Friday, 13 November 2015


जय जवाहरलाल की

'हम कोटि-कोटि कुटुम्बियों की और विश्व विशाल की,
सुख-शांति-चिंता थी, तुम्हारी सहचरी चिरकाल की।
तुम जागते थे रात में भी, जबकि सोते थे सभी,
जन-मात्र की सच्ची विजय है, जय जवाहरलाल की।'
- मैथिलीशरण गुप्त की कविता 'जय' से



नेहरू जी यह जानते थे कि देश को आजादी मिलने के बाद देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ देश को मजबूत बनाया जाना बड़ा जरूरी है। भारत के आजाद होने के पहले ही चीन भी साम्राज्यवादी राजतंत्र से आजाद हुआ था। नेहरू की सर्वभौम वैश्विक दृष्टि थी। उनकी सोच यही थी कि नए आजाद हुए एशियाई देशों में सहयोग और भाईचारे की भावना जरूरी है तभी वे गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी जैसी चुनौतियों से पार पा सकेंगे। उन्होंने चीन के साथ पंचशील का समझौता इसी उद्देश्य से किया था कि देश के सैन्य संसाधनों का अनाश्यक विस्तार न करते हुए देश निर्माण पर ध्यान दिया जाए। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू एक गांव में पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों से सवाल किया कि आप अक्सर भारत माता की जय का नारा लगाते हैं, क्या आप बता सकते हैं भारत माता कौन है। कोई जवाब नहीं मिला तो नेहरू बोले हमारे पहाड़, नदियां, जंगल, जमीन, वन संपदा,खनिज... यही तो भारत माता है।
आप भारत माता की जय का नारा लगाते हैं तो आप हमारे प्राकृतिक संसाधनों की जय ही करते हैं। नेहरू कहते थे हिन्दुस्तान एक ख़ूबसूरत औरत नहीं है। नंगे किसान हिन्दुस्तान हैं। वे न तो ख़ूबसूरत हैं, न देखने में अच्छे हैं- क्योंकि ग़रीबी अच्छी चीज़ नहीं है, वह बुरी चीज़ है। इसलिए जब आप 'भारतमाता' की जय कहते हैं- तो याद रखिए कि भारत क्या है, और भारत के लोग निहायत बुरी हालत में हैं- चाहे वे किसान हों, मजदूर हों, खुदरा माल बेचने वाले दूकानदार हों,और चाहे हमारे कुछ नौजवान हों। नेहरू की इसी सोच के चलते उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है। उन्होंने भाखड़ा नंगल डेम, बीएचईएल (बिजली के भारी उपकरणों का उद्योग) आईआईटी, एम्स, नेशनल इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी की स्थापना की। नेहरू ने गांधी की आर्थिक संकल्पना को व्यवहारवादी रुख देते हुए देश में बड़े कारखानों, तकनीकी प्रगति और वैज्ञानिक सोच को समाविष्ट किया।
देश के प्रथम प्रधानमंंत्री की घरेलू नीति चार स्तंभों पर थी लोकतंत्र, समाजवाद,एकता और धर्मनिरपेक्षता। नेहरू ने अपने कार्यकाल के दौरान इन चारों स्तंभों को मजबूती प्रदान की। नेहरू एक आइकॉन थे। उनके आदर्श और राजनीतिक कुशलता का सम्मान विदेशों में भी किया जाता था। देश के जनमानस को आधुनिक मूल्य और विचारों से नेहरू ने ही संपृक्त कराया। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को सदा ही महत्व दिया। उन्होंने हमेशा देश की एकता बनाए रखने का प्रयास किया। वे जातीय अस्मिताओं और विविध धार्मिक समूहों वाले इस देश को वैज्ञानिक नवाचार और तकनीकी प्रगति के आधुनिक युग में लेकर गए। समाज में हाशिए के लोग और गरीब उनकी चिंता के केंद्र थे। लोकतात्रिंक मूल्यों में नेहरू ने सदैव पूर्ण आस्था रखी।
नेहरू को खास तौर पर हिंदू सिविल कोड लागू करने के लिए याद किया जाता है, इसी की बदौलत हिंदू औरतें उत्तराधिकार और संपत्ति में पुरुषों के साथ बराबरी का दर्जा पा सकीं। नेहरू ने ही हिंदू कानून में बदलाव लाकर जातिगत भेदभाव को आपराधिक कृत्य की श्रेणी में ला दिया। नेहरू ने ही पांच वर्षीय योजना में देश के सभी बच्चों को अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा देने की गारंटी दी।
नेहरू के अनुसार भारत की सेवा का अर्थ, करोड़ों पीड़ितों की सेवा है। इसका अर्थ दरिद्रता और अज्ञान, और अवसर की विषमता का अन्त करना है। नेहरू की आकांक्षा यही रही कि प्रत्येक आँख के प्रत्येक आँसू को पोंछ दिया जाए, ऐसा करना हमारी शक्ति से बाहर हो सकता है, लेकिन जब तक आँसू हैं और पीड़ा है, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा।
पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने घर पर निजी शिक्षकों से प्राप्त की। पंद्रह साल की उम्र में वे इंग्लैंड चले गए और हैरो में दो साल रहने के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया जहाँ से उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। 1912 में भारत लौटने के बाद वे सीधे राजनीति से जुड़ गए। यहाँ तक कि छात्र जीवन के दौरान भी वे विदेशी हुकूमत के अधीन देशों के स्वतंत्रता संघर्ष में रुचि रखते थे। उन्होंने आयरलैंड में हुए सिनफेन आंदोलन में गहरी रुचि ली थी। उन्हें भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनिवार्य रूप से शामिल होना पड़ा।
1912 में उन्होंने एक प्रतिनिधि के रूप में बांकीपुर सम्मेलन में भाग लिया एवं 1919 में इलाहाबाद के होम रूल लीग के सचिव बने। 1916 में वे महात्मा गांधी से पहली बार मिले जिनसे वे काफी प्रेरित हुए। उन्होंने 1920 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में पहले किसान मार्च का आयोजन किया। 1920-22 के असहयोग आंदोलन के सिलसिले में उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा।
पंडित नेहरू सितंबर 1923 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव बने। उन्होंने 1926 में इटली, स्विट्जरलैंड, इंग्लैंड, बेल्जियम, जर्मनी एवं रूस का दौरा किया। बेल्जियम में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में ब्रुसेल्स में दीन देशों के सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने 1927 में मास्को में अक्तूबर समाजवादी क्रांति की दसवीं वर्षगांठ समारोह में भाग लिया। इससे पहले 1926 में, मद्रास कांग्रेस में कांग्रेस को आजादी के लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध करने में नेहरू की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन के खिलाफ एक जुलूस का नेतृत्व करते हुए उन पर लाठी चार्ज किया गया था। 29 अगस्त 1928 को उन्होंने सर्वदलीय सम्मेलन में भाग लिया एवं वे उनलोगों में से एक थे जिन्होंने भारतीय संवैधानिक सुधार की नेहरू रिपोर्ट पर अपने हस्ताक्षर किये थे। इस रिपोर्ट का नाम उनके पिता श्री मोतीलाल नेहरू के नाम पर रखा गया था। उसी वर्ष उन्होंने ‘भारतीय स्वतंत्रता लीग’ की स्थापना की एवं इसके महासचिव बने। इस लीग का मूल उद्देश्य भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से पूर्णतः अलग करना था।
1929 में पंडित नेहरू भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन के लाहौर सत्र के अध्यक्ष चुने गए जिसका मुख्य लक्ष्य देश के लिए पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना था। उन्हें 1930-35 के दौरान नमक सत्याग्रह एवं कांग्रेस के अन्य आंदोलनों के कारण कई बार जेल जाना पड़ा। उन्होंने 14 फ़रवरी 1935 को अल्मोड़ा जेल में अपनी ‘आत्मकथा’ का लेखन कार्य पूर्ण किया। रिहाई के बाद वे अपनी बीमार पत्नी को देखने के लिए स्विट्जरलैंड गए एवं उन्होंने फरवरी-मार्च, 1936 में लंदन का दौरा किया। उन्होंने जुलाई 1938 में स्पेन का भी दौरा किया जब वहां गृह युद्ध चल रहा था। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने से कुछ समय पहले वे चीन के दौरे पर भी गए।
पंडित नेहरू ने भारत को युद्ध में भाग लेने के लिए मजबूर करने का विरोध करते हुए व्यक्तिगत सत्याग्रह किया, जिसके कारण 31 अक्टूबर 1940 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें दिसंबर 1941 में अन्य नेताओं के साथ जेल से मुक्त कर दिया गया। 7 अगस्त 1942 को मुंबई में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में पंडित नेहरू ने ऐतिहासिक संकल्प ‘भारत छोड़ो’ को कार्यान्वित करने का लक्ष्य निर्धारित किया। 8 अगस्त 1942 को उन्हें अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर अहमदनगर किला ले जाया गया। यह अंतिम मौका था जब उन्हें जेल जाना पड़ा एवं इसी बार उन्हें सबसे लंबे समय तक जेल में समय बिताना पड़ा। अपने पूर्ण जीवन में वे नौ बार जेल गए। जनवरी 1945 में अपनी रिहाई के बाद उन्होंने राजद्रोह का आरोप झेल रहे आईएनए के अधिकारियों एवं व्यक्तियों का कानूनी बचाव किया। मार्च 1946 में पंडित नेहरू ने दक्षिण-पूर्व एशिया का दौरा किया। 6 जुलाई 1946 को वे चौथी बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए एवं फिर 1951 से 1954 तक तीन और बार वे इस पद के लिए चुने गए।

Tuesday, 10 November 2015

कांग्रेस की सात गुना छलांग

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार विजय के सूत्रधार हैं और राहुल गांधी गठबंधन के सूत्रधार हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की प्रभावशाली भूमिका के बिना महागठबंधन संभव नहीं होता।  जिस समय राजद प्रमुख को इस बारे में आपत्तियां थी, तब राहुल ने नीतीश कुमार और लालू प्रसाद को साथ लाने में बड़ी भूमिका निभाई। बिहार की विजय राहुल गांधी के पार्टी प्रमुख बनने का सही समय है।  वैसे इस मुद्दे पर कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी और राहुल गांधी को फैसला करना है।
कांग्रेस के लिए बिहार चुनावों में गठबंधन का रास्ता काफी फायदेमंद साबित हुआ है। परिणाम दर्शाते हैं कि पार्टी ने जिन 41 सीटों पर चुनाव लड़ा था उनमें से 27 पर वह जीत दर्ज करने में कामयाब रही। 2010 के विधानसभा चुनावों में इसे सिर्फ चार सीटें मिली थीं जबकि उसने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इस बार कम सीट पर चुनाव लड़ने के कारण उसका मत प्रतिशत भी कम हो गया जो 2010 में 8.37 फीसदी के मुकाबले 6.7 फीसदी रहा । पिछले चुनावों में पार्टी के 216 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी।
इस चुनाव में पार्टी के हिसाब से देखें तो मत प्रतिशत के मामले में कांग्रेस चौथे स्थान पर है। पिछले वर्ष मई के लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी के लिए बिहार एक बड़ी जीत है। लोकसभा चुनावों में पार्टी महज 44 सीटों पर सिमट कर रह गई है। पार्टी ने महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था. दिल्ली में तो कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला था।
भारत की आजादी के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अविभाजित बिहार की 324 विधानसभा सीटों में से 239 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2010 में बिहार के विभाजित होने के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस ने अपना सबसे खराब प्रदर्शन दिया और 243 विधानसभा सीटों में से मात्र 4 सीटें हासिल कीं। साल 2014 के उपचुनावों में कांग्रेस ने एक और सीट जीती।
ऐसे में इन चुनावों में 5 से 27 सीटों तक का सफर तय करके कांग्रेस ने शानदार कमबैक किया है. मंडल दौर के बाद लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक कद में दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ोतरी हुई। साल 1995 के चुनावों में कांग्रेस मात्र 29 सीटों पर सिमट गई। बीजेपी इन चुनावों में 41 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी पार्टी बनने में सफल हुई।  साल 2000 में लालू यादव ने कांग्रेस के 23 विधायकों को राबड़ी देवी कैबिनेट में शामिल किया। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सदानंद सिंह को असेंबली स्पीकर भी बनाया गया।
इसके बाद कांग्रेस ने दोबारा कभी बिहार में अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने की मजबूत कोशिश नहीं की। प्रदेश स्तर पर किसी ओबीसी या महादलित नेता को भी तैयार नहीं किया गया। कांग्रेस को बिहार की राजनीति में की हुईं गलतियों से सबक नहीं लेने का परिणाम 2005 के चुनावों में मिल गया। इन चुनावों में कांग्रेस के हाथ मात्र 5 सीटें आईं, अगले चुनावों (2010) में कांग्रेस सिर्फ चार सीटें हासिल कर सकी।
इसके पांच साल बाद 2015 में कांग्रेस ने न चुनावों में लालू और नीतीश ने कांग्रेस के उम्मीदवारों को चुना। यही नहीं चुनाव के दौरान सोनिया गांधी ने 6 और राहुल गांधी ने 10 रैलियां कीं। इस चुनाव की पूरी जिम्मेदारी लालू और नीतीश ने अपने कंधों पर संभाली और कांग्रेस को 41 में से 27 सीटों पर जीत दिलाई।
हालांकि, कांग्रेस ने बिहार की राजनीति में वापसी की है लेकिन इसे बरकरार रखने के लिए कांग्रेस को बिहार में नेताओं की नई फौज तैयार करनी पड़ेगी.

Saturday, 7 November 2015

जीती जनता, नीतीश कुमार को बधाई

विभिन्न लोगो की राय अलग अलग है लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि हमारा समाज परिपक्व है व चुनाव में धन बल व प्रचार का महत्व होते हुये भी निर्णायक नही है ।निर्णायक भूमिका है वर्तमान सरकार के नेतृत्व की कार्यप्रणाली व उसकी छवि तथा उसके विपरीत मैदान में मुख्य विपक्षी दल के नेतृत्व व स्वीकार्यता । गत चुनावों में केन्द्र ,राजस्थान,महाराष्ट्र व हरियाना में सरकारों को बुरी तरह हराना,झारखण्ड में दोनो पक्षों मे किसी का विश्वसनीय न होनेपर निर्णायक बहुमत किसी को न देना तथा मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में अच्छा कार्य करने वाले नेतृत्व को जनता ने आशीर्वाद दिया था ।उसी क्रम में नितिश के नेतृत्व में अपना मत देकर जनता ने उनकी कार्य प्रणाली की स्वीकार्यता पर मुहर लगाया है क्योंकि उनके सामने कोई विश्वसनीय स्थानीय नेतृत्व नहीं था । पर नितिश जी को लालू की छवी व उनके तौर तरीक़ों से सतर्क रहना होगा ।लेकिन बिहार अभी भी जातिवाद के कोढ़ से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाया है ।देखे शायद नई पीढ़ी इस कोढ़ से मुक्ति दिला दे क्योकि जातिवाद राजनिति के पोषक नेताओं का अस्पताल अब पास ही है ।

बिहार के 243 सदस्यीय विधानसभा चुनाव केजो नतीजे सामने आ रहे हैं वो बता रहे हैं कि नीतीश कुमार और लालू यादव के बवंडर में मोदी लहर पूरी तरह हवा हो गई। महागठबंधन बंपर बहुमत की तरफ बढ़ रहा है। एनडीए गठबंधन 100 सीटों से भी कम पर सिमटता दिख रहा है। रुझानों के बाद जहां बीजेपी खेमे में खामोशी है और बैठकों का दौर शुरू हो गया है, वहीं महागठबंधन  खेमे में जबरदस्त उत्साह और जश्न का माहौल है। आज सुबह लालू यादव ने कहा था, गुड मॉर्निंग हम जीत रहे हैं। लालू की ये बात सही भी साबित हुई। 
बिहार विधानसभा चुनाव के लिए पिछले एक माह से जारी चुनाव नतीजों  के रुझानों से तय हो गया है कि जेडीयू नीत महागठबंधन को बहुमत मिल रहा है। बीजेपी के लिए ये नतीजे किसी झटके से कम नहीं। बीजेपी गठबंधन 100 से भी कम सीटों पर सिमट गया। आइए उन कारणों के बारे में जानते हैं जिससे महागठबंधन को इतनी बड़ी कामयाबी मिलती दिख रही है। बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह इस बार पूरी तरह विफल रहे। बीजेपी की चुनावी रणनीति शुरुआत से ही संदेहों के घेरे में रही। विकास के मुद्दे से शुरू हुआ चुनाव प्रचार हर चरण के साथ बदलते हुए आरक्षण के रास्ते कब ध्रुवीकरण और बदजुबानी तक पहुंच गया पता ही नहीं चला। बीजेपी नेता कभी बीफ तो कभी पाकिस्तान में पटाखे छूटने की बात करते रहे और नीतीश कुमार मीडिया हलचल से दूर अपनी रणनीति को अमल में लाते रहे। नीतीश ने लालू को बीजेपी का मुकाबला करने के आगे बढ़ाकर अपनी योजना को सफल बनाने में लगे रहे और यहां बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह नीतीश के चुनावी रणनीति को समकझने में नाकाम रहे। बीजेपी कभी पीएम मोदी के जाति बताकर जातीय समीकरण साधते दिखी तो कभी संघ के संग ध्रुवीकरण लेकिन कुल मिलाकर चुनावी रमनीति स्पष्ट न होने के खामियाजा भुगतना पड़ा।
एक बात स्पष्ट है कि मात्र लफ्फाबाजी व अनर्गल / दुष्प्रचार से चुनाव जीत पाना सम्भव नहीं है व जनता के आशिर्वाद के लिये सरकारों को काम करना होगा व अपनी छवि में सुधार करना होगा यानि विकास, नेतृत्व की सत्यनिष्ठा प्रदर्शित करनी होगी ।
यह देश व देशवासियों के लिये शुभ संदेश /समाचार है ।
जय भारत,जय लोक तन्त्र,जय समाजवाद व जय जनता जनार्दन ।।

Friday, 30 October 2015

स्वयं को सफल साबित किया इंदिरा गाँधी ने



भारत के जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, उन सभी की अनेक विशेषताएँ हो सकती हैं, लेकिन इंदिरा गाँधी के रूप में जो प्रधानमंत्री भारत भूमि को प्राप्त हुआ, वैसा प्रधानमंत्री अभी तक दूसरा नहीं हुआ है क्योंकि एक प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने विभिन्न चुनौतियों का मुक़ाबला करने में सफलता प्राप्त की। युद्ध हो, विपक्ष की ग़लतियाँ हों, कूटनीति का अंतर्राष्ट्रीय मैदान हो अथवा देश की कोई समस्या हो- इंदिरा गाँधी ने अक्सर स्वयं को सफल साबित किया। इंदिरा गाँधी, नेहरू के द्वारा शुरू की गई औद्योगिक विकास की अर्द्ध समाजवादी नीतियों पर क़ायम रहीं। उन्होंने सोवियत संघ के साथ नज़दीकी सम्बन्ध क़ायम किए और पाकिस्तान-भारत विवाद के दौरान समर्थन के लिए उसी पर आश्रित रहीं। जिन्होंने इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल को देखा है, वे लोग यह मानते हैं कि इंदिरा गाँधी में अपार साहस, निर्णय शक्ति और धैर्य था।
इंदिरा प्रियदर्शिनी को परिवार के माहौल में राजनीतिक विचारधारा विरासत में प्राप्त हुई थी। यही कारण है कि पति फ़ीरोज़ गाँधी की मृत्यु से पूर्व ही इंदिरा गाँधी प्रमुख राजनीतिज्ञ बन गई थीं। कांग्रेस पार्टी की कार्यकारिणी में इनका चयन 1955 में ही हो गया था। वह कांग्रेस संसदीय मंडल की भी सदस्या रहीं। पंडित नेहरू इनके साथ राजनीतिक परामर्श करते और उन परामर्शों पर अमल भी करते थे।
इंदिरा गाँधी को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने के आरोप उस समय पंडित नेहरू पर लगे। 1959 में जब इंदिरा को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तो कई आलोचकों ने दबी जुबान से पंडित नेहरू को पार्टी में परिवारवाद फैलाने का दोषी ठहराया था। लेकिन वे आलोचना इतने मुखर नहीं थे कि उनकी बातों पर तवज्जो दी जाती। वस्तुतः इंदिरा गाँधी ने समाज, पार्टी और देश के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किए थे। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्राप्त थी। विदेशी राजनयिक भी उनकी प्रशंसा करते थे। इस कारण आलोचना दूध में उठे झाग की तरह बैठ गई। कांग्रेस अध्यक्षा के रूप में इंदिरा गाँधी ने अपने कौशल से कई समस्याओं का निदान किया। उन्होंने नारी शाक्ति को महत्त्व देते हुए उन्हें कांग्रेस पार्टी में महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किए। युवा शक्ति को लेकर भी उन्होंने अभूतपूर्व निर्णय लिए। इंदिरा गाँधी 42 वर्ष की उम्र में कांग्रेस अध्यक्षा बनी थीं।
पाकिस्तान से युद्ध के बाद इंदिरा गाँधी ने अपना सारा ध्यान देश के विकास की ओर केंद्रित कर दिया। संसद में उन्हें बहुमत प्राप्त था और निर्णय लेने में स्वतंत्रता थी। उन्होंने ऐसे उद्योगों को रेखांकित किया जिनका कुशल उपयोग नहीं हो रहा था। उनमें से एक बीमा उद्योग था और दूसरा कोयला उद्योग। बीमा कंपनियाँ भारी मुनाफा अर्जित कर रही थीं। लेकिन उनकी पूँजी से देश का विकास नहीं हो रहा था। वह पूँजी निजी हाथों में जा रही थी। बीमा कंपनियों के नियमों में पारदर्शिता का अभाव होने के कारण जनता को वैसे लाभ नहीं प्राप्त हो रहे थे, जैसे होने चाहिए थे। लिहाज़ा अगस्त, 1972 में बीमा कारोबार का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
15 जून, 1975 को जे.पी. और समर्थिक विपक्ष ने आंदोलन को उग्र रूप दे दिया। साथ ही यह तय किया गया कि पूरे देश में सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाया जाए और प्रधानमंत्री आवास को भी घेर लिया जाए। आवास में मौजूद लोगों को नज़रबंद करके किसी को भी अंदर प्रविष्ट न होने दिया जाए। इन्हीं परिस्थितियों के कारण प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने 25 जून, 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की हस्ताक्षरित स्वीकृति प्राप्त कर ली। इस प्रकार 26 जून, 1975 की प्रातः देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। आपातकाल लागू होने के बाद जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और अन्य सैकड़ों छोटे-बड़े नेताओं को गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया। ऐसा माना जाता है कि आपातकाल के दौरान एक लाख व्यक्तियों को देश की विभिन्न जेलों में बंद किया गया था। इनमें मात्र राजनीतिक व्यक्ति ही नहीं, आपराधिक प्रवृत्ति के लोग भी थे जो ऐसे आंदोलनों के समय लूटपाट करते हैं। साथ ही भ्रष्ट कालाबाज़ारियों और हिस्ट्रीशीटर अपराधियों को बंद कर दिया गया।
अभी तीन वर्ष भी पूर्ण नहीं हुए थे कि जनता पार्टी में दरारें पड़ गईं और देश को मध्यावधि चुनाव का भार झेलना पड़ा। इंदिरा गाँधी ने देश में घूम-घूमकर चुनाव प्रचार के दौरान आपातकाल के लिए शर्मिंदगी का इजहार किया और काम करने वाली सुदृढ़ सरकार का नारा दिया। लोगों को यह नारा काफ़ी पसंद आया और चुनाव के बाद नतीजों ने यह प्रमाणित भी कर दिया। इंदिरा कांग्रेस को 592 में से 353 सीटें प्राप्त हुईं और स्पष्ट बहुमत के कारण केंद्र में इनकी सरकार बनी। इंदिरा गाँधी पुनः प्रधानमंत्री बन गईं। इस प्रकार 34 महीनों के बाद वह सत्ता पर दोबारा क़ाबिज हुईं। जनता पार्टी ने 1977 में सत्ता में आने के बाद कई राज्यों की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया था। उस समय उसने यह तर्क दिया कि जनता का रुझान जनता पार्टी के साथ है, अतः नए चुनाव होने चाहिए। इंदिरा गाँधी ने सत्ता में आने के बाद जनता पार्टी द्वारा आरंभ की गई परिपाटी पर चलकर उन प्रदेशों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया जहाँ जनता पार्टी तथा विपक्ष का शासन था। बाद में हुए इन राज्यों के चुनावों में कांग्रेस ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। 22 राज्यों में से 15 राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकार बन गई। यह चुनाव जून 1980 में संपन्न हुए थे।
उड़ीसा में जबरदस्त चुनाव प्रचार के बाद इंदिरा गांधी 30 अक्टूबर की शाम दिल्ली पहुंची थीं। आमतौर पर जब वो दिल्ली में रहती थीं तो उनके घर एक सफदरजंग रोड पर जनता दरबार लगाया जाता था। लेकिन ये भी एक अघोषित नियम था कि अगर इंदिरा दूसरे शहर के दौरे से देर शाम घर पहुंचेंगी तो अगले दिन जनता दरबार नहीं होगा। 30 तारीख की शाम को भी इंदिरा से कहा गया कि वो अगले दिन सुबह के कार्यक्रम रद्द कर दें। लेकिन इंदिरा ने मना कर दिया। वो आइरिश फिल्म डायरेक्टर पीटर उस्तीनोव को मुलाकात का वक्त दे चुकी थीं।

एसीपी दिनेश चंद्र भट्ट बताते हैं कि जैसे एक नॉर्मल तरीका होता है। सुबह उठकर आप जनता से मिलते हैं तो उस दिन एक बिजी शिड्यूल था। उनके इंटरव्यू के लिए बाहर से एक टीम आई हुई थी। पीटर उस्तीनोव आए। उन लोगों ने अपना सर्वे किया। ये देखा कि खुली जगह पर इंटरव्यू करना चाहिए। वहां दीवाली के पटाखे पड़े हुए थे। उसको साफ-वाफ करवा कर वैसा इंतजाम करवाया गया तो उसमें कुछ वक्त लग रहा था।
दरअसल पीटर इंदिरा गांधी पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बना रहे थे। इस बीच सुबह के आठ बजे इंदिरा गांधी के निजी सचिव आर के धवन एक सफदरजंग रोड पहुंच चुके थे। धवन जब इंदिरा गांधी के कमरे में गए तो वो अपना मेकअप करा रही थीं। इंदिरा ने पलटकर उन्हें देखा। दीवाली के पटाखों को लेकर थोड़ी नाराजगी भी दिखाई और फिर अपना मेकअप पूरा कराने में लग गईं।
अब तक घड़ी ने 9 बजा दिए थे। लॉन भी साफ हो चुका था और इंटरव्यू के लिए सारी तैयारियां भी पूरी थीं। चंद मिनटों में ही इंदिरा एक अकबर रोड की तरफ चल पड़ीं। यहीं पर पेंट्री के पास मौजूद था हेड कॉन्सटेबल नारायण सिंह। नारायण सिंह की ड्यूटी आइसोलेशन कैडर में होती थी। साढ़े सात से लेकर 8.45 तक पोर्च में ड्यूटी करने के बाद वो कुछ देर पहले ही पेंट्री के पास आकर खड़ा हुआ था। इंदिरा को सामने से आते देख उसने अपनी घड़ी देखी। वक्त हुआ था 9 बजकर 05 मिनट। आर के धवन भी उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। दूरी करीब तीन से चार फीट रही होगी। तभी वहां से एक वेटर गुजरा। उसके हाथ में एक कप और प्लेट थी। वेटर को देखकर इंदिरा थोड़ा ठिठकीं। पूछा कि ये कहां लेकर जा रहे हो। उसने जवाब दिया इंटरव्यू के दौरान आइरिश डायरेक्टर एक-टी सेट टेबल पर रखना चाहते हैं। इंदिरा ने उस वेटर को तुरंत कोई दूसरा और अच्छा टी-सेट लेकर आने को कहा। ये कहते हुए ही इंदिरा आगे की ओर बढ़ चलीं। ड्यूटी पर तैनात हेड कॉन्सटेबल नारायण सिंह के साथ छाता लेकर उनके साथ हो लिया।
तेज कदमों से चलते हुए इंदिरा उस गेट से करीब 11 फीट दूर पहुंच गई थीं जो एक सफदरजंग रोड को एक अकबर रोड से जोड़ता है। नारायण सिंह ने देखा कि गेट के पास सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह तैनात था। ठीक बगल में बने संतरी बूथ में कॉन्सटेबल सतवंत सिंह अपनी स्टेनगन के साथ मुस्तैद खड़ा था।
आगे बढ़ते हुए इंदिरा गांधी संतरी बूथ के पास पहुंची। बेअंत और सतवंत को हाथ जोड़ते हुए इंदिरा ने खुद कहा-नमस्ते। उन्होंने क्या जवाब दिया ये शायद किसी को नहीं पता लेकिन बेअंत सिंह ने अचानक अपने दाईं तरफ से .38 बोर की सरकारी रिवॉल्वर निकाली और इंदिरा गांधी पर एक गोली दाग दी। आसपास के लोग भौचक्के रह गए। सेकेंड के अंतर में बेअंत सिंह ने दो और गोलियां इंदिरा के पेट में उतार दीं। तीन गोलियों ने इंदिरा गांधी को जमीन पर झुका दिया। उनके मुंह से एक ही बात निकली-ये क्या कर रहे हो। इस बात का भी बेअंत ने क्या जवाब दिया ये शायद किसी को नहीं पता। लेकिन तभी संतरी बूथ पर खड़े सतवंत की स्टेनगन भी इंदिरा गांधी की तरफ घूम गई। जमीन पर नीचे गिरती हुई इंदिरा गांधी पर कॉन्सटेबल सतवंत सिंह ने एक के बाद एक गोलियां दागनी शुरु कीं। लगभग हर सेकेंड के साथ एक गोली। एक मिनट से कम वक्त में सतवंत ने अपनी स्टेन गन की पूरी मैगजीन इंदिरा गांधी पर खाली कर दी। स्टेनगन की तीस गोलियों ने इंदिरा के शरीर को भूनकर रख दिया।

Tuesday, 27 October 2015

भगवान वाल्मीकि का संदेश, हर वर्ग बने सक्षम




भगवान वाल्मीकि ने पूरी मानवता को शिक्षा ग्रहण करने और ज्ञान का प्रकाश फैलाने का संदेश दिया। दयावान वाल्मीकि भगवान जी ने सर्वप्रथम दुनिया को दया और अहिंसा का पाठ पढ़ाया और शांति का संदेश दिया। वह किसी को भी दुखी नहीं देख सकते थे। एक दिन जब वह तमसा नदी के घाट पर नित्य की तरह स्नान के लिए गए तो पास ही क्रौंच पक्षियों का जोड़ा जो कभी भी एक-दूसरे से अलग नहीं रहता था, विचरण कर रहा था। उसी समय एक निषाद ने उस जोड़े में से नर पक्षी को बाण से मार डाला। यह देखकर महर्षि का हृदय बहुत दुखी हुआ। उन्होंने निषाद से कहा कि यह अधर्म हुआ है। निषाद तुझे नित्य निरंतर कभी भी शांति न मिले क्योंकि तूने बिना किसी अपराध के इसकी हत्या कर डाली। ऐसा कह कर जब महर्षि ने अपने कथन पर विचार किया तब उनके मन में बड़ी चिंता हुई कि पक्षी के शोक से पीड़ित होकर मैंने क्या कह डाला। अंतत: उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं ऐसे ही श्लोकों में रामायण काव्य की रचना करूं।
सामर्थ्यशाली, सर्वशक्तिमान, महाज्ञानी, परमबुद्धिमान वाल्मीकि भगवान को संपूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति के नाविक, महाकाव्य रामायण के निर्माता, आदिकवि महर्षि, दयावान व संस्कृत कविता के पितामाह के रूप में जाना व माना जाता है। इस महाकाव्य रामायण में इन्होंने चौबीस हजार श्लोक, एक सौ आख्यान, पांच सौ सर्ग और उत्तरकांड सहित सात कांडों का प्रतिपादन किया है। इस महाकाव्य में महापराक्रम, लोकप्रियता, क्षमा, सौम्यभाव तथा सत्यशीलता का वर्णन है जो भारतीय संस्कृति, सभ्यता, साहित्य और समाज की अमूल्य निधि है। श्रीमद् वाल्मीकि महाकाव्य रामायण विश्व का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें मानवीय जीवन के प्रभावशाली आदर्श हैं। इस महाकाव्य में धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक क्षेत्र के समूह संबंधों के आदर्श रूप वॢणत मिलते हैं। भगवान वाल्मीकि जी ने राम कथा के माध्यम से मानव संस्कृति के शाश्वत और स्वर्णिम तत्वों का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है जो अनुपम और दिव्य है। समाज और राष्ट्र को उन्नत तथा स्वस्थ बनाने के लिए व्यक्ति का चरित्र विशेष महत्व रखता है। चरित्र के निर्माण के लिए परिवार के महान योगदान को श्रीमद् वाल्मीकि रामायण ने ही स्वीकार किया है। परिवार एक ऐसा शिक्षा केंद्र है जहां व्यक्ति स्नेह, सौहार्द, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, आस्था एवं समाज के सामूहिक कल्याण के लिए व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के त्याग की शिक्षा पाता है। परिवार समस्त मानवीय संगठनों की इकाई है जिसमें जीवन के प्राचीन आदर्शों को सुरक्षित रखा गया है।
भगवान वाल्मीकि जी की शिक्षाओं का महाकाव्य रामायण में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है जिसमें कर्तव्य परायणता, आज्ञा पालन, वचन निभाना, भाई का भाई के प्रति अथाह प्रेम व स्नेह, दुखियों, शोषित व पीड़ितों के प्रति दया और करुणा प्रेम, मानवता व शांति का संदेश देने के साथ-साथ अपने अंदर के अहंकार, ईर्षा, क्रोध व लोभ रूपी राक्षस को मारकर सहनशीलता का परिचय देना शामिल है। परम बुद्धिमान व महाज्ञानी भगवान वाल्मीकि जी के अनुसार संसार का मूल आधार ज्ञान ही है अर्थात शिक्षा के बिना मानव जीवन व्यर्थ एवं अर्थहीन है क्योंकि जिंदगी की भूल भुलैयां के चक्रव्यूह से शिक्षित व्यक्ति का ही बाहर निकलना संभव तथा आसान होता है। इनकी शिक्षाओं  में अस्त्र-शस्त्र, ज्ञान-विज्ञान, राजनीति तथा संगीत के अलावा आदर्श पिता, आदर्श माता, आदर्श पत्नी, आदर्श पति, आदर्श भ्राता, आदर्श स्वामी, आदर्श सेवक, आदर्श राजा, आदर्श प्रजा का ही नहीं आदर्श शत्रु का भी वर्णन मिलता है। आज भी इनकी शिक्षाएं पूरी दुनिया को मानवता, प्रेम व शांति तथा सहनशीलता का संदेश देती हैं तथा हिंसा, शत्रुता व युद्ध से होने वाले भयंकर विनाश के दुष्परिणामों से बचने का संकेत कर रही हैं।
रामायण मुख्यतः एक पारिवारिक महाकाव्य है। इस काव्य का मूल स्वर परिवार है जो कि सामाजिक समरसता, मानव-गौरव और भ्रातृत्व की विराट भावना की बुनियाद है। इसमें तीन प्रकार के भ्रातृ-युगल दिखाई देते हैं-राम और भरत, बाली और सुग्रीव तथा रावण और विभीषण।
इसी प्रकार तीन प्रकार के जीवन-साथी हैं-राम और सीता, बाली और तारा तथा रावण और मंदोदरी। सीता-राम हृदय-संगम के आदर्श प्रतिरूप हैं। बाली और तारा में समानता कम होने पर भी समरसता बराबर है। रावण और मंदोदरी के आदर्शों में काफी अंतर होने पर भी एक-दूसरे के प्रति अनुराग, सद्भाव और सदाशय में कोई कमी नहीं है। सीता, तारा और मंदोदरी-तीनों में से सीता सर्वाधिक पूजनीय हैं, हालांकि लौकिक दृष्टि से उनको सबसे अधिक पीड़ा सहनी पड़ी। तारा सबसे अधिक सुखी रही और मंदोदरी का स्वाभिमान सर्वोपरि है। उनका स्वभाव, व्यवहार और आदर्श संसार के समस्त स्त्री-पुरुषों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं। विडंबना है कि सारा संसार सीता और राम को आदर्श दंपति मानकर उनकी पूजा करता है किंतु उनके जैसा दांपत्य जीवन किसी को भी स्वीकार्य नहीं होगा। इससे स्पष्ट होता है कि उनके दांपत्य जीवन में मानव की सहनशीलता का कितना उदात्त उन्नयन हो पाया है। पीड़ा सहने से यदि लोक कल्याण संभव है तो सहनशीलता तपस्या बन जाती है। वाल्मीकि ने अपनी कृति रामायण के माध्यम से मानव-जाति को यही संदेश दिया है।

Friday, 16 October 2015

कोई तो किसान की सुनो

पंजाब में नरमा कपास की खराब फसल के मुआवजे की मांग पर किसान आंदोलरत थे। सात दिनों तक जबरदस्त आंदोलन किया। रेलवे ट्रैक पर बैठे रहे। सातवें दिन धरना समाप्त किया गया। सरकार के दबाव में किसान संगठनों को बिना मांग पूरी करवाए ही आंदोलन खत्म करना पड़ा। अब किसानों ने 22 अक्टूबर से अकाली दल के सांसदों तथा विधायकों के आवास के घेराव का निर्णय किया है। लेकिन कुछेक संस्थानों के अलावा कहीं इन्हें पर्याप्त स्पेस नहीं मिला। क्यों ? क्योंकि इससे टीआरपी नहीं आती? क्योंकि इससे विज्ञापन नहीं आती? लेकिन, हां इतना गुणा-भाग करके यह जरूत आकलन किया गया कि किसानों के इस धरने से रेलवे 200 करोड़ से अधिक रुपये की हानि हुई। रेलवे अपने नुकसान का अनुमान ट्रेनों के रद्द होने यात्रियों के टिकटों की वापसी, माल गाड़ी में बुकिंग कैंसिल के अलावा गाड़ियों के ट्रैक बदलने को लेकर जोड़ा जाता है। अम्बाला और फिरोजपुर रेलवे मंडलों से गुजरने वाली 574 रेल गाड़ियां किसान आंदोलन में प्रभावित रहीं। इनमें अम्बाला मंडल की 311 रेल गाड़ियां थीं। 
किसान संगठन पंजाब सरकार से किसानों के लिए 40 हजार और मजदूरों के लिए 20 हजार रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा तथा बासमती चावल का दाम बढ़ाने की मांग कर रहे थे। सरकार ने केवल मजदूरों को मुआवजा राशि देने के लिए 66 करोड़ रुपए की मंजूरी दी है। भारतीय किसान यूनियन एकता उग्रांहा के महासचिव सुखदेव सिंह कोकरी के अनुसार, आम लोगों को परेशानी से बचाने के लिए धरना उठाने का निर्णय किया गया। पंजाब सरकार द्वारा मात्र आठ हजार रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा दिया जा रहा है, जबकि किसानों को इससे कहीं ज्यादा नुकसान हुआ है।
बता दें कि पंजाब के आठ किसान तथा चार मजदूर संगठन की ओर से बठिंडा, फिरोजपुर, मानसा तथा अमृतसर जिले में रेल रोको आंदोलन किया जा रहा था। पंजाब, हरियाणा तथा राजस्थान रूट की करीब 550 रेलगाड़ियां प्रभावित रहीं। चंडीगढ़ में पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से किसान और मजदूर संगठनों के साथ बैठक की थी, लेकिन वह बैठक बेनतीजा रही थी। पंजाब में सफेद मक्खी की वजह से कपास की फसल बर्बाद हो गई है। इसको लेकर परेशान चल रहे किसानों के जख्म पर प्रदेश सरकार ने भी नमक छिड़कने का काम किया। मुआवजे के नाम पर किसी किसान को 15 रुपये का चेक दिया गया, तो किसी को 80 रुपये का। कपास की बर्बाद फसल के उचित मुआवजे की मांग को लेकर चल रहे राज्य स्तरीय धरने पर किसान द्वारा जहर खाकर आत्महत्या करने के मामले ने भी तूल पकड़ लिया था। 
और तो और, किसानों की दिक्कत यह भी रही कि इतने कम राशि के चेक को वे अगर अपने खाते में नकद करवाते हैं, तो उसका शुल्क अधिक लग जाएगा। एक किसान के अनुसार, उसका बठिडा के कोआपरेटिव बैंक में खाता है। मुआवजा चेक पंजाब नेशनल बैंक तलवंडी साबो का है। चेक बाहरी शहर का होने पर क्लीयरिग चार्ज (आउट स्टेशन) के रूप में 25 रुपये वसूले जाएंगे, जिसके बाद उसे सिर्फ 55 रुपये मिलेंगे। एक बैंक अधिकारी से जब पूछा गया कि 15 रुपया मुआवजा पाने वाले किसान को अगर क्लीयरेंस चार्ज देना पड़ा, तो उसके पल्ले क्या पड़ेगा? इस पर उनका जवाब था कि ऐसा चेक लगाने की क्या जरूरत है। चेक शीशे में जड़वा कर यादगार के तौर पर रख लेना चाहिए।
जब हम पंजाब में किसानों की स्थिति की पड़ताल करते हैं, तो पाते हैं कि पंजाब में कर्ज के कारण आत्महत्या के मामले 1997 से जारी हैं। 1997-2003 में कपास बेल्ट में फसल खराब हुई थी। इस इलाके में तब किसानों की खुदकुशी के मामले ज्यादा देखने को मिले। भारतीय किसान यूनियन ने 2004 में पंजाब के 300 गांवों का सर्वे किया था। इसमें 3000 किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा सामने आया था। यूनियन के दावे के मुताबिक 1990 से 2013 के बीच सवा लाख किसानों और मजदूरों ने आत्महत्या कर ली थी, जबकि सरकार के आदेश पर हुए पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, पंजाबी यूनिवर्सिटी और गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी के संयुक्त सर्वे के मुताबिक 2000 से 2010 तक ग्रामीण इलाकों में 6926 किसानों और मजदूरों ने खुदकुशी की। इनमें से करीब 4800 मामलों में आत्महत्या की वजह कर्ज थी। साल 2010 के बाद के खुदकुशी के मामलों का सर्वे होना अभी बाकी है।
जानकारों का कहना है कि आढ़तियों का नेटवर्क काफी बड़ा है। उपज की मार्केटिंग और किसान को अदायगी आढ़तिए के जरिए होती है। आढ़तिया तब उसका पेमेंट करता है, जब वो उसका कर्ज़ चुका देता है। पंजाब सरकार आढ़तियों के साथ है और वे संगठित हैं। उनका असर बहुत ज्यादा है। उपज की मार्केटिंग सहकारी व्यवस्था के जरिए हो तभी किसान को इस मुश्किल से बाहर निकाला जा सकता है। अभी कम कीमत वाली फसल का उत्पादन होता है। किसान को लो वैल्यू फसल से निकालकर हाई वैल्यू फसल में शिफट करने की जरूरत है. तभी वो समृद्ध हो सकते हैं। इसके लिए भी सहकारी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है।

Wednesday, 14 October 2015

राष्ट्र ऋषि डाॅ. कलाम

कुछ व्यक्तित्व इतने विराट होते हैं कि उनके बारे में कुछ कहने में भाषा पंगु हो जाती है। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भारतीय ऋषि परम्परा के ऐसे ही महापुरुष थे। डॉ. अब्दुल कलाम क्या थे, यह कहने से ज्यादा यह कहना उपयुक्त होगा कि वह क्या नहीं थे! भारतीय जीवन मूल्यों के मूर्तिमंत स्वरूप डॉ. कलाम एक ज्योतिर्मय प्रज्ञा-पुरुष थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. कलाम उत्कृष्ट वैज्ञानिक, मौलिक विचारक, गंभीर आध्यात्मिक साधक, कवि, संगीत रसिक, कुशल वक्ता, प्रशासक और सबसे बड़ी बात, संवेदनाओं से परिपूर्ण एक महामानव थे।
‘मुझे आश्चर्य हुआ कि कुछ लोग विज्ञान को इस तरह से क्यों देखते हैं जो व्यक्तियों को ईश्वर से दूर ले जाए। जैसा कि मैंने इसमें देखा कि हृदय के माध्यम से ही हमेशा विज्ञान तक पहुंचा जा सकता है। मेरे लिए विज्ञान हमेशा आध्यात्मिक रूप से समृध्द होने और आत्मज्ञान का रास्ता रहा।’ ये विचार किसी धर्माचार्य के नहीं हैं वरन् भारतीय गणराज्य के 11वें राष्ट्रपति स्व. डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने व्यक्त किए थे। डॉ. कलाम देश की रचनात्मकता के विचार को विस्तार देने के कर्म में अंतिम सांस तक रत रहे। किसी भी रूप में डॉ. कलाम सहाब को मुसलमान के रूप में स्थापित करना हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियत की तौहीन की कहा जाएगा। वे भारत की प्रगतिशील ऋषि परंपरा के वाहक ही थे। वे आधुनिक भारत में युवाओं के लिए रचनात्मका, कर्म साधना और देश सेवा के प्रेरक और रोल मॉडल बने। उन्होंने शून्य से शिखर तक संघर्ष यात्रा से सत्य को स्थापित किया कि नेक नीयत से किए गए कर्म के द्वारा असंभव को संभव किया जा सकता। मेधा के धनी और सफलता से शीर्ष को प्राप्त करने के बाद उनकी बच्चे जैसी मासूमियत, सहजता और सरलता ने खुद ब खुद  लोगों के दिल पर छा गई, जिसके लिए आज हर हिन्दुस्तानी उनके निधन पर गहरा अफसोस जता रहा है।
डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मछुआरे अल्पशिक्षित निर्धन परिवार में जन्मे, गांव में बिजली न होने से लालटेन की रोशनी में अध्ययन की साधना करते हुये राष्ट्र के शिखर पुरुष बने। उन्होंने जो पुस्तकें लिखीं, उनमें 1. विग आफ द फायर, 2. इग्नाइटेड माइण्ड, 3. गाडडिंग सोल्स, 4. मिशन इण्डिया, 5. इण्डिया विजन- 2020, 6. इन विजनिंग एन इम्पावर्ड नेशन, अति चर्चित कृतियां हैं। देश के अनेक प्रकाशनों ने डा. कलाम विषयक पुस्तकें प्रकाशित की। जिनमें दिल्ली के प्रभात प्रकाशन ने ही तत्संबंधी 10 पुस्तकों का प्रकाशन करके 2,50,000 प्रतियों से अधिक की बिक्री से उनकी जनप्रियता का कीर्तिमान स्थापित किया। पांच वर्ष की अवस्था में रामेश्वरम के पंचायत प्राथमिक विद्यालय में उनका दीक्षा-संस्कार हुआ था। उनके शिक्षक इयादुराई सोलोमन ने उनसे कहा था कि ‘जीवन मे सफलता तथा अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था, अपेक्षा इन तीन शक्तियों को भलीभांति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहिए।’ अब्दुल कलाम ने अपनी आरंभिक शिक्षा जारी रखने के लिए अखबार वितरित करने का कार्य भी किया था। कलाम ने 1958 में मद्रास इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलजी से अंतरिक्ष विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। स्नातक होने के बाद उन्होंने हावरक्राफ्ट परियोजना पर काम करने के लिये भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में प्रवेश किया। 1962 में वे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में आये जहां उन्होंने सफलतापूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में अपनी भूमिका निभाई। परियोजना निदेशक के रूप में भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी 3 के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जिससे जुलाई 1980 में रोहिणी उपग्रह सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया था।  वैसे उनके  विचार शांति और हथियारों को लेकर विवादास्पद रहे। 

इस संबंध में कलाम साहब का कहना था- ‘2000 वर्षों के इतिहास में भारत पर 600 वर्षों तक अन्य लोगों ने शासन किया है। यदि आप विकास चाहते हैं तो देश में शांति की स्थिति होना आवश्यक है और शांति की स्थापना शक्ति से होती है। इसी कारण मिसाइलों को विकसित किया गया ताकि देश शक्ति संपन्न हो।’ कलाम साहब ने अपने इस विचार को कार्य रूप में स्थापित कर दुनिया से भारतीय मेधा का लोहा मनवा लिया, जिसके लिए सुपर पॉवर अमेरिका सहित समूचा पाश्चात्य जगत अपनी उपलब्धियों पर गौरन्वावित हुआ करता था। डॉक्टर कलाम ने साहित्यिक रूप से भी अपने शोध को चार उत्कृष्ट पुस्तकों में समाहित किया है, जो इस प्रकार हैं- 'विंग्स आॅफ फायर', 'इण्डिया 2020- ए विजन फॉर द न्यू मिलेनियम', 'माई जर्नी' तथा 'इग्नाटिड माइंड्स- अनलीशिंग द पॉवर विदिन इंडिया'। इन पुस्तकों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।
उनके जीवन में संवेदना सदा सृजन के लिए ही थी, उनके भावों की इन पंक्तियों में आप अनुभव करेंगे-
सुंदर हैं वे हाथ, सृजन करते जो सुख से, धीरज से, साहस से, हर क्षण, हर पल, हर दिन, हर युग।
उनके जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना ‘अग्नि मिसाइल’ के सफल परीक्षण के दिन उनकी डायरी में लिखी ये भावपूर्ण पंक्तियां हैं- राष्ट्र के गौरव तथा शत्रु को भयभीत करने वाली धधकती आग- अग्नि में मत ढूंढ़ों, शत्रु को भय ग्रस्त करता, शक्ति का स्तम्भ कोई, यह तो एक आग है, दिल में जो सुलगती है, हर भारतीय के, सभ्यता के स्त्रोत की, एक छोटी-सी प्रतिमा है यह भारत के गौरव की आभा से प्रदीप लौ।
डा. कलाम के कार्यकाल में देश की सुरक्षा हेतु सफल परीक्षण 1. पृथ्वी, 2. त्रिशूल, 3. आकाश, 4. आग, 5. अग्नि किए गए। राष्ट्र इतना अभिभूत हुआ कि उन्हें ‘मिसाइलमैन’ नाम से संबोधित करने लगा। देश ने विज्ञान की दीर्घकालीन सक्रिय सतत् सेवाओं हेतु पद्मभूषण, पद्म विभूषण और शिखर सम्मान पदक भारत रत्न से सम्मानित किया। देश के 28 विश्वविद्यालयों एवं संस्थाओं ने मानद् डी.एस.सी. एवं डी. लिट् की उपाधियां भी प्रदान कीं। कृतज्ञ राष्ट्र ने इन्हें देश के प्रथम नागरिक रूप में राष्ट्रपति बनाया। वहां भी वह एक विदेह संत की भांति रहे। वह जितनी भारत की सुरक्षा हेतु रचनात्मक वैज्ञानिक कार्यों को गति दे रहे थे उतना ही जनता के दु:ख दर्द को आन्तरिक रूप से अनुभव करते थे। कलाम ने अपने कार्यकाल में पोलियोग्रस्त बच्चों हेतु कुछ तत्वों के मिश्रम से लकड़ी के भारी पैरों के बदले हल्के पैर निर्मित कराए और हजारों पोलियोग्रस्त बच्चों में वितरण कराया। इनके कार्यकाल में कई प्राकृतिक आपदाओं में डी.आर.डी.ओ ने सहायता प्रदान की। गुजरात का चक्रवात, जलेश्वर (उड़ीसा) का तुफान, मानसरोवर के मार्ग में भूस्खलन, चमोली (उत्तराखण्ड) का भूकम्प, गुजरात का भूकम्प, लातूर (महाराष्ट्र) का भूकम्प की सहायता में अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वाहन किया।
83 वर्षीय कलाम का सोमवार को आईआईएम शिलांग में व्याख्यान देते समय दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उन्हें एक ऐसे दिलेर राष्ट्रपति के रूप में जाना जाता है जिन्होंने सुखोई लड़ाकू विमान में उड़ान भरी, पनडुब्बी में सफर किया, दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध के मैदान सियाचिन ग्लेशियर गए और नियंत्रण रेखा पर जाकर सैनिकों से बातचीत की।
इसमें वह साहसिक घटना भी शामिल है जब उनके विमान ने एजल हवाई अड्डे से रात के समय उड़ान भरी तो रनवे को लालटेन और टॉर्च की रोशनी से प्रकाशित किया गया। यह घटना 2005 की है जब कलाम ने अपनी मिजोरम यात्रा के दौरान सभी आधिकारिक कार्यक्रम पूरे कर लिये। उनका अगली सुबह रवाना होने का कार्यक्रम था। लेकिन कलाम ने रात में ही दिल्ली के लिए उड़ान भरने का निर्णय किया। उनके एक वरिष्ठ सहयोगी ने इस घटना को याद करते हुए यह विवरण सुनाया।
भारतीय वायु सेना के स्टेशन प्रमुख को बुलाया गया और उन्हें राष्ट्रपति के राष्ट्रीय राजधानी के लिए उड़ान भरने की इच्छा से अवगत कराया क्योंकि मिजोरम में उनका काम पूरा हो गया है। वायु सेना के अधिकारी ने कहा, ‘‘लेकिन हवाई अड्डे पर रात में उड़ान भरने की सुविधा नहीं है।’’ लेकिन कलाम उनके स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन अगर आपात स्थिति हो तो क्या होगा ? क्या वायु सेना सुबह का इंतजार करेगी। उन्हें बता दें कि मुझे उड़ान भरना है और सभी जरूरी व्यवस्था की जाए।’’
डॉ. कलाम के सहयोगी तब वायु सेना के अधिकारी के पास गए और उन्हें उनका संदेश सुनाया जो राष्ट्रपति के तौर पर सशस्त्र सेनाओं के सुप्रीम कमांडर भी थे। आईएएफ के कमांडर ने तत्काल दिल्ली में अपने वरिष्ठ अधिकारियों से सम्पर्क किया। लेकिन उच्च अधिकारियों ने उन्हें मिसाइल मैन के आदेशों का पालन करने का निर्देश दिया। सहयोगी ने बताया कि अंतत: कलाम की इच्छा पूरी हुई और वायुसेना कर्मियों ने लालटेन, टॉर्च एवं मशाल जलाकर रनवे को रौशन किया ताकि उड़ान भरी जा सके। कलाम के सहयोगी उनके रात में उड़ान भरने के फैसले से चिंतित थे क्योंकि हवाई अड्डे पर केवल बुनियादी सुविधा ही उपलब्ध थी। वायुसेना अधिकारियों से अलग से पूछा गया कि क्या ऐसे में उड़ान भरना सुरक्षित होगा।
वायुसेना अधिकारी ने कहा कि आप उडान तो भर सकते हैं लेकिन अगर लौटना पड़ा तो परेशानी होगी। रात के करीब नौ बजे राष्ट्रपति के बोइंग विमान ने उड़ान भरी जिस पर कलाम और उनके साथ 22 लोग थे। विश्वविद्यालय और स्कूली छात्रों से चर्चा के दौरान डॉ. कलाम कहा करते थे, ‘‘अगर आप विफल होते हैं तब साहस नहीं छोड़े क्योंकि एफ ए आई एल का अर्थ होता है पहले प्रयास में सीखना, समाप्त का अर्थ समाप्त नहीं होता, बल्कि ई एन डी का अर्थ अगला अवसर होता है, इसलिए सकारात्मक रहें।
डॉ. कलाम जब देश के 11वें राष्ट्रपति बने तब इसके कुछ ही समय बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति कृष्णकांत को दिल का दौरा पड़ा और उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया। कलाम उनका कुशलक्षेम पूछने के लिए पहुंचने वाले पहले व्यक्ति थे। उस दिन वह नीले रंग की शर्ट और खाकी पैंट पहनकर गए थे। राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कलाम ने सियाचिन जाकर सैनिकों से मुलाकात करने का निर्णय किया। मौसम साफ होने के लिए उन्हें करीब 40 मिनट तक इंतजार करना पड़ा और बाद में वह हेलीकाप्टर से सियाचिन आधार शिविर पहुंचे। सैनिकों को अपने संबोधन में कलाम ने कहा था, ‘‘यह ग्लेशियर अत्यंत भू सामरिक महत्व का है। पिछले 20 वर्षो में कई युद्ध लड़े गए और हमारी सर्वोच्चता स्थापित हुई। यह हमारे जाबांज कारनामों की लड़ाई थी।’’ एयरोनॉटिकल इंजीनियर कलाम ने जून 2006 में सुखोई 30 लड़ाकू विमान उड़ाया और कहा था, ‘‘यह 1958 से ही मेरा सपना था कि मैं लड़ाकू विमान उड़ाऊं। मैं बचपन से ही पायलट बनना चाहता था।’’ इसी वर्ष कलाम ने फरवरी माह में तब इतिहास रचा जब वह आईएनएस सिंधुरक्षक पनडुब्बी से सफर करने वाले वह देश के पहले राष्ट्रपति बने।
आखिरकार शिक्षा वास्तव में सत्य की खोज है। ज्ञान और जागरूकता के माध्यम से यह एक कभी न समाप्त होने वाली यात्रा है। जहांर् ईष्या, घृणा, दुश्मनी, संकीर्णता और असमंजस के लिये कोई स्थान नहीं होता। यह मनुष्य को एक हितकारी, उदार इंसान और विश्व का एक उपयोगी व्यक्ति बना देती है। वास्तविक ज्ञान मनुष्य की गरिमा और स्वाभिमान को बढ़ाता है। देश और समाज के विकास मार्ग में वह अतीत तथा वर्तमान के सभी सत्कार्यों को मान्यता देते थे।
डा. अब्दुल कलाम का व्यक्तित्व विज्ञानवेत्ता के साथ ही एक श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में भी उजागर होता है। हरिद्वार उत्तरांचल के देव संस्कृति विश्वविद्यालय के दीक्षान्त भाषण के कुछ अंश कलाम के शब्दों में- मुझे ज्ञात है कि इस विश्वविद्यालय ने स्वतंत्रता सेनानी और लगभग 3000 पुस्तकों के लेखक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के स्वप्न को साकार रूप दिया है। उन्हें भारत में ज्ञान क्रांति का प्रवर्तक कहना उपर्युक्त होगा। दोस्तों! रामेश्वरम् में अपने बाल्यकाल में मैंने वकीलों, वैज्ञानिकों, आध्यात्मिकों, व्यवसायियों और शिक्षाविदों की देशभक्ति देखी, जिन्होंने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। अपनी इस स्वतंत्रता के लिए हम उन महान आत्माओं के ऋणी हैं। ऐसे देश भक्तों को मैं सलाम करता हूं।’ देश को स्वतंत्र करवाने के पश्चात् अब वर्ष 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्र में परिवर्तित करना हमारी जिम्मेदारी है। मुझे विश्वास है कि हमारे देश के 54 करोड़ तेजस्वी युवा मिलकर निश्चित ही इस परिवर्तन की दिशा में कार्य करेंगे…।
एक राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने जो नई परंपराएं स्थापित की, जिनको लेकर किसी को भी परहेज नहीं हुआ और न किसी तरह की सियासत करने का मौका दिया, उनकी यही विलक्षणता सच्चे अर्थों में ‘भारत रत्न’ के रूप में स्थापित करती है। अपनी मानवीय खूबियों के साथ वह एक राष्ट्रनायक के रूप में लोगों के दिल में जगह बनाने में कामयाब हुए। 15 अक्टूबर 1931 को धनुषकोडी गांव (रामेश्वरम, तमिलनाडु) में एक मध्यमवर्ग मुस्लिम परिवार में इनका जन्म हुआ। इनके पिता जैनुलाब्दीन न तो ज्यादा पढ़े-लिखे थे, न ही पैसे वाले थे। इनके पिता मछुआरों को नाव किराए पर दिया करते थे। अब्दुल कलाम सयुंक्त परिवार में रहते थे। परिवार की सदस्य संख्या का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यह स्वयं पांच भाई एवं पांच बहन थे और घर में तीन परिवार रहा करते थे। अब्दुल कलाम के जीवन पर इनके पिता का बहुत प्रभाव रहा। वे भले ही पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उनकी लगन और उनके दिए संस्कार अब्दुल कलाम के बहुत काम आए।