Thursday, 17 October 2013

वाल्मीकि जी ने दिखाया सदमार्ग

महर्षि वाल्मीकि प्राचीन वैदिक काल के महान ऋषियों कि श्रेणीमें प्रमुख स्थान प्राप्त करते हैं. इन्होंने संस्कृत मे महान ग्रंथ रामायण महान ग्रंथ की रचना कि थी इनके द्वारा रचित रामायण वाल्मीकि रामायण कहलाती है. हिंदु धर्म की महान कृति रामायण महाकाव्य श्रीराम के जीवन और उनसे संबंधित घटनाओं पर आधारित है. जो जीवन के विभिन्न कर्तव्यों से परिचित करवाता है. 'रामायण' के रचयिता के रूप में वाल्मीकि जी की प्रसिद्धि है. इनके पिता महर्षि कश्यप के पुत्र वरुण या आदित्य माने गए हैं.  एक बार ध्यान में बैठे हुए इनके शरीर को दीमकों ने अपना ढूह (बाँबी) बनाकर ढक लिया था। साधना पूरी करके जब ये दीमक-ढूह से जिसे वाल्मीकि कहते हैं, बाहर निकले तो इन्हें वाल्मीकि कहा जाने लगा.
महर्षि बनने से पूर्व वाल्मीकि रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे तथा परिवार के पालन हेतु दस्युकर्म करते थे एक बार उन्हें निर्जन वन में नारद मुनि मिले तो रत्नाकर ने उन्हें लूटने का प्रयास किया तब नारद जी ने रत्नाकर से पूछा कि तुम यह निम्न कार्य किस लिये करते हो, इस पर रत्नाकर ने जवाब दिया कि अपने परिवार को पालने के लिये. इस पर नारद ने प्रश्न किया कि तुम जो भी अपराध करते हो और जिस परिवार के पालन के लिए तुम इतने अपराध करते हो, क्या वह तुम्हारे पापों का भागीदार बनने को तैयार होगें यह जानकर वह स्तब्ध रह जाता है। नारदमुनि ने कहा कि हे रत्नाकर यदि तुम्हारे परिवार वाले इस कार्य में तुम्हारे भागीदार नहीं बनना चाहते तो फिर क्यों उनके लिये यह पाप करते हो इस बात को सुनकर उसने नारद के चरण पकड़ लिए और डाकू का जीवन छोड़कर तपस्या में लीन हो गए और जब नारद जी ने इन्हें सत्य के ज्ञान से परिचित करवाया तो उन्हें राम-नाम के जप का उपदेश भी दिया था, परंतु वह राम-नाम का उच्चारण नहीं कर पाते तब नारद जी ने विचार करके  उनसे मरा-मरा जपने के लिये कहा और  मरा रटते-रटते यही 'राम' हो गया और निरन्तर जप करते-करते हुए वह ऋषि वाल्मीकि बन गए.
महर्षि वाल्मीकि संस्कृत भाषा के आदि कवि और हिन्दुओं के आदि काव्य 'रामायण' के रचयिता के रूप में प्रसिद्ध है। महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है, इसलिये इन्हें प्राचेतस् नाम से उल्लेखित किया जाता है।उपनिषद के विवरण के अनुसार ये भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे। एक बार ध्यान में बैठे हुए वरुण-पुत्र के शरीर को दीमकों ने अपना ढूह (बाँबी) बनाकर ढक लिया था। साधना पूरी करके जब ये दीमक-ढूह से जिसे वाल्मीकि कहते हैं, बाहर निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे। तमसा नदी के तट पर व्याध द्वारा कोंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डालने पर वाल्मीकि के मुंह से व्याध के लिए शाप के जो उद्गार निकले वे लौकिक छंद में एक श्लोक के रूप में थे। इसी छंद में उन्होंने नारद से सुनी राम की कथा के आधार पर रामायण की रचना की। कुछ लोगों का अनुमान है कि हो सकता है, महाभारत की भांति रामायण भी समय-समय पर कई व्यक्तियों ने लिखी हो और अतिम रूप किसी एक ने दिया हो और वह वाल्मीकि की शिष्य परंपरा का ही हो।
देश भर में महर्षि बाल्मीकि की जयंती को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है. इस अवसर पर शोभा यात्राओं का आयोजन भी होता है.महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित पावन ग्रंथ रामायण में प्रेम, त्याग, तप व यश की भावनाओं को महत्व दिया गया है वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना करके हर किसी को सद मार्ग पर चलने की राह दिखाई. इस अवसर पर वाल्मीकि मंदिर में पूजा अर्चना भी की जाती है तथा शोभा यात्रा के दौरान मार्ग में जगह-जगह लोगों इसमें बडे़ उत्साह के साथ भाग लेते हैं. झांकियों के आगे उत्साही युवक झूम-झूम कर महर्षि वाल्मीकि के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं. इस अवसर पर उनके जीवन पर आधारित झाकियां निकाली जाती हैं व राम भजन होता है. महर्षि वाल्मीकि को याद करते हुए महर्षि वाल्मीकि जयंती की पूर्व संध्या पर उनके चित्र पर माल्यार्पण करके उनको श्रद्धासुमन अर्पित किए जाते हैं.



Tuesday, 15 October 2013

रक्षा के लिए सदा तत्पर

कुर्बानी को हर धर्म और शास्त्र में भगवान को पाने का सबसे प्रबल हथियार माना जाता है। हिंदू धर्म में जहां हम कुर्बानी को त्याग से जोड़ कर देखते हैं, वहीं मुस्लिम धर्म में कुर्बानी का अर्थ है खुद को खुदा के नाम पर कुर्बान कर देना। यानी अपनी सबसे प्यारी चीज का त्याग करना। इसी भावना को उजागर करता है मुस्लिम धर्म का महत्वपूर्ण त्योहार ईद-उल-जुहा, जिसे हम बकरीद के नाम से भी जानते हैं। ईद-उल-जुहा मुसलमान कैलेंडर का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है।

दरअसल, इस्लामी साल में दो ईदों में से एक है बकरीद। ईद-उल-जुहा और ई-उल-फितर। ईद-उल-फिरत को मीठी ईद भी कहा जाता है। इसे रमजान को समाप्त करते हुए मनाया जाता है। एक और प्रमुख त्योहार है ईद-उल-मीनाद-उन-नबी, लेकिन बकरीद का महत्व अलग है। इसे बड़ी ईद भी कहा जाता है। हज की समाप्ति पर इसे मनाया जाता है। इस्लाम के पांच फर्ज माने गए हैं, हज उनमें से आखिरी फर्ज माना जाता है। मुसलमानों के लिए जिंदगी में एक बार हज करना जरूरी है। हज होने की खुशी में ईद-उल-जुहा का त्योहार मनाया जाता है। यह बलिदान का त्योहार भी है। इस्लाम में बलिदान का बहुत अधिक महत्व है। कहा गया है कि अपनी सबसे प्यारी चीज रब की राह में खर्च करो। रब की राह में खर्च करने का अर्थ नेकी और भलाई के कामों में। जिस तरह ईद-उल-फितर को गरीबों में पैसा दान के रूप में बांटा जाता है, उसी तरह बकरीद को गरीबों में मांस बांटा जाता है। यह इस्लाम की खासियत है कि वह अपने किसी भी पर्व में समाज के कमजोर और गरीब तबके को भूलते नहीं हैं, बल्कि उनकी मदद करना उनके धर्म का एक अभिन्न अंग है। यह पर्व जहां सबको साथ लेकर चलने की सीख देता है, वहीं बकरीद यह भी सिखाती है कि सच्चाई की राह में अपना सब कुछ कुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
इस त्योहार को मनाने के पीछे भी एक कहानी है, जो दिल को छू जाती है। हजरत इब्राहिम द्वारा अल्लाह के हुक्म पर अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए तत्पर हो जाने की याद में इस त्योहार को मनाया जाता है। हजरत इब्राहिम को पैगंबर के रूप में जाना जाता है, जो अल्लाह के सबसे करीब हैं। उन्होंने त्याग और कुर्बानी का जो उदाहरण विश्व के सामने पेश किया वह अद्वितीय है। इस्लाम के विश्वास के मुताबिक, अल्लाह हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेना चाहते थे और इसीलिए उन्होंने उनसे अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने के लिए कहा। हजरत इब्राहिम को लगा कि उन्हें सबसे प्रिय तो उनका बेटा है, इसलिए उन्होंने अपने बेटे की ही बलि देना स्वीकार किया। हजरत इब्राहिम को लगा कि कुर्बानी देते समय उनकी भावनाएं आड़े आ सकती हैं, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। जब अपना काम पूरा करने के बाद पट्टी हटाई, तो उन्होंने अपने पुत्र को अपने सामने जिंदा खड़ा हुआ देखा। बेदी पर कटा हुआ मेमना पड़ा हुआ था। तभी से इस मौके पर बकरे और मेमनों की बलि देने की प्रथा है। कुछ जगह लोग ऊंटों की भी बलि देते हैं।
यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों ही धर्म के पैगंबर हजरत इब्राहीम ने कुबार्नी का जो उदाहरण दुनिया के सामने रखा था, उसे आज भी परंपरागत रूप से याद किया जाता है। आकाशवाणी हुई कि अल्लाह की रजा के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करो, तो हजरत इब्राहीम ने सोचा कि मुझे तो अपनी औलाद ही सबसे प्रिय है। उन्होंने अपने बेटे को ही कुर्बान कर दिया। उनके इस जज्बे को सलाम करने का त्योहार है ईद-उल-जुहा। कुर्बानी का अर्थ है कि रक्षा के लिए सदा तत्पर। हजरत मोहम्मद साहब का आदेश है कि कोई व्यक्ति जिस भी परिवार, समाज, शहर या मुल्क में रहने वाला है, उस व्यक्ति का फर्ज है कि वह उस देश, समाज, परिवार की हिफाजत के लिए हर कुबार्नी देने को तैयार रहे। ईद-उल-फितर की तरह ईद-उल-जुहा में भी गरीबों और मजलूमों का खास ख्याल रखा जाता है। इसी मकसद से ईद-दल-जुहा के सामान यानी कि कुबार्नी के सामान के तीन हिस्से किए जाते हैं। एक हिस्सा खुद के लिए रखा जाता है, बाकी दो हिस्से समाज में जरूरतमंदों में बांटने के लिए होते हैं, जिसे तुरंत बांट दिया जाता है। नियम कहता है कि पहले अपना कर्ज उतारें, फिर हज पर जाएं। तब बकरीद मनाएं। इसका मतलब यह है कि इस्लाम व्यक्ति को अपने परिवार, अपने समाज के दायित्वों को पूरी तरह निभाने पर जोर देता है।

Sunday, 13 October 2013

सलाम मौसम विभाग

सलाम मौसम विभाग,चक्रवात और समुद्र विशेषज्ञ वैज्ञानिकों, NDMA, ओडिशा, आंध्र और केंद्र सरकार... साइक्लोन फाइलिन से निपटना इतना भी आसान न था. 10 लाख से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाल लेना, पल पल की खबर रखना हम सब आपके शुक्रगुजार हैं. बंगाल की खाड़ी से उठा भयानक चक्रवाती तूफान पाइलीन का बड़ा खतरा टल गया है। कल रात नौ बजे ओडिशा के तट पर पायलीन ने दस्तक दी। उसके बाद से तूफान की रफ्तार कम हो रही है। ओडिशा के गोपालपुर में सबसे ज्यादा खतरा बताया जा रहा था। उससे खतरा टल गया है। पाइलिन तूफान का केंद्र रहे गोपालपुर से तूफान 220 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गुजर गया है। और अब तूफान ओडिसा के उत्तर-उत्तर-पश्चिम इलाके की तरफ बढ़ गया है। यानी जिस इलाके पर सबसे ज्यादा बुरा असर या यूं कहें कि तबाही आने वाली थी, उससे खतरा गुजर गया है।
हालांकि अभी नुकसान का ठीक-ठीक आकलन नहीं किया जा सका है, लेकिन जिस तरह से तूफान की रफ्तार घटकर 100 किमी प्रति घंटा रह गई है, उससे अब नुकसान कम होने की संभावना है। गोपालपुर में पाइलिन तूफान की वजह से कच्चे घरों और पुरानी इमारतों को ही नुकसान पहुंचा है। ओडिशा के 12 जिलों में बत्ती गुल है। अभी तक ज्यादा जान-माल के नुकसान की खबर नहीं है।
गौरतलब है कि बंगाल की खाड़ी से उठा भयानक चक्रवाती तूफान फेलिन शनिवार को देर शाम नौ बजे के लगभग ओडिशा के तटवर्ती गोपालपुर से टकराया। इस दौरान हवा की गति 200 किलोमीटर प्रतिघंटा बनी हुई थी। ओडिशा-आंध्र प्रदेश के तटवर्ती इलाकों में बारिश जारी है। ओडिशा में इस तूफान से 7 लोगों की मौत हो चुकी है। राज्य के अलग-अलग इलाकों में भारी बारिश और तेज हवाओं से ये जानें गईं। पाइलीन ओडिशा के गोपालपुर इलाके के तट से सबसे पहले टकराया और यहां भारी तबाही की आशंका जताई जा रही है।
ओड़िशा में आया चक्रवाती तूफान फैलिन का असर झारखंड में भी दिखने लगा है. झारखण्ड के कई इलाकों में भारी बारिश के साथ तेज हवा भी चल रहा है. रात से ही कई इलाकों में बारिश हो रही है. राजधानी रांची  में दुर्गा पूजा पंडाल के मुख्य द्वार गिर गये हैं. शहर के कई मुख्य सड़के बाधित हो गयी है.  झारखण्ड में कई इलाके है जहा इस तूफान का असर अधिक देखने को मिल रहा है, जैसे: रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला, धनबाद, जामताड़ा, बोकारो, लातेहार, पलामू. कई इलाकों में रात से ही बिजली गुल है.ओडिशा और आंध्रप्रदेश के तटीय इलाके में कल आए शक्तिशाली तूफान ‘फैलिन’ की तीव्रता कम होने का जिक्र करते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकार ( एनडीएमए ) के उपाध्यक्ष एम शशिधर रेड्डी ने कहा है कि सटीक पूर्वानुमानों के कारण राहत कार्य में काफी मदद मिली है और तूफान के कारण आगे चलकर छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल एवं पूर्वाचल में भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है.
  रेड्डी ने कहा, ‘‘चक्रवात अभी फूलबनी में केंद्रित है. स्थानीय तौर पर ओडिशा के तूफान प्रभावित क्षेत्र में इसकी रफ्तार अभी 90 से 100 किलोमीटर प्रति घंटा है. हालांकि इसकी तीव्रता पहले से कम हुई है. पहले अनुमान था कि इसके कारण 20 से 25 सेंटीमीटर बारिश होगी लेकिन अब 10 से 15 सेंटीमीटर बारिश का पूर्वानुमान व्यक्त किया गया है.’’     उन्होंने कहा कि इससे नुकसान कम होने का अनुमान है, जो थोड़ी राहत की बात है. उन्होंने कहा, ‘‘आगे चलकर इसके कारण छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, पूर्वाचंल के इलाकों और पश्चिम बंगाल में भारी से अत्याधिक बारिश हो सकती है. हम सभी राज्यों के सम्पर्क में है और जरुरत पड़ने पर वहां टीम भेजी जायेगी.’’      एनडीएमए के उपाध्यक्ष ने कहा कि चक्रवात का केंद्र रहे गोपालपुर में पहले ही 90 से 95 प्रतिशत लोगों को निकाल लिया गया था. ‘‘यह हमारे लिये चुनौती थी, जिसमें हमें काफी सफलता मिली है.’’ यह पूछे जाने पर कि उत्तराखंड त्रसदी के समय एनडीएमए ने आपदा से निपटने एवं कार्रवाई के संदर्भ में एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करने की पहल की थी, रेड्डी ने कहा, ‘‘इस पर काफी काम किया गया है. हर मंत्रालय  और एजेंसी से बात की गई है और उनसे कार्ययोजना एवं सुझाव प्राप्त किये गए हैं.’’

Thursday, 3 October 2013

इंदिरा गांधी की राह पर सोनिया गांधी



लोकसभा चुनाव के अब चंद माह रह गए हैं। कांग्रेस खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण विधेयकों के जरिये लोगों तक यह संदेश लेकर जाने की योजना बना रही है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ नारे को उनकी बहु सोनिया गांधी आगे बढ़ा रही हैं। हाल में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआइसीसी) ने खाद्य सुरक्षा विधेयक पर यही उपाय किया था। दोनों विधेयक संसद में पारित हो चुके हैं। कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री की टिप्पणी है कि इंदिरा गांधी ने गरीब और समाज के सबसे दबे कुचले लोगों की भूख और कुपोषण की समस्या समाप्त करने के लिए ‘गरीबी हटाओ’ नारे पर अमल शुरू किया था। उनके अधूरे काम को उनकी बहु सोनिया गांधी पूरा करने की कोशिश कर रही हैं।
1969 में इंदिरा गांधी ने जब बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और रजवाड़ों का प्रीवि पर्स और विशेषाधिकार खत्म किए थे, तब भी विपक्ष उन कदमों का राजनीतिक निहितार्थ समझे बिना इंदिरा के विरोध में लगा रहा। इंदिरा सरकार ने जब प्रीवि पर्स खत्म करने की खातिर संसद में संविधान संशोधन बिल पेश किया तो विपक्ष ने उसे राज्यसभा में एक वोट से गिरा दिया। कांग्रेस संसद में कामयाब नहीं हो पाई मगर उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में उसने विपक्ष को करारी शिकस्त देते हुए 352 सीटें जीती थीं। इंदिरा गांधी हमेशा अपनी पिच पर खेलती थीं और विपक्ष के पास कोई विकल्प नहीं बचने देती थीं। वह विपक्ष को अपने अजेंडे का समर्थन या विरोध करने पर मजबूर कर देती थीं।
यह कहने की जरूरत नहीं कि जब यूपीए सरकार ने फूड सिक्युरिटी बिल पर अध्यादेश लाने का फैसला कर एकबार फिर देश का राजनीतिक अजेंडा अपने हाथ में लेने की कोशिश की थी, तब विपक्ष खास तौर से भाजपा इस पर जिस तरह के सवाल उठा रही है, वह कांग्रेस के पक्ष में जा रहा है। सच तो यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अब इंदिरा गांधी की तरह चुनाव से पहले सटीक राजनीतिक फैसले लेना सीख गई हैं। फूड अध्यादेश उन्हीं के निदेर्शों पर लाया गया है। इंदिरा जी की कार्यशैली के बारे में एकबार अटल बिहारी वाजपेयी बता रहे थे कि वह आपसे पूछती थीं कि चाय लेंगे या कॉफी। हंसते हुए उन्होंने कहा था कि इंदिरा किसी तीसरी चीज की गुंजाइश नहीं छोड़ती थीं। सोनिया ने भी अब देश में बहस का विषय फूड बिल और उसके लिए लाए जाने वाले अध्यादेश को बना दिया है। बीजेपी जिन मुद्दों पर चुनाव चाहती थी, कांग्रेस उन्हें हाशिये पर धकेल कर फिर गरीब और उनका हमदर्द कौन पर बहस को लाना चाहती है। इंदिरा ने जब 1971 में गरीबी हटाओ का नारा दिया था तो उन्होंने कहा था कि मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, ये (विपक्ष) कहते हैं इंदिरा हटाओ। कांग्रेस भी अब कह रही है कि हम कहते हैं कि भूख मिटाओ, ये कहते हैं भूखों को भूल जाओ।
खाद्य सुरक्षा बिल में देश की 80 फीसदी आबादी को भोजन मुहैया कराने की गारंटी, तो भूमि अधिग्रहण बिल से किसानों की इच्छा के बगैर जमीन लेने पर रोक की तैयारी है। कांग्रेसी हलके में चर्चा है कि दोनों ही बिल कांग्रेस को उसी तरह से जीत के दर्शन कराएंगे, जैसे मनरेगा और किसानों की कर्ज माफी ने 2009 में कांग्रेस की राह आसान की थी। खबर यह भी है कि कांग्रेस का ही एक आर्थिक सुधारवादी तबका यह सोचता है कि इससे आर्थिक विकास की गति थमेगी और संकट बढ़ेगा। लेकिन शायद सोनिया गांधी को यकीन है कि महंगाई, घोटालों और नेतृत्वहीनता के गंभीर आरोपों से जूझ रही सरकार के पास चुनाव जीतने का कोई कारगर मंत्र नहीं है, लिहाजा लोक-लुभावन योजनाओं से ही आम आदमी का दिल जीता जा सकता है।
सोनिया गांधी के इस मूड ने एक बार फिर इंदिरा गांधी की याद दिलाई है। इंदिरा गांधी हवा के खिलाफ दो टूक फैसले लेने के लिए जानी जाती थीं। उनकी निर्णय क्षमता पर आलोचक भी सवाल नहीं खड़े करते थे। 1967 के बाद चाहे वह पार्टी के आधिकारिक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी की जगह वी वी गिरि को समर्थन देना हो, या फिर बैंक राष्ट्रीयकरण करना और प्रिवी पर्स खत्म करना हो, या 1971 में बांग्लादेश को आजाद कराने के लिए सेना भेजना हो, या फिर 1984 में स्वर्ण मंदिर से चरमपंथियों को निकालना हो, एक बार तय करने के बाद इंदिरा गांधी हिचकी नहीं। किसी मामूली नेता के लिए सत्तर के दशक में आपातकाल लागू करने का फैसला आसान नहीं होता। इंदिरा गांधी ने न केवल फैसला किया, बल्कि गलती का एहसास होते ही आपातकाल उठा भी लिया। सोनिया गांधी के करीबी लोगों का कहना है कि राजनीति में दिलचस्पी नहीं होने के बाद भी उन्होंने इंदिरा गांधी को काफी करीब से देखा और उनसे काफी कुछ सीखा।यह सच है कि सोनिया गांधी के सामने इंदिरा जैसी चुनौती कभी नहीं रही। न ही उन्हें पार्टी पर नियंत्रण के लिए जद्दोजहद करनी पड़ी। शरद पवार ने जरूर विदेशी मूल का मुद्दा उठाया, पर यह मसला परवान नहीं चढ़ा और हारकर पवार को उनसे ही गठबंधन करना पड़ा, जबकि इंदिरा गांधी को शुरूआती दिनों में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा था। पार्टी पर पुराने दिग्गज और क्षेत्रीय क्षत्रप हावी थे। कामराज, एस निजलिंग्प्पा, मोरारजी देसाई, जगजीवन राम, एस के पाटिल, अतुल्य घोष जैसे लोगों की तूती बोला करती थी। ये सभी लोग जवाहरलाल नेहरू के समकक्ष और सहयोगी थे। इंदिरा गांधी ने इन सबका मुकाबला करने और पार्टी को दक्षिणपंथी नेताओं के चंगुल से बाहर लाने के लिए रातोंरात समाजवादी एजेंडे को आगे किया। लेफ्ट का समर्थन लेकर मोरारजी जैसे तगड़े प्रतिद्वंद्वी और पुराने दिग्गजों को किनारे लगा दिया।यूपीए-दो के समय सोनिया गांधी की तबियत बेहतर नहीं थी और साथ ही राहुल को पार्टी की बागडोर संभालने की ऊहापोह ने पार्टी को काफी समय तक अनिर्णय की स्थिति में डाले रखा। यह ऐसा वक्त था, जब पार्टी और सरकार को लकवा मारने की बात कही जाने लगी। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। कई मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। अर्थव्यवस्था डांवांडोल हुई। पार्टी में निराशा का भाव जगा। चुनाव के पहले ही तमाम नेता कहने लगे कि पार्टी सौ सीट भी ले आए, तो बड़ी बात होगी। सोनिया फिर सक्रिय हुईं। पूरी इंडस्ट्री, बुद्धिजीवी वर्ग और सरकार-पार्टी के एक बड़े तबके के विरोध के बावजूद दोनों बिलों को लाने का फैसला किया।

Thursday, 26 September 2013

वंचित के लिए विशेष योजना

विश्‍व के सभी बड़े धर्मों के अनुयायी भारत में भी हैं। यहां हिन्‍दू बहुसंख्‍यक हैं और राष्‍ट्रीय अल्‍पसंख्‍यक आयोग, अधिनियम, 1992 के तहत मुस्लिमों, सिखों, ईसाइयों, बौद्ध एवं पारसियों को अल्‍पसंख्‍यक का दर्जा प्राप्‍त है। देश के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में अल्‍पसंख्‍यक समुदाय महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। सरकार ने इन समुदायों के सामाजिक-आर्थिक उत्‍थान के लिए समय-समय पर विभिन्‍न कार्यक्रम एवं योजनाएं संचालित की है। इसी के मद्देनजर भारत सरकार ने अल्‍पसंख्‍यक समुदायों के सशक्‍तीकरण और उनकी संस्‍कृति, भाषा एवं धार्मिक स्‍वरूप को बनाए रखने के लिए अल्‍पसंख्‍यक मामलों के मंत्रालय का गठन किया है। इस मंत्रालय का लक्ष्‍य सकारात्‍मक कार्यों तथा समावेशी विकास के जरिए अल्‍पसंख्‍यक समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार लाना है ताकि एक प्रगतिशील देश के निर्माण में हर नागरिक को बराबर के अवसर मिल सकें।
 अल्‍पसंख्‍यक समुदायों की शिक्षा, रोजगार, आर्थिक गतिविधियों में बराबर की हिस्‍सेदारी तथा उनका उत्‍थान सुनिश्चित करने के लिए जून 2006 में अल्‍पसंख्‍यकों के कल्‍याण के लिए प्रधानमंत्री के नए 15 सूत्री कार्यक्रम की घोष्‍णा की गई थी। इसके तहत विभिन्‍न लक्ष्‍यों को निश्चित समयावधि में हासिल किए जाने पर जोर दिया गया है। इस कार्यक्रम के मुख्‍य उद्देश्‍य इस प्रकार हैं : शिक्षा के क्षेत्र में अवसरों को बढ़ावा देना।
मौजूदा एवं नयी योजनाओं के जरिए आर्थिक गतिविधियों एवं रोजगार में अल्‍पसंख्‍यकों की समान हिस्‍सेदारी सुनिश्चित करना, स्‍वरोजगार के लिए ऋण सहायता को बढ़ावा देना तथा राज्‍य एवं केन्‍द्र सरकार की नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्‍व बढ़ाना। बुनियादी सुविधाओं के विकास से जुड़ी योजनाओं में उनकी पर्याप्‍त हिस्‍सेदारी सुनिश्चित करते हुए उनके जीवन स्‍तर में सुधार लाना। सांप्रदायिक हिंसा एवं वैमनस्‍यता की रोकथाम तथा नियंत्रण।
 इस कार्यक्रम का मुख्‍य उद्देश्‍य इस बात को सुनिश्चित करना है कि वंचित तबकों के लिए शुरू की गई विभिन्‍न सरकारी योजनाओं का लाभ अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के वंचित वर्गों तक अवश्‍य पहुंचे। इन योजनाओं का लाभ समान रूप से अल्‍पसंख्‍यकों तक पहुंचाने के लिए इस कार्यक्रम में इस बात पर विशेष ध्‍यान दिया गया है कि अल्‍पसंख्‍यक बहुल क्षेत्रों में विकासात्‍मक परियोजनाओं की निश्चित हिस्‍सेदारी हो।   केन्‍द्र सरकार ने सच्‍चर समिति की रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए कुछ सीमित उपाय भी किए हैं। देश के शैक्षिक रूप से पिछड़े 374 जिलों में प्रत्‍येक में एक मॉडल कॉलेज की स्‍थापना की जाएगी। इन 374 जिलों में से 61 जिलों की पहचान अल्‍पसंख्‍यक बहुल जिलों के रूप में की गई है। जिन क्षेत्रों में अल्‍पसंख्‍यक खासकर मुस्लिम अधिक रहते हैं, वहां के विश्‍वविद्यालयों एवं कॉलेजों में महिला छात्रावास की स्‍थापना व्‍यवस्‍था में विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग से वरीयता का प्रावधान।अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्‍लामिया विश्‍वविद्यालय, नई दिल्‍ली तथा मौलाना आजाद राष्‍ट्रीय उर्दू विश्‍वविद्यालय, हैदराबाद में उर्दू माध्‍यम के शिक्षकों के लिए पेशेवर अकादमियों की स्‍थापना। इसके अलावा केन्‍द्र सरकार ने 2008-09 में बहु-आयामी विकास कार्यक्रम भी शुरू किया है। इस कार्यक्रम का मुख्‍य उद्देश्‍य अल्‍पसंख्‍यक बहुल जिलों में लोगों के जीवन की गुणवत्‍ता में सुधार लाना, विभिन्‍न प्रकार के असन्‍तुलनों को कम करना तथा सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार लाना है। विकास के नजरिए से जो जिले मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, उनके लिए विशेष योजना बनाई गई है, जिसमें स्‍कूली एवं माध्‍यमिक शिक्षा की बेहतर व्‍यवस्‍था, साफ सफाई पर ध्‍यान देना, पक्‍के घरों का निर्माण, स्‍वच्‍छ पेयजल एवं बिजली की उपलब्‍धता तथा आय बढ़ाने वाली लाभार्थी आधारित योजनाएं शामिल हैं। इसमें इस बात पर ध्‍यान दिया गया है कि जीवन स्‍तर में सुधार लाने के लिए बुनियादी सुविधाओं जैसे बेहतर सड़क संपर्क, मूलभूत स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं, कौशल विकास एवं विपणन सुविधाओं का होना जरूरी है।

    

Wednesday, 25 September 2013

गरीबों के कल्याण के लिए यूपीए समर्पित

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने रविवार को 'अनोखे' खाद्य सुरक्षा कानून और ग्रामीण रोजगार योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार का जोर कमजोर तबके के लोगों और महिलाओं के कल्याण पर है। राजस्थान के बाड़मेड़ जिले के पचपदरा में 37,000 करोड़ रुपये लागत से 90 लाख टन वार्षिक क्षमता वाले तेलशोधक एवं पेट्रोकेमिकल परिसर की आधारशिला रखने के बाद विशाल जनसभा को सोनिया गांधी  ने संबोधित किया।
सोनिया गांधी ने कहा कि यूपीए सरकार का सदैव कमजोर तबके के लोगों और महिलाओं को सबल बनाने पर जोर रहा है। हमारी प्राथमिकता है कि विकास हो और समाज के हर तबके को उसका लाभ मिले।
अपने 10 मिनट के भाषण में सोनिया ने यूपीए सरकार की ओर से शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं की खूबियां गिनाई। उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार ने क्रांतिकारी कदम उठाए हैं और संपूर्ण विकास के लिए कानून लागू कराए हैं। उदाहरण के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ने ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए रोजगार सुनिश्चित किया है। उन्होंने कहा कि भुखमरी और कुपोषण को दूर भगाने के लिए सरकार ने खाद्य सुरक्षा विधेयक लाया, जिससे 80 करोड़ लोगों को सीधे लाभ मिलेगा। सोनिया गांधी ने कहा कि इस तेलशोधक से 25,000 लोगों को रोजगार मुहैया हो सकेगा। आने वाले वर्षो में यह क्षेत्र अभूतपूर्व विकास का गवाह बनेगा। रिफाइनरी से होने वाली राजस्व आय का राज्य सरकार आम आदमी की भलाई में इस्तेमाल कर सकेगी। उन्होंने अशोक गहलोत सरकार की ओर से चलाई जा रही लोक कल्याणकारी योजनाओं की सराहना की। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री एम. वीरप्पा मोइली ने कहा कि रिफाइनरी से सृजित होने वाले रोजगार से बाड़मेड़ क्षेत्र के लोग लाभान्वित होंगे।

गरीबों के लिए काम करती है कांग्रेस

               
कांग्रेस गरीबों व आम आदमी की पार्टी है, जिसने सदैव उनके हितों की लड़ाई लड़ी है।कांग्रेस आम आदमी की पार्टी है। इसीलिए इसने लंबे समय तक सत्ता में रहकर गरीबों और आम आदमी की सेवा की है। विपक्षी नेता सिर्फ लंबे-चौड़े वादे करते हैं और अमीरों के लिए काम करते हैं, जबकि कांग्रेस पार्टी गरीबों के साथ खड़ी होती है और उन्हें उनके सपनों को साकार बनाने में मदद करने में यकीन रखती है। लोग आते हैं और लंबे-चौड़े दावे करते हैं। हम लंबे-चौड़े दावे करने में यकीन नहीं करते। हम काम करते हैं। हम चाहते हैं कि आपके बच्चे बड़े सपने देखें। अगर आप सपने नहीं देख पाएंगे तो यह देश आगे भी नहीं बढ़ सकता। जब गरीबों के लिए योजनाओं की बात होती है तो वे लोग पूछते हैं कि पैसा कहां से आएगा, परंतु जब खदानें आबंटित होती हैं और जमीनों का अधिग्रहण होता है तो कोई सवाल नहीं पूछता। यही इन दलों और कांग्रेस के बीच अंतर है। केंद्र सरकार ने समाज के सभी वर्गो का ख्याल रखा है। विशेषकर गरीबों के लिए खाद्य बिल पारित करा लागू कराया।खाद्य सुरक्षा विधेयक, भूमि अधिग्रहण विधेयक तथा मनरेगा जैसे संप्रग सरकार सभी योजनाओ को आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के उत्थान के लिए बनाया गया है। कांग्रेस सरकार चाहती है कि देश में पुल बने, सड़क बनें और रेल लाइन बनें पर विपक्ष गरीबों के बारे में नहीं सोंचता है।  विपक्ष चाहता है कि सत्‍ता की ताकत मात्र कुछ लोगों तक ही सीमित होकर रह जाये, कुछ पांच सौ, हजार लोग तरक्‍की करें, लेकिन हम चाहते हैं कि एक गरीब किसान का बेटा पायलेट बने हवाई जहाज उड़ाये। विपक्षी नेता सिर्फ लंबे-चौड़े वादे करते हैं और अमीरों के लिए काम करते हैं, जबकि हमारी पार्टी गरीबों के साथ खड़ी होती है|
गांव के गरीबों और आम भूमिहीनों के बारे में केन्द्र सरकार ने भारी-भरकम धनराशि अपने खजाने से निकाल दी। ग्रामीण क्षेत्रों में आम गरीब को घर बनाने के लिए सरकार ने मदद का हाथ तो बढ़ाया ही ही, साथ ही भूमिहीनों को घर के लिए जमीन खरीदने का दोगुना पैसा देने के लिये भी सरकार ने खजाने को खोल दिया।  कांग्रेस नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार के ताजा फैसले से सरकारी खजाने से 4 हजार करोड़ रुपये की धनराशि गरीबों के सपनों का घर बनाने में खर्च करने हेतु दिये जाने का अनुमान है। चालू वित्त वर्ष में इंदिरा आवास की मद में जहां 11 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, वहीं आगामी वित्त वर्ष 2013-14 में यह राशि बढ़कर 15 हजार करोड़ रुपये हो जाएगी। ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने ‘इंदिरा आवास योजना’ को गरीबी रेखा से नीचे रह रहे परिवारों खासतौर से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति, मुक्त बंधुआ मजदूरों और शारीरिक रुप से अक्षम लोगों को निर्माण/आवास के लिए सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किया था।

भूमिहीन लाभार्थियों के लिए भी केन्द्र सरकार ने बड़ी राहत देते हुए ऐलान किया कि जिस जमीन पर भूमिहीन अपना आवास बनायेगा उस जमीन को खरीदने के लिए मिलने वाली मदद अब पहले की तुलना में दोगुनी हो जायेगी। इस पहल को बीते दिनों भूमिहीनों को सरकार की तरफ से दिये गये वादे को पूरा करने के रूप में भी देखा जा रहा है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले ऐसे ग्रामीणों को जिनके पास न तो कृषि भूमि है और न ही मकान बनाने के लिए जगह है पहले 10 हजार प्रति आवास की धनराशि मिलती थी अब यह बढ़कर 20 हजार रुपये हो गई है। प्रत्येक आवासीय इकाई में शौचालय बनाने के लिए 9 हजार रुपये अलग से दिए जाएंगे। भूमिहीनों के लिये इंदिरा आवास हेतु जमीन खरीदने का आग्रह केवल सात राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, केरल, महाराष्ट्र, सिक्किम, उत्तर प्रदेश और राजस्थान ने ही किया है। विकास की दुहाई देने वाले बाकी राज्य केन्द्र सरकार की इस योजना का लाभ गरीबों तक पहुंचाने में अभी भी कोताही कर रहे हैं।