Saturday, 24 May 2014

क्यों बढ़ रहे हैं तलाक ?



सात फेरों में लिया गया जनम जनम का बंधन अब दरकने लगा है, परंपराए टूटने लगी है, संस्कार बिखरने लगे हैं। जी हां महानगर तलाक की राजधानी बनकर उभर रहे हैं। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसे महानगरों में हर रोज हजारों तलाक होते हैं। मुंबई और दिल्ली जैसे महानगर में तो रोजाना 10 हजार से ज्यादा तलाक होते हैं। जबकि देश में हर 100 वीं शादी का अंत तलाक पर होता है। आज के आधुनिक समाज में दंपत्तियों के बीच मन मुटाव और फिर तलाक काफी आम हो गया है। जिसे कभी बुरा माना जाता था उसे आज एक अच्छा निर्णय कहा जाता है।यह कहना गलत नहीं होगा कि जीवन की जितनी बड़ी सच्चाई शादी है उतना ही बड़ा सच तलाक भी है। हालांकि, इसे लेने से पहले लोग पर्सनल फाइनेंस के बारे में बेहद कम सोचते हैं।  बदलती जीवनशैली और आजाद सोच के कारण शादियों का अंत तलाक के साथ हो रहा है। करीब 5 साल पहले 1000 शादियों में 1 तलाक का मामला आता था और अब प्रत्येक 1000 शादियों में यह मामले 13 हो चुके हैं।
देश में तलाक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कई बार तो अजीबोगरीब वजह बताते हुए तलाक मांगा जाता है। वैसे, शारीरिक हिंसा तलाक का सबसे बड़ा कारण है। जबकि शादी के बाद भी पर पुरुष या स्त्री से शारीरिक संबंध, नशे की लत, जीवन साथी  को लेकर बहुत अधिक पजेसिव (उस पर अधिकार जमाना) होने जैसे कारण भी रिश्तों में दरार के लिए जिम्मेदार हैं। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, जैसे महानगरों में तलाक की जो दर है, वह छोटे शहरों से कहीं ज्यादा है। मुंबई और दिल्ली जैसे महानगर तलाक की ‘राजधानी’ बनकर उभर रहे हैं। एक आकलन के मुताबिक इन दोनों शहरों में हर साल 10 हजार से अधिक तलाक होते हैं। जबकि देश में होने वाली हर 100वीं शादी का अंत तलाक पर जाकर होता है। केरलाज मेंटल ब्लॉक रिपोर्ट के अनुसार, ‘देश की कुल आबादी में तलाक का प्रतिशत 1.1 है तो केरल में यह दर 3.3 फीसदी है। केरल सबसे अधिक साक्षरता वाला राज्य है। यहां पिछले एक दशक में तलाक की दर 350 फीसदी बढ़ी है। जबकि कृषि आधारित राज्य, पंजाब और हरियाणा में एक दशक में 150 फीसदी की बढ़त देखने को मिली है।’ राष्ट्रीय स्तर पर बीते पांच-छह सालों में तलाक की दर सौ फीसदी बढ़ गई है।
एक-दूसरे पर विश्वास की कमी  तलाक की सबसे बड़ी वजहों में से एक हैं। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो फेसबुक जैसी सोशल साइटों पर फर्जी आईडी के माध्यम से अपने हमसफर पर नजर रखते हैं। फर्जी प्रोफाइल से खुद की ही पत्नी या पति से चैट किया जाता है और नतीजा तू-तू, मैं-मैं से शुरू होकर तलाक तक पहुंच जाता है। शारीरिक हिंसा तलाक का सबसे बड़ा कारण है। एकल परिवार, शादी के बाद भी दूसरे पुरुष या स्त्री से शारीरिक संबंध, नशे की लत, जीवन साथी को लेकर बहुत अधिक पजेसिव होने जैसे कारण भी रिश्तों में दरार के लिए जिम्मेदार हैं। कई बार तलाक के पीछे अजीबोगरीब कारण होते हैं। अब तक तलाक की अर्जी के बाद कोर्ट पति पत्नी को थोड़ा वक्त देता था ताकि शादी को बचाया जा सके लेकिन नए सुधार के बाद अब तलाक की अर्जी देने के बाद महीनों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
हाल ही में केन्द्रीय केबिनेट ने हिन्दुओं में तलाक को सरल बनाने के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन को मंजूरी दी। तलाक के मामलों में जल्द निपटारा करने के लिए सरकार पर हिन्दू मैरिज एक्ट में संशोधन करने का दबाव था जिसे अंततरू सरकार ने स्वीकार कर लिया। संशोधन के अनुसार अगर पत-िपत्नी परस्पर सहमति से एक-दूसरे से अलग रहना चाहते हैं तो ऎसे मामले को अधिक समय तक बिना किसी वजह के लंबित नहीं रखा जा सकेगा। उन्हें शीघ्र अलग कर दिया जाएगा। इस संशोधन के साथ ही प्रश्नों के असंख्य चेहरे उभरते हैं और गौर से देखें तो 99 प्रतिशत चेहरे भय, पीड़ा, तकलीफ, बिछोह, टूटन और अलगाव की ही त्रासदी बयान करते हैं। कहीं गलत बंधन की वजह से छुटकारा पाने की तीव्र इच्छा होगी तब भी जब छुटे तब कितने-कितने टूटे यह उनका ही मन जानता है।
तलाक के कारण पर्सनल फाइनेंस के सभी कारकों पर प्रभाव पड़ता है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि तलाक सर्वसम्मति के साथ हो रहा है तो सलाहकार दोनों जीवन साथियों के लिए मैत्रीपूर्ण समझौता बनाते हैं। इस समझौते पर पहुंचने के बाद कानूनी खर्चो के बोझ को हलका कर दिया जाता है।तलाक के कारण फाइनेंशियल प्लानिंग के संबंध में बच्चे के संरक्षण पर असर नहीं पड़ना चाहिए। यदि किसी ने श्चाइल्ड प्लानश् ले रखा है और इसे संयुक्त रूप से फंडिड किया जा रहा है तो उसे बंद नहीं करना चाहिए। बंद करने से आप पर जुर्माना लग सकता है।  परिवार की सभी परिसंपत्तियों जैसे प्रॉपर्टी, इंवेस्टमेंट, इंश्योरेंस आदि की एक सूची बनाएं। कानूनी सलाह लेने से पहले यह सूची मददगार साबित हो सकती है। यदि दंपत्ति किसी समझौते पर नहीं पहुंचे हैं तो भागीदारी के हिसाब से परिसंपत्तियों को प्रत्येक जीवनसाथी के बीच बांटना चाहिए। संयुक्त जिम्मेदारी को व्यक्तिगत कर्ज से अलग रखना चाहिए।

राजनीति में वकीलों का दम

देश में करियर बनाने के विकल्पों पर बात हो, तो शायद ही कोई युवा होगा जो ये कहेगा कि हमें तो वकील बनना है। ऐसी हालत तब है जब देश में कम से कम 900 विधि (यानी लॉ) कॉलेज हैं और 14 उच्चस्तरीय केंद्रीय विधि संस्थान हैं। अगर कुछ साल पहले (दस साल) तक की बात करें तो लॉ कॉलेजों का ये आंकड़ा देश में मौजूद कुल इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेजों की संख्या पर भी बीस पड़ता था...(इन दो विभागों से तुलना इसीलिए क्योंकि देश में कैरियर के तौर पर इन्हीं दो विकल्पों को रामबाण माना जाता रहा है)। लेकिन समय के साथ मान्यताएं बदली हैं। लोग अब अपने बच्चों को वकील भी बना रहे हैं। इसके पीछे एक कारण राजनीति भी है। कई वकील जितना नाम वकालत में नहीं कमा पाए, उससे अधिक उनके नामों की चर्चा लोगों की जुबान पर है।
गौर करने योग्य यह भी है कि देश को आजाद कराने में वकीलों ने अहम भूमिका निभाई थी। आज भी समाज को आगे बढ़ाने तथा समाज को जागृत करने में वकील अपनी भूमिका निभा रहे हैं। देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने और आजादी के आंदोलन में वकीलों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, उनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। आंदोलन के सूत्रधार महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू ने विदेश से कानून की पढ़ाई वकील बनने के लिए ही किया था। दोनों ने लंदन, इलाहाबाद और मुंबई में प्रैक्टिस भी शुरू कर दी थी, लेकिन देश को आजाद कराने के लिए उन्होंने कांग्रेस से जुड़कर काम  करना शुरू किया।
आज भी राजनीति में दर्जनों वकील संगठन और सरकार में अच्छा खासा दखल रखते हैं, लेकिन उन्होंने कभी उस व्यवसाय के लिए कोई ठोस काम करने की पहल तक नहींकी, जिसके कारण उनकी राजनीति में पकड़ बनी। राजनैतिक दलों ने जिस मकसद से वकीलों को संगठन से जोड़ा था वह काफी हद तक पूरी हुई, लेकिन उसकेबाद वकीलों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गई कि उन्होंने सत्ता के गलियारे में इतनी पैठ बना ली है कि आने वाले समय में राजनीति में उनके वर्चस्व को तोड़ पाना मुश्किल है। बीते कार्यकाल के दौरान राजग ने राम जेठमलानी और उसके बाद अरुण जेटली को यह सोच कर कानून मंत्री बनाया था, कि दोनों सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील हैं और कननू को जानने वाले हैं। इसलिए कुछ ऐसा करेंगे, जिससे देश की न्याय व्यवस्था में सुधार आएगा, लेकिन दोनों ने कोई ऐतिहासिक फैसला करने की जगह न्यायिक प्रक्रिया में उलटफेर करने में ही समय बिता दिया। यूपीए ने हंसराज भारद्वाज को इसलिए कानून मंत्री बनाया कि वे कानून के जानकार हैं, लेकिन उन्होंने भी वैसा ही काम किया, जैसे दूसरे कांग्रेसी मंत्री कर रहे हैं। भाजपा में रविशंकर प्रसाद और सुषमा स्वराज दो बड़े नेता भी वकालत से जुड़े रहे हैं। कांग्रेस में कपिल सिब्बल को पार्टी ने मंत्रिमंडल में जगह देकर पार्टी के प्रति उनकी वफादारी का इनाम दे दिया है। अभिषेक मनु सिंघवी और मनीष तिवारी को पार्टी ने प्रवक्ता बना कर उनको महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है। मनीष को टिकट देकर उनके काम का भी इनाम दे दिया गया है। एक जमाने में कांग्रेस ने आरके आनंद को चुनाव लड़वाया था और पार्टी में उन्हें बहुत ताकतवर माना जाता था, लेकिन नरसिम्हा राव के करीबी होने के कारण इस समय वे संगठन में हाशिए पर हैं, लेकिन माना जा रहा है कि इस समय आरके आनंद मायावती के करीब आ चुके हैं और आने वाले समय में बसपा में शामिल हो सकते हैं। बसपा में सतीश चंद्र मिश्र बसपा सुप्रीमो के बाद सबसे ताकतवर स्थिति में माने जाते हैं। वकीलों को बड़े पैमाने पर जोडने के लिए कांगे्रस और भाजपा ने जिला स्तर तक अपने-अपने प्रकोष्ठ का गठन किया है। इसके पीछे पार्टी की मंशा यह रहती है कि केंद्र में सुप्रीम कोर्ट, राज्यों में हाईकोर्ट और जिलों में जिला अदालतों में काम करने वाले वकीलों को संगठन से जुड़ जाने पर एक तो संगठन को आराम से अदालती काम करने वाला वकील मिल जाएगा और दूसरा इसके माध्यम से पढ़े-लिखे लोगों में पार्टी का आधार खड़ा हो जाएगा, लेकिन दिल्ली में संगठन का काम करने वाले वकील पार्टी से सबसे ज्यादा फायदा ले जाते हैं। कई बार राज्यों में काम करने वाले वकीलों का भी नंबर लग जाता है, लेकिन जिलों में काम करने वाले अधिकांश वकीलों को कुछ नहीं मिल पाता है। छोटे और मझोले नेताओं की तरह वे न तो वकालत कर पाते हैं और न ही नेता बन पाते हैं।
ऐसा नहीं है कि यह नया सिलसिला है। भारतीय राजनीति में वकील नेताओं का शुरुआत से ही बोलबाला रहा है। इस समय भी राजनीति में वकील ही छाए हुए हैं। लोकसभा के मौजूदा 544 सदस्यों में से 76 वकालत के पेशे से जुड़े हुए हैं। राज्यसभा के 243 सदस्यों में 39 वकील हैं। 15वीं लोकसभा के अध्यक्ष मीरा कुमार के साथ ही यूपी सरकार में रक्षा मंत्री ए के एंटनी, वित्त मंत्री पी चिदंबरम, गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे, पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली, कानून मंत्री कपिल सिब्बल, वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा, रेल मंत्री मल्लिकार्जुन खडगे और विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद वकालत करते रहे हैं। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय से संबद्ध राज्यमंत्री वी नारायण स्वामई और सूचना व प्रसारण राज्यमंत्री मनीश तिवारी भी वकील रहे। बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायवती और और उनके नंबर दो सतीश मिश्र भी एडवोकेट हैं। राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने भी वकालत की पढाई  की। इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिस्ठ अधिवक्ता केशरीनाथ त्रिपाठी ने भाजपा की सरकार में मंत्री पद के अलावा विधानसभा अध्यक्ष जैसा अहम पद संभाला। बतौर विधानसभा अध्यक्ष वह सूबे ही नहीं देश की राजनीति में भी चर्चित रहे और राजनीति के चाणक्य माने गए।
कुछ समय पहले तक कामयाब लोग राजनीति में नहीं आना चाहते थे, लेकिन अब बदलाव की बयार चल रही है। इन दिनों गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के लोग, पत्रकार, बड़ी कंपनियों से जुड़े लोग, पूर्व नौकरशाह, आईआईएम-आईआईटी से पढ़े-लिखे पेशेवर, खिलाड़ी, वकील, बॉलीवुड हस्तियां, कला क्षेत्र के बड़े नाम, सेना में रहे लोग राजनीतिक दलों से जुड़ते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता जाएगा, इसमें और तेजी आएगी। हाल ही में पूर्व थलसेनाध्यक्ष वी.के. सिंह, टीवी पत्रकार आशुतोष, मुंबई के पूर्व कमिश्नर सत्यपाल सिंह, डेक्कन एयर के गोपीनाथ, नृत्यांगना मल्लिका साराभाई, समाजसेवी मेधा पाटकर, आरबीएस की पूर्व चेयरपर्सन मीरा सान्याल, एनडीटीवी के पूर्व सीईओ समीर नायर, इंफोसिस के वी. बालाकृष्णन, संगीतकार बप्पी लाहिड़ी आदि प्रमुख हैं।

Sunday, 4 May 2014

वाणी पर संयम है जरूरी

हाल के ही मामलों को देखें तो चुनाव आयोग ने समाज में कटुता फैलाने एवं उन्मादी भाषणों पर भाजपा नेता अमित शाह और समाजवादी नेता आजम खान की रैलियों पर रोक लगा दी। यानी ये दोनों नेता उत्तर प्रदेश में लोकसभा के बाकी बचे चरणों में रैली, भाषण, जुलूस आदि में हिस्सा नहीं ले सकेंगे। लेकिन, चुनाव आयोग कार्रवाई करे या फिर चेतावनी दे, नेताओं के भड़काउ बोल रुकने का नाम नहीं ले रहे। एक के बाद एक नेताओं के बेतुके बयान सामने आ रहे हैं। डॉक्टर प्रवीण तोगडि़या और बिहार भारतीय जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता द्वारा की गई टिप्पणियों ने पुनः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के असली चेहरे को उजागर कर दिया है। डाक्टर प्रवीण तोगडि़या ने गुजरात के एक शहर के हिन्दू मोहल्ले में एक मुसलमान द्वारा मकान खरीदने पर सख्त ऐतराज जाहिर किया और उस क्षेत्र के हिन्दुओं से कहा कि वे मुसलमान द्वारा खरीदे जा रहे मकान पर कब्जा कर लें या उसमें आग लगा दें। इसी तरह, बिहार के गिरिराज सिंह ने कहा है कि जो भी नरेन्द्र मोदी का विरोध करता है उसे पाकिस्तान चले जाना चाहिए। डाक्टर प्रवीण तोगड़िया, संघ परिवार के एक बहुत ही महत्वपूर्ण सदस्य हैं। संघ परिवार की अनेक शाखाएं हैं,जिनमें एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण शाखा विश्व हिन्दू परिषद है। इस समय डाक्टर तोगड़िया विश्व हिन्दू परिषद के मुखिया हैं। इसी तरह, गिरिराज सिंह,जो भाजपा के लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार हैं, बिहार  मंत्रिपरिषद के सदस्य रहे हैं, नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद में वे भाजपा के प्रतिनिधि के रूप में शामिल रहे हैं। उनके पास महत्वपूर्ण विभाग रहे हैं।
सच तो यह भी है कि देश में लोकतांत्रिक इतिहास में यह लोकसभा चुनाव शायद सबसे ज्यादा अभ्रद भाषा के इस्तेमाल के लिए जाना जाएगा। विभिन्न दलों के नेता निरंतर एक-दूसरे के खिलाफ आपत्तिजतनक और अभद्र शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। राजनीतिक विरोध का स्तर पर इतना नीचे गिर गया है कि केंद्रीय मंत्री भी अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा निशाने पर रहे हैं। मोदी भी अपने विरोधियों के खिलाफ हमले करते निजी स्तर तक चले जाते हैं। हालांकि मोदी ने भी रक्षा मंत्री एके एंटनी और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को ‘पाकिस्तान का एजेंट’ कहा। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढते जा रहे हैं नेताओं की जुबान और भी ज्यादा तल्ख होती जा रही है। विरोधियों पर वार करने में नेता कब मर्यादा की सीमा लांघ जा रहे हैं पता ही नहीं चल रहा। कभी अमित शाह, आजम खान तो कभी गिरिराज शाह, मानो हर नेता में दूसरे से ज्यादा तीखे और बेतुके बयान देने की होड़ लगी है। इसी कड़ी में एक और नाम जुड़ गया है राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष अजित सिंह का। अलीगढ़ की एक सभा में बोलते हुए अजित सिंह ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की तुलना बकरे से कर डाली। और उसके बाद राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने मोदी से बेहतर तो कसाई को बता दिया।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी की सरकार पर आरोप लगाया कि वह किसानों की जमीन चुरा रहे हैं। उन्होंने मोदी का नाम लिए बगैर कहा वह ‘नाजी तानाशाह एडोल्फ हिटलर’ की तरह काम करते हैं। वैसे, मोदी राहुल को अक्सर ‘शहजादा’ कहते रहे हैं और उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ इतालवी मरीन के मुद्दे को लेकर निशाना साधा। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद ने मोदी को ‘टुकडे-टुकडे करने’ वाला बयान देकर विवाद खडा किया। इस बयान को लेकर उन्हें जेल की हवा खानी पडी. विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा, ‘हम तुमको (मोदी) लोगों की हत्या करने का आरोपी नहीं बता रहे हैं। हमारा आरोप है कि तुम नपुंसक हो।’ केंद्रीय कृषि मंत्री और राकांपा प्रमुख शरद पवार ने कहा कि मोदी को मानसकि अस्पताल में उपचार कराने की जरूरत है।
भाजपा नेता और पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस वोटरों को भाजपा का नाम ले ले कर धमका रही है, तो दूसरी तरफ आरएलडी अध्यक्ष अजित सिंह ने मोदी को बकरा बता दिया। वहीं बिहार के भागलपुर में एक रैली में बोलते हुए जेडीयू नेता शकुनि चैधरी ने मोदी को वहीं गाड़ देने की बात कही। गिरिराज सिंह अकेले नहीं हैं, जो इस बार के चुनाव में भड़काऊ बोल बोल रहे हैं। इससे पहले भी कई नेता इस तरह के बोल बोल चुके हैं। शिकायतों पर चुनाव आयोग ने कार्रवाई भी की है, लेकिन फिर भी चुनावी समर में अपनी-अपनी जीत देख रहे ये नेता जोश में जनता के सामने बेतुके बोल बोलने का सिलसिला जारी रखे हुए हैं।
नेताओं की बदजुबानी की कहानी यहीं नहीं रुकती। हाल ही में राजद छोड़ जेडीयू में शामिल हुए शकुनी चैधरी एक कदम और आगे बढ़कर मोदी पर हमला बोलते हैं। बिहार के भागलपुर में नीतीश कुमार के सामने मंच पर खड़े शकुनी चैधरी जोश में जनता से वादा करते हैं कि अगर उनका साथ मिला तो वो मोदी को भागलपुर में ही गाड़ देंगे। बीजेपी नेता नितिन गडकरी भी विरोधियों पर निशाना साध रहे हैं। नेताओं की बदजुबानी को लेकर चुनाव आयोग में लगातार शिकायतें हो रही हैं। आयोग चेतावनी देने से लेकर रैलियों, जनसभाओं, रोड शो पर रोक तक लगा दे रहा है। लेकिन लगता है कि ऐसे बेतुके बयान देने वालों नेताओं को चुनाव आयोग की इन कार्रवाइयों का भी कोई डर नहीं। तभी तो तमाम कोशिशों के बाद भी नेताओं की जबान पर लगाम नहीं लग रही है।
राजनीति में लोग एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते रहते हैं लेकिन कोई मंत्री या नेता अपनी मर्यादा को भूल जाए..बड़ी शर्मनाक बात है। चुनाव आयोग ने सही समय पर कदम उठाया नहीं तो आने वाले दिनों में अमित शाह और आजम खान दोनों अपने-अपने वोटों के ध्रुवीकरण के लिए आपत्तिजनक, उकसावे और उन्मादी बयानों का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं भय रहित चुनाव संपन्न कराने का पूरा दारोमदार चुनाव आयोग पर होता है। लेकिन कई बार ऐेसा भी देखने में आता है कि नेता आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करते हैं लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती। उन्हें नोटिस जारी कर महज कागजी खाना-पूर्ति की जाती है। चुनाव आयोग को बिना भेद-भाव किए आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले नेताओं पर कार्रवाई करनी चाहिए। हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कुछ अधिकारियों का तबादला करने से इंकार कर दिया था, लेकिन जैसे ही चुनाव आयोग सख्त हुआ ममता को झुकना पड़ा। चुनाव आयोग को कुछ इसी तरह की कार्रवाई आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले सभी मामलों में करनी चाहिए। कार्रवाई का भय होगा तभी नेता आपत्तिजनक, भड़काऊ और उन्मादी बयान देने से परहेज करेंगे।



Saturday, 5 April 2014

कांग्रेस में है दम


भारतीय राजनीति में कांग्रेस का हमेशा दबदबा रहा है और ज्यादातर समय यही पार्टी सत्तारुढ़ रही है। पिछले दस वर्षों से भी यही सत्ता पर काबिज है। हालंाकि, वर्तमान लोकसभा चुनाव 2014 में पार्टी को थोडे़ मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अमूमन यह होता है, जब आप सत्ता में लंबे समय तक रहते हैं। दिल्ली में बैठकर कुछ लोगों को यही लगता है कि कांग्रेस का तो इस बार पूरा सूपड़ा हो जाएगा ? इसको वे भरसक प्रचारित भी करते हैं। जबकि वास्तविकता के धरातल पर ऐसा नहीं है।
दिल्ली से तो यही बात फैलाई जा रही है कि कांग्रेस विरोधी लहर हवा में है और ज्यादातर लोगों का मानना है कि मनमोहन सरकार नाकाम रही है। जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर है। कांग्रेस आज भी सर्वधर्म समभाव का भाव लेकर चलती है। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर। यही तो हमारा सिद्धांत रहा है। हम कहने से अधिक करने में विष्वास रखते हैं। तमाम विरोधी राजनीतिक दल भ्रष्टाचार को लेकर बावेला काटने पर उतारू हैं, क्या उन्हें यह नहीं पता है कि यह कांग्रेस और यूपीए की ही सरकार थी, जिसे सूचना के अधिकार के रूप में एक अचूक हथियार जनता को दिया है भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए। हाल के वर्षों में जितने भी घोटालों का पर्दाफाष हुआ है, क्या यह सूचना के अधिकार के बदौलत नहीं है? कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन ने दस साल में देश का विकास किया है। कांग्रेस ने नरेगा के माध्यम से देश के 82 करोड़ लोगों को रोजगार देने का काम किया है।यूपीए ने गरीब और किसानों के लिए जो ग्रामीण रोजगार योजना, उपज के दामों में वृद्धि व कर्ज माफी की आर्थिक प्रक्रिया चलाई थी, उसी अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए एक बार फिर यूपीए को मौका मिलेगा। सर्वशिक्षा अभियान, मिड डे मील योजना, ग्राणीम स्वाथ्य सेवा योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी योजनाओं को भला आप कैसे दरकिनार कर सकते हैं ? साथ ही सूचना के अधिकार और लोकपाल बिल को संसद में पेश किए जाने का श्रेय मनमोहन सिंह सरकार को नहीं दिया जाना चाहिए ? जब हम गठबंधन के दौर में होते हैं, तो कई तरह की परेषानियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन जिस प्रकार से यूपीए सरकार ने भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया, चाहे वह कितना भी रसूखदार हो, वह काबिलेतारीफ है। कांग्रेस ने हमेषा भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसा है। आज भी कई आरोपों की जांच हो रही है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
ऐसा नहीं है कि हम सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं। कांग्रेस का सबसे बुरा प्रदर्शन 1999 में रहा था जब यह पार्टी मात्र 114 सीट जीत पाई थी, इसकी सफलता का प्रतिशत मात्र 20.91 था। जहां तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का सवाल है तो 1984 में हुए आम चुनाव में इस पार्टी ने 415 सीट जीत कर ऐतिहासिक सफलता रची थी। उस वक्त इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और इससे उपजी सहानुभूति की लहर का लाभ कांग्रेस को मिला था। इसकी सफलता का प्रतिशत 77.86 था। इतनी सफलता तो कांग्रेस को पहले चुनाव में भी नहीं मिली थी। अब तक यह पार्टी चार सौ सीटों का आंकड़ा एक बार, तीन सौ सीटों का आंकड़ा पांच बार, दो सौ सीटों का आंकड़ा तीन बार और सौ का आंकड़ा छरू बार पार कर चुकी है। 114 सीट इसका न्यूनतम स्कोर है। बेषक, कुछ लोग तमाम हथकंडे का प्रयोग करके हवा बनाने की जुगत कर रहे हांे, लेकिन देष की जनता जानती है कि कौन उनके लिए बेहतर सरकरा लाएगा ? कौन बेहतर सुविधा मुहैया कराएगा? कांग्रेस की काबिलियत से पूरे देष की जनता वाकिफ है।

Sunday, 23 March 2014

सियासत में स्वार्थ सबसे बुरी

कोई चार दशकों से, जब भी चुनाव आता है, तो अधिकतर राजनीतिक पार्टियां और उनके दिग्गज नेता देश के सामने विकास का कोई नया व अनोखा मॉडल न रखकर, कांग्रेस के वंशवाद पर हमला बोलने लगते हैं। पहली बार 1967 में समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया ने उत्तर प्रदेश के फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में ‘नेहरू वंश’ के तर्क के जरिये जवाहरलाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित के खिलाफ जनेश्वर मिश्र की तरफ से मोर्चा खोला था। वह खुद कन्नौज से चुनाव लड़ रहे थे। पर आज कश्मीर से लेकर केरल और महाराष्ट्र से ओडिशा तक की राजनीति में सियासी वंशों की ही हुक्मरानी है। एक आंकड़े के अनुसार, साल 2004 के चुनाव में कोई 120 परिवारों ने 250 क्षेत्रों से चुनाव लडे़ थे। लोग कहते हैं कि ‘शहजादा-शहजादी’ और ‘युवराज’ जैसे शब्द सामंती प्रथा की देन हैं। और ये शब्द गरीबों को परियों की कहानियों की तरह लुभाते हैं। यह एक मानसिकता है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक मार्क टुली इंग्लैंड से आयातित सामंती परंपरा की देन मानते हैं।
दरअसल, वंशवाद भारतीय राजनीति का एक ऐसा विषय है, जिसका अध्ययन और आलोचना करते करते कई राजनेता और कई दल इसी की चपेट में आ गए। अक्सर यह बहस सिर्फ गांधी परिवार के संदर्भ में उभरती है और बाकी परिवारों को छोड़ते हुए तू-तू मैं-मैं में बदल कर कोई ठोस राजनीतिक विमर्श में नहीं बदल पाता है। यह मुद्दा किसलिए है? राहुल गांधी को टारगेट करने के लिए या भारतीय राजनीति को वंशवाद से दूर करने के लिए। क्या राहुल गांधी का मामला इसलिए संगीन है क्योंकि वे आए और आते ही परिवार के नाम पर प्रधानमंत्री के दावेदार बन गए या इसलिए है कि वंशवाद हमारी राजनीति को खाए जा रहा है। प्रधानमंत्री पद के लिए गंभीर है या मुख्यमंत्री या संसदीय सीटों पर परिवारों के कब्जे का मसला भी उतना ही गंभीर है। यह अजीब नहीं है कि कोई वंशवाद पर हमला करते हुए खुद अपने परिवार का जिक्र करता है। चाय वाला, दूध वाला या गरीब परिवार वाला। कोई इसका जिक्र कैसे न करें। वंशवाद को लेकर राहुल गांधी को घेरा जाता है और उनसे उनके पिता के बयान का हिसाब पूछा जाता है। क्या यह अजीब नहीं है। बाप का हिसाब बेटे से।
उड़ीसा के वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे बीजू पटनायक के पुत्र नवीन पटनायक वतर्मान में मुख्यमंत्री है। शिरोमणि अकाली दल के संरक्षक और वर्तमान में पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के पुत्र सुखबीर सिंह बादल पार्टी अध्यक्ष के साथ-साथ प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं। 18 सदस्यीय मंत्रिमंडल में आधे दर्जन रिश्तेदार (मनप्रीत सिंह बादल- बादल के भतीजे और वित्त मंत्री, आदेश प्रताप सिंह कैरो- बादल के दामाद और खाद्य आपूर्ति मंत्री, विक्रमजीत सिंह मजीठा-सुखबीर के साले और सूचना प्रसारण मंत्री, जनभेजा सिंह जोहल- सिंचाई मंत्री और बादल कें करीबी रिश्तेदार) भरे पड़े हैं। सुखबीर की पत्नी हरसिमरत कौर भंटिडा सीट से सबसे मजबूत उम्मीदवार हैं तथा बादल की पत्नी सुरिंदर कौर बादल शिरोमणि अकाली दल (महिला ग्रुप) की संरक्षक हैं। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के एक पुत्र चंद्रमोहन विश्नाई (मो. चांद) उपमुख्यमंत्री रहे तो दूसरे कुलदीप विश्नोई भिवानी से सासंद तथा हरियाणा जनहित पार्टी के अध्यक्ष हैं। जम्मू काश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुला के पिता फारूख अब्दुला और उनके पिता शेख अब्दुला वर्षों तक कश्मीर की रियासत को संभालते रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की पुत्री महबूबा मुफ्ती सासंद के साथ ही पीडीपी की अध्यक्षा भी हैं।
महाराष्ट्र में राकपा प्रमुख और केन्द्रीय मंत्री शरद पवार अपनी सुपुत्री सुप्रिया सुले को आसानी से संसद में पहुंचाने के लिए  अपनी बारामती की सीट छोड़ चुके हैं तथा भतीजा अजीत पवार भी जंग-ए मैदान में कूदने को तैयार हैं। बाला साहब ठाकरे ने पुत्र मोह में उद्धव ठाकरे को शिवसेना का अध्यक्ष क्या बनाया भतीजे राज ठाकरे ने एक नई पार्टी महाराष्ट्र नवर्निमाण सेना गठित कर चाचा को ही टक्कर दे दी। 1987 में नादेड़ से लोकसभा पहुंचे महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक चैहान पूर्व मुख्यमंत्री रहे एस बी चौहान के बेटे हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री व द्रमुक अध्यक्ष एम करुणानिधि के पुत्र एम के स्टालिन पार्टी के कोषाध्यक्ष हैं तो पुत्री कानी मोझी को संसद में भेजने की तैयारी हैं। उनके ही परिवार के दयानिधि मारण अभी तक केन्द्र में संचार मंत्री रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री तथा जद (सेकुलर) प्रमुख एच. डी. देवगौड़ा के पुत्र एच. डी. कुमार स्वामी मुख्यमंत्री रह चुके हैं तो दूसरे एच डी खेन्ना दो बार बिजली मंत्री और सार्वजनिक मंत्री रह चुके हैं।  एच. डी. कुमारस्वामी की पत्नी अनिता मधुगिरी विधान सभा से उपचुनाव लड़ चुकी हैं। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह वर्तमान में विधायक है तथा लोकसभा जाने की तैयारी में है। पूर्व मंत्री माधव राव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा राजेश पायलट के पुत्र सचिन पायलट वर्तमान मे सांसद है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र सिंह भी बाड़मेड़ से लोकसभा जाने की तैयारी में है। पूर्व सांसद सुनील दत्त की बेटी प्रिया दत्त मुम्बई से सांसद है तथा संजय दत्त लखनऊ से संसद पहुंचने की चाहत में है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा की बेटी अगाथा मेघालय के तुरा क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुनी गई है। अभी हाल में कांग्रेस से निष्कासित मागंरेट निरंजन अल्वा की सास वायलट अल्वा राज्यसभा की उपसभापति रह चुकी है तथा पति जोकिभ अल्वा भी सासंद रह चुके हैं।
भारतीय राजनीति में परिवारवाद को लेकर पैट्रिक फ्रेंच ने एक गंभीर अध्ययन किया है। पैट्रिक ने 15वीं लोकसभा के 545 सांसदों की पारिवारिक पृष्ठभूमि का अध्ययन किया तो 255 सांसदों की पारिवारिक पृष्ठभूमि कुछ खास नहीं लगी, लेकिन 156 सांसद पारिवारिक पृष्ठभूमि से तालुल्क रखते हैं। करीब 29 प्रतिशत सांसदों का फैमिली कनेक्शन है। पैट्रिक फ्रेंच पार्टियों में खानदानी प्रतिशत भी निकालने का अजूबा काम करते हैं, तो पाते हैं कि राष्ट्रीय लोकदल एक ऐसी पाटी है जो सौ परसेंट खानदानी है। इसके पांचों सांसद खानदानी हैं। आज के दैनिक हिन्दुस्तान में इनका एक विज्ञापन भी छपा है आगरा में संकल्प रैली का। वो भी राजनीति को स्वच्छ करने के लिए। इस विज्ञापन में तीन ही चेहरे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी।
पैट्रिक फ्रेंच के अनुसार पार्टियों में वंशवाद कुछ इस प्रकार है-
एनसीपी ? 77.8 प्रतिसत 9 में से 7
बीजेडी ? 42.9  प्रतिशत 14 में से 6
कांग्रेस ? 37.5 प्रतिशत 208 में से 78
सपा ? 27.3 प्रतिशत 22 में से 6
बीजेपी ? 19 प्रतिशत 116 में से 22
क्यों जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार है, जिससे कांग्रेस और बीजेपी दोनों हाथ मिलाते रहे हैं। फिर क्यों पंजाब में बादल परिवार है, जो बीजेपी की सहयोगी है? फिर क्यों यूपी में यादव परिवार हैं? क्यों बिहार में यादव और पासवान परिवार है? फिर क्यों महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार है, जिससे बीजेपी हाथ मिलाती है। फिर क्यों मध्यप्रदेश और राजस्थान में सिंधिया परिवार है, जो कांग्रेस में भी है, बीजेपी में है। कुछ परिवार तो बढ़ते ही जा रहे हैं। जैसे मुलायम सिंह यादव का परिवार। लालू प्रसाद यादव का परिवार, रामविलास पासवान का परिवार।
असल में वंशवाद उतना बुरा नहीं है, जितना स्वार्थपरता। स्वार्थ वह भी केवल और केवल अपने लिए, अपने परिवार के लिए। नेहरू-गांधी परिवार पर केवल विरोधी केवल राजनीति से प्रेरित होकर बयानबाजी करते हैं। उन्हें इस बात पर गौर फरमाना चाहिए कि इस परिवार का कोई भी सदस्य कभी राज्यसभा के रास्ते संसद में नहीं पहुंचा है। बेशक इंदिरा गांधी लोकसभा चुनाव हार गर्इं थीं, फिर भी उन्होंने राज्यसभा का दरवाजा नहीं खटखटाया। सोनिया गांधी या राहुल गांधी ने कभी भी सत्ता की कुर्सी पर आने को बेताब नहीं दिखे। इसी परिवार ने पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया। कभी इस परिवार ने लोकसभाध्यक्ष अथवा राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति की कुर्सी की ईच्छा नहीं रखीं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि वह राजनीति में वंशवाद की धारणा के खिलाफ हैं, लेकिन वह महसूस करते हैं कि एक बंद व्यवस्था में वंशवाद को अलग नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं कि मैं पूरी तरह से वंशवाद की धारणा के खिलाफ हूं। जो कोई भी मुझे जानता है, वह यह जानता और समझता है। लेकिन आप एक बंद व्यवस्था में वंशवाद को अलग नहीं कर सकते। आपको व्यवस्था को खोलना होगा।
यह अवसरवादिता नहीं तो और क्या है कि जो मोदी देश भर में वंशवाद के खिलाफ जहर उगलते नजर आते हैं, उसे खत्म कर डालने का संकल्प दिखाते हैं , उन्हें ना बिहार में पासवानों का वंशवाद दिखता है ना पंजाब में बादलों का और न महारास्ट्र में ठाकरे कंपनी का। वह खुद को और अपनी पार्टी को जाति-धर्म से ऊपर बताते हैं, जातियों की राजनीति करने वाली सपा बसपा पर भाले बरछी चलाते हैं लेकिन जाति की राजनीतिक ठेकेदारी करने वाले पासवान और उदितराज उन्हें प्रिय हो जाते हैं और कोई आश्चर्य नहीं कि चुनाव बाद बसपा भी पहले की तरह साथ आना चाहे तो उसकी भी जातीयता आधारित राजनीति पर भी भाजपा की स्वीकृति की मुहर लगने में कुछ ही मिनट लगें। भाजपा इसे स्वीकार करे या न करे, लेकिन अब उसे वंशवाद की राजनीति का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं। भाजपा में ऐसे नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है, जो अपने पुत्र-पुत्रियों को राजनीति में स्थापित करने में लगे हुए हैं। एक समय था जब गैर कांग्रेसी राजनीतिक दल कांग्रेस की इसलिए आलोचना किया करते थे कि वह वंशवाद की राजनीति को प्रश्रय दे रही है, लेकिन अब करीब-करीब सभी राजनीतिक दल यही कर रहे हैं। भाजपा, सपा, राजद, द्रमुक आदि में वंशवाद की राजनीति को खाद-पानी देने की होड़ सी लगी हुई है। वंशवाद पर सबसे आक्रामक दिखने वाले मोदी को यह वंशवाद राहुल गांधी में तो नजर आता है लेकिन अपने साथ खड़े प्रकाश बादल-सुखबीर बादल में वो नहीं दिखता, दिवंगत बाल ठाकरे-उद्धव ठाकरे में वह नहीं दिखता। वह राहुल गांधी को शहजादा बुलाते हैं लेकिन अपने साथ खड़े शहजादे वरुण गांधी और शहजादी वसुंधरा राजे नहीं दिखती, उन्हें वंशवाद तब भी नहीं दिखता जब राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, लालजी टंडन जैसे उनके नेता अपने बेटों के लिए टिकट मांगते और उन्हें चुनाव लड़वाते हैं।
राजनीति में वंशवाद केवल भारत तक महदूद नहीं है। नेपाल में कोईराला परिवार, सामंतवादी राजनीति के लिए मशहूर पाकिस्तान में भुट्टो परिवार का दबदबा है, तो बांग्लादेश में शेख हसीना और खालिदा जिया में ही टक्कर होता है। श्रीलंका में लोग जयवर्धने और भंडारनायके परिवार के जिक्र से लोग रोमांचित हो जाते हैं। वास्तव में, राजनीतिक वंशवाद भारत या एशिया तक ही सीमित नहीं है। यह तो तकरीबन पूरी दुनिया में है। कहते हैं कि अमेरिका में प्रजातंत्र काफी मजबूत है, मगर सभी जानते हैं कि वहां बुश, केनेडी और क्लिंटन वंश हमेशा ही चर्चा में रहे हैं। हाल ही में टाइम पत्रिका ने अमेरिका की ‘पॉलिटिकल डायनेस्टी’ के बारे में लिखा था: हालांकि संविधान ऐसा कुछ नहीं कहता, लेकिन सदियों से अमेरिकी लोग साफ तौर पर ऐसे लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनते रहे हैं, जो किसी न किसी स्थापित परिवार से आते हैं। दस में से एक सांसद के परिवार का कोई सदस्य पहले भी इस पद पर रहा चुका होता है।

Sunday, 16 March 2014

पहले वाली होली कहां रही?

पहले होली के दिन अलग अलग युवकों की टोलियां घर घर घूम कर गीत गाती थी. बदले में उनको मिलते थे रंग अबीर और खाने के लिए लिए मालपुए. लेकिन अब यह परंपरा दम तोड़ रही है. कुछ लोग इसकी वजह आपसी दुश्मनी, भेदभाव और बढ़ते वैमनस्य को मानते हैं तो कुछ लोग पश्चिमी परंपराओं के हावी होने को मुख्य वजह बताते हैं. भारत में होली का स्वरूप बदल रहा है. सामुदायिक त्योहार की पहचान रखने वाला यह उत्सव धीरे-धीरे जाति और समूह के दायरे में बंट रहा है. इसकी प्राचीन परंपराएं भी तेजी से खत्म हो रही हैं.
प्रेम सौहार्द के इस त्योहार में लोग दुश्मन के भी गले लग जाते थे. पहले होली एक महीने तक चलने वाला त्योहार था. गांव भर के लोग एक जगह जमा होकर होली के हुड़दंग में मस्त हो जाते थे. हर गांव में एक महीने तक ढोल और मंजीरे बजते थे. लेकिन अब एक दूसरे के साथ तालमेल के अभाव, कद्रदानों की कमी और गांवों से तेज होते पलायन के चलते यह पुरानी परंपरा दम तोड़ रही है. युवा पीढ़ी को तो फगुआ गीतों के बोल तक याद नहीं हैं. फगुआ के गीतों में पति-पत्नी, प्रेमी प्रेमिका, देवर भाभी के रिश्तों में हास्यपुट तो दिए ही जाते हैं, धार्मिक गीतों को भी शामिल किया जाता है. लेकिन अब गायन की यह परंपरा खत्म होती जा रही है. अब इनकी जगह फूहड़ गीत बजने लगे हैं.
पहले हिंदी भाषी प्रदेशों में फागुन का महीना चढ़ते ही फिजा में होली के रंगीले और सुरीले गीत तैरने लगते थे. इनको स्थानीय भाषा में फाग या फगुआ गीत कहा जाता है. कोई महीने भर बाकायदा इनकी महफिलें जमती थीं. शहरों में भी ढोल-मजीरे के साथ फगुआ के गीत गाए जाते थे. लेकिन समय की कमी, बदलती जीवनशैली और कई अन्य वजहों से शहरों की कौन कहे, गांवों में भी यह परंपरा दम तोड़ रही है.
पहले होली के मौके पर शहरों में महामूर्ख सम्मेलन आयोजित होते थे और अखबारों में नामी-गिरामी लोगों को उपाधियां दी जाती थीं. अब यह परंपरा भी आखिरी सांसें ले रही है. होली के मौके पर बनने वाली ठंडई और भांग की जगह अब अंग्रेजी शराब ने ली है.
अब लोगों में प्रेम की भावना ही गायब हो गई है. लोग टीवी से चिपके रहते हैं. पहले गांवों के चौपालों से होली खेलने के लिए निकलने वाली टोली में बुजुर्ग से लेकर युवा शामिल होते थे. यह टोली सामाजिक एकता की मिसला होती थी.  पहले गांवों में होली के दिन भांग और ठंडई बड़े बड़े बर्तनों में घोली जाती थी. जात पांत से परे गांव का हर व्यक्ति उसका सेवन करता था. अब तो जात पांत की भावना सतह पर आ गई है. इसके अलावा इनकी जगह देशी और विलायती शराब ने ले ली है. अब होली की वह मस्ती तो अतीत के पन्नों में कहीं गुम हो गई है. पहले होली के दिन महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन किया जाता था और इसमें समाज के हर तबके के लोग बड़े उत्साह से भाग लेते थे. लोग इस दौरान मिलने वाली उपाधियों का बुरा नहीं मानते थे. अब लोगों को इसकी फुर्सत ही कहां है? अब तो टीवी और इंटरनेट ने लोगों को समाज से काट कर रख दिया है.

Wednesday, 5 March 2014

शीला दीक्षित बनेंगी राज्यपाल


दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित केरल की नई राज्यपाल होंगी। शीला दीक्षित को केरल के राज्यपाल के पद पर बिठाने को लेकर कांग्रेस हाईकमान ने हरी झंडी दे दी है और उनकी नियुक्ति की अधिसूचना किसी भी वक्त जारी की जा सकती है। विज्ञप्ति में कहा गया है कि केरल में नए राज्यपाल के पदभार ग्रहण करने तक वहां की जिम्मेदारी कर्नाटक के राज्यपाल एच.आर.भारद्वाज संभालेंगे।
15 सालों तक दिल्ली पर राज करने वाली शीला दीक्षित को राज्यपाल पद की जिम्मेदारी दिए जाने से एक बात तो साफ है कि अब सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका खत्म हो जाएगी। राष्ट्रपति भवन द्वारा जारी विज्ञप्ति के मुताबिक शीला निखिल कुमार का स्थान लेंगी। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने निखिल कुमार का इस्तीफा तत्काल प्रभाव से मंजूर कर लिया है। निखिल कुमार बिहार से चुनाव लड़ने जा रहे हैं।
तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं शीला दीक्षित हाल के विधानसभा चुनाव में पराजित होने के तीन महीने के अंदर केरल की राज्यपाल नियुक्त की गईं। पिछले दिसंबर में दिल्ली विधानसभा चुनाव में शीला दीक्षित को नयी दिल्ली सीट से आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से भारी शिकस्त मिली थी। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का बहुत खराब प्रदर्शन रहा और वह सत्तर सदस्यीय विधानसभा में तीसरे स्थान पर पहुंच गई।
शीला 1998 से लेकर 2013 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। पिछले साल दिसंबर में हुए विधानसभा चुनावों मे वह आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से चुनाव हार गई थीं। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री 1984 से 1989 तक उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोक सभा सीट से सांसद रह चुकी हैं। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले चल रहे हैं।