Sunday, 23 March 2014

सियासत में स्वार्थ सबसे बुरी

कोई चार दशकों से, जब भी चुनाव आता है, तो अधिकतर राजनीतिक पार्टियां और उनके दिग्गज नेता देश के सामने विकास का कोई नया व अनोखा मॉडल न रखकर, कांग्रेस के वंशवाद पर हमला बोलने लगते हैं। पहली बार 1967 में समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया ने उत्तर प्रदेश के फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में ‘नेहरू वंश’ के तर्क के जरिये जवाहरलाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित के खिलाफ जनेश्वर मिश्र की तरफ से मोर्चा खोला था। वह खुद कन्नौज से चुनाव लड़ रहे थे। पर आज कश्मीर से लेकर केरल और महाराष्ट्र से ओडिशा तक की राजनीति में सियासी वंशों की ही हुक्मरानी है। एक आंकड़े के अनुसार, साल 2004 के चुनाव में कोई 120 परिवारों ने 250 क्षेत्रों से चुनाव लडे़ थे। लोग कहते हैं कि ‘शहजादा-शहजादी’ और ‘युवराज’ जैसे शब्द सामंती प्रथा की देन हैं। और ये शब्द गरीबों को परियों की कहानियों की तरह लुभाते हैं। यह एक मानसिकता है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक मार्क टुली इंग्लैंड से आयातित सामंती परंपरा की देन मानते हैं।
दरअसल, वंशवाद भारतीय राजनीति का एक ऐसा विषय है, जिसका अध्ययन और आलोचना करते करते कई राजनेता और कई दल इसी की चपेट में आ गए। अक्सर यह बहस सिर्फ गांधी परिवार के संदर्भ में उभरती है और बाकी परिवारों को छोड़ते हुए तू-तू मैं-मैं में बदल कर कोई ठोस राजनीतिक विमर्श में नहीं बदल पाता है। यह मुद्दा किसलिए है? राहुल गांधी को टारगेट करने के लिए या भारतीय राजनीति को वंशवाद से दूर करने के लिए। क्या राहुल गांधी का मामला इसलिए संगीन है क्योंकि वे आए और आते ही परिवार के नाम पर प्रधानमंत्री के दावेदार बन गए या इसलिए है कि वंशवाद हमारी राजनीति को खाए जा रहा है। प्रधानमंत्री पद के लिए गंभीर है या मुख्यमंत्री या संसदीय सीटों पर परिवारों के कब्जे का मसला भी उतना ही गंभीर है। यह अजीब नहीं है कि कोई वंशवाद पर हमला करते हुए खुद अपने परिवार का जिक्र करता है। चाय वाला, दूध वाला या गरीब परिवार वाला। कोई इसका जिक्र कैसे न करें। वंशवाद को लेकर राहुल गांधी को घेरा जाता है और उनसे उनके पिता के बयान का हिसाब पूछा जाता है। क्या यह अजीब नहीं है। बाप का हिसाब बेटे से।
उड़ीसा के वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे बीजू पटनायक के पुत्र नवीन पटनायक वतर्मान में मुख्यमंत्री है। शिरोमणि अकाली दल के संरक्षक और वर्तमान में पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के पुत्र सुखबीर सिंह बादल पार्टी अध्यक्ष के साथ-साथ प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं। 18 सदस्यीय मंत्रिमंडल में आधे दर्जन रिश्तेदार (मनप्रीत सिंह बादल- बादल के भतीजे और वित्त मंत्री, आदेश प्रताप सिंह कैरो- बादल के दामाद और खाद्य आपूर्ति मंत्री, विक्रमजीत सिंह मजीठा-सुखबीर के साले और सूचना प्रसारण मंत्री, जनभेजा सिंह जोहल- सिंचाई मंत्री और बादल कें करीबी रिश्तेदार) भरे पड़े हैं। सुखबीर की पत्नी हरसिमरत कौर भंटिडा सीट से सबसे मजबूत उम्मीदवार हैं तथा बादल की पत्नी सुरिंदर कौर बादल शिरोमणि अकाली दल (महिला ग्रुप) की संरक्षक हैं। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के एक पुत्र चंद्रमोहन विश्नाई (मो. चांद) उपमुख्यमंत्री रहे तो दूसरे कुलदीप विश्नोई भिवानी से सासंद तथा हरियाणा जनहित पार्टी के अध्यक्ष हैं। जम्मू काश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुला के पिता फारूख अब्दुला और उनके पिता शेख अब्दुला वर्षों तक कश्मीर की रियासत को संभालते रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की पुत्री महबूबा मुफ्ती सासंद के साथ ही पीडीपी की अध्यक्षा भी हैं।
महाराष्ट्र में राकपा प्रमुख और केन्द्रीय मंत्री शरद पवार अपनी सुपुत्री सुप्रिया सुले को आसानी से संसद में पहुंचाने के लिए  अपनी बारामती की सीट छोड़ चुके हैं तथा भतीजा अजीत पवार भी जंग-ए मैदान में कूदने को तैयार हैं। बाला साहब ठाकरे ने पुत्र मोह में उद्धव ठाकरे को शिवसेना का अध्यक्ष क्या बनाया भतीजे राज ठाकरे ने एक नई पार्टी महाराष्ट्र नवर्निमाण सेना गठित कर चाचा को ही टक्कर दे दी। 1987 में नादेड़ से लोकसभा पहुंचे महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक चैहान पूर्व मुख्यमंत्री रहे एस बी चौहान के बेटे हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री व द्रमुक अध्यक्ष एम करुणानिधि के पुत्र एम के स्टालिन पार्टी के कोषाध्यक्ष हैं तो पुत्री कानी मोझी को संसद में भेजने की तैयारी हैं। उनके ही परिवार के दयानिधि मारण अभी तक केन्द्र में संचार मंत्री रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री तथा जद (सेकुलर) प्रमुख एच. डी. देवगौड़ा के पुत्र एच. डी. कुमार स्वामी मुख्यमंत्री रह चुके हैं तो दूसरे एच डी खेन्ना दो बार बिजली मंत्री और सार्वजनिक मंत्री रह चुके हैं।  एच. डी. कुमारस्वामी की पत्नी अनिता मधुगिरी विधान सभा से उपचुनाव लड़ चुकी हैं। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह वर्तमान में विधायक है तथा लोकसभा जाने की तैयारी में है। पूर्व मंत्री माधव राव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा राजेश पायलट के पुत्र सचिन पायलट वर्तमान मे सांसद है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र सिंह भी बाड़मेड़ से लोकसभा जाने की तैयारी में है। पूर्व सांसद सुनील दत्त की बेटी प्रिया दत्त मुम्बई से सांसद है तथा संजय दत्त लखनऊ से संसद पहुंचने की चाहत में है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा की बेटी अगाथा मेघालय के तुरा क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुनी गई है। अभी हाल में कांग्रेस से निष्कासित मागंरेट निरंजन अल्वा की सास वायलट अल्वा राज्यसभा की उपसभापति रह चुकी है तथा पति जोकिभ अल्वा भी सासंद रह चुके हैं।
भारतीय राजनीति में परिवारवाद को लेकर पैट्रिक फ्रेंच ने एक गंभीर अध्ययन किया है। पैट्रिक ने 15वीं लोकसभा के 545 सांसदों की पारिवारिक पृष्ठभूमि का अध्ययन किया तो 255 सांसदों की पारिवारिक पृष्ठभूमि कुछ खास नहीं लगी, लेकिन 156 सांसद पारिवारिक पृष्ठभूमि से तालुल्क रखते हैं। करीब 29 प्रतिशत सांसदों का फैमिली कनेक्शन है। पैट्रिक फ्रेंच पार्टियों में खानदानी प्रतिशत भी निकालने का अजूबा काम करते हैं, तो पाते हैं कि राष्ट्रीय लोकदल एक ऐसी पाटी है जो सौ परसेंट खानदानी है। इसके पांचों सांसद खानदानी हैं। आज के दैनिक हिन्दुस्तान में इनका एक विज्ञापन भी छपा है आगरा में संकल्प रैली का। वो भी राजनीति को स्वच्छ करने के लिए। इस विज्ञापन में तीन ही चेहरे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी।
पैट्रिक फ्रेंच के अनुसार पार्टियों में वंशवाद कुछ इस प्रकार है-
एनसीपी ? 77.8 प्रतिसत 9 में से 7
बीजेडी ? 42.9  प्रतिशत 14 में से 6
कांग्रेस ? 37.5 प्रतिशत 208 में से 78
सपा ? 27.3 प्रतिशत 22 में से 6
बीजेपी ? 19 प्रतिशत 116 में से 22
क्यों जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार है, जिससे कांग्रेस और बीजेपी दोनों हाथ मिलाते रहे हैं। फिर क्यों पंजाब में बादल परिवार है, जो बीजेपी की सहयोगी है? फिर क्यों यूपी में यादव परिवार हैं? क्यों बिहार में यादव और पासवान परिवार है? फिर क्यों महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार है, जिससे बीजेपी हाथ मिलाती है। फिर क्यों मध्यप्रदेश और राजस्थान में सिंधिया परिवार है, जो कांग्रेस में भी है, बीजेपी में है। कुछ परिवार तो बढ़ते ही जा रहे हैं। जैसे मुलायम सिंह यादव का परिवार। लालू प्रसाद यादव का परिवार, रामविलास पासवान का परिवार।
असल में वंशवाद उतना बुरा नहीं है, जितना स्वार्थपरता। स्वार्थ वह भी केवल और केवल अपने लिए, अपने परिवार के लिए। नेहरू-गांधी परिवार पर केवल विरोधी केवल राजनीति से प्रेरित होकर बयानबाजी करते हैं। उन्हें इस बात पर गौर फरमाना चाहिए कि इस परिवार का कोई भी सदस्य कभी राज्यसभा के रास्ते संसद में नहीं पहुंचा है। बेशक इंदिरा गांधी लोकसभा चुनाव हार गर्इं थीं, फिर भी उन्होंने राज्यसभा का दरवाजा नहीं खटखटाया। सोनिया गांधी या राहुल गांधी ने कभी भी सत्ता की कुर्सी पर आने को बेताब नहीं दिखे। इसी परिवार ने पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया। कभी इस परिवार ने लोकसभाध्यक्ष अथवा राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति की कुर्सी की ईच्छा नहीं रखीं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि वह राजनीति में वंशवाद की धारणा के खिलाफ हैं, लेकिन वह महसूस करते हैं कि एक बंद व्यवस्था में वंशवाद को अलग नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं कि मैं पूरी तरह से वंशवाद की धारणा के खिलाफ हूं। जो कोई भी मुझे जानता है, वह यह जानता और समझता है। लेकिन आप एक बंद व्यवस्था में वंशवाद को अलग नहीं कर सकते। आपको व्यवस्था को खोलना होगा।
यह अवसरवादिता नहीं तो और क्या है कि जो मोदी देश भर में वंशवाद के खिलाफ जहर उगलते नजर आते हैं, उसे खत्म कर डालने का संकल्प दिखाते हैं , उन्हें ना बिहार में पासवानों का वंशवाद दिखता है ना पंजाब में बादलों का और न महारास्ट्र में ठाकरे कंपनी का। वह खुद को और अपनी पार्टी को जाति-धर्म से ऊपर बताते हैं, जातियों की राजनीति करने वाली सपा बसपा पर भाले बरछी चलाते हैं लेकिन जाति की राजनीतिक ठेकेदारी करने वाले पासवान और उदितराज उन्हें प्रिय हो जाते हैं और कोई आश्चर्य नहीं कि चुनाव बाद बसपा भी पहले की तरह साथ आना चाहे तो उसकी भी जातीयता आधारित राजनीति पर भी भाजपा की स्वीकृति की मुहर लगने में कुछ ही मिनट लगें। भाजपा इसे स्वीकार करे या न करे, लेकिन अब उसे वंशवाद की राजनीति का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं। भाजपा में ऐसे नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है, जो अपने पुत्र-पुत्रियों को राजनीति में स्थापित करने में लगे हुए हैं। एक समय था जब गैर कांग्रेसी राजनीतिक दल कांग्रेस की इसलिए आलोचना किया करते थे कि वह वंशवाद की राजनीति को प्रश्रय दे रही है, लेकिन अब करीब-करीब सभी राजनीतिक दल यही कर रहे हैं। भाजपा, सपा, राजद, द्रमुक आदि में वंशवाद की राजनीति को खाद-पानी देने की होड़ सी लगी हुई है। वंशवाद पर सबसे आक्रामक दिखने वाले मोदी को यह वंशवाद राहुल गांधी में तो नजर आता है लेकिन अपने साथ खड़े प्रकाश बादल-सुखबीर बादल में वो नहीं दिखता, दिवंगत बाल ठाकरे-उद्धव ठाकरे में वह नहीं दिखता। वह राहुल गांधी को शहजादा बुलाते हैं लेकिन अपने साथ खड़े शहजादे वरुण गांधी और शहजादी वसुंधरा राजे नहीं दिखती, उन्हें वंशवाद तब भी नहीं दिखता जब राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, लालजी टंडन जैसे उनके नेता अपने बेटों के लिए टिकट मांगते और उन्हें चुनाव लड़वाते हैं।
राजनीति में वंशवाद केवल भारत तक महदूद नहीं है। नेपाल में कोईराला परिवार, सामंतवादी राजनीति के लिए मशहूर पाकिस्तान में भुट्टो परिवार का दबदबा है, तो बांग्लादेश में शेख हसीना और खालिदा जिया में ही टक्कर होता है। श्रीलंका में लोग जयवर्धने और भंडारनायके परिवार के जिक्र से लोग रोमांचित हो जाते हैं। वास्तव में, राजनीतिक वंशवाद भारत या एशिया तक ही सीमित नहीं है। यह तो तकरीबन पूरी दुनिया में है। कहते हैं कि अमेरिका में प्रजातंत्र काफी मजबूत है, मगर सभी जानते हैं कि वहां बुश, केनेडी और क्लिंटन वंश हमेशा ही चर्चा में रहे हैं। हाल ही में टाइम पत्रिका ने अमेरिका की ‘पॉलिटिकल डायनेस्टी’ के बारे में लिखा था: हालांकि संविधान ऐसा कुछ नहीं कहता, लेकिन सदियों से अमेरिकी लोग साफ तौर पर ऐसे लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनते रहे हैं, जो किसी न किसी स्थापित परिवार से आते हैं। दस में से एक सांसद के परिवार का कोई सदस्य पहले भी इस पद पर रहा चुका होता है।

Sunday, 16 March 2014

पहले वाली होली कहां रही?

पहले होली के दिन अलग अलग युवकों की टोलियां घर घर घूम कर गीत गाती थी. बदले में उनको मिलते थे रंग अबीर और खाने के लिए लिए मालपुए. लेकिन अब यह परंपरा दम तोड़ रही है. कुछ लोग इसकी वजह आपसी दुश्मनी, भेदभाव और बढ़ते वैमनस्य को मानते हैं तो कुछ लोग पश्चिमी परंपराओं के हावी होने को मुख्य वजह बताते हैं. भारत में होली का स्वरूप बदल रहा है. सामुदायिक त्योहार की पहचान रखने वाला यह उत्सव धीरे-धीरे जाति और समूह के दायरे में बंट रहा है. इसकी प्राचीन परंपराएं भी तेजी से खत्म हो रही हैं.
प्रेम सौहार्द के इस त्योहार में लोग दुश्मन के भी गले लग जाते थे. पहले होली एक महीने तक चलने वाला त्योहार था. गांव भर के लोग एक जगह जमा होकर होली के हुड़दंग में मस्त हो जाते थे. हर गांव में एक महीने तक ढोल और मंजीरे बजते थे. लेकिन अब एक दूसरे के साथ तालमेल के अभाव, कद्रदानों की कमी और गांवों से तेज होते पलायन के चलते यह पुरानी परंपरा दम तोड़ रही है. युवा पीढ़ी को तो फगुआ गीतों के बोल तक याद नहीं हैं. फगुआ के गीतों में पति-पत्नी, प्रेमी प्रेमिका, देवर भाभी के रिश्तों में हास्यपुट तो दिए ही जाते हैं, धार्मिक गीतों को भी शामिल किया जाता है. लेकिन अब गायन की यह परंपरा खत्म होती जा रही है. अब इनकी जगह फूहड़ गीत बजने लगे हैं.
पहले हिंदी भाषी प्रदेशों में फागुन का महीना चढ़ते ही फिजा में होली के रंगीले और सुरीले गीत तैरने लगते थे. इनको स्थानीय भाषा में फाग या फगुआ गीत कहा जाता है. कोई महीने भर बाकायदा इनकी महफिलें जमती थीं. शहरों में भी ढोल-मजीरे के साथ फगुआ के गीत गाए जाते थे. लेकिन समय की कमी, बदलती जीवनशैली और कई अन्य वजहों से शहरों की कौन कहे, गांवों में भी यह परंपरा दम तोड़ रही है.
पहले होली के मौके पर शहरों में महामूर्ख सम्मेलन आयोजित होते थे और अखबारों में नामी-गिरामी लोगों को उपाधियां दी जाती थीं. अब यह परंपरा भी आखिरी सांसें ले रही है. होली के मौके पर बनने वाली ठंडई और भांग की जगह अब अंग्रेजी शराब ने ली है.
अब लोगों में प्रेम की भावना ही गायब हो गई है. लोग टीवी से चिपके रहते हैं. पहले गांवों के चौपालों से होली खेलने के लिए निकलने वाली टोली में बुजुर्ग से लेकर युवा शामिल होते थे. यह टोली सामाजिक एकता की मिसला होती थी.  पहले गांवों में होली के दिन भांग और ठंडई बड़े बड़े बर्तनों में घोली जाती थी. जात पांत से परे गांव का हर व्यक्ति उसका सेवन करता था. अब तो जात पांत की भावना सतह पर आ गई है. इसके अलावा इनकी जगह देशी और विलायती शराब ने ले ली है. अब होली की वह मस्ती तो अतीत के पन्नों में कहीं गुम हो गई है. पहले होली के दिन महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन किया जाता था और इसमें समाज के हर तबके के लोग बड़े उत्साह से भाग लेते थे. लोग इस दौरान मिलने वाली उपाधियों का बुरा नहीं मानते थे. अब लोगों को इसकी फुर्सत ही कहां है? अब तो टीवी और इंटरनेट ने लोगों को समाज से काट कर रख दिया है.

Wednesday, 5 March 2014

शीला दीक्षित बनेंगी राज्यपाल


दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित केरल की नई राज्यपाल होंगी। शीला दीक्षित को केरल के राज्यपाल के पद पर बिठाने को लेकर कांग्रेस हाईकमान ने हरी झंडी दे दी है और उनकी नियुक्ति की अधिसूचना किसी भी वक्त जारी की जा सकती है। विज्ञप्ति में कहा गया है कि केरल में नए राज्यपाल के पदभार ग्रहण करने तक वहां की जिम्मेदारी कर्नाटक के राज्यपाल एच.आर.भारद्वाज संभालेंगे।
15 सालों तक दिल्ली पर राज करने वाली शीला दीक्षित को राज्यपाल पद की जिम्मेदारी दिए जाने से एक बात तो साफ है कि अब सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका खत्म हो जाएगी। राष्ट्रपति भवन द्वारा जारी विज्ञप्ति के मुताबिक शीला निखिल कुमार का स्थान लेंगी। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने निखिल कुमार का इस्तीफा तत्काल प्रभाव से मंजूर कर लिया है। निखिल कुमार बिहार से चुनाव लड़ने जा रहे हैं।
तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं शीला दीक्षित हाल के विधानसभा चुनाव में पराजित होने के तीन महीने के अंदर केरल की राज्यपाल नियुक्त की गईं। पिछले दिसंबर में दिल्ली विधानसभा चुनाव में शीला दीक्षित को नयी दिल्ली सीट से आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से भारी शिकस्त मिली थी। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का बहुत खराब प्रदर्शन रहा और वह सत्तर सदस्यीय विधानसभा में तीसरे स्थान पर पहुंच गई।
शीला 1998 से लेकर 2013 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। पिछले साल दिसंबर में हुए विधानसभा चुनावों मे वह आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से चुनाव हार गई थीं। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री 1984 से 1989 तक उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोक सभा सीट से सांसद रह चुकी हैं। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले चल रहे हैं।

Thursday, 20 February 2014

राहुल गांधी दूर करेंगे भ्रष्टाचार


लोकसभा चुनाव से पहले संसद सत्र का आज आखिरी दिन है।  इस मौके को कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी की भ्रष्टाचार विरोधी छवि के लिए सरकार लोकसभा में लंबित 6 भ्रष्टाचार विरोधी कानून को पास करा सकती है। सरकार ने अपनी तरफ से इसकी पूरी तैयारी कर ली है। अगर ये सभी बिल आज पास नहीं हो पाते हैं तो संसद का सत्र आगे भी बढ़ाया जा सकता है। संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ ने इस बात के संकेत दे दिए हैं। तेलंगाना के मुद्दे पर लगातार हंगामा होने की वजह से अब तक इस बिल पर बात आगे नहीं बढ़ पा रही थी। कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार विरोधी इन 6 बिल को संसद की दहलीज पास कराने की जिम्मेदारी जयराम रमेश को सौंपी गई है। संकेत यह भी हैं कि अगर इन बिलों को संसद से मंजूरी नहीं मिली तो सरकार इन पर अध्यादेश लेकर आएगी।
1. न्यायिक जवाबदेही बिल, 2010
2. व्हीसिल ब्लोवर प्रोटेक्शन बिल, 2011
3. समय पर सेवाएं पाने और उनकी सुनवाई का अधिकार, 2011
4. विदेशी और गैर सरकारी अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में रिश्वत निरोधी बिल, 2011
5. भ्रष्टाचार निरोधी बिल (संशोधित), 2013
6. पब्लिक प्रॉक्यूरमेंट (सरकारी खरीद) बिल, 2012
 हालांकि, विपक्षी दल साफ कर चुके हैं कि ये सब बेहद अहम विधेयक हैं। इन्हें आनन-फानन में नहीं, बल्कि विस्तृत चर्चा के बाद ही पास किया जाना चाहिए। बिलों को पारित करने में कहीं कोई चूक न हो इस के लिए इसकी जिम्मेदारी जयराम रमेश को सौंपी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए एक फ्रेमवर्क बनाने की जरूरत बताते हुए राहुल गांधी इन बिलों को पास करने के लिए मौजूदा सत्र को बढ़ाने की वकालत भी कर चुके हैं। एआईसीसी के महासचिव और पार्टी के संचार विभाग के अध्यक्ष अजय माकन ने कहा, ‘‘राहुल गांधी भ्रष्टाचार के खिलाफ दृढ़संकल्पित हैं। उन्होंने कहा, ‘‘संप्रग सरकार के दौरान ऐतिहासिक भ्रष्टाचार निरोधक विधेयक पारित किये गये हैं। हमारा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का ट्रैक रिकार्ड रहा है।’’
हाल में हुए विधानसभा के चुनावों तक राहुल मनरेगा, सूचना और शिक्षा के अधिकार, खाद्य सुरक्षा और कंडीशनल कैश ट्रांसफर को ‘गेम चेंजर’ मानकर चल रहे थे। ग्राम प्रधान को वे अपने कार्यक्रमों की धुरी मान रहे थे। कांग्रेस की बदली हुई समझ का संकेत 21 दिसम्बर को फिक्की की सभा में मिला जहाँ राहुल को उद्योगपतियों की नाराजगी से रूबरू होना पड़ा। उन्हें बताया गया कि केवल पर्यावरण के नाम पर ही तमाम उद्योगों का काम रुका पड़ा है। उसी रोज वन एवं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन का इस्तीफा हुआ। पहले समझा गया कि यह इस्तीफा चुनाव की तैयारी के सिलसिले में है। पर बाद में चीजें ज्यादा स्पष्ट हुईं। फिक्की की सभा में राहुल ने कहा कि भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा है जो लोगों का खून चूस रहा है। व्यापार जगत की चिंताओं का उत्तर देते हुए उन्होंने स्थिति में सुधार लाने के लिए मंजूरी देने में नियम आधारित व्यवस्था की वकालत की। इसके एक हफ्ते बाद 27 दिसम्बर को राहुल गांधी ने पार्टी के शीर्ष नेताओं और कांग्रेस शासित 12 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की। उन्होंने आदर्श हाउसिंग घोटाला मामले पर महाराष्ट्र सरकार की खिंचाई की और न्यायिक आयोग की रिपोर्ट को खारिज करने के फैसले से असहमति जताते हुए कहा कि इस पर पुनर्विचार होना चाहिए। इस बैठक में फल और सब्जियां बेचने के लिए किसानों पर लगी पाबंदियों को हटाने की घोषणा भी की गई। यह भी तय किया गया कि कांग्रेस-शासित राज्य 28 फरवरी से पहले केंद्रीय कानून की तर्ज पर लोकायुक्त अधिनियम पास करेंगे।

Monday, 17 February 2014

कांग्रेस में सम्मान, संघ में नहीं स्थान


कांग्रेस हमेशा से बिना किसी भेदभाव के समाज के हर तबके की बात की है। उसके विकास और सम्मान की बात की है। न तो जाति का भेद और न ही जाति का। न तो लिंग का भेद और न ही प्रदेश का। हमेशा आम आदमी और उसके विकास के लिए नीतियां बनाती रही है कांग्रेस। वहीं, दूसरे कई राजनीति दल और उनके मातृसंगठन के लिए महिला मानो अछूत हों। क्या आपने कभी सुना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक के रूप में किसी महिला का नाम आया है? आखिर, मातृशक्ति से ऐसा दुराव क्यों? आखिर कथनी और करनी में अंतर क्यों?
कांग्रेस पार्टी ने हमेशा से महिला सशक्तीकरण की बात की है। जब से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभाली इस ओर और भी अधिक प्रयास किए। 16 फरवरी को अपनी नीति पर अमल करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने महिला सशक्तिकरण का वादा किया और कहा कि कांग्रेस का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया में ज्यादा महिलाओं को आगे लाने की है। उन्होंने भाजपा और आरएसएस पर प्रत्यक्षत: हमला करते हुए कहा कि विपक्ष महिलाओं का सम्मान नहीं करता और उनके विचारधारात्मक संगठन में महिलाओं के लिए जगह नहीं है। राहुल गांधी ने कहा है कि जब तक हम महिलाओं को सशक्त नहीं करेंगे, भारत महाशक्ति नहीं बन सकता। जहां-जहां महलाओं को सशक्त किया गया और उन्हें अवसर दिए गए, वे देश तेजी से आगे बढ़े। हम महिलाओं को सियासत में बराबरी देना चाहते हैं..पंचायतों में, विधानसभाओं में, संसद में ज्यादा महिलाएं दिखनी चाहिए। राहुल गांधी ने महिलाओं से अपील करते हुए कहा कि हम इस देश की प्रगति में आपकी शक्ति का उपयोग करना चाहते हैं। हम महिलाओं के लिए स्कूलों, अस्पतालों और संसद का दरवाजा खोलना चाहते हैं, क्योंकि आपके बगैर कोई प्रगति नहीं है।
सच तो यही है कि राहुल गांधी की यही तमन्ना है कि ऐसे दिन आएं जब महिलाएं बिना किसी डर-भय के शाम में, रात में निकल सकें, बसों में सफर कर सकें। इससे पूर्व भी महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध की पृष्ठभूमि में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा था कि उनके सशक्तीकरण के लिए कानून बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें जमीनी स्तर पर उचित ढंग से लागू करना भी जरूरी है। श्रीमति सोनिया गांधी ने कहा था कि हम महसूस करते हैं कि बस कानून बना देना एवं नीतियां घोषित कर देना ही महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काफी नहीं होगा। इसके साथ ही नीतियों एवं कानूनों को जमीनी स्तर पर उचित ढंग से लागू भी करना होगा। हमें महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार की हिंसा खत्म करनी चाहिए और ऐसे सभी कदम उठाने चाहिए, जिससे महिलाएं सुरक्षित महसूस कर सकें, बेखौफ बनें, सशक्त बनें तथा उन्हें सम्मान प्राप्त हो।
महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए सामाजिक क्रांति शुरू करने की अपील करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा था कि सबसे मूलभूत मुद्दा यह है कि हमारे समाज की मानसिकता एवं पुरानी सोच बदलनी चाहिए। पुरुषों की तरह ही महिलाओं को भी समान अधिकार देना एक बड़ी चुनौती है और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव की दीवार गिरनी चाहिए। हम सभी जानते हैं कि हमारे बच्चों के सामाजिक दृष्टिकोण का निर्माण अपने घरों की चारदीवारी के भीतर होता है। परिवार में लड़की को उसके भाई के समान ही दर्जा दिया जाना चाहिए। परिवार में लड़कियों को भी शिक्षा, विकास एवं सशक्तीकरण का अधिकार है जैसा कि लड़के को होता है।
दूसरी ओर भाजपा की मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महिलाओं से भेदभाव करता है। महिलाओं की आधी दुनिया से संघ की दूरी है। भले ही संघ के अनेक प्रकल्पों से महिलाएं जुड़ी हुई हों, मगर मूल संगठन में उन्हें कोई स्थान नहीं है। इस लिहाज से संघ को यदि पुरुष प्रधान कहा जाए, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। संघ ने महिलाओं की भी शाखाएं गठित करने पर कभी विचार नहीं किया। आज जब कि महिला सशक्तिकरण पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, महिलाएं हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं, संघ का महिलाओं से जुड़ाव नहीं हो रहा है। आखिर क्यों?
गौर करने योग्य यह भी है कि मानव-सभ्यता जब पृथ्वी पर पनपने लगी तो पुरुष ने अपनी शारीरिक सामर्थ्य का फायदा उठाते हुए पहला अधिकार स्त्री पर जताया था। महिलाओं के शोषण की कहानी वहीं से शुरू हो गई थी। संपत्ति पर अधिकार का सिलसिला उसके बाद शुरू हुआ। वर्ष 1848 में सोनेका फाल्स में आयोजित महिला-अधिकार सम्मेलन में जारी किए गए घोषणा-पत्र में कहा गया था कि मानवता का इतिहास पुरुष द्वारा स्त्री पर लगातार अत्याचार और उस पर आधिपत्य जमाने की गाथा मात्र है। प्राचीन रोमन साम्राज्य में महिलाओं को पुरुष के स्वामित्व वाला प्राणी समझा जाता था। फ्रांस में उन्हें आधी आत्मा वाला जीव समझा जाता था, जो समाज के विनाश के लिए जिम्मेदार था। चीनवासी महिलाओं में शैतान की आत्मा के दर्शन करते थे। इस्लाम के प्रचार से पहले अरबवासी लड़कियों को जिंदा दफ्न कर दिया करते थे। भारत में भी सीता से लेकर द्रौपदी तक स्त्रियां विभिन्न प्रकार की अग्नि-परीक्षा से गुजरती रही हैं। कन्या हत्या के पाप से जब भारतवासी मुक्त होने लगे थे तो सहज ही कन्या-भ्रूण हत्या सामाजिक व्यवस्था में स्थापित हो गई थी। मापदंड और तरीके भिन्न हो सकते हैं, पर महिलाओं के प्रति भेदभाव और शोषण एक विश्वव्यापी सामाजिक परिदृश्य है। इसे सभ्यता-दोष मान कर सभी को इसके निराकरण के उपाय ढूंढ़ने की जरूरत है। महिला सशक्तीकरण की बात करने से पहले इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ने की आवश्यकता है कि क्या वास्तव में महिलाएं अशक्त हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि अज्ञानवश या निहित स्वार्थों ने एक षड्यंत्र के तहत एक असत्य को बार-बार सत्य बता कर उसे सत्य के रूप में स्थापित कर दिया गया हो? मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक तथ्य यह साबित करते हैं कि वह प्राणी जिसे हम ह्यऔरतह्ण कहते हैं, जन्म से औरत नहीं होती, उसे समाज द्वारा ह्यऔरतह्ण बनाया जाता है। वह अशक्त नहीं, अशक्त बताई जाती है। प्रकृति ने स्त्री और पुरुष दोनों को अलग-अलग प्रकार की शक्तियां देकर एक समान रूप से सशक्त बनाया है। पुरुष में अगर शारीरिक सामर्थ्य थोड़ी ज्यादा है तो स्त्री में शारीरिक शक्ति का संवरण करने की शक्ति पुरुष से अधिक होती है। इसका प्रमाण है कि भारत में महिलाओं की औसत आयु पुरुषों की औसत आयु से लगभग पांच वर्ष अधिक है।  भावनात्मक रूप से महिलाएं पुरुषों से अधिक संतुलित होती हैं। विषम परिस्थितियों से शीघ्र बाहर निकल कर संयमित हो जाने और दर्द सहने की क्षमता स्त्रियों में पुरुषों से अधिक होती है। मानसिक प्रबलता और कार्य-निपुणता में महिलाएं अगर पुरुषों से इक्कीस नहीं तो उन्नीस भी नहीं हैं।
समाज में पुरुष के वर्चस्व की कीमत सभी सभ्यताओं ने सदैव चुकाई है। जनसंख्या के आधे भाग के योगदान के अभाव में समाज की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रगति की दर उतनी नहीं बढ़ पाई, जितनी शायद संभव थी। वर्ष 2011 के इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार प्रदान करते समय भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि राष्ट्र की आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की उचित भागीदारी के बिना सामाजिक प्रगति की अपेक्षा रखना तर्कसंगत नहीं होगा।
वर्ष 2009 में संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया की सबसे बड़ी पांच सौ कंपनियों (फारचून 500) में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक सर्वेक्षण कराया था। निष्कर्ष यह निकला था कि जिन कंपनियों के प्रबंधन में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिला था उनमें निवेशकों को तिरपन प्रतिशत अधिक लाभांश और चौबीस प्रतिशत अधिक बिक्री का फायदा मिला था। जाहिर है, महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करके आर्थिक प्रगति की रफ्तार बढ़ाई जा सकती है।
भारत सरकार महिला सशक्तीकरण के प्रति सदैव सकारात्मक रही है। वर्ष 2001 में महिला सशक्तीकरण से संबंधित राष्ट्रीय नीति की घोषणा की गई थी। इस बहुआयामी नीति में महिलाओं के विकास का वातावरण तैयार करने, समानता के साथ राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक विकास में भागीदारी सुनिश्चित करने, भेदभाव समाप्त करने, महिलाओं के प्रति हिंसा को रोकने और सभी क्षेत्रों में विकास और भागीदारी के एक समान अवसर उपलब्ध कराने का आह्वान किया गया है।
यह कांग्रेस और यूपीए की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के कुशल नेतृत्व का ही कमाल रहा था कि राष्ट्रीय नीति के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हुए वर्ष 2010 में महिला सशक्तीकरण राष्ट्रीय मिशन ‘मिशन पूर्ण शक्ति’ की स्थापना की गई थी। संयुक्त राष्ट्र ने भी महिला सशक्तीकरण के पांच-आयामी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन दिशा-निदेर्शों में महिलाओं को राष्ट्रीय मुद्दों पर निर्णायक भूमिका निभाने, विकास के समान अवसरों की उपलब्धता, व्यक्तित्व की महत्ता और स्वेच्छा से जीवन के फैसले करने के अधिकार को अधिमान दिया गया है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में महिला सशक्तीकरण के नियामकों को सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में निर्धारित करने की जरूरत है। दो तिहाई मजदूरी के कार्यों को करने के बाद भी महिलाएं केवल दस प्रतिशत संपत्ति और संसाधनों की मालिक हैं। भूमि पर मालिकाना हक से संबंधित अधिकारों में महिलाओं के हक को जमीनी सतह पर स्थापित करने की आवश्यकता है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन करके पुश्तैनी जमीन में लड़कियों को लड़कों के बराबर अधिकार दे दिया गया है। पर लड़कियों को इस अधिकार की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। इसके लिए एक सामाजिक क्रांति की जरूरत होगी।


Saturday, 25 January 2014

26 जनवरी तारीख का मतलब



26 जनवरी आखिर है क्या? गणतंत्र, प्रजातंत्र, डेमोक्रेसी, जम्हूरियत, सिस्टम और संविधान। आखिर इन शब्दों के मायने क्या हैं? आखिर क्या है 26 जनवरी की तारीख का मतलब? 26 जनवरी, जनतंत्र का सबसे बड़ा जश्न है। इंडिया गेट से लालकिले तक लोकतंत्र का लोकपर्व है। जम्हूरियत के जज्बात को जताने का त्योहार है। संविधान के सूरज का इस्तकबाल का दिन है। स्वराज की सुबह के संस्मरण का समय है। इसी की वजह से तो सारी दुनिया में हमारी डेमोक्रेसी का डंका है। जनता जीते तंत्र कायम रहे और खत्म हर भय हो। जनतंत्र की जय हो।
प्रजातंत्र के प्रहरियों के सम्मान का प्रहर है। गणतंत्र के गणमान्य के गुणगान का दिन है। स्वतंत्रता के शहीदों के सम्मान का दिन है। आजादी के योद्धाओं के अभिवादन का अरमान है। 26 जनवरी का जन्म कैलेंडर पर छपी कोई तारीख नहीं है.। ये तो समय के सीने पर भारत का हस्ताक्षर है। इतिहास के पन्नों की सबसे बड़ी इबारत है। वर्तमान बना रहे और भविष्य तय हो। जनतंत्र की जय हो।
आज सेनाओं के शौर्य के स्मरण का दिन है। आज शूरवीर सैनिकों के संस्मरण का दिन है। आज वीरों के बहादुरी के बखान का वक्त है। आज दुनिया के दुश्मनों को दहलाने का दिन है। आज ताकत, हिम्मत, हौसला और साहस के सम्मान का दिन है। आज शांति के संकटों को चेतावती का संदेश है। आज गांधी के स्वराज की सालगिरह है। अहिंसा ऐसे ही निर्भय हो। जनतंत्र की जय हो।
हम विविध, विभिन्न बोली, भाषा, रंगरूप, रहन-सहन, खाना-पान, जलवायु में होने के बावजूद एकी संस्कृति की माला पिरोये हुए हैं। हमारे लोकतंत्र के प्रहरी अपने इस अवसर सपने को परिपक्वता के साथ मजबूत दीवार एवरेस्ट की चोटी से ऊंचा बना लिया है। कई उतार-चढ़ाव आए, आपातकाल भी देखा लेकिन भारत की सार्वभौमिकता बरकरार है।
खुशियों की तमाम बातों के बावजूद आज अहम सवाल हो गया है कि राजनीतिक व्यवस्था समाज को चुस्त, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासित कानून बनाया जाए और प्रत्येक नागरिक चाहे जो कोई हो बेरोजगार या अमीर, सेवादार या किसान सब अपनी प्रत्यक्ष संपत्ति जायदाद का खुलासा करें कि जो भी चल-अचल धन है वही है और अप्रत्यक्ष कहीं भी देश या विदेश में मिलने पर जब्त होगा तो सजा मिलेगी। जनतंत्र-गणतंत्र की प्रौढ़ता को हम पार कर रहे हैं लेकिन आम जनता को उसके अधिकार, कर्तव्य, ईमानदारी समझाने में पिछड़े, कमजोर, गैर जिम्मेदार साबित हो रहे हैं।
कई मुश्किलों को पार करता हुआ भारत आज दुनिया के ताकतवर देशों की कतार में शामिल होने की कोशिश कर रहा है और यही कोशिश देश के हर आम आदमी की है। पिछले 6 दशकों में देश के आम आदमी को ताकत देने की कई कोशिशें हुई हैं, मुश्किलें अभी भी हैं लेकिन ना उम्मीदी का अंधेरा अब छट चुका है। गणतंत्र दिवस यानी भारत के हर नागरिक को आत्म सम्मान से जिंदगी जीने का अधिकार देने का दिन। पिछले 6 दशकों में देश ने कई उतार चढ़ाव देखे। आम आदमी की कई उम्मीदें को आकार मिलना अभी बाकी है लेकिन उनकी जिंदगी पिछले कई दशकों में काफी बदली है। कई ऐसे अधिकार आम आदमी को मिले हैं जिनसे कमोबेश उनकी जिंदगी में उमीदों की किरण दिख रही है।
भोजन का अधिकार
देश की आधी से ज्यादा आबादी के लिए दो वक्त के भोजन का जुगाड़ आसान कभी भी इतना आसान नहीं रहा लेकिन हाल ही में आम आदमी के इस वंचित वर्गो को मिला है भोजन का अधिकार। इस अधिकार के तहत यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि देश का कोई इंसान भूखा ना सोए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक इसे भी मौलिक अधिकारों की श्रेणी में माना गया है। इस अधिकार के तहत बने कानून के जरिये देश के तकरीबन 70 फीसदी लोगों को बहुत कम मूल्य में खाद्यान्न और दूसरी वस्तुएं उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
शिक्षा का अधिकार
देश के हर बच्चे को स्कूली शिक्षा मिले ये सपना हमारे संविधान निर्माताओं ने देखा था हालांकि कई दशक लग गए देश के नौनिहालों तक शिक्षा के अधिकार को पहुंचाने में लेकिन अब देश के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार मिल गया है। छह से 14 साल तक के बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य रूप से स्कूल भेजना अब जरूरी है आखिर पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया।
रोजगार की गारंटी
भोजन और शिक्षा के अधिकार के बाद जिस अधिकार ने सबसे ज्यादा आम आदमी की जिंदगी पर सकारात्मक असर डाला है वो है रोजगार गारंटी योजना। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के जरिये लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान तैयार किए गए है। इस कानून के तहत हर इंसान को 100 दिनों का रोजगार दिये जाने की गारंटी है। रोजगार उपलब्ध कराने में विफल रहने पर बेरोजगारी भत्ता के तहत मजदूरी उपलब्ध कराना जरूरी है। गरीबी से जूझते ग्रामीण क्षेत्र के लिए ये अधिकार किसी संजीवनी से कम नहीं।
सूचना का अधिकार
अब बात उस अधिकार की जिसने आम आदमी को उठ खड़ा होने की शक्ति दी है। हम बात कर रहे हैं सूचना के अधिकार की नए वक्त मे सूचना जीवन रेखा बन चुकी है। अपने देश समाज और आम आदमी से जुड़े पहलू को जानना अब हर भारतीय का अधिकार है।
आरटीआई कानून ने आम आदमी को सशक्त बना कर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की ताकत दी है। माना जाता है कि भ्रष्टाचार देश में कई बड़ी समस्याओं की जननी है लेकिन अब कोई भी आम आदमी अपने या सामूहिक हित के मुद्दों पर सवाल पूछ सकता है। दुनिया के फलक पर उभरते भारत की तस्वीर आम आदमी को ताकत दिए बगैर नहीं बन सकती और देश का हर तबका अब इसकी अहमियत को समझता है। आखिर तभी तो देश दुनिया के सामने कह सकेगा जय हो...

जीवन में अनुशासन आवश्यक


प्रगति व सम्मान के लिए मनुष्य के जीवन में अनुशासन आवश्यक है। यह आगे बढ़ाता है। अनुशासन के बिना व्यक्ति, परिवार, देश व प्रदेश प्रगति नहीं कर सकता। अनुशासित व्यक्ति तब बन सकता है, जब उसका अपने मन और तन पर नियंत्रण हो। जीवन में अनुशासन से ही प्रगति संभव है। सोए हुए सिंह के मुंह में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करता। उसे भी शिकार के लिए परिश्रम करना पड़ता है। अनुशासन का पाठ वास्तव मे प्रेम का पाठ होता है ,कठोरता का नहीं। अत: इसे प्रेम के साथ सीखना चाहिए । बालक को अनुशासन का पाठ पढ़ाते समय कु्छ कठोर कदम उठाने आवश्यक हैं, परन्तु इससे रहित रखकर हम बालक को अवश्य ही अवनति की ओर ढकेल देंगे। गाँधीजी ने भी कहा था कि अनुशासन ही आजादी की कुंजी है।
अनुशासन शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है - अनु, शास्, अन, । विशेष रूप से अपने ऊपर शासन करना तथा शासन के अनुसार अपने जीवन को चलाना ही अनुशासन है । अनुशासन राष्ट्रीय जीवन का प्राण है । यदि प्रशासन, स्कूल समाज, परिवार सभी जगह सब लोग अनुशासन में रहेंगे और अपने कर्त्तव्य का पालन करेंगे, अपनी जिÞम्मेदारी समझेंगे तो कहीं किसी प्रकार की गड़बड़ी या अशांति नहीं होगी । नियम तोड़ने से ही अनुशासनहीनता बढती है तथा समाज में अव्यवस्था पैदा होती है। बड़े होकर अनुशासन सीखना कठिन है । अनुशासन का पाठ बचपन से परिवार में रहकर सीखा जाता है । बचपन के समय मे अनुशासन सिखाने की जिम्?मेदारी माता-पिता तथा गुरूओं की होती है । अनुशासन ही मनुष्य को एक अच्छा व्यक्ति व एक आदर्श नागरिक बनाता है । विद्यालय जाकर अनुशासन की भावना का विकास होता है । अच्छी शिक्षा विद्यार्थी को अनुशासन का पालन करना सिखाती है । वास्तव में अनुशासन-शिक्षा के लिये विद्यालय ही सर्वोच्च स्थान है । विद्यार्थियों को यहाँ पर अनुशासन की शिक्षा अवश्य मिलनी चाहिये । ताकि उनका सामाजिक दृष्?टी से सम्?पूर्ण विकास हो सके । उन्हें सदा गुरुओं की आज्ञा का पालन करना चाहिये । अनुशासनप्रिय होने पर ही हर विद्यार्थी की शिक्षा पूर्ण समझी जानी चाहिये । सच्चा अनुशासन ही मनुष्य को पशु से ऊपर उठाकर वास्तव में मानव बनता है । दर से अनुशान का पालन करना सच्चा अनुशासन नहीं है और ना ही अनुशासन पराधीनता है । यह तो सामाजिक तथा राष्ट्रीय आवश्यकता है। पाश्चात्य देशों में भी शिक्षा का उद्देश्य जीवन को अनुशासित बनाना है । अनुशासित विद्यार्थी अनुशासित नागरिक बनते हैं, अनुशासित नागरिक एक अनुशासित समाज का निर्माण करते हैं और एक अनुशासित समाज पीढ़ियों तक चलने वाली संस्कृति की ओर पहला कदम है । अनुशासन का पाठ वास्तव मे प्रेम का पाठ होता है, ना कि कठोरता का । अत: इसे प्रेम के साथ सीखना चाहिये । बालक को अनुशासन का पाठ पढ़ाते समय कु्छ कठोर कदम उठाने आवश्यक हैं लेकिन आज कल माता-पिता अपने बच्?चों को बाल्?या अवस्?था में, अति प्रेम में आकर उन्?हे कुछ छुट दे देते है जिसेस उनमे अनुशासन की कमी आ जाती है ओर इस बात का पता उन्?हे समय निकल जाने के बाद होता है । आज हमारे जीवन मे अनुशासन की सख्?त आवश्?यकता है अनुशासन जीवन के विकास का अनिवार्य तत्व है, जो अनुशासित नहीं होता, वह दूसरों का हित तो कर नहीं पता, स्वयं का अहित भी टाल नहीं सकता ।
जैन-शासन के संदर्भ में अनुशासन के लिए ‘आज्ञा’ शब्द का प्रयोग भी हुआ है। आज्ञा को सर्वोपरि मूल्य दिया गया है। जिस प्रकार मौलि और शिरोमणि रत्न को शिर पर धारण किया जाता है, उसी प्रकार आज्ञा को शिरोधार्य किया जाता है। फिर उसी आज्ञा के अनुसार अपना प्रत्येक कार्य करना होता है। कहा भी गया है -

शिरोरत्नमिवार्याज्ञां धारयंत: स्वमस्तके.
निर्मान्तु निखिलं कार्यं आचार्याज्ञानुवर्तिन:..

आचार्य के अनुशासन में रहने वाले आचार्य की आज्ञा को शिरोरत्न की तरह मस्तक पर धारण करते हुए अपने सब काम सम्पादित करें। आज्ञा को महत्व देने वाला व्यक्ति स्वयं महत्वपूर्ण बन जाता है। जो व्यक्ति आज्ञा को तुच्छ समझता है, उसकी अवहेलना करता है, वह स्वयं तुच्छ और अवहेलित हो जाता है। गुरु ने शिष्य को सदा दो बातों से दूर रहने का निर्देश देते हुए कहा-'अणाणाए एगे सोवट्ठाणा आणाए एगे निरुवट्ठाणा'- कुछ व्यक्ति उन कार्यों में अपने पुरुषार्थ का नियोजन करते हैं जिनके लिए भगवान की आज्ञा नहीं होती है। वे उन कामों के प्रति उदासीन रहते हैं, जिन्हें करने की आज्ञा होती है. ये दोनों ही स्थितियां खतरनाक हैं। इनसे बचने वाला साधक लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ता है। जो आज्ञा की उपेक्षा कर अनाज्ञा में प्रवृत्त होता है, वह विकास के बदले ह्मास के पथ पर अग्रसर होता है।
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन का महत्व है । अनुशासन से धैर्य और समझदारी का विकास होता है । समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है । इससे कार्य क्षमता का विकास होता है तथा व्यक्ति में नेतृत्व की शक्ति जाग्रत होने लगती है । इसलिए हमे हमेशा अनुशासनपूर्वक आगे बढने का प्रयत्न करना चाहिए । आज भारत देश में इस आयु के लोग सबसे बड़ी संख्या में मौजूद है। यह एक ऐसा वर्ग है जो शारीरिक एवं मानसिक रूप से सबसे ज्यादा ताकतवर है। जो देश और अपने परिवार के विकास के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं। आज भारत देश में 75% युवा पढ़ना लिखना जानता है। आज भारत ने अन्य देशों की तुलना में अच्छी खासी प्रगति की है। इसमें सबसे बड़ा योगदान शिक्षा का है। आज भारत का हर युवा अच्छी से अच्छी शिक्षा पा रहा है। हम सब जानते हैं कि भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। आज भारत में दूसरे देशों से सबसे ज्यादा युवा बसते हैं। युवा वर्ग वह वर्ग होता है जिसमें 14 वर्ष से लेकर 40 वर्ष तक के लोग शामिल होते हैं। भारत की राजनीति में आज वृद्ध लोगों का ही बोलबाला है और चंद गिने-चुने युवा ही राजनीति में है। इसका एक कारण यह है कि भारत में राजनीति का माहौल दिन-ब-दिन बिगड़ रहा है और सच्चे राजनीतिक लोगों की जगह सत्तालोलुप और धन के लालची लोगो ने ले ली है।
यह सच है कि राजनीति में देश प्रेम की भावना की जगह परिवारवाद, जातिवाद और संप्रदाय ने ले ली है। आए दिन जिस तरह से नेताओं के भ्रष्टाचार के किस्से बाहर आ रहे है देश के युवा वर्ग में राजनीति के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है। ईमानदारी और संजीदगी के लाख पाठ पढ़ाए जाएं, लेकिन यह एक क्रूर सत्य है कि उदारीकरण के दौर में संजीदगी और ईमानदारी में प्रगति की गुंजाइश लगातार कम हुई है। चूंकि राजनीति का आज सीधा संबंध पैसे और ताकत से जुड़ गया है, इसलिए इस क्षेत्र में नई प्रतिभाओं के पनपने और शिखर तक पहुंचने की गुंजाइश लगातार कम होती गई है। मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव जीतना ही राजनीति का अहम और विशिष्ट दोनों तरह का पर्याय बन गया है, शायद यही वजह है कि कार्यकर्ता दरी और जाजिम बिछाते रह जाते हैं और नेता और नेता के बाद उसके परिवार के लोगों को ही सियासी राह पर आगे बढ़ने के मौके मिलते चले जाते हैं। अब भारत की राजनीति में सुभाषचन्द्र बोस, शहीद भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, लोकमान्य तिलक जैसे युवा नेता आज नहीं है। जो अपने होश और जोश से युवा वर्ग के मन में एक नई क्रांति का संचार कर सके। लेकिन अफसोस आजादी के बाद नसीब में है यह बूढ़े नेता जो खुद की हिफाजत ठीक से नहीं कर सकते तो युवा को क्या देशभक्ति या क्रांति की बातें सिखाएंगे? यही वजह है कि भारत के युवा अब इस देश को अपना न समझकर दूसरे देशो में अपना आशियाना खोज रहे हैं। वे यहां की राजनीतिक सत्ता और फैले हुए भ्रष्टाचार से दूर होना चाहते हैं। इसलिए वे कोई भी ठोस कदम उठाने से पहले कई-कई बार सोचते हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि युवा वर्ग संयमित रहे। अनुशासित रहे। बिना अनुशासित हुए वह अपने अभीष्ट की प्राप्ति नहीं कर सकता है।
हालांकि, आज के युवाओं को सिर्फ और सिर्फ टारगेट ओरियेंटेड बना दिया गया है। मतलब यह है कि आजकल के माता-पिता स्वंय नहीं चाहते कि उनका पुत्र या पुत्री अपने कार्यो के अलावा देश के सामाजिक कार्यो में भी अपना योगदान दें क्योंकि आजकल का माहौल ही कुछ इस तरह का हो गया है कि सब केवल अपना भविष्य बनाने में लगे हुए हैं। यहां तक कि आजकल के युवाओं को उनके परिवार के प्रति जिम्मेदारी का एहसास तक नहीं होता, इसलिए हमें इसके लिए कई ठोस कदम उठाने होंगे। आज भारत का हर नागरिक भली-भांति अपना अच्छा बुरा समझता है। युवाओं को संप्रदायवाद तथा राजनीति से परे अपनी सोच का दायरा बढ़ाना होगा। युवाओं को इस मामले में एकदम सोच समझकर आगे बढ़ना होगा। और ऐसी किसी भी भावना में न बहकर सोच समझकर निर्णय लेना होगा। भारत का युवा वर्ग वाकई में समझदार है जो सच में इस मामले में एक है और ज्यादातर युवावर्ग राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मान रहा है। यह वाकई में एक अच्छी और सकारात्मक बात है जो भारत जैसे देश के लिए बड़ी बात है।