Wednesday, 19 August 2015

अविस्मरणीय है राजीव गॉंधी



देश ने विकास के नये आयाम को स्व- राजीव गॉंधी के प्रधानमंत्रीत्व काल में छुआ और अपने अहम निर्णयों से भारत को विश्व के शिखर पर पहुंचा दिया। अपने कार्यकाल में राजीव गॉंधी ने संचार क्रांति, पंचायती राज की स्थापना के क्षेत्र में निर्णय लेकर देश को विकास के पथ पर अग्रसर किया, इसके साथ ही उस समय पंजाब, नॉर्थ इस्ट के क्षेत्र में उत्पन्न हुयी विषम परिस्थितियों से निबटने के लिये कई समझौतों को अमली जामा पहनाया। पंजाब में दशकों से चल रहे आतंकवाद को समाप्त कर विकास की नयी परिभाषा तैयार की। राजीव गॉंधी ने देश के विकास में युवा वर्ग को भागीदार बनाने हेतु चुनाव में मदतान की आयु सीमा 18 र्व ा करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया जिसमें आज भी युवा वर्ग प्रभावित है।
राजीव गॉंधी का व्यक्तित्व सम्मोहक था, उनकी कार्यशैली विश्वास जागृत करती थी, वे प्रेरणा के स्तम्भ रहे, पॉंच साल के प्रधानमंत्रीत्वकाल में स्व. राजीव गॉंधी ने देश की राजनीति को जो मोड़ दिया उससे 21वीं सदी के भारत की परिकल्पना के साथ देशवासियों का साक्षात्कार हुआ। स्व. राजीव गॉंधी का विश्वास सत्ता प्राप्ति से ज्यादा विकास पर केन्द्रित रहा, संचार क्रांति के अग्रदूत के रूप में उनकी भूमिका सदैव अविस्मरणीय रहेगी।
भारत की विदेश नीति के क्षेत्र में जो पहल की उससे देश को विश्व पटल पर मजबूती मिली, उनके शासनकाल में हुए संविधान संशोधनों के माध्यम से पंचायत राज संस्थाओं का सशक्तीकरण किया गया, सूचना प्रौद्योगिकी के नये आयाम स्थापित हुए, उनके विचारों का उस समय विरोध करने वाले आज संचार क्रांति के सबसे बड़े हिमायती बनने का ढोंग रच रहे हैं। भारत की अधिकांश आबादी मोबाईल फोन का इस्तेमाल कर रही है, चंद रूपयों में देश-विदेश में आसानी से बात की जा सकती है। आईटी के क्षेत्र में भारत 100 बिलियन डॉलर का निर्यात करता है, यह स्व. राजीव गॉंधी की ही कल्पना थी, जिसमें इन्टरनेट पर हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल को भी सार्थक बना दिया। स्व. राजीव गॉंधी की कूटनीति, कौशल विकास व सूचना प्रौद्योगिकी की दूरगामी सोच का ही नतीजा है कि देश आज विश्व शक्ति के रूप में उभर रहा है।
राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को बम्बई में हुआ था। वे सिर्फ तीन वर्ष के थे जब भारत स्वतंत्र हुआ और उनके दादा स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए। उनके पिता फिरोज गांधी सांसद बने एवं जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की। राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने दादा के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया जहाँ इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में कार्य किया। वे कुछ समय के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया। वहां उनके कई मित्र बने जिनके साथ उनकी आजीवन दोस्ती बनी रही। बाद में उनके छोटे भाई संजय गाँधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया जहाँ दोनों साथ रहे। स्कूल से निकलने के बाद श्री गाँधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लन्दन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए। उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।
यह तो स्पष्ट था कि राजनीति में अपना करियर बनाने में उनकी कोई रूचि नहीं थी। उनके सहपाठियों के अनुसार उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं। हालांकि संगीत में उनकी बहुत रुचि थी। उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय एवं आधुनिक संगीत पसंद था। उन्हें फोटोग्राफी एवं रेडियो सुनने का भी शौक था। हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था। अपेक्षानुसार इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की एवं वाणिज्यिक पायलट का लाइसेंस प्राप्त किया। जल्द ही वे घरेलू राष्ट्रीय जहाज कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए। कैम्ब्रिज में उनकी मुलाकात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी जो उस समय वहां अंग्रेजी की पढ़ाई कर रही थीं। उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली। वे अपने दोनों बच्चों, राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे। आस-पास राजनीतिक गतिविधियों की ऐसी हलचल के बावजूद वे अपना निजी जीवन जीते रहे। लेकिन 1980 में एक विमान दुर्घटना में उनके भाई संजय गाँधी की मौत ने सारी परिस्थितियां बदल कर रख दीं। उनपर राजनीति में प्रवेश करने एवं अपनी माँ को राजनीतिक कार्यों में सहयोग करने का दवाब बन गया। फिर कई आंतरिक एवं बाह्य चुनौतियाँ भी सामने आईं। पहले उन्होंने इन दबावों का विरोध किया लेकिन बाद में वे उनके द्वारा दिए गए तर्क से सहमत हो गए। उन्होंने अपने भाई की मृत्यु के कारण खाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी संसद क्षेत्र का उपचुनाव जीता।
नवंबर 1982 में जब भारत ने एशियाई खेलों की मेजबानी की थी, स्टेडियम के निर्माण एवं अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने संबंधी वर्षों पहले किये गए वादे को पूरा किया गया था। श्री गांधी को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि सारे काम समय पर पूर्ण हों एवं यह सुनिश्चित किया जा सके कि बिना किसी रूकावट एवं खामियों के खेल का आयोजन किया जा सके। उन्होंने दक्षता एवं निर्बाध समन्वय का प्रदर्शन करते हुए इस चुनौतीपूर्ण कार्य को संपन्न किया। साथ-ही-साथ कांग्रेस के महासचिव के रूप में उन्होंने उसी तन्मयता से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित एवं सक्रिय किया। उनके सामने आगे इससे भी अधिक मुश्किल परिस्थितियां आने वाली थीं जिसमें उनके व्यक्तित्व का परीक्षण होना था।
जब 31 अक्टूबर 1984 को अपनी मां की क्रूर हत्या के बाद वे कांग्रेस अध्यक्ष एवं देश के प्रधानमंत्री बने थे। लेकिन व्यक्तिगत रूप से इतने दु:खी होने के बावजूद उन्होंने संतुलन, मर्यादा एवं संयम के साथ राष्ट्रीय जिम्मेदारी का अच्छे से निर्वहन किया। महीने भर के लंबे चुनाव अभियान के दौरान श्री गांधी ने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के लगभग सभी भागों में जाकर 250 से अधिक सभाएं कीं एवं लाखों लोगों से आमने-सामने मिले। स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच एवं निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे और जैसा कि वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता को बनाये रखने के उद्देश्य के अलावा उनके अन्य प्रमुख उद्देश्यों में से एक है – इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण। 40 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी भारत के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और संभवतः दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं जिन्होंने सरकार का नेतृत्व किया है। उनकी माँ श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं। उनके महान दादाजी पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 वर्ष के थे जब उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में 17 साल की लंबी पारी शुरू की थी।
देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश प्राप्त हुआ था। अपनी मां की हत्या के शोक से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया। उस चुनाव में कांग्रेस को पिछले सात चुनावों की तुलना में लोकप्रिय वोट अधिक अनुपात में मिले और पार्टी ने 508 में से रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं।

Monday, 17 August 2015

साज और आनन्द का उत्सव है तीज



इस समय जब प्रकृति चारों तरफ हरियाली की चादर सी बिछा देती है तो प्रकृति की इस छटा को देखकर मन पुलकित होकर नाच उठता है। जगह-जगह झूले पड़ते हैं। स्त्रियों के समूह गीत गा-गाकर झूला झूलते हैं। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज कहते हैं। इसे हरितालिका तीज भी कहते हैं। जनमानस में यह हरियाली तीज के नाम से जानी जाती है।तीज भारत के अनेक भागों में मनाई जाती है, परन्तु राजस्थान की राजधानी जयपुर में इसका विशेष महत्त्व है। तीज का आगमन भीषण ग्रीष्म ऋतु के बाद पुनर्जीवन व पुनर्शक्ति के रूप में होता है। यदि इस दिन वर्षा हो, तो यह और भी स्मरणीय हो उठती है। लोग तीज जुलूस में ठंडी बौछार की कामना करते हैं। ग्रीष्म ऋतु के समाप्त होने पर काले - कजरारे मेघों को आकाश में घुमड़ता देखकर पावस के प्रारम्भ में पपीहे की पुकार और वर्षा की फुहार से आभ्यंतर आनन्दित हो उठता है। ऐसे में भारतीय लोक जीवन कजली या हरियाली तीज का पर्वोत्सव मनाता है। आसमान में घुमड़ती काली घटाओं के कारण ही इस त्योहार या पर्व को 'कजली' या 'कज्जली तीज' तथा पूरी प्रकृति में हरियाली के कारण 'तीज' के नाम से जाना जाता है।
इस त्योहार पर लड़कियों को ससुराल से पीहर बुला लिया जाता है। विवाह के पश्चात पहला सावन आने पर लड़की को ससुराल में नहीं छोड़ा जाता है। नवविवाहिता लड़की की ससुराल से इस त्योहार पर सिंजारा भेजा जाता है। हरियाली तीज से एक दिन पहले सिंजारा मनाया जाता है। इस दिन नवविवाहिता लड़की की ससुराल से वस्त्र, आभूषण, शृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाई भेजी जाती है। इस दिन मेहंदी लगाने का विशेष महत्त्व है। तीज के दिन का विशेष कार्य होता है, खुले स्थान पर बड़े–बड़े वृक्षों की शाखाओं पर झूला बाँधना। झूला स्त्रियों के लिए बहुत ही मनभावन अनुभव है। मल्हार गाते हुए मेंहदी रचे हुए हाथों से रस्सी पकड़े झूलना एक अनूठा अनुभव ही तो है। सावन में तीज पर झूले न लगें, तो सावन क्या? तीज के कुछ दिन पूर्व से ही पेड़ों की डालियों पर, घर की छत की कड़ों या बरामदे में कड़ों में झूले पड़ जाते हैं और नारियाँ, सखी - सहेलियों के संग सज - संवरकर लोकगीत, कजरी आदि गाते हुए झूला झूलती हैं। पूरा वातावरण ही उनके गीतों के मधुर लयबद्ध सुरों से रसमय, गीतमय और संगीतमय हो उठता है।
इस त्योहार की सबसे बड़ी विशेषता है, महिलाओं का हाथों पर विभिन्न प्रकार से बेलबूटे बनाकर मेंहदी रचाना। पैरों में आलता लगाना, महिलाओं के सुहाग की निशानी है। राजस्थान में हाथों व पाँवों में भी विवाहिताएँ मेंहदी रचाती हैं। जिसे "मेंहदी - माँडना" कहते हैं। इस दिन राजस्थानी बालाएँ दूर देश गए अपने पति के तीज पर आने की कामना करती हैं। जो कि उनके लोकगीतों में भी मुखरित होता है। तीज पर तीन बातें त्यागने का विधान है -

पति से छल–कपट
झूठ एवं दुर्व्यवहार करना
परनिन्दा

Monday, 10 August 2015

बुद्ध का स्त्री विमर्श



बुद्ध ने नर्तकी अंबपाली का आतिथ्य स्वीकार किया. कुछ लोग इस तथ्य के आधार पर साबित करना चाहते हैं कि बुद्ध तत्कालीन पितृसत्तात्मक मूल्यों के विरुद्ध स्त्रियों के पक्षधर थे. बात ऐसी नहीं है. अंबपाली का स्वीकार उसी पितृसत्तात्मक मूल्यों के अधीन वेश्यावृत्ति को मान्यता प्रदान करना था. कहना न होगा कि बुद्ध ने जब संघ स्थापित किया तो शुरू में उन्होंने दासों की तरह महिलाओं को उसमें आने नहीं दिया, उन्हें संघ में आने से बार-बार मना किया, उन्हें उसमें जगह नहीं लेने दी. जहां एक ओर बुद्ध और अन्य दूसरे लोग स्त्रियों का संघ में आने और जीवन का दूसरा रास्ता अपनाने का विरोध कर रहे थे, वहीं आनंद, जो बुद्ध के चचेरे भाई थे, जैसे लोग भी थे जो स्त्रियों के संघ में आने दिए जाने का समर्थन और उसके लिए तर्क कर रहे थे. कहना होगा कि बुद्ध को रास्ता दिखाया आनंद ने. संघ में स्त्रियों के आने के लिए जिसने बार-बार प्रश्न उठाया वह आनंद की मां थीं, प्रजापति गौतमी. जहां-जहां बुद्ध जाते थे, वहां-वहां वे बुद्ध के पीछे-पीछे जाती थीं. आनंद ने बुद्ध से पूछा कि ‘अगर औरतें कोशिश करें तो क्या वे निर्वाण प्राप्त कर सकती हैं?’ जवाब में बुद्ध ने कहा-‘हां’, इस पर आनंद ने कहा कि ‘तब फिर आप उन्हें संघ में क्यों नहीं आने देते?’ क्योंकि निर्वाण प्राप्त करने के लिए संघ में आना जरूरी था।
सच तो यह है कि आनंद उस संपूर्ण प्रकरण में स्त्रियों का एकमात्र सुभेच्छु था जो इस सिद्धांत में विश्वास रखता था कि स्त्री और पुरुष समान रूप से निर्वाण के हकदार हो सकते हैं. बुद्ध की मृत्यु के बाद अनेक अवसरों पर इस बात के लिए आनंद की निन्दा की गई थी. प्रथमतः, महाप्रजापति गौतमी के मामले में संघ में प्रवेश के सवाल पर और द्वितीयतः रोती हुई माता के बुद्ध के अंतिम दर्शन के अवसर पर (चुल्लवग , पृष्ठ 411). संपूर्ण बौद्ध साहित्य में आनंद के अलावे किसी दूसरे व्यक्ति का उल्लेख तक नहीं मिलता जो स्त्रियों का पक्षधर हो. यह आनंद के व्यक्तित्त्व का मानवीय पहलू हो सकता है, लेकिन इस तरह का कोई उल्लेख शायद ही मिलता है, जिसके आधार पर कहा जा सके कि बुद्ध या बौद्ध धर्म स्त्रियों के प्रति उदार था. यहां अंगुत्तरनिकाय (खंड-२, पृष्ठ ७६) का वह प्रसंग उल्लेखनीय है जब आनंद स्त्रियों के दरबार में नहीं बैठने एवं शील-चर्चा के क्रम में उपस्थित नहीं रहने के प्रश्न पर बुद्ध से चर्चा करता है।
उस समय और उनके कायदे के अनुसार, इस प्रश्नोत्तर के क्रम में बुद्ध ने अंततः उन्हें संघ में आने दिया, लेकिन कायदे ऐसे बनाए कि संघ में भिक्षुणियों को भिक्षुओं के नीचे दबे रहना था। संघ को भिक्षु एवं भिक्षुणि इन दो संघों में बांटकर भिक्षु संघ को ऊपर का दर्जा दिया गया और भिक्षुणि संघ को उसके नीचे का। उन्होंने भिक्षुणियों के लिए दस शर्तें, नियम या कायदे बताए जिनके पालन के पश्चात ही औरतें संघ में आ सकती थीं। उनमें से एक बहुत ही चोट पहुंचानेवाला कायदा था कि चाहे जितनी भी वरिष्ठ भिक्षुणि हो उसके सामने चाहे जितना भी कनिष्ठ भिक्षु आ जाए, उसे उसको सलामी देनी पड़ेगी। भिक्षुणियों पर और भी कई सख्त प्रतिबंध थे। इसके साथ ही समान गलती के लिए भिक्षुओं की अपेक्षा भिक्षुणियों को अधिक सख्त दंड का भागी बनना पड़ता था। ऐसा आप कह ले सकते हैं कि यह औरत और मर्द के बीच स्थापित उच्च एवं निम्न के भेद को कायम रखने के लिए किया गया। इसका सीधा सा अर्थ था- औरतों को संघ के अंदर भी पुरुषों के दबाव में रखना।
स्त्रियों के प्रति बुद्ध के विचार को बौद्ध साहित्य में वर्णित गाथाओं के माध्यम से भी समझा जा सकता है। एक गाथा (कोलिय जातक,१३०) इस प्रकार शुरू होती है- ‘वह एक श्रद्धालु उपासक ब्राह्मण की ब्राह्मणी थी; बहुत दुश्चरित्र, पापिन। रात को दुराचार करती थी. ... ब्राह्मण घर आता तो (रोग का) बहाना बनाकर लेट जाती। उसके बाहर जाने पर ‘‘जारों’’ के साथ गुजारती। वह ब्राह्मण बुद्धदेव का भक्त था-‘‘उपासक’’. (गृहस्थ बौद्ध को उपासक कहा जाता है)। वह ब्राह्मण तक्षशिला का स्नातक था और वाराणसी का प्रसिद्ध आचार्य भी था। सौ राजधानियों के क्षत्रिय राजकुमार उनके पास पढ़ा करते थे (देखें, मोहनलाल महतो वियोगी, जातककालीन भारतीय संस्कृति , पृष्ठ १४८).
एक दूसरे ब्राह्मण की स्त्री भी घोर दुश्चरित्रा थी। ब्राह्मण भी अपनी पत्नी के अनाचार को जानता था। जब ब्राह्मण व्यापार के लिए जाने लगा तो अपने दो पालित पुत्रों को सचेत करता गया- ‘यदि माता ब्राह्मणी अनाचार करें, तो रोकना।’ पालित पुत्रों ने जवाब दिया- ‘रोक सकेंगे तो रोकेंगे, नहीं तो चुप रहेंगे।’ जातक कथा में यह वाक्य है- ‘उसके जाने के दिन से ब्राह्मणी ने अनाचार करना आरंभ किया। घर में प्रवेश करनेवालों और निकलनेवालों की गिनती नहीं रही। ब्राह्मण का वह घर क्या था, पूरा वेश्यालय! उसके धर्मपुत्र भी उदासीन रहकर सब कुछ देखते रहे’ (राधजातक , १४५).
राधजातक (१७९) के अनुसार, ‘एक ब्राह्मण ने दो तोते पाले। ब्राह्मणी व्यभिचारिणी थी। ब्राह्मण तोतों को निगाह रखने का आदेश देकर व्यापार के उद्येश्य से कहीं चला गया। मौका मिलते ही ब्राह्मणी ने खुलकर अनाचार करना शुरू कर दिया।’
पुनश्च, ‘किसी ब्राह्मण की पत्नी दुश्चरित्रा थी। एक नट को उसने घर में बुला लिया। ब्राह्मण घर से बाहर गया हुआ था। ब्राह्मणी ने नट को भात-दाल पकाकर खिलाया। वह जैसे ही खाने बैठा कि ब्राह्मण आ गया। नट को ब्राह्मणी ने छिपा दिया। ब्राह्मण ने भोजन मांगा तो नट की जूठी थाली में थोड़ा-सा भात डालकर ब्राह्मण के आगे घर दिया। ब्राह्मण खाने लगा। एक नट भिखमंगा, जो दरवाजे पर बैठा सब कुछ देख रहा था, ने ब्राह्मण से सारी कथा कह दी’ (उच्छिट्ठभत्त जातक , २१२).
एक गाथा ऐसी है जिसमें बतलाया गया है कि एक ब्राह्मणी युवती ने अपने तुरंत के ब्याहे महापराक्रमी पति का खून डकैत सरदार के हाथ में तलवार पकड़ाकर करा दिया। उन्चास तीरों से उन्चास डकैतों को उस पराक्रमी ने ब्राह्मण ने मार गिराया। पचासवां व्यक्ति था डाकू-सरदार। अब ब्राह्मण के पास तीर न था। उसने डाकू सरदार को पटक दिया और अपनी स्त्री से तलवार मांगी। स्त्री उस डाकू-सरदार पर पहले ही मुग्ध हो चुकी थी। उसने तलवार डाकू-सरदार को पकड़ा दी और उस डाकू ने ब्राह्मण पर वार कर दिया। डाकू-सरदार के पूछने पर ब्राह्मणी ने कहा, ‘मैंने तुम पर आसक्त हो अपने कुल-स्वामी को मरवा दिया।’ वह डकैत भी ब्राह्मण ही था; क्योंकि उस ब्राह्मणी ने उसे ‘बाह्मण’ कह पुकारा था-‘सब्बं भण्डं समादाय पारं तिण्णोसि ब्राह्मण।’ (चुल्लधनुग्गह जातक , ३७४).
एक ब्राह्मणी ऐसी थी जिसने अपने पति को भीख मांगकर धन जमा करने के लिए बाहर भेज दिया और खुद अनाचार में लिप्त हो गई। धन कमाकर ब्राह्मण जब लौटा, तब ब्राह्मणी ने उस धन को अपने उपपति को दे दिया (सत्तुभस्त जातक , ४०२).
जातकों में उल्लिखित तथ्य एवं निष्कर्ष से भी स्त्रियों की सामाजिक हैसियत एवं उसके प्रति बुद्ध के विचार पर प्रकाश पड़ता है. बुद्ध, बोधिसत्व के रूप में एक बार भी मादा योनि में जन्म नहीं लेते हैं. पशु या मनुष्य दोनों ही कोटि के जीवों में वे नर रूप ही धारण करते हैं. बुद्ध सदैव स्त्रियों को घृणित, दुर्गंधयुक्त एवं व्यभिचारी बताते पाये जाते हैं. ( डॉक्टर अशोक कुमार, बौद्ध परंपरा में स्त्रियों का स्थान , पोस्ट डॉक्टोरल थीसिस,आई .सी एच .आर .हेतु शोधरत). बुद्ध की स्पष्ट घोषणा है कि वह देश रहने योग्य नहीं है जहां स्त्री शासक है (कंडिन जातक ) . स्त्रियां आम तौर पर असंगत और पापिणी प्रकृति की होती हैं (असात्मंत्र जातक ). स्त्रियों की प्रकृति एवं चरित्र संदिग्ध है (अंडभूत जातक). बोधिसत्व लोक-प्रसिद्ध आचार्य के रूप में अपने शिष्यों को उपदेश देते हैं कि आमतौर पर स्त्रियां व्यभिचारिणी होती हैं. अतएव बुद्धिमान पुरुष के लिए यही उचित है कि उसकी प्रकृति को समझें, घृणा न करें। स्त्रियां उस धर्म-स्थल की नदी के समान होती हैं जहां साधु और चांडाल दोनों स्नान करते हैं (अनभिरत् जातक )।
जातकों के अलावे भी बौद्ध साहित्य में ऐसे अनेक प्रसंग आये हैं जो स्त्रियों के प्रति बुद्ध एवं बौद्ध धर्म के नजरिये को स्पष्ट करने में सहायक हो सकते हैं। कहना होगा कि सर्वत्र स्त्रियों को काला नाग, दुर्गंध, व्यभिचारिणी और पुरुषों को फांसनेवाली कहा गया है (अंगुत्तरनिकाय , खंड-1, पृष्ठ २६३). स्त्रियों को रहस्यमयी कहा गया है. स्त्रियां अपने दुर्गुणों एवं दुराचारी प्रवृत्ति के कारण सामाजिक कर्मों में हिस्सेदार नहीं हो सकती थीं। महत्त्वपूर्ण है कि स्त्रियों के संबंध में ये विचार किसी एक स्त्री को ध्यान में रखकर नहीं व्यक्त किये गये थे, बल्कि स्त्रियों की प्रकृति पर विचार करते हुए सामने आये हैं।
इस तरह, हम पाते हैं कि बौद्ध साहित्य में स्त्रियों के इर्द-गिर्द जिस तरह की घेराबंदी कर दी गई थी, उससे पूर्ववर्ती एवं परवर्ती ब्राह्मण साहित्य की मान्यताओं का अनायास स्मरण हो आता है, जहां स्त्रियां अपने पति और पुत्र की निगरानी में ही सुरक्षित रह सकती थीं। बौद्ध साहित्य भी इस बोध से परे नहीं है (अंगुत्तरनिकाय , खंड-२, पृष्ठ ७६). स्त्रियों की मूल भूमिका पति की विश्वासी सेविका की थी (वही, खंड-३, पृष्ठ २४४,३६१-६७). स्त्रियों के स्वतंत्र अस्तित्त्व एवं स्वतंत्र दायित्त्व के अस्तित्त्व की कल्पना का घोर अभाव उसे घर और पितृसत्तात्मक मूल्यों से ही बंधे रहने को प्रेरित करता था। स्वयं बुद्ध की नजरों में भी यह कल्पना से परे था कि कोई स्त्री तथागत या चक्रवर्ती भी हो सकती है (अंगुत्तरनिकाय , खंड-१, पृष्ठ २९).
अतएव विचारणीय प्रश्न है कि सामाजिक-धार्मिक जीवन में हिस्सेदारी से स्त्रियों को अलग/वंचित रखकर किस प्रकार बौद्ध धर्म स्त्रियों के प्रति उदार हो सकता था ?

कैसे मिटेगा यह अंधविष्वास


ऐसा लगता है कि झारखंड और देश के अन्य कई अंचल 21वीं सदी में नहीं अंधकार युग में रह रहे हैं। ज्ञान-शिक्षा, सुख सुविदाओं से युक्त स्मार्ट सिटी बनाने और बुलेट ट्रेन चलाने के इस दौर में यह घटना हमें यह सोचने को मजबूर करती है कि आखिर हमारा ग्रामीण समाज अब भी किस मानसिकता से जी रहा है। अब भी भारत में 70 प्रतिशत लोग गांवों में ही रहते हैं। गांवों के विकास से ही देश का विकास संभव है। किन्तु मांडर के इस गांव की घटना हमारी शिक्षा, ज्ञान और विकास के सपनों पर प्रश्न चिह्न खड़ा करती है। ऐसी कुरीतियों से उबरे बिना हम विकसित भारत की कल्पना नहीं कर सकते। ऐसा नहीं है कि इस तरह की घटना इस क्षेत्र में पहली बार घटी है। ऐसा भी नहीं कि यह काम किसी वहशी ने यूं ही ताव में आकर कर दिया। बाकायदा पंचायत लगाकर सामूहिक फैसले के बाद घटना को अंजाम दिया गया। झारखंड में डायन प्रथा विरोधी कानून 2001 से लागू है। इतने साल गुजर जाने के बाद भी इसे न तो प्रभावी तौर पर लागू करने की कोशिश की गयी और न ही कानून के लागू होने के बाद समाज में कोई बदलाव आया है। वर्ष 2001 से अब तक झारखंड में डायन बताकर 1200 से ज्यादा महिलाओं की हत्या की जा चुकी है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड व्यूरो के अनुसार देशभर में वर्ष 2000 से 2012 के बीच ऐसी 2,097 हत्याएं होने का अनुमान है। डायन बिसाही जैसी कुप्रथा को समाप्त किये बिना एक सभ्य और विकसित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। झारखंड सरकार को इस दिशा में गंभीरता से विचार करते हुए डायन प्रथा के विरोध में बने कानून को सख्ती से लागू करना चाहिये ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। लेकिन इसके साथ ही जनजागृति का मोर्चा भी खोलना होगा।
रांची के मांडर थाना क्षेत्र में डायन-बिसाही के आरोप में पांच महिलाओं की नृशंस हत्या के मामले में एक महीने के अंदर चार्जशीट दायर करने का निर्णय लिया गया है। इस मामले में अब तक 27 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। पिछले तीन वर्षों से लंबित ऐसे सभी मामलों के जल्द निष्पादन के लिए उच्च न्यायालय से फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन के लिए अनुरोध किया जायेगा। साथ ही लंबित मामलों के तीव्र निष्पादन के लिए स्पेशल पब्लिक प्रोसीक्यूटर नामित किया जायेगा। समीक्षा के दौरान मुख्य सचिव ने डायन व अंधविश्वास से जुडे पूर्व में लंबित मामले, जो अनुसंधान के क्रम में हैं, की एक महीने के अन्दर समीक्षा कर निष्पादन करने का निर्देश दिया। साथ ही आदिवासी बहुल ग्रामीण इलाकों में मुख्यमंत्री द्वारा घोषित आदिवासी ग्राम विकास योजना को मिशन मोड में क्रियान्वयन करने की बात कही।

Monday, 27 July 2015

महान आत्मा पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम को विनम्र श्रद्धांजलि



दिल का दौरा पड़ने से पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का सोमवार शाम निधन हो गया। निधन से पहले 83 साल के डॉ. कलाम इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, शिलॉन्ग में लेक्चर दे रहे थे। उसी दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे बेहोश हो गए। उन्हें शिलॉन्ग के बेथनी अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन शाम 7.45 बजे अस्पताल ने उनके निधन की घोषणा की। अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. जॉन ने इस बात की पुष्टि की है। जॉन ने बताया कि 7 बजे उन्हें अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। IIM, शिलॉन्ग में डॉ. कलाम लिवेबल प्लैनेट अर्थ सब्जेक्ट पर लेक्चर दे रहे थे। इस बारे में उन्होंने ट्वीट भी किया था, जो उनका आखिरी ट्वीट साबित हुआ। 15 अक्टूबर, 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्मे कलाम ने 2002 में देश के 11 वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी। वे मिसाइलमैन के रूप में भी मशहूर रहे।
चमत्कारिक प्रतिभा के धनी डॉ0 अवुल पकिर जैनुलआब्दीन अब्दुल कलाम भारत के ऐसे पहले वैज्ञानिक हैं, जो देश के राष्ट्रपति (11वें राष्ट्र पति के रूप में) के पद पर भी आसीन हुए। वे देश के ऐसे तीसरे राष्ट्र्पति (अन्य दो राष्ट्र पति हैं सर्वपल्लीन राधाकृष्णन और डॉ0 जा़किर हुसैन) भी हैं, जिन्हें राष्ट्रीपति बनने से पूर्व देश के सर्वोच्च‍ सम्मा्न ‘भारत रत्न’ से सम्मा‍नित किया गया। इसके साथ ही साथ वे देश के इकलौते राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने आजन्म अविवाहित रहकर देश सेवा का व्रत लिया है।
भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम हमारे देश के प्रख्यात वैज्ञानिक हैं जो भारत गणराज्य के राष्ट्रपति रह चुके हैं। उनका पूरा नाम है अवुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम। वे भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति रहे हैं। वे एक गैरराजनीतिक व्यक्ति रहे हैं फिर भी विज्ञान की दुनिया में चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण इतने लोकप्रिय रहे कि देश ने उन्हें सिर माथे पर उठा लिया तथा सर्वोच्च पद पर आसीन कर दिया। एक वैज्ञानिक का राष्ट्रपति पद पर पहुंचना पूरे विज्ञान जगत के लिए सम्मान तथा प्रतिष्ठा की बात थी। कहते हैं कि जो व्यक्ति किसी क्षेत्र विशेष में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है, उसके लिए दूसरे क्षेत्रों में भी सब कुछ आसान और सहज हो जाता है। डॉ. कलाम इस बात को चरितार्थ करते हैं। भारत को अंतरिक्ष में पहुंचाने तथा मिसाइल क्षमता प्रदान करने का श्रेय डॉ. कलाम को जाता है। उनके द्वारा सफलतापूर्वक विकसित अग्नि और पृथ्वी जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों ने राष्ट्र की सुरक्षा को मजबूती प्रदान की है। डॉ. कलाम अविवाहित नागरिक हैं तथा 81 वर्ष के हो चुके हैं। इनकी जीवन-गाथा किसी रोचक उपन्यास के नायक की कहानी से कम नहीं है। चमत्कारिक प्रतिभा के धनी डॉ. कलाम का व्यक्तित्व इतना उन्नत है कि वह सभी धर्म, जाति एवं सम्प्रदायों के व्यक्ति नज़र आते हैं। वे एक ऐसे सर्वस्वीकार्य भारतीय हैं जो देश के सभी वर्गों के लिए 'एक आदर्श' बन चुके हैं। विज्ञान की दुनिया से होकर देश का प्रथम नागरिक बनना कोई कपोल-कल्पना नहीं है बल्कि यह एक जीवित प्रणेता की सत्यकथा है।
     इतने महत्तवपूर्ण व्यक्ति के बारे में कुछ भी कहना सरल नहीं है। वेशभूषा, बोलचाल के लहजे, अच्छे-खासे सरकारी आवास को छोड़कर हॉस्टल का सादगीपूर्ण जीवन, ये बातें उनके संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर एक सम्मोहक प्रभाव छोड़ती हैं। डॉ. कलाम एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, देश के विकास और युवा मस्तिष्कों को प्रज्ज्वलित करने में अपनी तल्लीनता के साथ साथ वे पर्यावरण की चिंता भी खूब करते हैं, साहित्य में रूचि रखते हैं, कविता लिखते हैं, वीणा बजाते हैं, तथा अध्यात्म से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। डॉ. कलाम में अपने काम के प्रति जबर्दश्त दीवानगी है। उनके लिए कोई भी समय काम का समय होता है। वह अपना अधिकांश समय कार्यालय में बिताते हैं। देर शाम तक विभिन्न कार्यक्रमों में डॉ. कलाम की सक्रियता तथा स्फूर्ति काबिलेतारीफ है। ऊर्जा का ऐसा प्रवाह केवल गहरी प्रतिबद्धता तथा समर्पण से ही आ सकता है। डॉ. कलाम खानपान में पूर्णत: शाकाहारी व्यक्ति हैं। वे मदिरापान से बिलकुल परहेज करते हैं। उनका निजी जीवन अनुकरणीय है। डॉ. कलाम की याददाश्त बहुत तेज है। वे घटनाओं तथा बातों को याद रखते हैं।
     डॉ. कलाम बातचीत में बड़े विनोदप्रिय स्वभाव के हैं। अपनी बात को बड़ी सरलता तथा साफगोई से सामने रखते हैं। प्राय: उनकी बातों में हास्य का पुट होता है। लेकिन बात बहुत सटीक तौर पर करते हैं। डॉ. कलाम सभी मुद्दों को मानवीयता की कसौटी पर परखते हैं। उनके लिए जाति, धर्म, वर्ग, समुदाय मायने नहीं रखते। वे सर्वधर्म समभाव के प्रतीक हैं। वह इंसान के जीवन को ऊंचा उठाना चाहते हैं। उसे बेहतरी की ओर ले जाना चाहते हैं। उनका मानवतावाद मनुष्यों की समानता के आधारभूत सिद्धांत पर आधारित है। 25 जुलाई, 2002 की शाम को भारत के राष्ट्रपति का सर्वोच्च पद सँभालने के दिन घटित एक बात से इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। उस दिन राष्ट्रपति भवन में एक प्रार्थना सभा आयोजित की गई थी जिसमें रामेश्वरम् मसजिद के मौलवी, रामेश्वरम् मंदिर के पुजारी, सेंट जोसेफ कॉलेज के फॉदर रेक्टर तथा अन्य लोगों ने भाग लिया था। उनके बारे में जो पहलू सबसे कम प्रचारित है वह है उनकी उदारता या परोपकार की भावना।
    उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तकें बहुत लोकप्रिय रही हैं। वे अपनी किताबों की रॉयल्टी का अधिकांश हिस्सा स्वयंसेवी संस्थाओं को मदद में दे देते हैं। मदर टेरेसा द्वारा स्थापित 'सिस्टर्स आफ चैरिटी' उनमें से एक है। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले हैं। इनमें से कुछ पुरस्कारों के साथ नकद राशियां भी थीं। वह इन पुरस्कार राशियों को परोपकार के कार्यों के लिए अलग रखते हैं। जब-जब देश में प्राकृतिक आपदाएँ आई हैं, तब-तब डॉ. कलाम की मानवीयता एवं करुणा निखरकर सामने आई है। वह अन्य मनुष्यों के कष्ट तथा पीड़ा के विचार मात्र से दुःखी हो जाते हैं। वह प्रभावित लोगों को राहत पहुचाँने के लिए डी.आर.डी.ओ. के नियंत्रण में मौजूद सभी संसाधनों को एकत्रित करते। जब वे रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन में कार्यरत थे तो उन्होंने हर राष्ट्रीय आपदा में विभाग की ओर से बढ़ चढ़कर राहत कोष में मदद की।
      डॉ. कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम् कस्बे में एक मध्यमवर्गीय तमिल परिवार में हुआ था। इनके पिता जैनुलाबदीन की कोई बहुत अच्छी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी, और न ही वे कोई बहुत धनी व्यक्ति थे। इसके बावजूद वे बुद्धिमान थे और उनमें उदारता की सच्ची भावना थी। इनकी माँ, आशियम्मा उनके जीवन की आदर्श थीं। वे लोग अपने पुश्तैनी घर में रहते थे, जो कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य बना था तथा रामेश्वरम् के प्रसिद्ध शिव मंदिर से महज दस मिनट की दूरी पर स्थित मस्जिदवाली गली में था। इनके पिताजी एक स्थानीय ठेकेदार के साथ मिलकर लकड़ी की नौकाएँ बनाने का काम करते थे जो हिन्दू तीर्थयात्रियों को रामेश्वरम् से धनुषकोटि ले जाती थीं। डॉ. कलाम को अपने पिताजी से विरासत के रूप में ईमानदारी और आत्मानुशासन, तथा माँ से ईश्वर में विश्वास और करुणा का भाव मिला।
     उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा रामेश्वरम् के प्राइमरी स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद आगे की स्कूली शिक्षा इन्होंने रामनाथपुरम् के श्वार्ट्ज हाई स्कूल से प्राप्त की। उनके शिक्षक अयादुरै सोलोमन कहा करते थे- ”जीवन में सफल होने और नतीजों को हासिल करने के लिए तुम्हें तीन प्रमुख बातों को समझना चाहिए- "इच्छा, आस्था और आशा”। इसलिए श्वार्ट्ज हाइ स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद वे सफलता हासिल करने के प्रति आत्मविश्वास से सराबोर छात्र थे। इन्होंने आगे पढ़ाई करने का फैसला कर लिया। उन दिनों इन्हें व्यावसायिक शिक्षा की संभावानाओं के बारे में जानकारी तो थी नहीं। इसलिए इन्होंने सन् 1950 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज में बी.एस-सी. में दाखिला ले लिया। बी.एस-सी. पूरा करने के बाद इन्होंने यह महसूस किया कि भौतिकी उनका बहुत प्रिय विषय नहीं हैं। इसलिए उन्हें अपना सपना पूरा करने के लिए इंजीनियरिंग में जाना चाहिए था। फिर उन्होंने दक्षिण भारत में तकनीकी शिक्षा के लिए मशहूर एक विशेष संस्थान मद्रास इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी (एम.आई.टी.) में दाखिला ले लिया। एम.आई.टी. में उड़ान संबंधी मशीनों की विभिन्न कार्यप्रणालियों को समझाने के लिए नमूने के तौर पर रखे गए दो विमानों ने इन्हें काफी आकर्षित किया। इन्होंने पहला साल पूरा करने के बाद वैमानिकी यानी एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग को अपने विशेष विषय के रूप में चुना। स्नातक के बाद वे एम.आई.टी. से एक प्रशिक्षु के रूप में हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एच.ए.एल.), बंगलौर चले गए। वहाँ इन्होंने टीम के एक सदस्य के रूप में विमान के इंजनों के अनुरक्षण पर काम किया। यहाँ इन्होंने दोनों तरह के इंजनों- पिस्टन इंजन तथा टरबाइन इंजन पर काम किया। इसके साथ ही उन्होंने रेडियल इंजन तथा ड्रम आपरेशनों में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया।
    जब वे एच.ए.एल. से एक वैमानिकी इंजीनियर बनकर निकले तो इनके पास नौकरी के दो बड़े अवसर थे। ये दोनों ही उनके बरसों पुराने उड़ान के सपने को पूरा करने वाले थे। एक अवसर भारतीय वायुसेना का था और दूसरा रक्षा मंत्रालय के अधीन तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय, का था। उन्होंने दोनों जगहों पर साक्षात्कार दिया। वे रक्षा मंत्रालय के तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय में चुन लिए गए। सन् 1958 में इन्होंने दो सौ पचास रूपए के मूल वेतन पर निदेशालय के तकनीकी केंद्र (उड्डयन) में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के पद पर काम सँभाल लिया। निदेशालय में नौकरी के पहले साल के दौरान इन्होंने आफिसर-इंचार्ज आर. वरदराजन की मदद से एक अल्ट्रासोनिक लक्ष्यभेदी विमान का डिजाइन तैयार करने में सफलता हासिल कर ली। विमानों के रख-रखाव का अनुभव हासिल करने के लिए इन्हें एयरक्रॉफ्ट एण्ड आर्मामेंट टेस्टिंग यूनिट, कानपुर भेजा गया। उस समय वहाँ एम.के.-1 विमान के परीक्षण का काम चल रहा था। इसकी कार्यप्रणालियों के मूल्यांकन को पूरा करने के काम में इन्होंने भी हिस्सा लिया। वापस आने पर इन्हें बंगलौर में स्थापित वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान में भेज दिया गया। यहाँ ग्राउंड इक्विपमेंट मशीन के रूप में स्वदेशी होवरक्रॉफ्ट का डिजाइन तथा विकास करने के लिए एक टीम बनाई गई। वैज्ञानिक सहायक के स्तर पर इसमें चार लोग शामिल थे, जिसका नेतृत्व करने का कार्यभार निदेशक डॉ. ओ. पी. मेदीरत्ता ने डॉ. कलाम पर सौंपा। उड़ान में इंजीनियरिंग मॉडल शुरू करने के लिए इन्हें तीन साल का वक्त दिया गया। भगवान् शिव के वाहन के प्रतीक रूप में इस होवरक्राफ्ट को 'नंदी' नाम दिया गया।
    कालान्तर में इन्हें इंडियन कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च की ओर से साक्षात्कार के लिए बुलावा आया। उनका साक्षात्कार अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई ने खुद लिया। इस साक्षात्कार के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति में रॉकेट इंजीनियर के पद पर उन्हें चुन लिया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति में इनका काम टाटा इंस्टीट्यूट आफ फण्डामेंटल रिसर्च के कंप्यूटर केंद्र में काम शुरू किया। सन् 1962 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति ने केरल में त्रिवेंद्रम के पास थुंबा नामक स्थान पर रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र स्थापित करने का फैसला किया। थुंबा को इस केंद्र के लिए सबसे उपयुक्त स्थान के रूप में चुना गया था, क्योंकि यह स्थान पृथ्वी के चुंबकीय अक्ष के सबसे करीब था। उसके बाद शीघ्र ही डॉ. कलाम को रॉकेट प्रक्षेपण से जुड़ी तकनीकी बातों का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए अमेरिका में नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन यानी 'नासा' भेजा गया। यह प्रशिक्षण छह महीने का था। जैसे ही डॉ. कलाम नासा से लौटे, 21 नवंबर, 1963 को भारत का 'नाइक-अपाचे' नाम का पहला रॉकेट छोड़ा गया। यह साउंडिंग रॉकेट नासा में ही बना था। डॉ. साराभाई ने राटो परियोजना के लिए डॉ. कलाम को प्रोजेक्ट लीडर नियुक्त किया। डॉ. कलाम ने विशेष वित्तीय शक्तियाँ हासिल की, प्रणाली विकसित की तथा 8 अक्टूबर 1972 को उत्तर प्रदेश में बरेली एयरफोर्स स्टेशन पर इस प्रणाली का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया।
    उनके जीवन का अगला बड़ा अवसर तब आया जब डॉ. कलाम को भारत के सैटेलाइट लांच वेहिकल (एस.एल.वी.) परियोजना का प्रबंधक बनाया गया। परियोजना प्रमुख के रूप में नामांकित करना एक सम्मान भी था और चुनौती भी थी। एस.एल.वी.-3 परियोजना का मुख्य उद्देश्य एक भरोसेमंद प्रमोचन यान विकसित करना था जो चालीस किलोग्राम के एक उपग्रह को पृथ्वी से 400 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा में स्थापित कर सके। इसमें एक बड़ा काम था यान के चार चरणों के लिए एक रॉकेट मोटर सिस्टम का विकास। हाई एनर्जी प्रोपेलेंट के इस्तेमाल में सक्षम रॉकेट मोटर सिस्टम में इस्तेमाल के लिए 8.5 टन प्रोपेलेंट ग्रेन निर्मित किया जाना था। एक अन्य कार्य था नियंत्रण तथा मार्गदर्शन। यह एक बड़ी परियोजना थी जिसमें दो सौ पचास उप-भाग और चालीस बड़ी उपप्रणालियाँ शामिल थीं। सभी गतिविधियों में तालमेल बैठाना और टीम का कुशल नेतृत्व करना डॉ. कलाम के लिए एक चुनौती थी। अंततः कड़ी मेहनत के बाद 18 जुलाई, 1980 को सुबह आठ बजकर तीन मिनट पर श्रीहरिकोटा रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र से एस.एल.वी.-3 ने सफल उड़ान भरी। इस परियोजना की सफलता ने डॉ. कलाम को राष्ट्रीय पहचान दी। इस उपलब्धि के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 26 जनवरी 1981 को 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया।
डॉ0 कलाम 25 जुलाई 2002 को भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हुए। वे 25 जुलाई 2007 तक इस पद पर रहे। वह अपने देश भारत को एक विकसित एवं महाशक्तिशाली राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं। उनके पास देश को इस स्थान तक ले जाने के लिए एक स्पष्ट और प्रभावी कार्य योजना है। उनकी पुस्तक 'इण्डिया 2020' में उनका देश के विकास का समग्र दृष्टिकोण देखा जा सकता है। वे अपनी इस संकल्पना को उद्घाटित करते हुए कहते हैं कि इसके लिए भारत को कृषि एवं खाद्य प्रसंस्ककरण, ऊर्जा, शिक्षा व स्वास्‍थ्‍य, सूचना प्रौद्योगिकी, परमाणु, अंतरिक्ष और रक्षा प्रौद्योगिकी के विकास पर ध्यान देना होगा।

पुस्‍तकें:
डॉ0 अब्दुल कलाम भारतीय इतिहास के ऐसे पुरूष हैं, जिनसे लाखों लोग प्रेरणा ग्रहण करते हैं। अरूण तिवारी लिखित उनकी जीवनी 'विंग्स ऑफ़ फायर' (Wings of Fire) भारतीय युवाओं और बच्‍चों के बीच बेहद लोकप्रिय है। उनकी लिखी पुस्तकों में 'गाइडिंग सोल्स: डायलॉग्स ऑन द पर्पज ऑफ़ लाइफ' (Guiding Souls Dialogues on the Purpose of life) एक गम्‍भीर कृति है, जिसके सह लेखक अरूण के. तिवारी हैं। इसमें उन्‍होंने अपने आत्मिक विचारों को प्रकट किया है।

इनके अतिरिक्त उनकी अन्य चर्चित पुस्तकें हैं- ‘इग्नाइटेड माइंडस: अनलीशिंग दा पॉवर विदीन इंडिया’ (Ignited Minds:Unleashing The Power Within India), ‘एनविजनिंग अन एमपावर्ड नेशन: टेक्नोलॉजी फॉर सोसायटल ट्रांसफारमेशन’ (Envisioning an Empowered Nation: Technology for Societal Transformation), ‘डेवलपमेंट्स इन फ्ल्यूड मैकेनिक्सि एण्ड स्पेस टेक्नालॉजी’ (Developments in Fluid Mechanics and Space Technology), सह लेखक- आर. नरसिम्हा‍, ‘2020: ए विज़न फॉर दा न्यू मिलेनियम’ (2020- A Vision for the New Millennium) सह लेखक- वाई.एस. राजन, ‘इनविज़निंग ऐन इम्पॉएवर्ड नेशन: टेक्नोमलॅजी फॉर सोसाइटल ट्राँसफॉरमेशन’ (Envisioning an Empowered Nation: Technology for Societal Transformation) सह लेखक- ए. सिवाथनु पिल्ललई।

डॉ0 कलाम ने तमिल भाषा में कविताएँ भी लिखी हैं, जो अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। उनकी कविताओं का एक संग्रह ‘दा लाइफ ट्री’ (The Life Tree) के नाम से अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुआ है।

पुरस्कार/सम्‍मान:
डॉ0 कलाम की विद्वता एवं योग्य ता को दृष्टिगत रखते हुए सम्मान स्वरूप उन्हें अन्ना यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, कल्याणी विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्‍वविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, मैसूर विश्वविद्यालय, रूड़की विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, मद्रास विश्वविद्यालय, आंध्र विश्वविद्यालय, भारतीदासन छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, तेजपुर विश्वविद्यालय, कामराज मदुरै विश्वविद्यालय, राजीव गाँधी प्रौद्यौगिकी विश्वविद्यालय, आई.आई.टी. दिल्ली, आई.आई.टी; मुम्बई, आई.आई.टी. कानपुर, बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी, इंडियन स्कूल ऑफ साइंस, सयाजीराव यूनिवर्सिटी औफ बड़ौदा, मनीपाल एकेडमी ऑफ हॉयर एजुकेशन, विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी ने अलग-अलग ‘डॉक्टर ऑफ साइंस’ की मानद उपाधियाँ प्रदान की। इसके अतिरिक्त् जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने उन्हें ‘पी-एच0डी0’ (डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी) तथा विश्वभारती शान्ति निकेतन और डॉ0 बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, औरंगाबाद ने उन्हें ‘डी0लिट0’ (डॉक्टर ऑफ लिटरेचर) की मानद उपाधियाँ प्रदान कीं।

Wednesday, 22 July 2015

सबकी आजादी का प्रतीक तिरंगा



स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने इसके लिए कहा था ‘यह ना सिर्फ हमारी स्वतंत्रता का ध्वज हैै बल्कि सबकी आजादी का प्रतीक है’। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज एक हाॅरीजोंटल तिरंगा है, जिसमें बराबर अनुपात में गहरा भगवा रंग सबसे उपर, मध्य में सफेद और गहरा हरा रंग नीचे है। ध्वज की लंबाई चैड़ाई का अनुपात 2:3 है। सफेद पट्टी के बीच में एक गहरे नीले रंग का पहिया है जो धर्म चक्र का प्रतीक है। इस पहिये की 24 तीलियां हैं। ध्वज में भगवा रंग साहस, बलिदान और त्याग का प्रदर्शन करता है। इसका सफेद रंग पवित्रता और सच्चाई तथा हरा रंग विश्वास और उर्वरता का प्रतीक है।
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना पिंगली वैंकैयानन्द ने की थी और इसे इसके वर्तमान स्वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था। यह 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ‘तिरंगे’ का अर्थ भारतीय राष्ट्रीय ध्वज है।
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्तंभ पर बना हुआ है। इसका व्यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है। भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्‍य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है। इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्‍यु है।
सन 1916 में पिंगली वेंकैया ने एक ऐसे ध्वज की कल्पना की, जो सभी भारतवासियों को एक सूत्र में बाँध दे। उनकी इस पहल को एस.बी. बोमान जी और उमर सोमानी जी का साथ मिला और इन तीनों ने मिल कर नेशनल फ़्लैग मिशन का गठन किया। वेंकैया ने राष्ट्रीय ध्वज के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से सलाह ली और गांधी जी ने उन्हें इस ध्वज के बीच में अशोक चक्र रखने की सलाह दी, जो संपूर्ण भारत को एक सूत्र में बाँधने का संकेत बने। पिंगली वेंकैया लाल और हरे रंग के की पृष्ठभूमि पर अशोक चक्र बना कर लाए पर गांधी जी को यह ध्वज ऐसा नहीं लगा कि जो संपूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व कर सकता है। राष्ट्रीय ध्वज में रंग को लेकर तरह-तरह के वाद-विवाद चलते रहे। अखिल भारतीय संस्कृत कांग्रेस ने सन् 1924 में ध्वज में केसरिया रंग और बीच में गदा डालने की सलाह इस तर्क के साथ दी कि यह हिंदुओं का प्रतीक है। फिर इसी क्रम में किसी ने गेरुआ रंग डालने का विचार इस तर्क के साथ दिया कि ये हिन्दू, मुसलमान और सिख तीनों धर्म को व्यक्त करता है।
हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के विकास में कुछ ऐतिहासिक पड़ाव इस प्रकार हैं:
प्रथम राष्‍ट्रीय ध्‍वज 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।
द्वितीय ध्‍वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्‍वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्‍तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्‍वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
तृतीय ध्‍वज 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया। डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्‍य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्‍वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्‍तऋषि के अभिविन्‍यास में इस पर बने सात सितारे थे। बांयी और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्‍व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
वर्ष 1931 ध्‍वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया । यह ध्‍वज जो वर्तमान स्‍वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। तथापि यह स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया इसका कोई साम्‍प्रदायिक महत्‍व नहीं था और इसकी व्‍याख्‍या इस प्रकार की जानी थी।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्‍व बना रहा। केवल ध्‍वज में चलते हुए चरखे के स्‍थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्‍वज अंतत: स्‍वतंत्र भारत का तिरंगा ध्‍वज बना।
ध्वज संहिता के अनुसार भारत के नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज को कुछ महत्वपूर्ण दिन, जैसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और महात्मा गांधी के जन्मदिन के अलावा फहराने का अधिकार नहीं है। प्रसिद्ध उद्योगपति नवीन जिंदल ने अपने कार्यालय के भवन पर झंडा फहराने पर दी गई चेतावनी को कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने इसके खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की जो कि अभी विचाराधीन है, लेकिन फैसला आने तक कोर्ट ने आम लोगों को सम्मानजनक तरीके से ध्वज फहराने की अस्थाई अनुमति दी है।
विश्व की सबसे उंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर 29 मई 1953 में भारतीय झंडा फहराया गया। विदेशी धरती पर पहली बार भारतीय झंडा मैडम भीकाजी कामा ने फहराया। उन्होंने इसेे जर्मनी में स्टूटग्राट में 22 अगस्त 1907 को फहराया। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज पहली बार अंतरिक्ष में विंग कमांडर राकेश शर्मा के साथ 1984 में गया। राकेश शर्मा के स्पेस सूट पर वह एक पदक की तरह जोड़ा गया था।

Tuesday, 14 July 2015

जनता को छला है भाजपा ने


चुनावी वादे केवल हवा हवाई होते हैं। यह एक बार फिर साबित हो गया है। अच्छे दिन अच्छे दिन की रट लगाने वाली भाजपा और उसके नेताओं की पोल अब खुलने लगी है। साल भर से अधिक का समय हो गया, लेकिन अच्छे दिन नहीं आए। भाजपा अध्यक्ष अमित षाह ने भोपाल में कहा कि अच्छे दिन आने में 25 साल लगेंगे। शाह ने यह भी कहा कि इंडिया को नंबर वन बनाने के लिए भाजपा को इन 25 साल में पंचायत से लेकर लोकसभा तक हर चुनाव जीतना होगा। देश को दुनिया के सर्वोच्च स्थान पर बैठाना है तो पांच साल की सरकार कुछ नहीं कर सकती।  अच्छे दिनों का मतलब भारत को दुनिया में वैसा ही सम्मान दिलाना है जैसा कि अंग्रेजों के शासन से पहले था। पहले पांच साल के शासन में भाजपा सरकार महंगाई कम कर सकती है, सीमाओं को सुरक्षित कर सकती है, मजबूत विदेश नीति बना सकती है, देश की आर्थिक तरक्की सुनिश्चित कर सकती है, नौकरियां दिला सकती है और गरीबी हटा सकती है।
जाहिर सी बात है कि भाजपा यदि यह बात पहले कहती तो चुनावी में सफलता नहीं मिलती। एक के बाद एक कई मामले खुलते जा रहे हैं। पारदर्शी नीति अपनाने का दावा करने वाली नरेंद्र मोदी सरकार भी भ्रष्टाचार के घेरे में आ गई है। भ्रष्टाचार का यह आरोप किसी विपक्षी पार्टी ने नहीं बल्कि केंद्र और महाराष्ट्र की भाजपानीत सरकार में शामिल शिवसेना ने ही लगाया है। शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में कार्यकारी संपादक संजय राउत ने ‘सच्चाई’ नामक शीर्षक के तहत एलईडी बल्ब में भारी घोटाले का पर्दाफाश किया है। राउत ने लिखा है कि केंद्र सरकार ने एलईडी बल्ब लगाने का ठेका एक मृत कंपनी को दिया है, जिसमें करीब 25 हजार करोड़ रुपये का गैर-व्यवहार हुआ है।
मोदी सरकार काला धन वापस लाने की बात की थी। सौ दिन में 80 लाख करोड़ लाने की बात थी। सरकार में आने के बाद मोदी सरकार कानून के ऽभगौड़े और काला धन पैदा करने वाले ललित मोदी की मदद कर रही है। अमित शाह अब कह रहे हैं कि काला धन लाने और हरेक के खाते में 15 लाख रुपये देने की बात तो चुनावी जुमला था। सच्चाई क्या है, आखिर कहां है काला धन ? किसके आए अच्छे दिन। 36 हजार करोड़ का पीडीएस घोटाला छत्तीसगढ़ में रमन सिंह करते हैं, जिसमें उनके पूरे परिवार की मिलीभगत है। डायरियों में यह बात उजागर हो चुकी है। मध्य प्रदेश में व्यापमं घोटाले भाजपा की सरकार कर रही है। बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। अब तक 49 लोगों की मौत हो चुकी है। राजस्थान में वसुंधरा राजे और ललित मोदी की मिलीऽागत पूरी दुनिया देख रही है। महाराष्ट्र में बच्चों की खाने वाली गुड़ की चिक्की तक भाजपा के लोग खा गए। मंत्री पंकजा मुंडे की सच्चाई लोगों के सामने आ चुकी है। महाराष्ट्र के एक और मंत्री हैं तावड़े जी, वो भी दो-दो घोटाले में शामिल हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी जी ने तीन-तीन शपथ पत्र दिए हैं, अपनी शिक्षा को लेकर। तीनों विरोधाऽाासी हैं। एक और हैं शिक्षा राज्य मंत्री रामशंकर कटारिया, जिन पर फर्जी डिग्री का मुकदमा चल रहा है। जी सिद्धेश्वर और नितिन गडकरी पर घपले का आरोप है। कैग ने ऽा्रश्टाचार में संलिप्तता की बात कही है। मोदी जी के एक और मंत्री हैं निहाल चंद, जिनको पुलिस बलात्कार के मामले में तलाश रही है।
इतना ही नहीं, लगता है मोदी सरकार को पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जय जवान जय किसान का नारा याद नहीं तभी तो जमीन अधिग्रहण (लैंड बिल) मुद्दे पर किसान तो पहले से ही रुठे हुए है और अब श्वन रैंक वन पेंशनश् के मुद्दे पर जवान भी नाराज हो गए हैं। गुस्सा इस कदर है कि 1971 लड़ाई के हीरो विंग कमांडर सुरेश दामोदर कार्णिक ने 26 मई को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के हाथों सम्मान लेने से मना कर दिया। 80 साल के वीर चक्र से सम्मानित विंग कमांडर कहते हैं कि जब सरकार श्वन रैंक वन पेंशनश् का सम्मान नहीं कर पा रही है तो वो मेरा क्या करेगी। हर कोई केवल बात करता है, एक्शन कुछ नहीं करता। ये लड़ाई सिर्फ पैसों के लिए नहीं है बल्कि इज्जत के लिए है। मोदी सरकार बनने के बाद ये पहला मौका है जब जवानों ने खुलकर सरकार के खिलाफ नाराजगी दिखाई है। ध्यान रहे बीजेपी ने चुनावी घोषणा पत्र में देश के 25 लाख पूर्व सैनिकों से वादा किया था कि वो वन रैंक वन पेंशन लागू करेगी। इस मुद्दे पर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर कहते है कि हमें जो करना था हमने कर दिया, थोड़ा इंतजार कीजिए और यही बात नौसेना प्रमुख एडमिरल रोबिन धवन भी कह रहे हैं कि पूर्व सैनिक थोड़ा धैर्य रखे। यहां तक कि प्रधानमंत्री ने भी मीडिया से बातचीत में इस बात को दोहराया है कि वे इस मुद्दे पर संजीदा हैं और जल्दी ही इसे अमल में ले आएंगे, लेकिन सवाल वही है कब तक?