Friday, 20 December 2013

नजर 17 जनवरी, 2014 पर


हाल ही में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने जैसे ही कहा कि लोकसभा चुनाव से पूर्व पार्टी अपना चेहरा जाहिर कर सकती है, मीडिया में कयासों का दौर शुरू हो गया। उसके बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी ने कार्यसमिति की बैठक 17 जनवरी को होने की बात कही और साथ ही कहा कि उसमें कई अहम फैसले लिए जा सकते हैं। बस, क्या था? कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी को लेकर हर तरफ कयास लगाए जाने लगे।
यकीन मानिए, जैसे पार्टी की ओर से कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी को आगे के लिए प्रोजेक्ट किया जाता है, हर कांग्रेसी का उत्साह दोगुना हो जाएगा। याद कीजिए, बीते जयपुर में पार्टी का चिंतन शिविर का दृश्य। चिंतन शिविर के नतीजों से पार्टी के तमाम नेता, कार्यकर्ता, प्रशंसक और समर्थक खासे उत्साहित दिखे थे। दरअसल, उत्साहित होने की वजह भी थी। वजह यह कि चिंतन शिविर के समापन के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी को पदोन्नत कर एक अहम जिम्मेदारी का पद (पार्टी उपाध्यक्ष) सौंपने का फैसला लिया गया। उसके बाद श्री राहुल गांधी पार्टी महासचिव नहीं, बल्कि पार्टी उपाध्यक्ष की हैसियत से कामकाज देखने के लिए अधिकृत हुए थे।
अब सबकी नजर 17 जनवरी, 2014 पर है। कांग्रेस नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में पहुंचने वाले पार्टी के ‘यूथ आइकन’ एवं भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में देखे जा रहे राहुल गांधी के नाम का ऐलान हो सकता है। इसके साथ ही उनके समक्ष पार्टी का जनाधार बढ़ाने और युवा मतदाताओं की बढ़ती संख्या को पार्टी के पक्ष में करने का चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। हमें जेहन में कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का वह वक्तव्य भी याद रखना होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश बदल रहा है और इस बदलाव में युवाओं की आवाज की अनदेखी कर हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं। युवा बढ़ रहे हैं। भारत बदल रहा है। हमें भी खुद को बदलना होगा। यह पीढ़ी चाहती है कि उसकी आवाज सुनी जाए।
निश्चित रूप से हाल के दिनों में 128 साल पुरानी और देश की सबसे बड़ी व ऐतिहासिक कांग्रेस पार्टी में इस पदोन्नति के साथ राहुल गांधी की जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों में इजाफा होगा। कांग्रेस उपाध्यक्ष बनाए जाने से पहले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव राहुल गांधी ने वर्ष 2009 में संप्रग को सत्ता में लाने और उत्तर प्रदेश में पार्टी के पुनरुत्थान में मदद करने लिए अपने अभिभावक नेताओं की छत्रछाया से उबरते हुए खुद के राजनीतिक कद में बढ़ोतरी की थी। उन्होंने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को अप्रत्याशित खुशी दिलाई और अब पार्टी केंद्र में तीसरी बार सत्ता में लौटने के लिए उनकी ओर देखने की जुगत भिड़ा रही है। कहते हैं कि बड़े ओहदे के साथ बड़ी जिम्मेदारियां भी आती हैं।
कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी पहले दागी नेताओं को बचाने के लिए ऑर्डिनेंस को नॉनसेंस बताकर सरकार को झुकने को मजबूर किया, तो अब लोकपाल को संसद में पास कराने में अपनी सक्रियता दिखाई। इतना ही नहीं, करप्शन के तमाम लंबित बिल को पास कराने की मांग को लेकर संसद का सत्र बढ़ाने तक का आग्रह किया। 

Thursday, 19 December 2013

अरविंदर सिंह लवली को कमान

दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री अरविंदर सिंह लवली को दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बना दिया गया है। पार्टी हाईकमान ने उनकी जीवटता और कर्तव्यनिष्ठ को देखते हुए यह जिम्मेदारी सौंपी है। मुझे पूरी उम्मीद है कि जिस प्रकार से बीते दशक से उन्होंने जनसेवा और जनसरोकार से जुड़े कार्यों में अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया है, आने वाले समय में वह प्रदेश कांग्रेस को और भी सशक्त बनाए।
दरअसल, अरविंदर सिंह लवली को दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष जे.पी.अग्रवाल के इस्तीफे के बाद यह जिम्मेदारी दी गई है। इसके साथ ही पार्टी हाइकमान ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में पराजय के बाद चरणदास महंत की जगह भूपेश बघेल को कमान सौंपी है।
अरविंदर सिंह लवली 1990 में वह दिल्ली प्रदेश यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। बाद में उन्हें एनएसयूआई का महासचिव बना दिया। 1996 तक वह इस पद पर रहे। 1998 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीतकर वह सबसे कम उम्र के विधायक बने। सन 2000 में उन्हें दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी का महासचिव बनाया गया। 2003 में वह मंत्री बने। वह गांधीनगर विधानसभा से जीतते रहे हैं।

Wednesday, 18 December 2013

जनता को मिला नया हथियार

 सड़क से संसद तक चली लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार लोकपाल विधेयक पास हो गया। बिल पास होने के बाद गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने अपना अनशन तोड़ दिया। इससे पहले 17 दिसंबर को राज्यसभा से लोकपाल विधेयक पास होने पर इस आंदोलन की अगुवाई करते रहे अन्ना हजारे ने सांसदों और सरकार का शुक्रिया अदा किया, तो वहीं डॉ. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे एक ऐतिहासिक कदम करार दिया। आठ दिन से उपवास पर बैठे अन्ना हजारे ने राज्यसभा में लोकपाल विधेयक पारित कराने में मदद करने के लिए विभिन्न दलों को धन्यवाद दिया और लोकसभा के सदस्यों से कल वहां भी इस विधेयक को पारित कराने की अपील की, जिसके बाद वह अपना उपवास खत्म कर लेंगे। कमजोर पर उत्साह से लबरेज दिख रहे हजारे ने विधेयक पारित होने पर तिरंगा लहराकर और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाकर अपनी खुशी प्रकट की। राज्यसभा में विधेयक पारित होने के बाद हजारे ने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि यह एक क्रांतिकारी कदम है। पिछले 40 साल में विधेयक आठ बार पेश किया गया, लेकिन कभी पारित नहीं हुआ। मैं सभी दलों को, उस हर (दल) को धन्यवाद देता हूं, जिन्होंने राज्यसभा में इस विधेयक का समर्थन किया, समाजवादी पार्टी उसका अपवाद रही है। यह विधेयक केवल अन्ना की मांग नहीं है, बल्कि देश यही चाहता है। अन्ना हजारे का कहना था कि हमारे नेता यह अहसास करने लगे हैं कि जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून चाहती है। मैं यह नहीं कहता कि इससे शत-प्रतिशत भ्रष्टाचार का नष्ट हो जाएगा, लेकिन इससे निश्चित तौर पर इसमें 40-50 फीसदी कमी आएगी।
इस विधेयक के प्रावधानों के मुताबिक विधेयक के पारित होने के एक साल के भीतर सभी राज्यों के इस कानून के आधार पर अपने यहां लोकायुक्त की नियुक्ति करना अनिवार्य होगा। लोकपाल से जुड़े मामले में सीबीआई लोकपाल के अधीन काम करेगी। सरकार लोकपाल की जांच से जुड़े सीबीआई अधिकारियों का ट्रांसफर नहीं कर सकेगी। राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति का अधिकार राज्य विधानसभा के पास होगा। हालांकि, उनके लिए एक साल के भीतर लोकायुक्त की नियुक्ति करना अनिवार्य है. इसके लिए केंद्रीय लोकपाल कानून को मॉडल कानून माना जाएगा। लोकपाल की नियुक्ति करने वाली समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में नेता विपक्ष, मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। धार्मिक संस्थाओं को छोड़कर अन्य सभी ऐसी स्वयंसेवी संस्थाएं लोकपाल के दायरे में आएंगी, जिन्हें सरकारी मदद मिलती है। लोकपाल को हटाने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास होगा। समिति में 50 प्रतिशत सदस्य अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिला वर्ग से होंगे। प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में हैं, हालांकि उनको लेकर शिकायतों के निपटान के लिए विशेष प्रक्रिया है। सभी श्रेणियों के सरकारी अधिकारी लोकपाल के दायरे में शामिल और साथ ही तय समयसीमा के भीतर जांच का प्रावधान।
हालांकि, यूपीए सरकार के लिए विधेयक पास करवाने की यह कवायद आसान नहीं रही, क्योंकि समाजवादी पार्टी विधेयक का पुरजोर विरोध कर रही थी। संसद शुरू होने से पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने केंद्रीय मंत्री कमलनाथ और पी. नारायणसामी को अपने घर तलब कर सरकार की रणनीति की जानकारी ली। इसके बाद मुलायम सिंह और रामगोपाल यादव की प्रधानमंत्री से मुलाकात हुई। इस मुलाकात में समाजवादी पार्टी को विरोध जताने के लिए हंगामा करने के जगह सदन से ‘वॉक आउट’ करने पर मना लिया गया और लोकपाल विधेयक शांति से पास होने का रास्ता साफ हो गया। वैसे, लेफ्ट समेत कुछ पार्टियों ने विधेयक के कुछ संशोधनों पर मत विभाजन भी करवाया, लेकिन भाजपा की रजामंदी के चलते वोटिंग भी विधेयक के पक्ष में ही रही।
अब बिल हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा उसके पश्चात यह कानून का रूप ले लेगा। हालांकि यह बिल लोकसभा से पहले ही पारित किया जा चुका है, लेकिन संशोधन बिल राज्यसभा में पेश किए जाने के चलते इसे दोबारा लोकसभा पारित किया गया है। इससे पहले, कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने लोकसभा में जैसे ही लोकपाल बिल पेश किया सपा के सदस्य हंगामा करने लगे। हंगामा के बीच चर्चा की शुरुआत में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि सत्ता पक्ष के लोग हंगामा कर रहे हैं, हम पहले से ही इस बिल के पक्ष में हैं। उन्होंने सशक्त लोकपाल के लिए सरकार का समर्थन किया है। सुषमा ने कहा कि लोकपाल के लिए श्रेय लेने की होड़ न लगे। इस बीच, राहुल गांधी ने कहा कि इस मौके का पिछले 45 साल से इंतजार था, इसका पूरा श्रेय वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे को जाता है।
दूसरी ओर, सच यह भी है कि यदि कांग्रेस इस विधेयक को लेकर पूरा जोर नहीं लगाती, तो शायद इस बार भी लोकपाल सदन में पास नहीं होता। हां, इसके साथ मुख्य विपक्षी दल भाजपा के रचनात्मक सहयोग को भी नहीं भुलाया जा सकता है, जिसने जनहित में कांग्रेस का साथ दिया है। सही मायने में यह कहा जाए कि यह राहुल गांधी के कारण संभव हुआ है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्हीं की मेहनत के कारण सभी दलों के बीच समन्वय बन सका है और यह विधेयक पारित हुआ है। सच तो यह है कि लोकपाल बिल संसद में तीन साल पहले लाया गया था, इन तीन सालों में जितना गंगा में पानी नहीं बहा, उतनी इस बिल को लेकर देश में राजनीति हुई। राजनीति इस बिल को लेकर चरम पर तब पहुंची, जब अन्ना के शिष्य और लोकपाल के आंदोलन से निकले अरविन्द केजरीवाल ने अन्ना से अलग होकर अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन किया और दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ा। इस बिल के स्वरूप को लेकर अन्ना और उनके प्रिय शिष्य के बीच बीते नौ दिनों से बयानबाजियों का लंबा दौर भी चला। अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम ने जहां बिल में खामियां बताई, वहीं अन्ना हजारे और उनके साथियों ने संसद में रखे गए बिल को उसी स्वरूप में स्वीकार किया। केंद्र सरकार ने सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई लेकिन इस बैठक में केंद्र सरकार को समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी नहीं आई और उसने लोकपाल और लोकायुक्त बिल 2011 के स्वरूप पर आपत्ति उठा दिया। कांग्रेस ने इस बिल को पास कराने के लिए कमर कस ली थी, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस लोकपाल बिल को देश की जरूरत बताया। दो दिनों तक राज्यसभा और लोकसभा में इस बिल को लेकर बहस चली, लेकिन कांग्रेस ने सबकुछ पहले से तय कर रखा था। राज्यसभा में 17 दिसंबर को देर शाम बिल पास होते ही देश में भ्रष्टाचार खत्म करने वाले इस बिल के कानून बनने कि सबसे बड़ी बाधा पार हो चुकी थी। वजह साफ थी बिल को लोकसभा में रोड़ा अटकाने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पहले ही साफ कर दिया था कि अगर राज्यसभा से बिल पास हो गया तो वह लोकसभा में इस बिल के पास होने पर रोड़ा नहीं अटकाएंगे। करीब 32 महीने बाद आज समाजवादी पार्टी के लोकसभा से बहिर्गमन के बाद देश को वो बहुप्रतीक्षित बिल मिल गया, जिसे हथियार बनाकर अब देश का कोई भी नागरिक बड़े से बड़े अधिकारी, नेता, और मंत्रियों के खिलाफ भी आवाज बुलंद कर सकेगा।



10 साल के काम की हो तारीफ



बेशक यह कहा जाए कि कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव की तैयारियों के लिए कमर कसते हुए पिछले दस सालों में अपनी सरकार के काम का बखान किया है। लेकिन सच तो यह है कि कांग्रेस हमेशा से आम आदमी और देशहित के लिए काम किया है। कांग्रेस ने संसदीय दल की बैठक में एक बुकलेट जारी की है। इस बुकलेट में कांग्रेस सरकार के कामकाज का ब्यौरा है। इस मौके पर सोनिया गांधी ने कहा कि हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव नतीजों से निराश होने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस को विधानसभा के चुनाव में सामने आए इन नतीजों से उबरना होगा। यह भी चिंता का विषय है कि संसद में महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो सका, लेकिन लोकपाल बिल पास होने पर हमें खुशी है।
अपने दस साल के रिपोर्ट कार्ड में कांग्रेस ने कहा कि पिछले 10 साल में सरकार के काम की तारीफ करनी चाहिए। कांग्रेस के शासन में मनरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसी योजनाएं लागू हुईं। कांग्रेस के शासन में गरीबी घटी है। सरकार ने किसानों के हित में काम किया। शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार पर सरकार ने जोर दिया। कांग्रेस कार्यकाल में साक्षरता दर बढ़कर 74% हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने यहां कांग्रेस संसदीय दल (सीपीपी) की बैठक में कहा कि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय के लिए अनेक कारण हैं। यह जाहिर है कि हम जनता को अपनी नीतियों कार्यक्रमों और उपलब्धियों के बारे में बताने में सफल नहीं हो पाए। ऐसा लगता है कि हम उनकी आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाए। उन्होंने कहा कि हमें मायूस नहीं होना चाहिए, हमारे सामने एक और संग्राम है, मई 2014 में, जिसके लिए हमें अपने आप को तैयार करना होगा। कांग्रेस पार्टी ने अनेक चुनाव जीते हैं और हारे हैं। जीत हो या हार, हमें यह याद रखना चाहिए कि जनता की सेवा करना हमारा सर्वोपरि दायित्व है। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा हमें उन लोगों के खिलाफ बोलते समय डरना नहीं चाहिए जो केवल संकीर्ण एवं विनाशकारी विकल्प पेश करते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विपक्ष ने प्रधानमंत्री सहित कांग्रेस और सरकार पर निंदात्मक और पूरी तरह से निराधार व्यक्तिगत हमले करने के लिए अपना ज्यादातर समय और उर्जा का इस्तेमाल किया। इस मौके पर पार्टी ने अपने सांसदों को एक पुस्तिका भी वितरित की, जिनमें संप्रग सरकार की उपलब्धियां गिनाई गयी हैं तथा सांसदों से इन उपलब्धियों का और ज्यादा कारगर तरीके से मतदाताओं के बीच प्रचार करने को कहा गया है।
इस दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंहगाई नहीं रोक पाने को अपनी सरकार की एक कमजोरी माना है। उन्होंने कहा कि कि मुद्रास्फीति नियंत्रित रखने में राज्यों की भी अहम भूमिका है और उनका अधिक से अधिक सहयोग लेने की जरुरत है। कांग्रेस संसदीय दल की बैठक को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि मुद्रास्फीति हमारी एक कमजोरी रही है और इसके लिए हमारी आलोचना भी हुई है। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा बहुत जटिल है जिस पर सरकार की आलोचना करना तो आसान है, लेकिन उसे समझना और उससे निपटना बहुत कठिन है। मनमोहन सिंह ने महंगाई से जुड़े विभिन्न पहलुओं की चर्चा करते हुए कहा कि इसे लेकर चिंतित होना लाजिमी है, लेकिन इस बात पर भी गौर करना होगा कि लोगों की आमदनी मुद्रास्फीति की दर से अधिक तेजी से बढ़ी है। इसी वजह से प्रति व्यक्ति खपत और वास्तविक वेतन में बढोतरी हुई है। अपने भाषण में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि हाल के विधानसभा चुनाव के नतीजे बेहद निराशाजनक हैं, लेकिन हमें वर्ष 2014 में होने जा रहे आम चुनाव को लेकर हताश नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन ने यह भी कहा कि कांग्रेस ऐसे वायदे नहीं करती जो पूरे ना हो सके। हमने अगले 20 साल का एजेंडा सेट किया है। हमने अपने कार्यकाल में गंभीर समस्याओं को सुलझाया है। हम अब भी कई गंभीर समस्याएं झेल रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव के परिणाम निश्चितरूप से इस बात के संकेत नहीं हैं कि कुछ महीनों के बाद हो होने जा रहे आम चुनावों में क्या होगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि अगले साल होने वाले आम चुनाव राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर लड़े जायेंगे। इनमें से कुछ मुद्दे विधानसभा चुनावों में भी रहे होंगे, लेकिन मई में होने वाले चुनावों में इस बात को लेकर हमारा आकलन होगा कि राष्ट्रीय मुद्दों पर हमारी कैसी प्रतिक्रिया रही है।

Monday, 16 December 2013

नहीं करें कन्फ्यूजन की राजनीति




क्या दिल्ली में दुबारा चुनाव होंगे? क्या दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगेगा या फिर अभी भी यहां सरकार बनने की कोई संभावना जीवित है? ऐसे कई सवाल हैं जिसने दिल्ली की सियासत को कन्फ्यूज कर रखा है। कैपिटल दिल्ली कन्फ्यूज है। कन्फ्यूजन में जनादेश का भी कबाड़ा हो गया। आम आदमी पार्टी के कमाल का ख्याल 28 के अंकों में उलझ गया। सत्ता के लिए ह्यआपह्ण का दरवाजा खोलने या बंद रखने पर खूब माथापच्ची हुई। आंकड़ों के अंकगणित की ये उलझन नेताओं को रात में भी कन्फ्यूज कर रही है। कोई कन्फ्यूज हो न हो कम से कम कांग्रेस कतई कन्फ्यूज नहीं। कन्फ्यूजन की इस किचकिच में कमल भी कन्फ्यूज है। विजय गोयल और नितीन गडकरी के बयानों के विरोधाभास ने तो कन्फ्यूजन और भी गहरा कर दिया। विजय गोयल ने ‘आप’ के समर्थन पर सोचने का इशारा किया तो नितिन गडकरी ने फौरन उनकी दुकान ही बंद करा दी।
राजनीति से परे रह कर आंदोलन तो हो सकता है, लेकिन उससे व्यवस्था नहीं बदल सकती। यही अब आम आदमी पार्टी के लिए भविष्य की चुनौती भी है। केजरीवाल की पार्टी दिल्ली विधानसभा की 28 सीटें जीतने में सफल रही है, लेकिन इस पार्टी का कोई राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक कार्यक्रम अब तक नहीं बन पाया है। आम जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त है, केजरीवाल ने उनमें एक उम्मीद जगाई है। लेकिन यदि वे सत्ता में आ भी गए, तो उन्हें संवैधानिक दायरे में रह कर ही काम करना पड़ेगा। उन्हें संविधान के अनुरूप कार्यनीति और योजनाएं तैयार करनी होगी। भारतीय राजनीति, समाज, अर्थशास्त्र और विकास की पेचीदगियों को भली प्रकार से समझना पड़ेगा और पार्टी की एक वैचारिक दिशा तय करनी होगी। यह भी देखना होगा कि आम आदमी को सहूलियतें देनेवाली सरकार चलाने के लिए साधन कहां से आये, इसका बोझ किन पर पड़े। इस संबंध में आम आदमी पार्टी की वैचारिक दिशा, नीति और कार्यक्रम अभी स्पष्ट नहीं है। आर्थिक असमानता और बेरोजगारी की समाप्ति के साथ-साथ भ्रष्टाचार से लड़ने और सूचना के अधिकार को बेहतर रूप प्रदान करने के लिए उन्हें नीतियां बनानी ही पड़ेंगी। यही उनके नेताओं और पार्टी का चरित्र भी निर्धारित करेगा और इसी से लोग जान पायेंगे कि केजरीवाल के वादों और दावों में कितना दम है। दिल्ली पहले केंद्रशासित प्रदेश था। वहां विधानसभा बन गयी,  मुख्यमंत्री का पद भी सृजित हो गया, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था अब भी राज्य सरकार के पास नहीं है, जबकि संविधान में अधिकारों का जो विभाजन किया गया है, उसमें कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है। इस संबंध में ‘आप’ का दृष्टिकोण क्या होगा, इसकी घोषणा अभी नहीं हुई है। आंध्र प्रदेश में तेलुगूदेशम पार्टी के संस्थापक अभिनेता नंदमूरि तारक रामाराव गैर-कांग्रेसवाद के नायक रहे हैं। उन्होंने तेलुगू अस्मिता की आवाज बुलंद की। लेकिन राज्य की जनता ने उनकी पार्टी को तीन बार इसलिए मौका दिया, क्योंकि उन्होंने राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास की नीतियां बनायीं और उन पर अमल भी किया। वे देश की वृहत्तर राजनीति से अलग नहीं थे। इसलिए उन्होंने चुनाव की राजनीति में दोस्त और दुश्मन की पहचान भी की। गंठबंधन की राजनीति के दौर में यह तय करना जरूरी माना जाता है।
गांधीजी को लोग संत मानते हैं, लेकिन वे भी राजनीतिक संत थे। उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में क्या करना है और क्या नहीं करना है, यह तय कर रखा था। उनका अपना राजनीतिक और आर्थिक दर्शन था। उन्हें राजनीति से परहेज नहीं था। उन्होंने देश-विदेश में जो आंदोलन किये, वह भी राजनीति थी। जाहिर है, आंदोलन कोई भी हो, उसे जीवन और समाज के सभी पहलुओं को समेटना पड़ेगा, उससे भाग कर कोई हल नहीं हो सकता। आंदोलन के जरिये केवल भीड़ बटोर कर ही निर्णय होंगे, तो उससे व्यवस्था नहीं, बल्कि भीड़तंत्र ही पनपेगा और यह भीड़तंत्र व्यवस्था का संचालक नहीं हो सकता। इसलिए यदि केजरीवाल भी अन्ना के दलविहीन राजनीति की कल्पना पर आधारित विचार और कार्यक्रमविहीन दल की ओर बढ़ेंगे, तो उनकी कठिनाइयां ही बढ़ेंगी।



Thursday, 12 December 2013

जनादेश सबसे अहम : सरफराज सिद्दीकी


दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव सरफराज अहमद सिद्दीकी तेज तर्रार अधिवक्ता हैं। साथ ही दिल्ली की राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव के  परिणाम और उसके बाद की स्थिति सहित कई अहम मुद्दों पर उन्होंने बेबाक राय रखी। पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंश :


0 दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम को किस रूप में देखते हैं?
जनता ने जो जनादेश दिया है, हम उसका सम्मान करते हैं। आखिर, हमारी पार्टी के हार के कौन-कौन से कारण रहे, इस पर विचार-विमर्श हो रहा है।

0 ‘आप’ ने जिस प्रकार का प्रदर्शन किया है, उसकी उम्मीद थी आपको?
राजनीति में कई बातें अनायास ही होती हैं। लेकिन यह सार्वभौमिक सत्य है कि लोकतंत्र में जनादेश सबसे अहम होता है। हमारी पार्टी ने 15 वर्षों तक दिल्ली की जनता का सेवा किया है। दिल्ली की जनता ने जो जनादेश दिया है, हम उसका सम्मान करते हैं।

0 कहा जा रहा है कि 1998 में प्याज के मुद्दे पर सुषमा स्वराज की सरकार चली गई थी। 2013 में शीला दीक्षित का हाल भी उसी तर्ज पर हुआ?
देखिए, प्याज और महंगाई एक मुद्दा जरूर था। लेकिन इसके साथ ही आपको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जिन्होंने प्याज स्टोर कर रखे थे, वे भारतीय जनता पार्टी के ही लोग थे। सुषमा स्वराज के हारने के कई और कारण थे। आपको याद होगा, उस समय भाजपा ने तीन-तीन मुख्यमंत्री बदले थे। इस बार भी कांग्रेस केवल महंगाई और प्याज के मुद्दे पर नहीं हारी है। चुनाव के दौरान प्याज आदि के दाम कुछ ताकतों ने जानबूझकर बढ़ाए। कुछ तो ऐसा था, नहीं तो चुनाव के एक दिन बाद ही प्याज कैसे सस्ता हो गया? जो चुनाव से पहले 100 रुपये किलो तक पहुंच गया था।

0 तो आपकी नजर में कौन-कौन से कारण थे?
वर्तमान में फौरी तौर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। पार्टी के भीतर मंथन जारी है। तमाम बातें आपके सामने होगी।

0 क्या ‘आप’ सरकार बनाएगी या भाजपा?
आखिर इस बारे में हम कैसे तय कर सकते हैं? सच तो यही है कि किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। यह तय दोनों पार्टियों को तय करना होगा।

0 आपकी पार्टी के कई नेता आप के साथ सरकार बनाने की बात कह रहे हैं?
हमन जनसरोकार की राजनीति करते आ रहे हैं। दिल्ली की जनता के हित में जो भी फैसला होगा, उसके लिए कांग्रेस पार्टी विचार कर रही है।

0 कांग्रेस की दिल्ली में आगे की रणनीति क्या होगी?
आज की तारीख में बात करूं तो पार्टी रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएगी और फिर से जनता का विश्वास हासिल करने के लिए काम करेगी। कांग्रेस हमेशा आम जनता से जुड़ी रही है। कांग्रेस ने आम आदमी के लिए काम किया है।  पार्टी द्वारा जनता की भावनाओं को समझने में अगर कोई कसर रह गई होगी, तो उसका आंकलन किया जाएगा। इस बात का भी पता लगाया जाएगा कि पार्टी कहीं विरोधियों की चुनावी तकनीकों का शिकार तो नहीं हुई है।

0 दिल्ली को लोग बीते कुछ अरसे से ‘रेप कैपिटल’ भी कहने लगे हैं, आप इससे सहमत हैं?
यह राजधानी के साथ अन्याय है। हम इससे सहमत नहीं हैं।

0 चूंकि आप अधिवक्ता भी हैं, इसलिए आपसे एक सवाल यह कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जो धारा 377 को लेकर आदेश दिया है, उसे किस रूप में देखते हैं?
देखिए, दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 में दिए गए फैसले के विपरीत सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को बदलने के लिए कोई संवैधानिक गुंजाइश नहीं है। धारा 377 के तहत दो व्यस्कों के बीच समलैंगिक रिश्ते को अपराध माना गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 377 के तहत समलैगिक रिश्ते को गैरआपराधिक कृत्य करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद सरकार धारा 377 में बदलाव को लेकर गंभीर है। केंद्र सरकार इस मामले को गैर आपराधिक बनाने पर विचार कर रही है। कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने भी इस मामले को संसद में उठाने की बात कही है। पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने भी कहा है कि अब संसद में धारा 377 में बदलाव करना ही एकमात्र उपाय है। सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने भी कहा कि जरूरत पड़ने पर संसद में इस पर चर्चा की जाएगी।

0 आप दो दशक से अधिक समय से राजधानी दिल्ली में निवास कर रहे हैं। शहर में अक्सर जाम की स्थिति भी तो बनी रहती है?
देखिए, जिस हिसाब से दिल्ली की आबादी बढ़ रही है और राजनीतिक दलों की वजह से रोज-रोज होने वाले धरने प्रदर्शन भी टैÑफिक जाम के महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं।

0 आगामी चुनाव में आपकी लड़ाई सीधे-सीधे भाजपा से है या आम आादमी पार्टी से?
हमारी लड़ाई सीधे-सीधे राष्टÑीय स्वयं सेवक संघ से है। भाजपा से अपनी कोई लड़ाई नहीं है। 2014 में न कहीं मोदी हैं और न ही कहीं भाजपा है। अगर है तो सिर्फ और सिर्फ आर एस एस।

0 लेकिन नरेंद्र मोदी की जनसभाओं में उमड़ रही भीड़ को आप लोग नजर अंदाज कैसे कर सकते हैं?
वह भीड़ सुनियोजित और प्रायोजित होती है, उसका वोटों से कोई लेना-देना नहीं होता।

0 क्या चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद भी नरेंद्र मोदी को आप लोग हलके में क्यों ले रहे हैं?
नरेंद्र मोदी की और उनके गुजरात मॉडल की पोल खुल चुकी है। वास्तविकता के धरातल जिन राज्यों में भाजपा ने सत्ता हासिल की है, वहां सच्चाई कुछ और है।

Wednesday, 11 December 2013

समलैंगिक संबंध अपराध

समलिंगी सेक्स को उच्चतम न्यायालय द्वारा अवैध करार दिये जाने के बीच सरकार ने आज संकेत दिया कि वह इस मुद्दे से निपटने के लिए विधायी रास्ता अपनाएगी। शीर्ष अदालत के फैसले के बाद अब समलिंगी सेक्स को लेकर गेंद संसद के पाले में आ गयी है और वही तय करेगी कि भारतीय दंड संहिता से कौन सी धाराएं हटाने की आवश्यकता है। कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि संविधान के तहत किसी कानून की संवैधानिकता परखना उच्चतम न्यायालय का विशेषाधिकार है। शीर्ष अदालत उसी विशेषाधिकार का उपयोग कर रही है। कानून बनाना हमारा विशेषाधिकार है और हम उस विशेषाधिकार का इस्तेमाल करेंगे।
सर्वोच्च न्यायालय ने दो वयस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक रिश्ते को अपराध करार दिया है। न्यायालय द्वारा बुधवार को सुनाए गए फैसले से समलैंगिक, उभयलिंगी और किन्नर समुदाय को बड़ा झटका लगा है। दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 में दिए गए फैसले के विपरीत सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को बदलने के लिए कोई संवैधानिक गुंजाइश नहीं है। धारा 377 के तहत दो व्यस्कों के बीच समलैंगिक रिश्ते को अपराध माना गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 377 के तहत समलैगिक रिश्ते को गैरआपराधिक कृत्य करार दिया था।
समलैंगिकता को अपराध ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद गे एक्टिविस्ट खासे नाराज दिखे। गे एक्टविस्ट ने इसे काला दिन बताते हुए कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है जब हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बदला है। वहीं समलैंगिकों की आवाज उठाने वाली संस्था नाज फाउंडेशन ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका डालने का फैसला किया है। गे राइट्स एक्टिविस्ट्स ने दिल्ली के पालिका बाजार में गे मार्च का आयोजन भी किया है। पीठ ने कहा कि भादंसं की धारा 377 को हटाने के लिए संसद अधिकृत है, लेकिन जब तक यह प्रावधान मौजूद है, तब तक न्यायालय इस तरह के यौन संबंधों को वैध नहीं ठहरा सकता। फैसले की घोषणा होने के बाद समलैंगिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे शीर्ष अदालत के फैसले की समीक्षा की मांग करेंगे। न्यायालय ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ समलैंगिकता विरोधी कार्यकर्ताओं और सामाजिक तथा धार्मिक संगठनों द्वारा दायर याचिकाओं पर आदेश पारित किया। पीठ ने 15 फरवरी 2012 से हर रोज सुनवाई करने के बाद पिछले साल मार्च में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अपील पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने के मुद्दे पर ढुलमुल रवैये के लिए केंद्र की खिंचाई की और इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर संसद द्वारा चर्चा नहीं किए जाने तथा बजाय इसके न्यायपालिका पर अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने का आरोप लगाये जाने पर चिंता जताई। समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किये जाने की वकालत करते हुए केंद्र ने बाद में न्यायालय से कहा था कि देश में समलैंगिकता विरोधी कानून ब्रिटिश उपनिवेशवाद का नतीजा था और भारतीय समाज समलैंगिकता के प्रति काफी सहिष्णु था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2 जुलाई 2009 को समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था और कहा था कि दो वयस्कों के बीच निजी स्थान पर आपसी सहमति से बने समलैंगिक संबंध अपराध नहीं होंगे। भादंसं की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) समलैंगिक संबंधों को आपराधिक जुर्म बनाती है जिसमें उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है।
केंद्र ने पूर्व में उच्चतम न्यायालय को सूचित किया था कि देश में करीब 25 लाख समलैंगिक लोग हैं और उनमें से लगभग सात प्रतिशत (1.75 लाख) एचआईवी संक्रमित हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने हलफनामे में कहा था कि वह अत्यंत जोखिम वाले चार लाख पुरुषों जिनके पुरुषों के साथ समलैंगिक संबंध (एमएसएम) हैं, को अपने एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के तहत लाने की योजना बना रहा है और उनमें से करीब दो लाख को पहले ही इसमें लाया जा चुका है। समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ताओं की कानूनी लड़ाई ने अदालतों में बहुत से मोड़ और उतार चढ़ाव देखे। जब मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में था तब गृह मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय ने भादंस की धारा 377 को लेकर विरोधाभासी रुख अपनाया था. गृह मंत्रालय ने दंड प्रावधान को जारी रखने का पक्ष लिया था तथा स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्रावधान को खत्म किये जाने का समर्थन किया था।