Wednesday, 8 October 2014

समाज को समर्पित जीवन गुरु रामदास का



गुरु रामदास सिक्खों के चौथे गुरु थे। इन्होंने सिक्ख धर्म के सबसे प्रमुख पद गुरु को 1574 ई. में प्राप्त किया था। इस पद पर ये 1581 ई. तक बने रहे थे। ये सिक्खों के तीसरे गुरु अमरदास के दामाद थे। इन्होंने 1577 ई. में 'अमृत सरोवर' नामक एक नये नगर की स्थापना की थी, जो आगे चलकर अमृतसर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गुरु रामदास ने 'सतोषसर' नामक पवित्र सरोवर की खुदाई भी आरंभ कराई थी। गुरु रामदास के समय में लोगों से 'गुरु' के लिए चंदा या दान लेना शुरू हुआ। वे बड़े साधु स्वभाव के व्यक्ति थे। इस कारण सम्राट अकबर भी उनका सम्मान करता था। गुरु रामदास के कहने पर अकबर ने एक वर्ष पंजाब से लगान नहीं लिया। इस कारण गुरु की गद्दी को लोगों से पर्याप्त धन प्राप्त हो गया था। गुरु रामदास के बाद गुरु की गद्दी वंश-परंपरा में चलने लगी। उन्होंने अपने पुत्र गुरु अर्जुन देव को अपने बाद गुरु नियुक्त किया।
राम दास या गुरू राम दास  सिखों के गुरु थे और उन्हें गुरु की उपाधि 30 अगस्त 1574 को दी गयी थी। उन दिनों जब विदेशी आक्रमणकारी एक शहर के बाद दूसरा शहर तबाह कर रहे थे, तब 'पंचम् नानक' गुरू राम दास जी महाराज ने एक पवित्र शहर रामसर, जो कि अब अमृतसर के नाम से जाना जाता है, का निर्माण किया।

गुरू राम दास (जेठा जी) का जन्म चूना मण्डी, लाहौर (अब पाकिस्तान में) में कार्तिक वदी २, (२५वां आसू) सम्वत १५९१ (२४ सितम्बर १५३४) को हुआ था। माता दया कौर जी (अनूप कौर जी) एवं बाबा हरी दास जी सोढी खत्री का यह पुत्र बहुत ही सुंदर एवं आकर्षक था। राम दास जी का परिवार बहुत गरीब था। उन्हें उबले हुए चने बेच कर अपनी रोजी रोटी कमानी पड़ती थी। जब वे मात्र ७ वर्ष के थे, उनके माता पिता की मृत्यु हो गयी। उनकी नानी उन्हें अपने साथ बसर्के गाँव ले आयी। उन्होंने बसर्के में ५ वर्षों तक उबले हुए चने बेच कर अपना जीवन यापन किया। एक बार गुरू अमर दास साहिब जी, रामदास साहिब जी की नानी के साथ उनके दादा की मृत्यु पर बसर्के आये और उन्हें राम दास साहिब से एक गहरा लगाव सा हो गया। रामदास जी अपनी नानी के साथ गोइन्दवाल आ गये एवं वहीं बस गये। यहाँ भी वे अपनी रोजी रोटी के लिए उबले चने बेचने लगे एवं साथ ही साथ गुरू अमरदास साहिब जी द्वारा धार्मिक संगतों में भी भाग लेने लगे। उन्होंने गोइन्दवाल साहिब के निर्माण की सेवा की।

रामदास साहिब जी का विवाह गुरू अमरदास साहिब जी की पुत्री बीबी भानी जी के साथ हो गया। उनके यहाँ तीन पुत्रों -१. पृथी चन्द जी, २. महादेव जी एवं ३. अरजन साहिब जी ने जन्म लिया। शादी के पश्चात रामदास जी गुरु अमरदास जी के पास रहते हुए गुरु घर की सेवा करने लगे। वे गुरू अमरदास साहिब जी के अति प्रिय व विश्वासपात्र सिक्ख थे। वे भारत के विभिन्न भागों में लम्बे धार्मिक प्रवासों के दौरान गुरु अमरदास जी के साथ ही रहते।

गुरू रामदास जी एक बहुत ही उच्च वरीयता वाले व्यक्ति थे। वो अपनी भक्ति एवं सेवा के लिए बहुत प्रसिद्ध हो गये थे। गुरू अमरदास साहिब जी ने उन्हें हर पहलू में गुरू बनने के योग्य पाया एवं 1 सितम्बर १५७४ को उन्हें ÷चतुर्थ नानक' के रूप में स्थापित किया। गुरू रामदास जी ने ही ÷चक रामदास' या ÷रामदासपुर' की नींव रखी जो कि बाद में अमृतसर कहलाया। इस उद्देश्य के लिए गुरू साहिब ने तुंग, गिलवाली एवं गुमताला गांवों के जमींदारों से संतोखसर सरोवर खुदवाने के लिए जमीनें खरीदी। बाद में उन्होने संतोखसर का काम बन्द कर अपना पूरा ध्यान अमृतसर सरोवर खुदवाने में लगा दिया। इस कार्य की देख रेख करने के लिए भाई सहलो जी एवं बाबा बूढा जी को नियुक्त किया गया।

जल्द ही नया शहर (चक रामदासपुर) अन्तराष्ट्रीय व्यापार का केन्द्र होने की वजह से चमकने लगा। यह शहर व्यापारिक दृष्टि से लाहौर की ही तरह महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। गुरू रामदास साहिब जी ने स्वयं विभिन्न व्यापारों से सम्बन्धित व्यापारियों को इस शहर में आमंत्रित किया। यह कदम सामरिक दृष्टि से बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ। यहाँ सिक्खों के लिए भजन-बन्दगी का स्थान बनाया गया। इस प्रकार एक विलक्षण सिक्ख पंथ के लिए नवीन मार्ग तैयार हुआ। गुरू रामदास साहिब जी ने ÷मंजी पद्धति' का संवर्द्धन करते हुए ÷मसंद पद्धति' का शुभारम्भ किया। यह कदम सिक्ख धर्म की प्रगति में एक मील का पत्थर साबित हुआ।

गुरू रामदास साहिब जी ने सिख धर्म को ÷आनन्द कारज' के लिए ÷चार लावों' (फेरों) की रचना की और सरल विवाह की गुरमत मर्यादा को समाज के सामने रखा। इस प्रकार उन्होने सिक्ख पंथ के लिए एक विलक्षण वैवाहिक पद्धति दी। इस प्रकार इस भिन्न वैवाहिक पद्धति ने समाज को रूढिवादी परम्पराओं से दूर किया। बाबा श्रीचंद जी के उदासी संतों व अन्य मतावलम्बियों के साथ सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किये। गुरू साहिब जी ने अपने गुरूओं द्वारा प्रदत्त गुरू का लंगर प्रथा को आगे बढाया। अन्धविश्वास, वर्ण व्यवस्था आदि कुरीतियों का पुरजोर विरोध किया गया।
उन्होंने ३० रागों में ६३८ शबद् लिखे जिनमें २४६ पौउड़ी, १३८ श्लोक, ३१ अष्टपदी और ८ वारां हैं और इन सब को गुरू ग्रन्थ साहिब जी में अंकित किया गया है। उन्होंने अपने सबसे छोटे पुत्र अरजन साहिब को ÷पंचम्‌ नानक' के रूप में स्थापित किया। इसके पश्चात वे अमृतसर छोड़कर गोइन्दवाल चले गये। भादौं सुदी ३ (२ आसू) सम्वत १६३८ (१ सितम्बर १५८१) को ज्योति जोत समा गए।

रु रामदास जी भिक्षा मांग कर अपना निर्वाह किया करते !एक गाँव में एक गली ऐसी थीजिसमे एक वृद्धा गुरु समर्थ रामदास जी को देखते ही गालिया देने लग जाया करती !समर्थ गुरु रामदास जी चुपचाप नीचे मुख कर बिना कुछ कहे आगे निकल जाया करते !सोचते अवश्य ही इस बूढी माँ के साथ पिछले जन्म का लेना देना शेष है अन्यथा इस जन्म में तो मैंने इनका कुछ बिगाड़ा नहीं है !
एक दिन वह बुढिया इतनी ज्यादा बिगड़ी हुई थी कि जो पोंचा वो लगा रही थी समर्थ गुरु रामदास के आते ही श्री गुरु मुख पर दे मारा !समर्थ रामदास ने चुपचाप वह पोंचा उठाया ;आज भिक्षा भी नहीं मांगी ,घर वापिस आ गए है !ठाकुर के समक्ष रोना शुरू कर दिया है -हे मेरे राम इस बूढी माँ का क्रोध रूपी राक्षस मार दो -२!साथ -२ पोंचे को भी साफ़ करते रहे ;पोंचे की बतिया बना कर के तो उन्हें जलाना शुरू कर दिया है;प्रार्थना भी करते रहे ! सच मानियेगा साधकजनों ज्यो -२ बतिया जल रही है उस बुढिया का क्रोध रूपी राक्षस भी जलना शुरू हो गया है !कई दिनों से इंतजार कर रही है कि कब समर्थ रामदास जी आयेगे और मैं अपना अपराध क्षमा करवाउंगी !आज आये है तो आंसुओ से चरण-कमलो को धो दिया है ;बड़ा मान सम्मान दे कर के तो भोजन कराया है !

भारतीय संस्कृति के शिल्पकार भगवान वाल्मीकि


‘सुंदरकांड’  महत्वपूर्ण अभिव्यंजना का भंडार है। जो लोग इसकी गहराई में जाना चाहते हैं, उनके लिए रामायण गहन अध्ययन का अक्षय भंडार है। आश्विन मास की शरद पूर्णिमा को आदिकवि भगवान वाल्मीकि जी का प्रकट दिवस मनाया जाता है। उन्होंने संस्कृत भाषा में रामायण की रचना की जो संसार का पहला आदिकाव्य है।भगवान वाल्मीकि की वाणी को सुनकर कौन ऐसा प्राणी है जो मोक्ष रूपी परम गति को प्राप्त न हो? उन आदिकवि वैदिक दृष्टि और काव्य सृष्टि की क्षमता से सम्पन्न भगवान वाल्मीकि जी ने ‘रामायण’ के माध्यम से वेद का सार और वैदिक सूक्तियों का वैभव मानव जाति तक पहुंचाया है।
महर्षि वाल्मीकि का जन्म नागा प्रजाति में हुआ था। महर्षि बनने के पहले वाल्मीकि रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे। वे परिवार के पालन-पोषण हेतु दस्युकर्म करते थे। एक बार उन्हें निर्जन वन में नारद मुनि मिले। जब रत्नाकर ने उन्हें लूटना चाहा, तो उन्होंने रत्नाकर से पूछा कि यह कार्य किसलिए करते हो, रत्नाकर ने जवाब दिया परिवार को पालने के लिये। नारद ने प्रश्न किया कि क्या इस कार्य के फलस्वरुप जो पाप तुम्हें होगा उसका दण्ड भुगतने में तुम्हारे परिवार वाले तुम्हारा साथ देंगे। रत्नाकर ने जवाब दिया पता नहीं, नारदमुनि ने कहा कि जाओ उनसे पूछ आओ। तब रत्नाकर ने नारद ऋषि को पेड़ से बाँध दिया तथा घर जाकर पत्नी तथा अन्य परिवार वालों से पूछा कि क्या दस्युकर्म के फलस्वरुप होने वाले पाप के दण्ड में तुम मेरा साथ दोगे तो सबने मना कर दिया। तब रत्नाकर नारदमुनि के पास लौटे तथा उन्हें यह बात बतायी। इस पर नारदमुनि ने कहा कि हे रत्नाकर यदि तुम्हारे घरवाले इसके पाप में तुम्हारे भागीदार नहीं बनना चाहते तो फिर क्यों उनके लिये यह पाप करते हो। यह सुनकर रत्नाकर को दस्युकर्म से उन्हें विरक्ति हो गई तथा उन्होंने नारदमुनि से उद्धार का उपाय पूछा। नारदमुनि ने उन्हें राम-राम जपने का निर्देश दिया।
रत्नाकर वन में एकान्त स्थान पर बैठकर राम-राम जपने लगे लेकिन अज्ञानतावश राम-राम की जगह मरा-मरा जपने लगे। कई वर्षों तक कठोर तप के बाद उनके पूरे शरीर पर चींटियों ने बाँबी बना ली जिस कारण उनका नाम वाल्मीकि पड़ा। कठोर तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इन्हें ज्ञान प्रदान किया तथा रामायण की रचना करने की आज्ञा दी। ब्रह्मा जी की कृपा से इन्हें समय से पूर्व ही रामायण की सभी घटनाओं का ज्ञान हो गया तथा उन्होंने रामायण की रचना की। कालान्तर में वे महान ऋषि बने।
मनुस्मृति के अनुसार वे प्रचेता, वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि के भाई थे। उनके बारे में एक और किंवदन्ती है कि बाल्यावस्था में ही उनको एक निःसंतान भीलनी ने चुरा लिया था और बड़े ही प्रेम से उनका लालन-पालन किया। उक्त भीलनी के जीवनयापन का मुख्य साधन दस्यु कर्म का था। जिसे वाल्मीकि ने अपने भरण-पोषण के दौरान अपना लिया था। जब वाल्मीकि एक तरूण युवा हो गए तब उनका विवाह उसी समुदाय की एक भीलनी से कर दिया गया। विवाह बाद वे कई संतानों के पिता बने और उन्हीं के भरण-पोषण के लिए उन्होंने पाप कर्म को ही अपना जीवन मानकर और भी अधिक घोर पाप करने लगे।
एक बार उन्होंने वन से गुजर रहे साधुओं की मंडली को ही हत्या की धमकी दे दी। साधु के पूछने पर उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि वे यह सब अपने पत्नी और बच्चों के लिए कर रहे है। तब साधु ने उन्हें समझाइश दी और कहा कि जो भी पाप कर्म तुम कर रहे हो, उसका दंड केवल तुम्हें ही भुगतना पड़ेगा।
तब साधु ने उन्हें कहा कि तुम जाकर अपने परिवार वालों से पूछकर आओ कि क्या वे तुम्हारे इस पाप के भागीदार बनेंगे। इस बात पर जब उनकी पत्नी और बच्चों ने अपनी असहमती प्रदान की और कहा कि हम आपके इस पाप कर्म में भागीदार नहीं बनेंगे। तब वाल्मीकि को अपने द्वार किए गए पाप कर्म पर बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने साधु मंडली को मुक्त कर दिया।
साधु मंडली से क्षमा मांग कर जब वाल्मीकि लौटने लगे तब साधु ने उन्हें तमसा नदी के तट पर 'राम-राम' नाम जप ही अपने पाप कर्म से मुक्ति का यही मार्ग बताया। लेकिन भूलवश वाल्मीकि राम-राम की जगह 'मरा-मरा' का जप करते हुए तपस्या में लीन हो गए। इसी तपस्या के फलस्वरूप ही वह वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुए और रामायण की महान रचना की। इसलिए उन्हें आदिकवि के नाम से पुकारा गया और यही नाम आगे चलकर 'वाल्मीकि रामायण' के नाम से अमर हो गए। अपने डाकू के जीवन के दौरान एक बार उन्होंने देखा कि एक बहेलिए ने सारस पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी जोर-जोर से ‍विलाप कर रही है। उसका मादक विलाप सुन कर वाल्मीकि के मन में करुणा जाग उठी और वे अत्यंत दुखी हो उठे। उस दुखभरे समय के दौरान उनके मुंह से अचानक ही एक श्र्लोक निकल गया-
'मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्।।'
 अर्थात्- अरे बहेलिए, तूने काम मोहित होकर मैथुनरत क्रौंच पक्षी को मारा है, अब तुझे कभी भी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होगी।
इस श्र्लोक के साथ ही वाल्मीकि को एक अलग ही ज्ञान प्राप्ति का अनुभव हुआ तथा उन्होंने 'रामायण' जैसे प्रसिद्ध महाकाव्य की रचना कर दी। जिसे आम भाषा में 'वाल्मीकि रामायण' भी कहा जाता है। इसीलिए वाल्मीकि को प्राचीन भारतीय महर्षि माना जाता हैं। ऋषि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण एक ऐसा महाकाव्य है जो हमें प्रभु श्रीराम के जीवन काल का परिचय करवाता है। जो उनके सत्यनिष्ठ, पिता प्रेम और उनका कर्तव्य पालन और अपने माता तथा भाई-बंधुओं के प्रति प्रेम-वात्सल्य से रूबरू करवा कर सत्य और न्याय धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

Sunday, 5 October 2014

कुर्बानी का मतलब है दूसरों की रक्षा करना

कुर्बानी का त्योहार ईद-उल-जुहा को लेकर राजधानी में जबरदस्त उत्साह है। बकरीद  को इस्लाम में बहुत ही पवित्र त्योहार माना जाता है। इस्लाम में एक वर्ष में दो ईद मनाई जाती है। एक ईद जिसे मीठी ईद कहा जाता है और दूसरी है बकरीद। बकरीद पर अल्लाह को बकरे की कुर्बानी दी जाती है। पहली ईद यानी मीठी ईद समाज और राष्ट्र में प्रेम की मिठास घोलने का संदेश देती है। दूसरी ईद अपने कर्तव्य के लिए जागरूक रहने का सबक सिखाती है। राष्ट्र और समाज के हित के लिए खुद या खुद की सबसे प्यारी चीज को कुर्बान करने का संदेश देती है। बकरे की कुर्बानी तो प्रतीक मात्र है, यह बताता है कि जब भी राष्ट्र, समाज और गरीबों के हित की बात आए तो खुद को भी कुर्बान करने से नहीं हिचकना चाहिए।
कोई व्यक्ति जिस परिवार में रहता है, वह जिस समाज का हिस्सा है, जिस शहर में रहता है और जिस देश का वह निवासी है। उस व्यक्ति का फर्ज है कि वह अपने देश, समाज और परिवार की रक्षा करे। इसके लिए यदि उसे अपनी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी देना पड़े तब भी वह पीछे ना हटे।
ईद-उल-जुहा अर्थात बकरीद मुसलमानों का प्रमुख त्योहार है। इस दिन मुस्लिम बहुल क्षेत्र के बाजारों की रौनक बढ़ जाती है। बकरीद पर खरीददार बकरे, नए कपड़े, खजूर और सेवईयाँ खरीदते हैं। बकरीद पर कुर्बानी देना शबाब का काम माना जाता है। इसलिए हर कोई इस दिन कुर्बानी देता है।
इस्लामी साल में दो ईदों में से एक है बकरीद। ईद-उल-जुहा और ई-उल-फितर। ईद-उल-फिरत को मीठी ईद भी कहा जाता है। इसे रमजान को समाप्त करते हुए मनाया जाता है। एक और प्रमुख त्योहार है ईद-उल-मीनाद-उन-नबी, लेकिन बकरीद का महत्व अलग है। इसे बड़ी ईद भी कहा जाता है। हज की समाप्ति पर इसे मनाया जाता है।
इस्लाम के पाँच फर्ज माने गए हैं, हज उनमें से आखिरी फर्ज माना जाता है। मुसलमानों के लिए जिंदगी में एक बार हज करना जरूरी है। हज होने की खुशी में ईद-उल-जुहा का त्योहार मनाया जाता है। यह बलिदान का त्योहार भी है। इस्लाम में बलिदान का बहुत अधिक महत्व है। कहा गया है कि अपनी सबसे प्यारी चीज रब की राह में खर्च करो। रब की राह में खर्च करने का अर्थ नेकी और भलाई के कामों में।
कुर्बानी की कथा : यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों ही धर्म के पैगंबर हजरत इब्राहीम ने कुर्बानी का जो उदाहरण दुनिया के सामने रखा था, उसे आज भी परंपरागत रूप से याद किया जाता है। आकाशवाणी हुई कि अल्लाह की रजा के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करो, तो हजरत इब्राहीम ने सोचा कि मुझे तो अपनी औलाद ही सबसे प्रिय है। उन्होंने अपने बेटे को ही कुर्बान कर दिया। उनके इस जज्बे को सलाम करने का त्योहार है ईद-उल-जुहा।
कुर्बानी का फर्ज : कुर्बानी का अर्थ है कि रक्षा के लिए सदा तत्पर। हजरत मोहम्मद साहब का आदेश है कि कोई व्यक्ति जिस भी परिवार, समाज, शहर या मुल्क में रहने वाला है, उस व्यक्ति का फर्ज है कि वह उस देश, समाज, परिवार की हिफाजत के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार रहे।
ईद-उल-फितर की तरह ईद-उल-जुहा में भी गरीबों और मजलूमों का खास ख्याल रखा जाता है। इसी मकसद से ईद-दल-जुहा के सामान यानी कि कुर्बानी के सामान के तीन हिस्से किए जाते हैं। एक हिस्सा खुद के लिए रखा जाता है, बाकी दो हिस्से समाज में जरूरतमंदों में बाँटने के लिए होते हैं, जिसे तुरंत बाँट दिया जाता है। नियम कहता है कि पहले अपना कर्ज उतारें, फिर हज पर जाएँ। तब बकरीद मनाएँ। इसका मतलब यह है कि इस्लाम व्यक्ति को अपने परिवार, अपने समाज के दायित्वों को पूरी तरह निभाने पर जोर देता है।
तीन हिस्से किए जाते हैं कुर्बानी के
इस्लाम में गरीबों और मजलूमों का खास ध्यान रखने की परंपरा है। इसी वजह से ईद-उल-जुहा पर भी गरीबों का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस दिन कुर्बानी के सामान के तीन हिस्से किए जाते हैं। इन तीनों हिस्सों में से एक हिस्सा खुद के लिए और शेष दो हिस्से समाज के गरीब और जरूरतमंद लोगों का बांटा दिया जाता है।

Friday, 3 October 2014

दुखद और मार्मिक घटना



पटना गांधी मैदान में, रावणवध कार्यक्रम के बाद लौटती भीड़ में हुई भगदड़ में अनेक लोगों की हुई मौत से मुझे गहरा आघात लगा। यह अत्यंत दुखद और मार्मिक घटना है। प्रभावित परिवारों के प्रति मेरी गहरी संवेदना है। प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत-मुआवजा मिले ही, साथ ही घायलों की समुचित चिकित्सा व्यवस्था की जाए। गौरतलब है पटना स्थित बड़े गांधी मैदान में करीब 5 लाख से अधिक लोग लंका दहन देखने पहुंचे थे। मरने वाले में अधिकतर महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। मौके ए वारदात में अफरा-तफरी और भगदड़ को देखते हुए कहा जा सकता है कि मरने वालों की संख्या में इजाफा भी हो सकते है, क्योंकि इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती किए गए कई लोग गंभीर हालत में हो सकते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक बिहार सरकार ने भगदड़ में मारे गए लोगों को 3-3 लाख रुपए बतौर मुआवजा देने की घोषणा की है। मीडिया रिपोर्ट है कि हादसे में 100 से अधिक लोग घायल हुए हैं। बिहार सरकार ने एक हेल्पलाइन नंबर जारी किया है, जिसे डायल करके लोग जानने वालों का कुशल-क्षेम पूछ सकते है। 0612-2219810 पर फोन करे अथवा जरूरंतमंदों को शेयर करें
इस बार विजयादशमी का त्योहार बिहार की राजधानी के बुरी खबर लेकर आया। पटना के गांधी मैदान पर रावण दहन के लिए जुटी लाखों की भीड़ को पता भी नहीं रहा होगा कि आने वाला पल उनके लिए जिंदगी भर का दर्द लेकर आएगा। रावण दहन के बाद लौट रही भीड़ एक अफवाह के बाद भगदड़ का शिकार हो गई। भगदड़ मचने से हुए हादसे में 34 लोगों की जान चली गई। जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हो गए।
घायलों को पटना के पीएमसीएच अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल के बाहर घायलों के परिजन अपनों की तलाश में भारी संख्या में जुट गए। चारों तरफ अफरातफरी का माहौल था। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि किससे पूछे, कहां जाएं, परिजनों को अस्पताल के भीरत जाने भी नहीं दिया जा रहा था। जिसे लेकर उनकी कई बार पुलिस से झड़प भी हो गई।
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि बिजली का तार मैदान में गिरने की अफवाह फैलने के बाद भगदड़ मची। हालांकि भगदड़ के कारण को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है। हादसे के बाद घटनास्थल का दृश्य बेहद भयावह था। घटनास्थल पर वहां से भागने का प्रयास कर रहे लोगों के जूते चप्पल करीब एक किलोमीटर तक के रास्ते में बिखरे पड़े थे। सुरक्षा बलों ने पीएमसीएच की घेराबंदी कर दी थी। सैंकड़ों लोग पीएमसीएच के चारों ओर बदहवास घूम रहे थे। इनमें से कुछ दहाड़ें मार-मारकर रो रहे थे, तो कुछ अपने लापता परिजनों को तलाशने में जुटे थे। भगदड़ के शिकार लोगों को लेकर कई एम्बुलेंस पीएमसीएच की ओर आ जा रही थीं।
वहीं रावण दहन के वक्त समारोह में मौजूद रहे बिहार के सीएम जितनराम मांझी हादसे के बाद गायब दिखे। यही नहीं बिहार सरकार का कोई मंत्री तक घटना के बाद नहीं दिखा। हालांकि देर रात सीएम मांझी घायलों का हाल जानने अस्पताल पहुंचे। पीएम नरेंद्र मोदी ने हादसे पर दुख व्यक्त किया और फोन पर सीएम जीतन मांझी से बात की। केंद्र सरकार की तरफ से हादसे में मारे गए लोगों के लिए 2 लाख रुपए का मुआवजा दिया गया। जबकि बिहार सरकार ने हादसे में मारे गए लोगों को तीन लाख रुपए के मुआवजे का ऐलान किया है।

Thursday, 2 October 2014

अपने अंदर के रावण को मारें


विजय दशमी का अर्थ बुराई पर अच्छाई की विजय। इसी दिन भगवान राम ने बुराई रूपी रावण को मारकर अच्छाई और सत्य को विजय दिलाई। तब ही से प्रतिवर्ष प्रतीकात्मक रूप से रावण का दहन किया जाता है। सदियां बीत चुकी हैं, लेकिन रावण पर राम की विजय का यह पर्व हम आज भी उसी उल्लास और उमंग के साथ मनाते हैं। अक्सर रावण दहन कर हम सत्य के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। विजयदशमी का एक ही कारण है और वह है राम की विजय। इसीलिए इसे विजय पर्व के नाम से जाना जाता है। यथार्थ में श्रीराम मात्र रावण विजेता नहीं थे, वह कर्म विजेता थे। उन्होंने शत्रु यानी दुराचार, अधर्म और असत्य को परास्त कर धर्म, सदाचरण और सत्य की प्रतिष्ठा की। लंका काण्ड के अंत में वर्णित दोहे-समर विजय रघुवीर के चरित जे सुनहिं सुजान। विजय विवेक विभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान के अनुसार, विजय, विवेक और विभूति, तीनों का मानव जीवन में बड़ा महत्व है। ये चीजें उन्हीं को प्राप्त होती हैं, जो सुजान होते हैं। यहां सुजान का तात्पर्य है सद्कर्म करने वाला, सदाचरण का पालन करने वाला। विजय पर्व का उत्सव तो एक-दो दिन का होता है, पर यथार्थ में मानव के संपूर्ण जीवन में इन तीनों की परीक्षा पल-पल होती है। वस्तुत: अंदर के रावण पर विजय ही जीवन का मूल है।
विजयदशमी एक ऐसा पर्व है, जो समाज के विभिन्न स्वरूपों, प्रवृत्तियों और उसकी दिशा को समझने-बूझने की एक जबरदस्त कसौटी है। यह हमें राजनीति के अर्थ, राजनीति और कूटनीति के भेद-विभेद, परस्पर संबंधों के निर्धारण के सिद्धांत, रण-कौशल, शासन-व्यवस्था के लिए आवश्यक चातुर्य आदि का विस्तृत ज्ञान देता है। इसमें किंचित भी संदेह नहीं कि इसके कुछ पात्र ऐसे हैं, जो शुरू से ही समाज में अपनी पैठ बनाए हुए हैं, यदि उनके बारे में सही समझ पैदा करने में कामयाबी पाने में समर्थ हो सकें तथा उसको मर्यादित करने के तौर-तरीकों के बारे में जानकारी प्राप्त कर, उन पर अमल कर लिया जाए, तो रामराज्य की कल्पना को साकार कर पाना असंभव नहीं होगा। लेकिन विडंबना यह है कि अधर्म रूपी पुतले का दहन करने के बाद भी सर्वत्र बुराई का बोलबाला है। रावण समाज में बुराई का प्रतीक है। हम हर साल रावण के पुतले जलाकर खुशियां मनाते हैं, पर क्या हम अपने अंदर बैठे रावण को मार पाए हैं? आइए इस विजयदशमी पर हम उन दशानन रूपी बुराइयों को जड़ से मिटाने का संकल्प लें, जिससे समाज में रामराज की स्थापना हो सके।
बाल विवाह
देश में बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए कई सख्त कानून हैं, लेकिन आज भी हजारों लड़कियों की शादी बचपन में कर दी जाती है। हमें यह समझना होगा कि केवल कानून बना देने से ऎसी सामाजिक कुरीतियों पर रोक नहीं लग सकती है। हमें इस दिशा में खुद पहल करनी होगी।
अतिक्रमण
हमारे यहां अतिक्रमण का यह हाल है कि राहगीरों के लिए बनी सड़कें अपने अस्तित्व के लिए जद्दोजहद करती दिखती हैं। यह हमारा गैर जिम्मेदाराना रवैया ही है कि सड़कें आज गलियों में तब्दील हो चुकी हैं।
बलात्कार
समाज में किसी भी स्त्री का बलात्कार होना, केवल उस स्त्री के साथ अन्याय नहीं, बल्कि उस समाज के सभ्य होने पर भी सवालिया निशान खड़ा करता है। यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि बलात्कार की अधिकांश घटनाओं में आरोपित पीडित का परिचित ही होता है। दिनोंदिन बढ़ती इस सामाजिक बुराई पर जल्द से जल्द काबू पाना होगा। एक बेहतर समाज तभी स्थापित हो सकता है जब हम खुद जागरूक हों और इसके लिए आगे आएं। केवल कानून बना देने से बलात्कार की घटनाओं पर काबू नहीं पाया जा सकता है।
कुपोषण
कुपोषण के मामले मे भारत अपने पड़ोसी देश नेपाल और बांग्लादेश से भी आगे है। हर व्यक्ति तक भोजन पहंुचाने के सरकारी प्रयास जब तक कागज से जमीन पर नहीं उतरेंगे, स्थिति बदलने वाली नहीं है। इस दिशा में लोगों को भी सरकार का सहयोग करने की जरूरत है। हम सभी को सजग रहने की जरूरत है। देश में खाद्यान्न उत्पादन को सड़ने से बचाना होगा, जिससे कोई भी देश में भूखा न रहे। तभी हम कुपोष्ाण मुक्त भारत बनाने में सफल होंगे।
गंदगी
सफाई ही किसी भी स्वस्थ समाज का आइना होता है। आइए, हम एक सभ्य नागरिक का परिचय देते हुए समाज को स्वस्थ बनाने का संकल्प लें।
भ्रष्टाचार
डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था, भारत में सिंहासन और व्यापार के बीच सम्बंध जितना दूçष्ात है, उतना किसी भी देश में नहीं है। भ्रष्टाचार ने देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर बहुत ही विपरीत प्रभाव डाला है।
दहेज
इतिहास गवाह है, जिस समाज ने नारी का सम्मान नहीं किया, उसका अस्तित्व ही समाप्त हो गया। आज दहेज के नाम पर नारी का प्रतिदिन अपमान किया जा रहा है। यह एक ऎसा कलंक है, जिसने समाज को घुन खाई लकड़ी की तरह अशक्त कर दिया है। इस सामाजिक अभिशाप को खत्म करने के लिए हमें मिल-जुलकर प्रयास करने होंगे।
लूट
बढ़ती आपराधिक घटनाएं पुलिस के लिए चुनौती बन चुकी हैं। लूट की वारदात दिनोंदिन कमजोर हो रही सामाजिक ताने-बाने पर चोट जैसी है। लोग अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए गलत राह चुनने से नहीं कतरा रहे हैं। कहीं न कहीं ऎसी घटनाएं हमारे संस्कारों में चूक को ही प्रदर्शित करती हैं।
छेड़खानी
आज महिलाएं खुद को कहीं भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हैं। छेड़खानी की घटनाएं हमारी गिरती नैतिकता को दिखाती हैं। महिलाएं आज भले ही हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं, लेकिन समाज की पुरूष मानसिकता आज भी नहीं बदली है। महिलाएं तभी खुद को सुरक्षित महसूस करेंगी, जब हम खुद अपने आचरण में बदलाव लाएंगे।
भ्रण हत्या
यह विडम्बना ही है, जिस नारी का हम "शक्ति" के रूप में पूजा करते हैं, उसी नारी को हम गर्भ में ही मारने से नहीं चूकते हैं। कन्या भ्रूण हत्या आज हमारे समाज का एक स्याह पहलू बन चुका है। आइए, इस विजयदशमी पर महिला सशक्तीकरण की शुरूआत हम अपने घर से ही करते हैं।
मनुष्य को अपने भीतर के रावण को मारकर दिल में राम को लाने की जरूरत है। रावण रूपी बुराइयां हमारे अंदर घुसी हुई हैं, जिसे हम पाप के दलदल से निकल नहीं पाते और पुण्य कर्मों से दूर रहते हैं। मन में श्रीराम के विचारों के आने से दूषित विचार बाहर हो जाएंगे। जब हर घर का मनुष्य राम बन जाएगा, तो रावण अपने आप ही खत्म हो जाएगा। 

Wednesday, 1 October 2014

एक नारे से बदल दिया हिन्दुस्तान



आज ही के दिन 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में पैदा हुए लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्मदिवस और गांधी जी काजन्मदिवस ही एक समान नहीं था। बल्कि व्यक्तित्व और विचारधारा भी एक जैसे थे। शास्त्री जी गांधी के विचारों से बेहद प्रेरित थे। शास्त्री जी ने आजादी के आंदोलन में गांधीवादी विचारधारा का अनुसरण करते हए देश की सेवा की और आजादी के बाद भी अपनी निष्ठा और सच्चाई में कमी नहीं आने दी।
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को मुगलसराय, उत्तर प्रदेश में 'मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव' के यहां हुआ था। इनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। ऐसे में सब उन्हें 'मुंशी जी' ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में क्लर्क की नौकरी कर ली थी। लालबहादुर की मां का नाम 'रामदुलारी' था। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार से 'नन्हे' कहकर ही बुलाया करते थे। जब नन्हे अठारह महीने के हुए तब दुर्भाग्य से उनके पिता का निधन हो गया। उसकी मां रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्जापुर चली गईं। कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हे की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी मां का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उसने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलते ही शास्त्री जी ने अनपे नाम के साथ जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा के लिए हटा दिया और अपने नाम के आगे शास्त्री लगा लिया।
भारत की स्वतंत्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रुप में नियुक्त किया गया था। वो गोविंद बल्लभ पंत के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में प्रहरी एवं यातायात मंत्री बने। जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद, शास्त्री जी ने 9 जून 1964 को प्रधान मंत्री का पद भार ग्रहण किया। शास्त्री जी का प्रधानमंत्री पद के लिए कार्यकाल राजनैतिक सरगर्मियों से भरा और तेज गतिविधियों का काल था। पाकिस्तान और चीन भारतीय सीमाओं पर नजरें गडाए खड़े थे तो वहीं देश के सामने कई आर्थिक समस्याएं भी थीं। लेकिन शास्त्री जी ने हर समस्या को बेहद सरल तरीके से हल किया। किसानों को अन्नदाता मानने वाले और देश के सीमा प्रहरियों के प्रति उनके अपार प्रेम ने हर समस्या का हल निकाल दिया। “जय जवान, जय किसान” के साथ उन्होंने देश को आगे बढ़ाया।
लाल बहादुर शास्त्री जी ने स्वतंत्रता संग्राम में अहम रोल अदा किया, केन्द्र सरकार में रेलमंत्री रहे और 1964 में देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने। 1965-66 में हुए पाकिस्तान के साथ युद्ध में उनके निर्णयों की वजह से भारत ने पाकिस्तान को मार भगाया। जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद शास्त्री जी ने 9 जून 1964 को प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण किया। उनका कार्यकाल राजनीतिक सरगर्मियों से भरा और तेज गतिविधियों का काल था। पाकिस्तान और चीन भारतीय सीमाओं पर नजरें गड़ाए खड़े थे तो वहीं देश के सामने कई आर्थिक समस्याएं भी थीं। लेकिन शास्त्री जी ने हर समस्या को बेहद सरल तरीके से हल किया। किसानों को अन्नदाता मानने वाले और देश की सीमा प्रहरियों के प्रति उनके अपार प्रेम ने हर समस्या का हल निकाल दिया "जय जवान, जय कि सान" के उद्घोष के साथ उन्होंने देश को आगे बढ़ाया।
जिस समय वह प्रधानमंत्री बने उस साल 1965 में पाकिस्तानी हुकूमत ने कश्मीर घाटी को भारत से छीनने की योजना बनाई थी। लेकिन शास्त्री जी ने दूरदर्शिता दिखाते हुए प ंजाब के रास्ते लाहौर में सेंध लगा पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस हरकत से पाकिस्तान की विश्व स्तर पर बहुत निंदा हुई। पाक हुक्मरान ने अपनी इज्जत बचाने के लिए तत्कालीन सोवियस संघ से संपर्क साधा जिसके आमंत्रण पर शास्त्री जी 1966 में पाकिस्तान के साथ शांति समझौता करने के लिए ताशकंद गए। इस समझौते के तहत भारत, पाकिस्तान के वे सभी हिस्से लौटाने पर सहमत हो गया जहां भारतीय फौज ने विजय के रूप में तिरंगा झंडा गाड़ दिया था। इस समझौते के बाद दिल का दौरा पड़ने से 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में शास्त्री जी का निधन हो गया। हालांकि उनकी मृत्यु को लेकर आज तक कोई आधिकारिक रिपोर्ट सामने नहीं लाई गई है। उनके परिजन समय समय पर उनकी मौत का सवाल उठाते रहे हैं। वर्ष 1966 में ही उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न का पुरस्कार भी मिला था।

सत्य में गांधी के " परमेश्वर "


सुभाष चन्द्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को रंगून रेडियो से गान्धी जी के नाम जारी प्रसारण में उन्हें राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित करते हुए आज़ाद हिन्द फौज़ के सैनिकों के लिये उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ माँगीं थीं। प्रति वर्ष 2 अक्टूबर को उनका जन्म दिन भारत में गांधी जयंती के रूप में और पूरे विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के नाम से मनाया जाता है।गान्धी जी ने सभी परिस्थितियों में अहिंसा और सत्य का पालन किया और सभी को इनका पालन करने के लिये वकालत भी की। उन्होंने साबरमती आश्रम में अपना जीवन गुजारा और परम्परागत भारतीय पोशाक धोती व सूत से बनी शाल पहनी जिसे वे स्वयं चरखे पर सूत कातकर हाथ से बनाते थे। उन्होंने सादा शाकाहारी भोजन खाया और आत्मशुद्धि के लिये लम्बे-लम्बे उपवास रक्खे। अहिंसा के पुजारी कहे व माने जाने वाले मोहन दास कर्मचंद गांधी, जिन्हें सम्मान से बापू कह कर पुकारा गया, का दुनिया भर में आज भी नाम है। ‘दे दी हमें आजादी बिना खडग़, बिना ढाल, साबरमती के संत, तूने कर दिया कमाल’ पंक्तियां चरितार्थ कर दिखाने वाले बापू के प्रति दुनिया भर के लोगों की क्या राय रही,
क्लीमैंट एटली के शब्दों में महात्मा गांधी विश्व के महान व्यक्ति थे। वह घोर तपश्चर्या का जीवन व्यतीत करते थे। उनके करोड़ों देशवासी उन्हें दैवी प्रेरणा प्राप्त संत मानते थे। लक्ष्य साधन में उनकी सच्चाई और निष्ठा पर उंगली नहीं उठाई जा सकती जबकि माऊंटबेटन का कहना था कि महात्मा गांधी के जीवित रहने से सारा संसार सम्पन्न था और उनके निधन से लगता है कि संसार ही दरिद्र हो गया है।
माऊंटबेटन की टिप्पणी थी कि गांधी के परामर्श उनके लिए सदा सहायक सिद्ध हुए। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि महात्मा गांधी एक ऐसे विजयी योद्धा थे, जिन्होंने बल प्रयोग का सदा उपहास किया। वह बुद्धिमान, नम्र, दृढ़ संकल्पी और निश्चय के धनी व्यक्ति थे। इसी तरह रेजिनाइल्ड सोरेन्सन ने लेनिन व महात्मा गांधी को विश्व में बीसवीं सदी का महानतम् व्यक्तित्व बताया था। उनका यह भी कहना था कि ये दोनों व्यक्तित्व एक दूसरे के विपरीत होते हुए भी दुनिया भर में चर्चित रहे। फिलिप नोएल बेकर का गांधी जी को लेकर कथन था कि आधुनिक इतिहास में किसी भी एक व्यक्ति ने अपने चरित्र की वैयक्तिक शक्ति, ध्येय की पावनता और अंगीकृत उद्देश्य के प्रति नि:स्वार्थ निष्ठा से लोगों के दिमागों पर इतना असर नहीं डाला, जितना महात्मा गांधी का असर दुनिया पर हुआ।
इसी तरह पर्ल बक ने कहा था कि हमारे लिए गांधी इने-गिने महात्माओं में से एक थे, जो अपने विश्वास पर हिमालय की तरह अटल और दृढ़ रहते थे। संसार का प्रत्येक व्यक्ति सोचता है कि गांधी जी एक उत्तम व्यक्ति थे तो लोगों ने उन्हें क्यों मार डाला, यह सवाल अनेक लोगों ने मुझसे पूछा और मुझे जवाब न सूझा। रिचर्ड बी. ग्रेड ने कहा था कि गांधी जी की यह भी विशेषता थी कि वह चाहे कहीं भी रहें और चाहे जिस तरह के काम में व्यस्त हों लेकिन हर रोज सुबह सबसे पहले प्रार्थना जरूर करते थे। अपने देश के लोगों में भी महात्मा गांधी शीर्ष स्तर पर छाए रहे। पंडित जवाहर लाल नेहरू उन्हें एक उच्च सिद्धांतवादी और सत्य का अनुयायी संत मानते थे। उनकी नजर में गांधी जी जनता की नब्ज को खूब पहचानते थे। वह कहा करते थे कि वास्तव में यदि कोई सार रूप में भारत का प्रतिनिधित्व करने में योग्य था तो वह सिर्फ महात्मा गांधी थे। बाल गंगाधर तिलक के शब्दों में बहुत सी बातों में लोगों का गांधी जी से मतभेद हो सकता है और बहुत से लोग उनसे अधिक विद्वान हो सकते हैं परन्तु उनमें चरित्र की जो महत्ता है, उसके कारण वह सब लोगों के आदर्श हो गए।
गांधी की पहली बड़ी उपलब्धि १९१८ में चम्पारन और खेड़ा सत्याग्रह, आंदोलन में मिली हालांकि अपने निर्वाह के लिए जरूरी खाद्य फसलों की बजाए नील नकद पैसा देने वाली खाद्य फसलों की खेती वाले आंदोलन भी महत्वपूर्ण रहे। जमींदारों (अधिकांश अंग्रेज) की ताकत से दमन हुए भारतीयों को नाममात्र भरपाई भत्ता दिया गया जिससे वे अत्यधिक गरीबी से घिर गए। गांवों को बुरी तरह गंदा और अस्वास्थ्यकर (unhygienic); और शराब, अस्पृश्यता और पर्दा से बांध दिया गया। अब एक विनाशकारी अकाल के कारण शाही कोष की भरपाई के लिए अंग्रेजों ने दमनकारी कर लगा दिए जिनका बोझ दिन प्रतिदिन बढता ही गया। यह स्थिति निराशजनक थी। खेड़ा , गुजरात में भी यही समस्या थी। गांधी जी ने वहां एक आश्रम  बनाया जहाँ उनके बहुत सारे समर्थकों और नए स्वेच्छिक कार्यकर्ताओं को संगठित किया गया। उन्होंने गांवों का एक विस्तृत अध्ययन और सर्वेक्षण किया जिसमें प्राणियों पर हुए अत्याचार के भयानक कांडों का लेखाजोखा रखा गया और इसमें लोगों की अनुत्पादकीय सामान्य अवस्था को भी शामिल किया गया था। ग्रामीणों में विश्‍वास पैदा करते हुए उन्होंने अपना कार्य गांवों की सफाई करने से आरंभ किया जिसके अंतर्गत स्कूल और अस्पताल बनाए गए और उपरोक्त वर्णित बहुत सी सामाजिक बुराईयों को समाप्त करने के लिए ग्रामीण नेतृत्व प्रेरित किया।
लेकिन इसके प्रमुख प्रभाव उस समय देखने को मिले जब उन्हें अशांति फैलाने के लिए पुलिस ने गिरफ्तार किया और उन्हें प्रांत छोड़ने के लिए आदेश दिया गया। हजारों की तादाद में लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए ओर जेल, पुलिस स्टेशन एवं अदालतों के बाहर रैलियां निकालकर गांधी जी को बिना शर्त रिहा करने की मांग की। गांधी जी ने जमींदारों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन और हड़तालों को का नेतृत्व किया जिन्होंने अंग्रेजी सरकार के मार्गदर्शन में उस क्षेत्र के गरीब किसानों को अधिक क्षतिपूर्ति मंजूर करने तथा खेती पर नियंत्रण, राजस्व में बढोतरी को रद्द करना तथा इसे संग्रहित करने वाले एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस संघर्ष के दौरान ही, गांधी जी को जनता ने बापू पिता और महात्मा (महान आत्मा) के नाम से संबोधित किया। खेड़ा में सरदार पटेल ने अंग्रेजों के साथ विचार विमर्श के लिए किसानों का नेतृत्व किया जिसमें अंग्रेजों ने राजस्व संग्रहण से मुक्ति देकर सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया था। इसके परिणामस्वरूप, गांधी की ख्याति देश भर में फैल गई।
गांधी जी ने अपना जीवन सत्य, या सच्चाई की व्यापक खोज में समर्पित कर दिया। उन्होंने इस लक्ष्य को प्राप्त करने करने के लिए अपनी स्वयं की गल्तियों और खुद पर प्रयोग करते हुए सीखने की कोशिश की। उन्होंने अपनी आत्मकथा को सत्य के प्रयोग का नाम दिया। गांधी जी ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ने के लिए अपने दुष्टात्माओं , भय और असुरक्षा जैसे तत्वों पर विजय पाना है। .गांधी जी ने अपने विचारों को सबसे पहले उस समय संक्षेप में व्य‍क्त किया जब उन्होंने कहा भगवान ही सत्य है बाद में उन्होने अपने इस कथन को सत्य ही भगवान है में बदल दिया। इस प्रकार , सत्य में गांधी के दर्शन है " परमेश्वर " .