Sunday, 21 September 2014

उबारना होगा जन्नत को दर्द से



ऐ जिन्दगी! तू ही बता
एक और स्वर्ग कहां बसाऊँ...
फिर वही कश्मीर कहां से लाऊँ...
कुदरत का ही दिया था सब
कुदरत ने ही लिया है सब
सच बता ऐ कुदरत!
चाहती तू क्या है?
कहते थे कभी सब...
धरती का स्वर्ग हेा तुम
तस्वीर कुछ ऐसी हुई कि नरक से भी बद्तर हुआ है।

‘हमारे बच्चे चार दिन से फंसे हैं... प्लीज़ सर हमारे बच्चों को बचा लीजिए... आँखों से बहती आँसुओं की धार और सूखे होंठों से निकलते ये बोल राहत कार्यों में जुटीं बचाव टीमों से अपने बच्चों की जान की भीख माँगते सुनाई दे रहे हैं। कुदरत के इस कहर ने अब तक सैकड़ों घरों के चिरागों का अपनी चपेट में ले लिया है और दर्जनों परिवार तबाह हो चुके हैं। दुआ करते हैं कि कुदरत का यह कहर उत्तराखण्ड की त्रासदी न बन जाए, जिसने लाखें घरों को पल भर में ही खत्म कर दिया और कइयों का तो कुछ पता ही नहीं चला, जहाँ आज भी लाश मिलने पर परिजन इस आस से पहुँच जाने हैं कि शायद यह लाश उनके ही परिवारीजन की हो...।
भारत ने तो पिछले वर्ष ही तो उत्तराखंड की भयानक त्रासदी झेली है और अब जम्मू-कष्मीर में हुए जन-धन के नुकसान की भरपाई के लिए हमारी सेना, एनडीआरएफ की टीम और जम्मू-कष्मीर सरकार के साथ भारत सरकार भी पूरी जिम्मेदारी के साथ मौके पर है। वहीं पाकिस्तान भी इस मुष्किल हालात से निपटने के लिए दिन-रात एक कर रहा है। पाकिस्तान तो अभी आर्थिक तौर पर इतना सक्षम भी नहीं है कि वह बाढ़ पीडि़तों की पूरी तरह मदद कर सके। भारत ने मानवता के आधार पर पाक अधिकृत कष्मीर में फंसे लोगों की मदद के लिए पहल की थी जिसे भी पाकिस्तान ने नकार कर अपने इरादे स्पष्ट कर दिये और घाटी में अमन-चैन के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तान यह समझने का प्रयास नहीं कर रहा है कि जम्मू-कष्मीर से निकलने वाली नदियां सिंधु, रावी, चिनाव, झेलम और तवी दोनों देषों के मध्य बहती है। लेकिन इन नदियों का अधिकांष भाग पाकिस्तान से गुजरकर अरब सागर में मिल जाता है। तो मतलब साफ है कि भारत शुरूआती दंष झेल रहा है तो पाकिस्तान को अभी सिंध, पंजाब में बाढ़ के कहर से निपटना बाकी है।
बाढ़ का जो कहर इन दोनों देषों पर बरपा है उसके लिए हमें पहले भारत-पाकिस्तान में बह रही इन नदियों की भौगोलिक स्थिति को समझना जरूरी होगा। सिंधु, रावी, चिनाव, झेलम, तवी, नीलम और सतलुज ये वे नदियां है जो भारत से होकर पाकिस्तान जाती है। हिमालय से निकलने वाली नदियों को लेकर भारत-पाक में एक समझौता भी हो चुका है। भारत-पाकिस्तान में नदियों के पानी के बंटवारे के लिए 1960 में ‘सिंधु जल-संधि’ पर भारत के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तानी के सद्र अयूब खान ने हस्ताक्षर किये थे। पानी के बंटवारे को लेकर विष्व बैंक की मध्यस्थता के बीच संधि में स्पष्ट लिखा है कि सिंधु, झेलम और चिनाव नदियों को भारत अविरल बहनें देगा। इस पर किसी प्रकार के बांध का निर्माण भारत की ओर से नहीं किया जायेगा। इससे एक बात तो स्पष्ट हो गई कि इस भयंकर बाढ़ में सबसे ज्यादा झेलम नदी उफान पर थी और पाकिस्तान के अखबारों एवं मीडिया-चैनलों ने खबरें दी कि भारत ने अपने लोगों को बचानें के लिए पाकिस्तान की ओर कई लाख क्यूबेक पानी छोड़ दिया। संधि के मुताबिक गौर करें तो पाकिस्तान को जबाव मिल गया होगा कि भारत ने न झेलम पर बांध बनाया है और न ही पानी छोड़ा है। यह प्राकृतिक आपदा है, जिसकी भयानक त्रासदी का दंष दोनों देष और जनता वर्तमान में भोग रही है।
बाढ़ से घिरे दोनों देष अभी इतने सक्षम नहीं है कि बाढ़ का पूर्वानुमान लगा सके। भारत ने उत्तराखंड त्रासदी से कोई सबक नहीं लिया। जम्मू-कष्मीर में तेज बारिष की चेतावनी तो मौसम विभाग ने दी थी लेकिन जम्मू सरकार ने ऐहतियात के तौर पर कोई कदम नहीं उठाये। भारत की एक और संस्था ब्ॅब् यब्मदजमतंस ॅंजमत ब्वउउपेेपवदद्ध की 6 सितंबर की रिपोर्ट में नदियों के बढ़ते जलस्तर को लेकर जो आंकड़े प्रस्तुत किये गये, उसमें जम्मू-कष्मीर की एक भी नदी का आंकड़ा नहीं था। यही हाल पाकिस्तान का है कि पाकिस्तान के मौसम विभाग ने तो तेज बारिष की जानकारी तो दी थी लेकिन प्राकृतिक आपदाओं से निपटने वाली एजेंसी एनडीएमए ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। दोनों देषों की सरकारें हमेषा से प्राकृतिक आपदा होने के बाद सक्रिय होती आई है। इसके कई उदाहरण पूर्व में हमारे सामने आ चुके है। ताजा हालातों में जो फुर्ती दिखाई गई, वह है बाढ़ के बाद पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में आपातकाल घोषित कर दिया गया है तो चिनाव दी में बांध पर संभावित दरार के चलते रेड-अलर्ट जारी किया जा चुका है। वहीं भारत में प्रधानमंत्री मोदी ने इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित कर देषवासियों से मदद के लिए आगे आने का आग्रह किया है।
भारत पाकिस्तान दोनों देष की सरकार, समाज और सेनाओं को समझना होगा कि वे अभी इतने सक्षम नहीं हुए है कि बार-बार आ रही भीषण त्रासदियों से निपट सके। सीमा सुरक्षा पर जितना अधिक पैसा दोनों देष खर्च करते है उसमें कमी लाकर अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए अन्य तंत्रों को मजबूत करनें के प्रयासों में तेजी लाए तो बेहतर होगा। लेख लिखने तक तो जम्मू-कष्मीर में मौसम खुल चुका है। पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम नवाज शरीफ ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर पाक अधिकृत कष्मीर में बाढ़ पीडि़तों की मदद की पहल का स्वागत किया है। उम्मीद की जा सकती है कि खुले आसमान के नीचे कराहते लोगों की मदद के लिए दोनों देष की सरकारें मिलकर बचाव काम में तेजी लायेगी और घाटी में अमन-चैन बनायें रखनें के लिए संयुक्त प्रयास शुरू करेंगी।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। सरहद पर बसे लोग आए दिन इन हालातों का सामना करते रहते हैं। पहले से ही समस्याओं से दो चार राज्य की जनता पर बाढ़ आफत बनकर टूटी है। राज्य में आयी बाढ़ ने धरती के स्वर्ग को नर्क में बदलकर रख दिया है। इस बारे में पुंछ की सुरनकोट तहसील के स्थानीय निवासी और उड़ान अखबार के रिपोर्टर सैय्यद एजाज-उल-हक बुखारी कहते हैं कि सरहद पर बसे होेने की वजह से दर्द हमारी किस्मत बन चुका है। सरहद पर होने की वजह से हम हर वक्त परेषान हाल रहते हैं। उस पर अब यह आपदा हम पर कहर बनकर टूटी है जिसने चंद ही दिनों धरती के स्वर्ग में इतनी तबाही मचाई है कि आज इसके हालात बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे किसी खुबसूरत फूल की हालत मुरझाने के बाद हो जाती है। जिधर देखो तबाही का मंजर है, मदद के लिए एक दूसरे को बेसब्री से पुकारती हुई लोगों की चीखें हैं और आंखों में आसूंओं की वह बाढ़ है जो इस बाढ़ के गुजर जाने के बाद न जाने कितने महीनों, सालों तक हमें हमारे गम की याद दिलाती रहेगी। आंकड़ों के मुताबिक बाढ़ की वजह से अब तक 5 सौ गांव डूब चुके हैं और तकरीबन 40 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। एक गांव के लोगों का दूसरे गांव के लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। सड़क, पुल और संचार सेवाएं सब कुछ बाढ़ की भेंट चढ़ गए हैं। स्थिति इतनी भयावह हो गयी है कि बच्चे अपनों से सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर सब कुछ पहले जैसा हो पाएगा या नहीं? 

Tuesday, 16 September 2014

मैजिक नहीं, धोखा था



लोकतंत्र में आप किसी को कुछ पल के लिए धोखा दे सकता है, आज न कल सच सामने आ ही जाता है। कुछ ऐसा ही रहा बीते दिनों हमारे यहां। भाजपा की ओर से मोदी लहर के नाम पर जनता को कुछ पल के लिए बरगलाने की कोशिश की गई। लंबे-चैड़े कोरे वादे किए गए, जो पूरे नहीं किए। सौ दिन के कार्यकाल की जमकर प्रोपगंडा की गई, लेकिन सच आखिर सच होता है। जनता को बार-बार कोई भी राजनीतिक दल भ्रमित नहीं कर सकता है। उपचुनावों के परिणामों में एक बार फिर से मोदी मैजिक की कलई खोल दी है। गुजरात में भाजपा की हार। राजस्थान में भाजपा की हार। उत्तर प्रदेश में भाजपा की हार। इससे पहले बिहार में हार। उत्तराखंड में हार। अव्वल तो यह भी कि जिस अमित शाह को मैन आॅफ द मैच से नवाजाने की पुरजोर कोशिश की, वह तो अपने पहले ही मैच में हार गए। उत्तर प्रदेश के उपचुनाव के नतीजों ने बता दिया लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से जितने भी वादे किए गए, केंद्र की मोदी सरकार उस पर खरा नहीं उतर सकी। जनता करने वाली सरकार को पसंद करती है न कि कहने वाले। भला कोरे आश्वासनों पर कौन भरोसा करेगा ?
सम की तीन सीटों में एक सीट पर बीजेपी, एक पर कांग्रेस जबकि एक सीट पर ।प्न्क्थ् को जीत हासिल हुई है। नौ राज्यों में तीन लोकसभा सीट और 33 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे आ गए हैं। लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली ऐतिहासिक जीत में बड़ी भूमिका यूपी से पार्टी को मिलीं 73 सीटों की थी। तत्कालीन यूपी प्रभारी अमित शाह को इस करिश्माई प्रदर्शन का इनाम पार्टी का अध्यक्ष बनाकर दिया गया। मोदी के खास सिपहसालार अमित शाह अपने पहले ही इम्तेहान में ही फेल हो गए। जिन राज्यों में गैर बीजेपी सरकारें थीं वहां तो बीजेपी फिसली ही, अपने राज्यों में भी उसकी भद पिट गई। जानने की कोशिश करते हैं कि किन 5 बड़ी वजहों से बीजेपी को करारी हार मिली।
 पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को चुनाव का प्रभारी बनाकर प्रदेश की जनता के बीच एक खास संदेश देने की कोशिश की। बीएसपी के चुनाव मैदान से हटने के बाद मुकाबला सीधे-सीधे सपा और भाजपा के बीच था लेकिन आज आए नतीजे ने जैसे पार्टी के दिग्गजों की बोलती बंद कर दी है। 13 सितंबर को राज्य की जिन 11 सीटों पर उपचुनाव हुए थे, उनमें से भाजपा को महज 4 सीटें मिलीं जबकि सपा के खाते में बाकी की सातों सीटें चली गईं। पार्टी के लिए ये इसलिए भी बहुत बड़ा झटका है क्योंकि चुनाव से पहले ये सभी सीटें बीजेपी की ही थीं।
उपचुनाव में बीजेपी के लिए बड़ा झटका है। यूपी में एसपी को 7 सीटों पर जीत मिली है, जबकि बीजेपी को 3 सीट मिली है। एक सीट के नतीजे आने बाकी हैं। गौरतलब है कि ये सभी 11 सीटें बीजेपी के पास थीं ऐसे में उपचुनाव के नतीजे बीजेपी के लिए बड़ा झटका माने जा रहे हैं। राजस्थान में भी बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा है। राजस्थान की चार में से तीन सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली है। वहीं बीजेपी को सिर्फ एक सीट मिली है। पहले ये चारों सीटें बीजेपी के पास थी। राजस्थान के सूरजगढ़, नसीराबाद और वैर सीट पर कांग्रेस का कब्जा हो गया है। बीजेपी के खाते में सिर्फ कोटा दक्षिण की सीट आई है। वहीं गुजरात में बीजेपी ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की। 3 पर कांग्रेस ने कब्जा कर लिया है। वडोदरा लोकसभा सीट बीजेपी ने जीत ली है। बीजेपी उम्मीदवार रंजन बेन भट्ट ने यहां से जीत हासिल की है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने अपना खाता खोला है। बशीरहाट सीट पर बीजेपी उम्मीदवार ने जीत हासिल की है। वहीं एक सीट पर टीएमसी की जीत हुई है। सम की तीन सीटों में एक सीट पर बीजेपी, एक पर कांग्रेस जबकि एक सीट पर ।प्न्क्थ् को जीत हासिल हुई है।
27 मई को नरेंद्र मोदी ने जोर-शोर के साथ देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली लेकिन उनकी पार्टी को महज दो महीने बाद ही 26 जुलाई को उत्तराखंड ने तगड़ा झटका लगा। जिस उत्तराखंड में वोटरों ने मोदी लहर पर सवार होकर पांचों लोकसभा सीट भाजपा को सौंप दी थीं, वहीं की धारचूला, डोईवाला और सोमश्वर सीट से कमल की बजाय पंजे को जीत मिली। उत्तराखंड के झटके के ठीक एक महीने बाद यानी 25 अगस्त को बीजेपी को बिहार में तगड़ा झटका लगा। यहां मोदी लहर की आंधी में नेस्तनाबूद हो चुके लालू यादव, नीतीश कुमार और कांग्रेस ने राज्य में अपना अस्तित्व बचाने के लिए हाथ मिला लिए। बीजेपी इस एकजुटता के सामना नहीं कर पाई और औंधे मुंह गिरी। उसे 10 में से महज 4 सीटें मिलीं। लालू-नीतीश गठबंधन को 6 सीटों पर जीत मिली जिसमें आरजेडी 3, जेडीयू 2 और कांग्रेस 1 सीट पर विजयी रही। खास बात ये है कि पिछले चुनाव में बीजेपी के पास इन 10 में से छह सीटें थीं।

Tuesday, 9 September 2014

चेहरा ही नहीं, चरित्र भी बदल रहा

चाल, चेहरा और चरित्र की बात करते थकने नहीं वाली भारतीय जनता पार्टी में सबकुछ बदल रहा है। पहले चेहरा बदला और अब चरित्र बदल रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित षाह ने तो सरेआम ऐलान कर दिया कि भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही नेतृत्व में चार राज्यों की विधानसभा चुनाव लड़ेगी। मुख्यमंत्री का निर्णय चुनाव परिणाम आने के बाद किए जाएंगे।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा बदल गई ? जो कांग्रेस पर आरोप लगाती रही है कि कांग्रेस ने मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम चुनाव के दौरान घोषित नहीं किया, उस भाजपा को अब क्या हो गया है ? विधानसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। ये बयान किसी स्थानीय नेता का नहीं बल्कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़ने और जीतने के बाद अब देखना होगा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी के नेतृत्व में किस तरह से विधानसभा चुनाव लड़ा जाता है।
ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ है। कई पुराने प्रसंग भी हैं। भाजपा के नेतृत्व में भी बदलाव आ रहा है। इनमें से कुछ बदलाव धीमे हैं, तो कुछ तेज। मगर तय है कि आने वाले वर्षों में राजनीति और समाज पर इनका गहरा असर पड़ेगा। विचारधारा के नजरिये से देखें, तो धर्मनिरपेक्षता के मामले में नेहरू के मॉडल में बदलाव दिख रहा है और उस नजरिये में, जिससे अब तक देश में सांप्रदायिकता की समस्या को परिभाषित किया जाता रहा है। नेहरू के समय में भारतीय राष्ट्रवाद एक क्षेत्र आधारित अवधारणा समझ्णी जाती थी, वर्तमान राजनीतिक व्यवस्?था में इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तौर पर देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। मोहन भागवत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे बड़े नेताओं का मानना है कि भारत की संस्कृति ही उसे राष्ट्र बनाती है, जो मुख्यतरू हिंदू संस्कृति ही है। उनका यह भी मानना है कि हिंदू संस्कृति केवल हिंदुओं तक सीमित नहीं है, सभी तरह की आस्?थाएं इसमें समाहित हैं। सुनने में यह भले अटपटा लगे, मगर संघ परिवार के अनेक नेता कहते आए हैं कि हिंदू संस्कृति और हिंदुत्व देश और उसके लोगों को पारिभाषित करता है। कुछ इसी सोच का उल्लेख नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में करते आए हैं। मगर भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में राष्ट्रीयता को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तौर पर देखने की कुछ सीमाएं भी हैं। यहां किसी खास संस्कृति के प्रभुत्व को धार्मिक अल्पसंख्यक अपनी पहचान और अस्तित्व के लिए खतरे के तौर पर देखते हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने अल्पसंख्यक समूहों को साफ संदेश दिया है कि चुनावी प्रक्रिया में उनके वोटों का अब उतना महत्व नहीं रह गया है, और उनके समर्थन के बगैर भी भाजपा पूर्ण बहुमत पा सकती है। इससे मुसलमानों और हिंदुओं में यह संकेत गया कि तमाम राजनीतिक दल द्वारा पहले की गई समुदाय आधारित गणनाओं की जरूरत नहीं थी।आज जरूरत इसकी है कि सरकार अल्पसंख्यकों को यह भरोसा दिलाए कि इस देश पर उनका भी बराबर हक है। बीते तीन महीनों में ऐसे कई मौके आए, जब प्रधानमंत्र्णी और उनके सहयोगी यह कर सकते थे। पुणे में मुस्लिम सॉफ्टवेयर इंजीनियर की हत्या और महाराष्ट्र सदन में शिवसेना के सांसद का रोजादार वेटर के मुंह में रोटी ठूंसने जैसी घटना का उपयोग भाजपा नेतृत्व मुसलमानों में पैठ बनाने में कर सकता था।
यह समझना होगा कि आबादी के एक बड़े तबके को दरकिनार करने की कोशिश देश के लिए अच्छी नहीं। इसके अलावा एक बड़ा बदलाव गवर्नेंस की कैबिनेट पद्धति में हो रहा है, जो अध्यक्ष्णीय प्रणाली में तब्दील होती दिख रही है। गुजरात के मुख्यमंत्र्णी रहते हुए नरेंद्र मोदी की यही शैली रही है। इसके अलावा प्रधानमंत्र्णी कार्यालय का बढ़ता प्रभुत्व, कैबिनेट सचिवालय का कम होता महत्व, नतीजतन नौकरशाही का बढ़ता प्रभाव व मंत्रियों के राजनीतिक प्रभाव में कटौती, ये कुछ ऐसी प्रवृत्तियां हैं, जो पहले भी इंदिरा गांधी के समय में देखी जा चुकी हैं। मगर जिस तरह कैबिनेट की बैठकें स्वतंत्र विचार के बजाय महज निर्देश ग्रहण करने का मंच बन गई हैं, उससे कैबिनेट की भूमिका का, और अंततरू पूरी राजनीतिक प्रक्रिया का क्षय होता दिख रहा है। नरेंद्र मोदी मानते हैं कि सहमति आधारित दृष्टिकोण से सरकार के कामकाज में कुशलता को बढ़ावा नहीं मिल सकता। उनके मुताबिक, निरंकुश व्यवस्था के जरिये ही सरकारी तंत्र से भ्रष्टाचार को दूर रखा जा सकता है।
भाजपा पहले ही एक पीढ़ीगत बदलाव कर चुकी है। हालांकि इसके पक्ष-विपक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं, पर इससे इन्कार नहीं कि उदारता मोदी की पहचान नहीं है। पर भाजपा की पुरानी पीढ़ी को भी, चाहे वह लालकृष्ण आडवाण्णी हों या मुरली मनोहर जोश्णी, समझना चाहिए कि उनका समय खत्म हो चुका है। अलबत्ता पचहत्तर से अधिक उम्र के लोगों को सक्रिय राजनीति से बाहर करने पर जोर एक नजीर की तरह लगता है। कया भारत भी चीन की तरह हर पांच-दस साल में पीढ़ीगत राजनीतिक बदलाव की राह पर चल पड़ा है?

कहीं हो न जाए मर्यादाओं की अनदेखी


दिल्ली में जो आजकल हो रहा है, वह नहीं होना चाहिए। जब हम या आप क्षमता नहीं होते हुए किसी चीज को पाने की कोषिष करते हैं, तो जाहिर है कि अनैतिक आचरण करते हैं। दिल्ली में सरकार के गठन को लेकर जिस प्रकार की कवायद हो रही है, उसने कई सवाल खड़े किए हैं। उस पर आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल का स्टिंग। जाहिर है जनता के मन में कई प्रकार के सवालों का उठना लाजिमी है।
असल में, सरकार का गठन कौन करे, लोकतंत्र में यह फैसला जनता मतदान के जरिये करती है। परंतु, सरकार गठन के तरीके पर जनता का अख्तियार नहीं होता। हां, उसे यह भरोसा होता है कि लोकतंत्र में सरकार गठन के लिए भी नियम-कायदे हैं, सो उनका पालन किया जायेगा। मुश्किल तब खड़ी होती है जब किसी एक दल के पक्ष में स्पष्ट जनादेश न हो। भारत जैसे बहुदलीय लोकतंत्र में ऐसा होना हरचंद संभव है। इसलिए अहम सवाल यह है कि क्या ऐसी स्थिति में सरकार बनाने में जुटे दल स्थापित मर्यादाओं की अनदेखी करेंगे? और, अगर ऐसी अनदेखी हो, तब इन मर्यादाओं की बहाली का दायित्व कौन संभालेगा?
दिल्ली में सरकार गठन को लेकर खींचतान से झांकती विद्रुपताओं की असल वजह किसी व्यक्ति या पार्टी में नहीं, बल्कि सरकार गठन से जुड़ी मर्यादाओं की बहाली और उसकी निगरानी से जुड़े तंत्र की विफलताओं में ही तलाशी जानी चाहिए। जिस पार्टी (भाजपा) ने दिल्ली विधानसभा में सर्वाधिक सीटें जीतीं, उसने जनादेश के बाद पूर्ण बहुमत नहीं होने का हवाला देते हुए स्वयं को सरकार गठन या जोड़-तोड़ की राजनीति से दूर रखा। लेकिन अब एक स्टिंग में उसी पार्टी के एक नेता को सरकार गठन के लिए विधायकों की बोली लगाते देखना-सुनना दुखद है। उधर, जिस पार्टी (आप) ने काफी हिचक के बाद सरकार बनायी और फिर जिम्मेवारियों से कन्नी काटते हुए बेहिचक इस्तीफा दे दिया, वह अब खुद को सरकार गठन की मर्यादाओं की प्रवक्ता के तौर पर पेश कर रही है।
दिल्ली के उप-राज्यपाल के पास किसी पार्टी ने बहुमत की दावेदारी या सरकार गठन के आमंत्रण के लिए कोई अनुरोध नहीं किया है और पहले गठित सरकार का हश्र उनके सामने है, फिर भी वे सरकार गठन के मोरचे पर सक्रिय हो गये हैं। राष्ट्रपति के फैसले का अभी इंतजार है। उधर, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई व्यवस्था देने से इनकार कर दिया है। दिल्ली में सरकार बनाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार हफ्ते का समय दिया है। केंद्र सरकार ने मंगलवार को कोर्ट को बताया कि ये मामला फिलहाल राष्ट्रपति के पास है। सरकार उनके आदेश का इंतजार कर रही है। कोर्ट ने सरकार को ये मोहलत देते हुए विधायकों की खरीद-फरोख्त की खबरों पर चिंता जताई। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में विधायकों की खरीद-फरोख्त पर चिंता जताई लेकिन चूंकि मामला राष्ट्रपति के पास है इसलिए चार हफ्तों का समय देना उचित समझा। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता आम आदमी पार्टी ने एक स्टिंग ऑपरेशन का हवाला देते हुए विधायकों की खरीद-फरोख्त का मामला उठाया और दिल्ली में जल्द चुनाव कराने की मांग की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभी राष्ट्रपति की राय का इंतजार करना चाहिए और इन आरोपों पर अगली सुनवाई में विचार किया जाएगा। उधर सुप्रीम कोर्ट के बाहर भी सरकार बनाने को लेकर बीजेपी और आम आदमी पार्टी में जंग जारी है।
यह चैतरफा बेचारगी की सूरत है, जिसका संकेत साफ है कि ऐसी स्थिति में सरकार गठन की मर्यादाओं की रक्षा को लेकर सर्वसम्मति से कोई रास्ता तलाशा जाये। सिर्फ दलबदल कानून या राज्यपाल के विवेक के भरोसे रह कर यह मान लेना कि सरकार गठन से जुड़ी मर्यादाओं का पालन हो जायेगा। एक ख्याली पुलाव ही बना रहेगा।

Friday, 5 September 2014

नहीं है अच्छी परंपरा

कहने और करने में किस प्रकार का अंतर होता है, यह कोई फिलहाल दिल्ली में आकर देखे। दिल्ली की राजनीति में जिस प्रकार से भाजपा की ओर से तमाम राजनीतिक षुचिता को धत्ता बताया जा रहा है, वह किसी भी रूप से अच्छा नहीं कहा जा सकता है। जो पार्टी एक बार पर्याप्त आंकड़ा नहीं होने के कारण सरकार बनाने से मनाही कर चुकी है, उसमें तीन सीट और कम होने के बाद किस प्रकार वह सरकार बनाएगी, इसका जवाब तलाषने में अपने आप कई और सवाल उठ खड़े होते हैं। 
असल में, जिस प्रकार से खबरें आ रही हैं उसके आधार पर दिल्ली में एक बार फिर से सरकार बनाने की कवायद शुरू हो गयी है। सरकार गठन को लेकर दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को चिट्ठी लिखी है। एक अंग्रेजी अखबार के अनुसार नजीब जंग ने राष्ट्रपति को पत्र लिख कर दिल्ली में सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी पार्टी को आमंत्रित करने के लिए इजाजत मांगी है। इधर खबर यह भी है कि इस मामले को लेकर राष्ट्रपति ने गृह मंत्रालय को चिट्ठी लिखी है। गृह मंत्रालय ने भी पुष्टि कर दी है कि राष्ट्रपति का पत्र उसे मिला है। केंद्र सरकार ने राजनीतिक चर्चा के बाद इस मामले पर विचार करने की बात कही है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के पास सबसे ज्यादा 29 विधायक है। आम आदमी पार्टी के पास 27 विधायक हैं। कांग्रेस के 8 विधायक और अन्य 3 हैं। दिल्ली में सरकार गठन के लिए कम से कम 34 विधायकों की आवश्यकता है।
दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को दिल्ली में सरकार बनाने के लिए रिपोर्ट भेजी थी। इस रिपोर्ट में उन्होंने नई सरकार बानाने के लिए कुछ विकल्पों को रखा था। दिल्ली के एलजी (लेफ्टिनेंट गवर्नर) द्वारा सुझाए गए विकल्पों में से एक विकल्प बीजेपी को भी रास आ रहा है। शुक्रवार को बीजेपी ने कहा कि गोपनीय बैलट के माध्यम से दिल्ली के विधायक नए मुख्यमंत्री का चुनाव करेंगे। बीजेपी ने कहा कि गोपनीय बैलट के माध्यम से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में नई सरकार बनाने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। बीजेपी को लगा रहा है कि गोपनीय बैलट दिल्ली में सरकार बनाने का सबसे सुरक्षित जरिया हो सकता है। प्रोविजन ऑफ नैशनल कैपिटल टेरिटरी ऐक्ट के तहत गोपनीय बैलट का विकल्प एलजी ने राष्ट्रपति को भेजा था। इसमें दलबदल विरोधी कानून और पार्टी विप काम नहीं करता है।गोपनीय बैलट में किसी भी पार्टी के विधायक को अपने मन के हिसाब से वोट करने का रास्ता खुल जाएगा। ल्ली में ज्यादतर विधायक फिलहाल चुनाव में नहीं जाना चाहते हैं। चुनाव से बचने का एक ही उपाय है कि दिल्ली में नई सरकार बने। इस सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब भाजपा के पास संख्याबल नहीं है तो उपराज्यपाल ऐसी पहल क्यों कर रहे हैं?
केंद्र में सरकार के गठन के बाद से ही सूबे में सरकार के गठन की चर्चा लगातार हो रही है। महत्वपूर्ण यह है कि सबसे पहले कांग्रेस विधायकों के सहयोग से ही भाजपा द्वारा सरकार बनाने की चर्चा थी लेकिन करीब डेढ़-दो महीने बीतने के बावजूद जब सरकार नहीं बनी तो कांग्रेस के सभी विधायक एक साथ सामने आए और उन्होंने भाजपा से सहयोग करने संबंधी तमाम कयासों को खारिज कर दिया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली आदि नेता बार-बार यह कहते रहे हैं कि कांग्रेस का कोई भी विधायक किसी भी कीमत पर भाजपा अथवा आम आदमी पार्टी को सरकार बनाने के लिए समर्थन नहीं देगा। पार्टी द्वारा आयोजित किए जा रहे कार्यक्रमों में कुछ विधायक पहुंच भी रहे हैं। 
सनद रहे कि दिल्ली विधानसभा के भविष्य के सवाल पर आगामी नौ सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। केंद्र सरकार को अदालत को बताना है कि दिल्ली में सरकार बनाने की क्या संभावनाएं हैं। इस दिशा में क्या कोशिशें हुई हैं। आम आदमी पार्टी की याचिका पर अदालत में सुनवाई इसी मुद्दे पर हो रही है कि आखिर लंबे समय तक विधानसभा को निलंबित रखने का भला क्या औचित्य है। अब जबकि अदालत में सुनवाई के महज चार दिन बाकी हैं, उपराज्यपाल जंग ने राष्ट्रपति को दिल्ली की सियासी स्थिति पर रिपोर्ट भेजी है और लिखा है कि दिल्ली में सरकार बनने की संभावनाएं अभी मौजूद हैं, लिहाजा विधानसभा में सबसे बड़े दल भाजपा को सरकार बनाने के लिए निमंत्रित किया जा सकता है। राष्ट्रपति ने संबंधित रिपोर्ट पर गृह मंत्रालय की टिप्पणी मांगी है।

Tuesday, 19 August 2014

देश को 21वीं सदी में ले जाने का मिशन



राजनीति से राजीव रत्‍न गांधी को विरक्ति-सी थी। वे स्‍वच्‍छंद जीवन जीने के आदी थे, तभी तो वे आकाश की ऊंचाईयों में वायुयान उड़ाते थे। लेकिन परिस्थितियों ने उन्‍हें देश की राजनीति के ‘कॉकपिट’ में बिठा दिया और यहां भी उन्‍होंने अपने पेशे से पूरी ईमानदारी बरती और देश को प्रगति के आकाश में परवान चढ़ाया। उनका कहना था- ‘मैंने एक सपना देखा है, महान भारतवासियों का सपना, जो आत्‍मविश्‍वास के साथ, भविष्‍य की तरफ आगे बढ़ रहे हैं। मैं एक ऐसे भारत का सपना देखता हूं, जो अपने को हर क्षेत्र में उत्‍कृष्‍ट सिद्ध करता है।’ यह पुस्‍तक उन्‍हीं के महान जीवनदर्शन पर आधारित है। इसके माध्‍यम से पाठक और अधिक निकट से राजीव गांधी के जीवन-वृत्‍त के दर्शन कर सकते हैं।
1984 में गहरे राजनीतिक उथल-पुथल के बीच जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, उन्होंने करीब डेढ़ दशक पहले ही भारत को 21वीं सदी में ले जाने का सपना दिखाया. देश को तकनीकी रूप से सशक्त बना कर उन्होंने पंडित नेहरू द्वारा रखी आधुनिक भारत की नींव में एक नया आयाम जोड़ा. इतना तो जरूर मानना होगा कि नेहरू के बाद भारत के विकास मॉडल में सबसे बेहतर कीर्तिस्तंभ राजीव गांधी ही थे, जिन्होंने देश को तकनीकी रूप से मजबूत बनाने की तकरीबन मुकम्मल कोशिश की. राजीव गांधी के विकास मॉडल और उनकी राजनीति पर बात करते हुए उन संदर्भो में दो महत्वपूर्ण घटनाओं से होकर गुजरना पड़ेगा. एक तो यह कि 1984 में जो राजीव गांधी को जो भारी बहुमत मिला था, उसमें निश्चित रूप से राजीव गांधी का सशक्त नेतृत्व था और दूसरा यह कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश एक भावुकता के दौर से गुजर रहा था, इन दोनों पहलुओं से होकर ही कांग्रेस ने एक बड़ी ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी. राजीव गांधी के अंदर कहीं न कहीं एक नौजवान प्रधानमंत्री बनने का सपना था. इसलिए जब वे प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने खुद का बहुत ईमानदाराना इस्तेमाल किया. उन्होंने अपने नौजवान सपने के नजरिये को न सिर्फ देश से रूबरू कराया, बल्कि अपनी नेतृत्व शक्ति से दुनिया के बेहतरीन दिमागों को भारत में जमा किया और फिर उन दिमागों की मदद से देश को 21वीं सदी में ले जाने के मिशन को पूरा करने के लिए दिल-ओ-जान से जुट गये.
राजीव गांधी ने दो बड़े पैमाने पर आधुनिक भारत के दरवाजे खोले. एक है दूरसंचार (टेलीकम्युनिकेशन सेक्टर) और दूसरा है सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी सेक्टर). खास तौर पर दूरसंचार के क्षेत्र में उनके योगदान को भारत के आधुनिक इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकेगा. उनके राजनीतिक योगदान को इस नजरिये से देखा जाये, तो कुछ चीजें स्पष्ट हो जायेंगी. जब वे कहते थे कि भारत को 21वीं सदी में ले जाना है और बहुत ही आधुनिक देश की स्थापना करनी है, तो कुछ लोग उन पर हंसते थे. 1984 का वह दौर था, जब लोग हंसते हुए कहते थे कि भई!  स्वर्गीय इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी के बेटे, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की आज 67वीं जयंती है. 20 अगस्त, 1944 को जन्में राजीव गांधी का पूरा नाम राजीव रत्न गांधी था. 3 जून, 1980 को राजीव के छोटे भाई संजय गांधी की दुर्घटना में मृत्यु हुई तब उन्होंने अपनी मां को सहयोग देने के लिए राजनीति में प्रवेश किया. वहीं 1984 में मां की हत्या ने उन्हें पूर्ण रूप से कांग्रेस के प्रति समर्पित नेता बना दिया.
राजीव गांधी एक नायक थे। देश के ऐसे नायक जो विश्व-पटल पर तेज़ी से अपनी जगह बनाते हुए नज़र आए। देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री के तौर पर लोकप्रिय राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय मंचों की शोभा भी होते थे। देश को आज भी अपने लोकप्रिय नेता की कमी महसूस होती है। वैसे नेता, जिस संचार-क्रांति की वजह से ख़ास तौर पर याद किया जाता है।
इंदिरा गांधी और फिरोज़ गांधी की सबसे बड़ी संतान ने दून स्कूल से शिक्षा हासिल करने के बाद उच्च-अध्ययन के लिए भारत छोड़ दिया था। विदेश प्रवास के दौरान ही 1965 में सोनिया माइनो से उनकी मुलाक़ात हुई जिनसे माइनो परिवार के शुरुआती विरोध के बावजूद उन्होंने 28 फरवरी 1968 को विवाह किया। राजीव राजनीति में क़दम रखने के इच्छुक नहीं थे लेकिन अनुज संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में असमय मौत के बाद परिस्थितियों से मजबूर होकर उन्होंने 11 मई 1981 को कांग्रेस (ई) की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की और 15 जून 1981 को उत्तर प्रदेश के अमेठी संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए जहाँ से मौजूदा समय में उनके पुत्र राहुल गांधी सांसद हैं। इससे पहले इंडियन एयरलाइन्स के पायलट के तौर पर काम कर चुके राजीव को दो फरवरी 1983 को कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया गया। 31 अक्टूबर 1984 को उन पर भारी विपदा आई लेकिन देश की बागडोर संभालने की ज़िम्मेदारी भी मिली। उस दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई और देश का राजीतिक माहौल डाँवाडोल हो गया। ऐसे नाज़ुक़ वक़्त में राजनीति से अछूते राजीव के कंधे पर प्रधानमंत्री जैसे ज़िम्मेदार पद का बोझ पड़ गया जिसे उन्होंने आने वाले समय में बख़ूबी निभाया। उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल और शुरुआत की जिनमें संचार-क्रांति, कंप्यूटर क्रांति शिक्षा का प्रसार 18 साल के युवाओं को मताधिकार, लाइसेंस-परमिट राज की समाप्ति आदि शामिल हैं। राजीव ने कई साहसिक क़दम उठाए जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं। 21वीं सदी के भारत के बारे में राजीव के विचार स्पष्ट थे। उन्होंने कहा था कि भविष्य में होने वाले सभी परिवर्तनों को पहले से नहीं बताया जा सकता। इतिहास पूर्वनियोजित या पूर्वनिर्धारित नहीं होता। घटनाएँ इसलिए मोड़ लेती हैं कि व्यक्ति फ़ैसला लेता है। उन्होंने अपनी इस बात को पुष्ट करते हुए कहा था कि आइंस्टीन पदार्थ और ऊर्जा के बीच के संबंध को सामने लाता है। एक लेनिन, एक गांधी, एक माओ और हो-ची-मिन्ह क्रांति का नेतृत्व करता है। एक जवाहर लाल नेहरू अपना ही लोकतांत्रिक जज़्बा पूरे देश को दे देता है। असंभव संभव हो जाता है।
राजीव गांधी भारतीय राजनीति और कांग्रेस के इतिहास में ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने शायद सबसे पहले किसी सार्वजनिक मंच पर खुद सरकार में होते हुए सरकार में फैले भ्रष्टाचार पर अंगुली उठाई. देश में सरकारी घोटालों की असलियत को खुद अपने मुंह से स्वीकारने वाले युवा और कर्मठ नेता राजीव गांधी की आज जयंती है. आज चाहे कांग्रेस सरकार कितने ही घोटालों से घिरी हो लेकिन कांग्रेस के राज में कभी कमान राजीव गांधी जैसे नेता के हाथ में भी थी जिन्होंने अपने अल्पकाल के शासन में ही देश को ढेरों सपने दिखाए.
अभी तो 25-26 साल बचे हुए हैं, अभी तो सरकार के पांच साल की बात करिये, देश को अभी 21वीं सदी में ले जाने की बात बेमानी है. लेकिन, अगर आज के दौर को देख कर आप इतिहास के उन पन्नों को पलटें और उन पर गौर करें, तो आप पायेंगे कि राजीव गांधी के उस सपने पर लोगों का हंसना यह साबित करता है कि नेतृत्व का ईमानदार और दृढ़निश्चयी होना राजीव के लिए कितना मायने रखता था. यही वजह है कि उनके आधुनिक भारत के विकास के मॉडल ने एक आयाम स्थापित किया, जो उनसे पहले या बाद की पीढ़ियों में नजर नहीं आया. हालांकि, इंदिरा गांधी ने भी ग्रीन रिवोल्यूशन की मुहिम चलायी और खाद्यान्न की बेशुमार उपलब्धता से देश को आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन इमरजेंसी की विभीषिका ने उनके नेतृत्व पर एक तानाशाह का दाग लगा दिया. राजीव गांधी का जनता से सीधा जुड़ाव था, जो राजनीतिक नेतृत्व के लिए बहुत जरूरी होता है. मौजूदा कांग्रेस में इसी बात की कमी नजर आती है. यही वजह है कि कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में लगातार हाशिये पर जा रही है. यहां सबसे अहम बात यह है कि राजीव गांधी की प्रासंगिकता के मद्देनजर उन्हें सिर्फ याद करने से कांग्रेस या देश को कुछ भी हासिल नहीं होगा. जरूरत इस बात की है कि उनके जैसा कोई ठोस नेतृत्व उभर कर आये.



Monday, 18 August 2014

बातों को अधूरा छोड़ते मोदी


‘कांग्रेस का 60 वर्ष बनाम 60 महीना’ जैसे कुछ जुमले लोकसभा चुनाव के दौरान खूब चले। जनता ने भरोसा भी किया। अब न तो जनता के हिसाब से वे सफल हो पाए और न ही अपने वादों के हिसाब से। कम से कम मोदी सरकार के 100 दिन के कार्यकाल तो इसी ओर इशारा करते हैं। न तो महंगाई रूकी और न नौकरी की भरमार हुई। भ्रष्टाचार का शोर अभी भी सुनाई पड़ रहा है। सरकारी बाबओं का रवैया पहले जैसा ही रहा। हां, इतना जरूर है कि कई मौके पर स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़े सरकारी अधिकारियों से सीधा संवाद किया। अपने मातहत मंत्रियों और सांसदों को इस बात की विशेष हिदायत दे रखी है कि कोई भी अपने निकटतम संबंधी को अपना निजी कर्मचारी न बनाएं। पांच वर्षों के लिए चुनी गई किसी भी सरकार को उसके 100 दिन के लिए काम के आधार पर नहीं परखा जा सकता, लेकिन जिस तरह के अप्रत्याशित जनादेश के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी सरकार बनाई, उसमें इस सरकार के केवल एक माह, दो माह या सौ दिन का ही नहीं, बल्कि एक-एक दिन की समीक्षा होना स्वाभाविक ही है।  जो लोग यूपीए सरकार के दस वर्षों के कार्यकाल से अकुता गए थे, उन्होंने निगेटिव वोटिंग किया और नतीजा सबके सामने आया। 2002 के गुजरात दंगों के बाद मोदी इस सदी के सबसे विवादास्पद नेताओं में से एक रहे हैं।
हम मोदी सरकार के पहले सप्ताह की ही बात करें, तो कार्यकाल में पीएमओ में बहुत सारे कर्मचारी निजी स्तर पर उनसे पहचान बनाने में नाकाम रहे। कुछ ने तो बस मनमोहन को गाड़ी से उतरते और चढ़ते देखा, वहीं मोदी ने कार्यकाल संभालने के तीसरे दिन ही पीएमओ में चहलकदमी की और स्टाफ की वर्किंग और उनकी परेशानियों के बारे में जाना। पीएम का पद संभालने वाले दिन ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात। इसके अलावा, सार्क देशों के प्रतिनिधियों से मुलाकात। मोदी ने अपने काम करने के तरीके से बता दिया कि वह अहम मुद्दों पर देरी करने में भरोसा नहीं रखते और उन्हें किसी पूर्व तैयारी की जरूरत नहीं है। कुछ मामलों में नरेंद्र मोदी काफी जल्दबाजी में भी नजर आए। ट्राई के चेयरमैन रहे नृपेंद्र मिश्रा को पद संभालने के कुछ घंटे के अंदर ही आपातकालीन अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए अपना मुख्य सचिव बनाया। इसके लिए पीएमओ ने टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया एक्ट 1977 में विधेयक लाकर बदलाव किया गया। इस कदम की कुछ आलोचना भी हुई। आलोचक यह मानते रहे हैं कि यूपीए सरकार में कई पावर सेंटर थे। मोदी की कैबिनेट पर नजर डालें तो पता चलता है कि उन्होंने ऐसी कोई गुंजाइश बाकी ही नहीं छोड़ी। उनके हर कदम की राजनीतिक समीक्षा करने पर यही पता चलते है कि मोदी की अपनी सरकार के सर्वेसर्वा हैं। पिछली सरकार में मंत्रियों की नियुक्ति बहुत कुछ उनके अनुभव और कद के मुताबिक की गई, लेकिन मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में कुछ नए लोगों को मौका देकर नई शुरुआत की। निर्मला सीतारमण, स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर समेत कई नाम इनमें शामिल हैं। पीएम के चुनाव की आलोचना भी हुई।
इसी के बीच सवाल यह भी उठता है कि देश की जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कौन-सी अपेक्षाएं रखती हैं ? राष्ट्रीय सुरक्षा, बढ़ती हुई महँगाई, सड़ते हुए अनाज भंडार, एक अनिश्चित मॉनसून की तैयारी, सूखा व बाढ पीडि़तों की राहत व्यवस्था, बढता राजस्व घाटा और सबसे ज्यादा औद्योगिक विकास को प्रेरित करना। माना यह जा रहा था कि शपथ ग्रहण समारोह की स्याही शायद सूख भी न पाये और प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमण्डल के सदस्यांे को इन अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रयासरत होना पड़ेगा, लेकिन ऐसा हो न सका। ये वे अपेक्षाएं हैं, जिन्हें इन नेताओं ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार दुहराकर जनता को इसकी पूर्ति के लिए आश्वस्त कर दिया है।
प्रधानमंत्री ने हाल के कुछ महीनों के दौरान देश में तेजी से बढ़ी सांप्रदायिकता, खासतौर पर पश्चिमी यूपी के दंगों सहित कई राज्यों में हुई हिंसक झड़पों, उसके कारणों और जिम्मेवार लोगों पर कोई ठोस टिप्पणी नहीं की है। यह बात जोर देकर कही है कि अगले दस वर्षो के लिए जातिवाद-संप्रदायवाद जैसे जहर का स्थगन जरूरी है। सवाल है कि सिर्फ दस साल के लिए स्थगन ही क्यों? इनका समूल नाश क्यों नहीं? प्रधानमंत्री के संबोधन में उन मुद्दों को उतनी तवज्जो नहीं मिली, जिनका चुनावों के दौरान उन्होंने उल्लेख किया। कालाधन की वापसी के लिए ठोस कदम, बड़े स्तर पर रोजगार-सृजन, महंगाई और भ्रष्टाचार पर निर्णायक अंकुश जैसे वायदों पर सरकार ने अब तक क्या किया और आगे क्या रणनीति है, संबोधन से लगभग गायब थे। शिक्षा और सबके लिए चिकित्सा-सेवा सहित ऐसे तमाम वायदों को पूरा करने के लिए सरकार ने अब तक क्या कुछ किया? क्या विदेशी बीमा कंपिनयां देश के आम लोगों को चिकित्सा-सुविधा का कवच देंगी?
अब एक महीना नहीं, सौ दिन होने वाले हैं। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वाकई अच्छे दिन आ रहे हैं, जैसा सरकार का वादा था। सरकार ने 100 दिन के जिस एजेंडे की बात की थी क्या उस पर काम शुरू कर लिया है। वैसे आज के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं।एजेंडे के नाम पर बैठकों का दौर जारी है। शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू कहते हैं कि हम बीच में नहीं बतायेंगे। सभी मंत्री 100 दिन के एजेंडे पर अच्छा काम कर रहे हैं। कुछ कड़े फैसले लेनें पड़ रहे हैं क्योंकि विरासत में कुछ भी ठीक नही मिला है।पहले प्रधानमंत्री ने कहा था कि अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए कुछ कड़वी दवाएं देनी होंगी। उसका नतीजा अब आने लगा हैं। ठीक एक महीने बाद यानी 25 जून से रेल किराया 14.2 फीसदी बढा दिया गया। चीनी पर आयात शुल्क 15 फीसदी से बढ़ाकर 40 फीसदी  शुल्क कर दिया गया। नतीजे में चीनी थोक भाव में एक-दो रुपये महंगी हो गई। लेकिन जल संसाधन मंत्री उमा भारती कहती हैं कि होमियोपैथी दवा ऐसी है जो शुरू में मर्ज बढाती है, लेकिन इसका असर अलग तरह से होता है और बाद में पूरी तरह बीमारी खत्म हो जाती है। वैसे फिलहाल मोदी सरकार के 100 दिन के एजेंडे में कई ब्रेक लग गए हैं। खराब मॉनसून के अंदेशे ने प्याज खाने के तेल और दाल के दाम बढा  दिए। कृषि और खाद्य संस्करण राज्य मंत्री संजीव बालियान के मुताबिक, हम ऐसी प्राकृतिक मुसीबतों पर जल्द ही काबू पा लेंगे और अच्छे दिन आने में कोई रोक नहीं लग सकती। लेकिन, हकीकत यह है कि महंगाई फिलहाल पांच महीनों के सबसे ऊंचे स्तर पर है और अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खस्ता है तो बढ़ी हुई महंगाई और घटे हुए मॉनसून के बीच सबको अब भी अच्छे दिनों के शुरू होने का इंतजार  ही है।
भाजपा के समर्थक ही नहीं, अनेक गैर-भाजपाई लोग भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 15 अगस्त के भाषण की तारीफ करते मिल रहे हैं। उनमें ज्यादातर इस बात की तारीफ कर रहे हैं कि उनका भाषण लिखा हुआ नहीं था, उसमें अद्भुत जोश था, जमीनी-अनुभवों की रोशनी थी, बड़े वायदे नहीं किये पर जो बातें कहीं, वे बहुत सारगर्भित थीं।