की प्रथा है। कुछ जगह लोग ऊंटों की भी बलि देते हैं।
यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों ही धर्म के पैगंबर हजरत इब्राहीम ने कुबार्नी का जो उदाहरण दुनिया के सामने रखा था, उसे आज भी परंपरागत रूप से याद किया जाता है। आकाशवाणी हुई कि अल्लाह की रजा के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करो, तो हजरत इब्राहीम ने सोचा कि मुझे तो अपनी औलाद ही सबसे प्रिय है। उन्होंने अपने बेटे को ही कुर्बान कर दिया। उनके इस जज्बे को सलाम करने का त्योहार है ईद-उल-जुहा। कुर्बानी का अर्थ है कि रक्षा के लिए सदा तत्पर। हजरत मोहम्मद साहब का आदेश है कि कोई व्यक्ति जिस भी परिवार, समाज, शहर या मुल्क में रहने वाला है, उस व्यक्ति का फर्ज है कि वह उस देश, समाज, परिवार की हिफाजत के लिए हर कुबार्नी देने को तैयार रहे। ईद-उल-फितर की तरह ईद-उल-जुहा में भी गरीबों और मजलूमों का खास ख्याल रखा जाता है। इसी मकसद से ईद-दल-जुहा के सामान यानी कि कुबार्नी के सामान के तीन हिस्से किए जाते हैं। एक हिस्सा खुद के लिए रखा जाता है, बाकी दो हिस्से समाज में जरूरतमंदों में बांटने के लिए होते हैं, जिसे तुरंत बांट दिया जाता है। नियम कहता है कि पहले अपना कर्ज उतारें, फिर हज पर जाएं। तब बकरीद मनाएं। इसका मतलब यह है कि इस्लाम व्यक्ति को अपने परिवार, अपने समाज के दायित्वों को पूरी तरह निभाने पर जोर देता है।