Wednesday, 22 October 2014

दिल्ली पुलिस की वीरता को सलाम


समाज व राष्ट्र की रक्षा करते हुए जीवन का बलिदान करने वाले जवानों की याद में मंगलवार को पुलिस स्मृति दिवस मनाया गया। जिसमें शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी गई और उनके परिजनों को सम्मानित किया गया। हम अपने घरों में रात में इसलिए चैन की नींद सोते हैं, चूंकि हमारे सैनिक सीमा पर और गली-मुहल्ले और शहरों में पुलिस हमारी रखवाली करती है। पुलिस स्मृति दिवस पर हम उन सभी वीर शहीदों को सलाम करते हैं, जिन्होंने अपना कर्तव्य निभाने में जीवन बलिदान कर दिया। हमारे पुलिसकर्मियों के समर्पण भाव और वीरता को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उनकी बहादुरी, सेवा और त्याग की भावना से हमें सदैव प्रेरणा मिलती रहेगी।
यह दिन हर सिपाही के लिए महत्वपूर्ण होता है। पुलिस स्मृति दिवस पर हम उन सभी वीर शहीदों को सलाम करते हैं जिन्होंने अपना कर्तव्य निभाने में जीवन बलिदान कर दिया। हमारे पुलिसकर्मियों के समर्पण भाव और वीरता को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उनकी बहादुरी, सेवा और त्याग की भावना से हमें सदैव प्रेरणा मिलती रहेगी।प्रत्येक वर्ष दिल्ली पुलिस 21 अक्तूबर को शहीदी दिवस के रूप में आयोजित करती है। जिसमें उन शहीदों को स्मरण दिया जाता है जिन्होंने राष्ट्र की सुरक्षा में ड्यूटी के दौरान अपने प्राणों की आहुहित दी थी। 55 साल पहले आज ही के दिन वर्ष 1959 में भारतीय पुलिस दल की एक छोटी टुकडी लद्दाख क्षेत्र में मातृभूमि की रक्षा के लिए तैनात थी। वहीं एक पहाड़ी पर छुपे चीनी सैनिकों के भारी दस्ते ने उन पर अचानक आक्रमण कर दिया। देश के शत्रुओं का सामना करते हुए भारतीय पुलिस दल के 10 जवान उस मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हुए। तब से प्रत्येक वर्ष हम उन शहीदों को आज के दिन याद करते हैं। साथ ही देश की सेवा में गत वर्ष प्राण न्यौछावर करने वाले हर पुलिस कर्मी को अपनी श्रद्वाजंलि अर्पित करते है। इस दिन को सभी केन्द्रिय पुलिस संगठनों और राज्यों की पुलिस द्वारा शहीदी दिवस के रूप में आयोजित करते हैं।




Monday, 20 October 2014

असली धन है स्वास्थ्य


'धन्वन्तरि जयन्ती' के दिन धनतेरस का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस जयंती के सन्दर्भ में यह दिन धन और समृद्धि से सम्बन्धित है और लक्ष्मी-कुबेर की पूजा के लिए यह महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन लोग धन-सम्पत्ति और समृद्धि की प्राप्ति के लिए देवी लक्ष्मी के साथ-साथ भगवान कुबेर की भी पूजा करते हैं। भगवान कुबेर जिन्हें धन-सम्पत्ति का कोषाध्यक्ष माना जाता है और श्री लक्ष्मी जिन्हें धन-सम्पत्ति की देवी माना जाता है, की पूजा साथ में की जाती है।

आज ही के दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जन्मदाता धन्वन्तरि समुद्र से अमृत कलश लेकर प्रगट हुए थे। इसलिए वैद्य-हकीम और ब्राह्मण समाज इस शुभ तिथि पर धन्वन्तरि भगवान का पूजन कर 'धन्वन्तरि जयन्ती' मनाता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि धनतेरस आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि की स्मृति में मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में नए बर्तन ख़रीदते हैं और उनमें पकवान रखकर भगवान धन्वंतरि को अर्पित करते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि असली धन तो स्वास्थ्य है। धन्वंतरि ईसा से लगभग दस हज़ार वर्ष पूर्व हुए थे। वह काशी के राजा महाराज धन्व के पुत्र थे। उन्होंने शल्य शास्त्र पर महत्त्वपूर्ण गवेषणाएं की थीं। उनके प्रपौत्र दिवोदास ने उन्हें परिमार्जित कर सुश्रुत आदि शिष्यों को उपदेश दिए। इस तरह सुश्रुत संहिता किसी एक का नहीं, बल्कि धन्वंतरि, दिवोदास और सुश्रुत तीनों के वैज्ञानिक जीवन का मूर्त रूप है।
धन्वंतरि के जीवन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग अमृत का है। उनके जीवन के साथ अमृत का कलश जुड़ा है। वह भी सोने का कलश। अमृत निर्माण करने का प्रयोग धन्वंतरि ने स्वर्ण पात्र में ही बताया था। उन्होंने कहा कि जरा मृत्यु के विनाश के लिए ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोम नामक अमृत का आविष्कार किया था। सुश्रुत उनके रासायनिक प्रयोग के उल्लेख हैं। धन्वंतरि के संप्रदाय में सौ प्रकार की मृत्यु है। उनमें एक ही काल मृत्यु है, शेष अकाल मृत्यु रोकने के प्रयास ही निदान और चिकित्सा हैं। धन्वन्तरि जयन्ती कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाई जाती है। इस दिन को भगवान धन्वन्तरि, जो कि आयुर्वेद के पिता और गुरु माने जाते हैं, उनके जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। भगवान धन्वन्तरि देवताओं के चिकित्सक हैं और भगवान विष्णु के अवतारों में से एक माने जाते हैं। 'धन्वन्तरि जयन्ती' को 'धनतेरस' तथा 'धन्वन्तरि त्रयोदशी' के नाम से भी जाना जाता है।
भगवान धन्वन्तरि आयुर्वेद जगत के प्रणेता तथा वैद्यक शास्त्र के देवता माने जाते हैं। इनकी चौबीस अवतारों के अंतर्गत गणना होने के कारण भक्तजन भगवान विष्णु का अवतार, श्रीराम तथा श्रीकृष्ण के समान पूजा करते हैं। आदिकाल में आयुर्वेद की उत्पत्ति ब्रह्मा से ही मानते हैं। और आदि काल के ग्रंथों में रामायण-महाभारत तथा विविध पुराणों की रचना हुई है, जिसमें सभी ग्रंथों ने आयुर्वेदावतरण के प्रसंग में भगवान धन्वन्तरि का उल्लेख किया है। महाभारत, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण, श्रीमद भागवत महापुराणादि में यह उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि देव और अतुर एक ही पिता कश्यप ऋषि के संतान थे। किंतु इनकी वंशवृद्ध अधिक हो गई थी अतः अधिकारों के लिए परस्पर लड़ा करते थे। वे तीनों ही लोकों पर राज्याधिकार चाहते थे। असुरों या राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य थे जो संजीवनी विद्या के बल से असुरों का जीवितकर लेते थे। इसके अतिरिक्त दैत्य दानव माँसाहारी होने के कारण हृष्ट-पुष्ट स्वस्थ तथा दिव्य शस्त्रों के ज्ञाता थे। अतः युद्ध में देवताओं की मृत्यु अधिक होती थी।
आयु के न्यूनाधिक्य की एक-एक माप धन्वंतरि ने बताई है। पुरुष अथवा स्त्री को अपने हाथ के नाप से 120 उंगली लंबा होना चाहिए, जबकि छाती और कमर अठारह उंगली। शरीर के एक-एक अवयव की स्वस्थ और अस्वस्थ माप धन्वंतरि ने बताई है। उन्होंने चिकित्सा के अलावा फसलों का भी गहन अध्ययन किया है। पशु-पक्षियों के स्वभाव, उनके मांस के गुण-अवगुण और उनके भेद भी उन्हें ज्ञात थे। मानव की भोज्य सामग्री का जितना वैज्ञानिक व सांगोपांग विवेचन धन्वंतरि और सुश्रुत ने किया है, वह आज के युग में भी प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण है।

Sunday, 19 October 2014

धनतेरस सबके लिए मंगलकारी



पांच दिवसीय दीपोत्सव का शुभारंभ धनतेरस से होगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस बार धनतेरस मंगलवार को होने से सबके लिए मंगलकारी रहेगा। धनतेरस पर सुबह से दिनभर श्रेष्ठ मुहूर्त है। लगभग 110 वर्ष बाद इस वर्ष मंगल धनवर्षा योग बन रहा है। इससे धनतेरस सभी के लिए मंगलकारी रहेगा। भगवान कुबेर खजाने का द्वार खोलेंगे। बाजार में कुबेर धन की वर्षा होगी। हिंदू धर्म में धनतेरस का खासा महत्व है। खरीदारी के लिए इस दिवस को शुभ माना जाता है। भगवान धनवंतरी की पूजा अर्चना के साथ बर्तन और जेवरात की खरीदी की जाती है। इसके अलावा दूसरे उत्पादों की भी खरीदारी होती है। इस बार शुभ मुहूर्त सोमवार की रात्रि 23.23 बजे से लेकर मंगलवार की रात 1.14 बजे तक का है। यानि 26 घंटे शुभ मुहूर्त रहेगा।
जिस प्रकार देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार भगवान धनवन्तरि भी अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए हैं। देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण है दीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें।
कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। धन्वन्तरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरी चुकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। कहीं कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें 13 गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर धनिया के बीज खरीद कर भी लोग घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।
धनतेरस के दिन खरीदारी का विशेष महत्व है। इस दिन चांदी का बर्तन खरीदना अत्यंत शुभ माना जाता है। धनतेरस के दिन चांदी खरीदने की भी प्रथा है। अगर सम्भव न हो तो कोइ बर्तन खरिदे। इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है। संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह स्वस्थ है सुखी है और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरी जो चिकित्सा के देवता भी हैं उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हें।शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी जी को घर में रोकने के लिए धनतेरस के दिन दीपक जलाना अनिवार्य है। इस दिन यमुना अथवा पवित्र नदी में स्नान कर यमराज के नाम पर दीपदान करने की परंपरा भी है। वैदिक देवता यमराज के नाम पर आटे का दीपक जलाकर घर के द्वार पर रखा जाता है। इस दीपक में चार बत्तियां लगाई जाती हैं। इधर, धनतेरस के मद्देनजर बाजार विभिन्न उत्पादों से सज गया है। वैसे दीपावली की रौनक मार्केट में नजर आने लगी है। बर्तन, सराफा, कपड़े सहित ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रानिक्स के उत्पादों की धनतेरस के दिन जमकर खरीदारी होती है। 

Tuesday, 14 October 2014

चाह लेंगे, तो बचेगी बिजली


बिजली की लगातार बढ़ती मांग और सीमित मात्रा में होने वाले उत्पादन के कारण असंतुलन पैदा हो गया है। असंतुलन की स्थिति में मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है।हालात कुछ ऐसे बन गये हैं कि बिजली उत्पादन के जो नए तरीके खोजे जा रहे हैं मांग उससे भी ज्यादा बढ़ती जा रही है। बिन बिजली सब सून है यह मान लिया जाना चाहिये। बिजली की कमी से जन जीवन प्रभावित होता है। बिजली के बगैर रहना कितना मुश्किल है इसे आसानी से समझा जा सकता है।
यह जानते हुए भी कि सभी संसाधनों के उपयोग करते हुए भी अब तक पर्याप्त विद्युत उत्पादन संभव नहीं हो पाया है, लोग बिजली का बेहिसाब, बेफालतू उपयोग करते हैं। बात शासकीय अशासकीय कार्यालयों की हो या घर, दुकान, गली, मुहल्ले, चैक चैराहों की आप हर कहीं-हर तरफ बिजली की बर्बादी के नज़ारे देख सकते है।बिजली के इस बेकार में हो रहे खर्च को रोकने के लिए जो जागरूकता अभियान, योजनाएं, नियम बनाये गये वे भी प्रभावी परिणाम नहीं दे पाये हैं। नतीजा यह है कि बिजली का बेहिसाब दुरूपयोग हो रहा है इसे रोकने की फिक्र नहीं है।
बिजली के दुरूपयोग को बढ़ाने में उन घोषणाओं ने भी बड़ा योगदान दिया है जिनमें झुग्गी बस्ती में रहने वालों, किसानों, आदमी की जाति बिरादरी को देख परखकर उसे मुफ्त में बिजली देने का ऐलान कर दिया गया। ‘‘माले मुफ्त दिले बेरहम’’ वाली कहावत ने ऐसा असर दिखाया कि लोगों ने खंभे पर तार डालकर मोटर पम्प,हीटर, फ्रिज, एयर कंडीशनर ही नहीं बड़ी बड़ी मशीनें भी खूब मुफ्त बिजली से चलाई और चला रहे हैं। बिजली उत्पादन को रसातल में पहुंॅचाने का काम करने में उद्योगपति भी पीछे नहीं रहे जिन्होंने रियायती दरों पर बिजली की सुविधा लेकर उसका सदुपयोग कम दुरूपयोग अधिक किया। बिजली चोरी करने वाले आज भी जमकर अपनी मनमानी कर रहे हैं। राजनीतिक, प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में बिजली की बर्बादी खूब हो रही है।
अब सवाल यह है कि सीमित मात्रा में हो रहे बिजली उत्पादन की तुलना में बिजली के बेहिसाब खर्च को रोका जा सकता है ? आखिर ऐसा क्या किया जाये जिससे बिजली की बर्बादी को बचाया जा सके ? ऐसा क्या करें कि लोग खुद ही बिजली की बचत करने में जुट जायें ? अब समय आ गया है कि बिजली से जु़ड़े इन ज्वलंत सवालों के जवाब तलाशे जायें। इसका एक तरीका यह हो सकता है कि बिजली की मुफ्तखोरी को तत्काल बंद किया जाये। जो बिजली का उपयोग करते हैं उनके लिए इसका शुल्क अदा करना जरूरी हो।
इसके साथ ही बिजली की बचत का एक फार्मूला यह भी हो सकता है जिस अवधि में बिजली का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है उस अवधि के निर्धारित समय में बिजली की दरें कुछ बढ़ाकर वसूल की जायें। इसी के साथ देर रात को बिजली के उपयोग की दरें प्रति यूनिट लगभग आधी कर दी जाये जबकि दिन के समय में उपयोग की जाने वाली बिजली की दर भी वर्तमान दर से कुछ कम ही होना चाहिये। इसका अर्थ यह है कि विद्युत दरों को सबसे अधिक खपत, सामान्य खपत और कम खपत के आधार पर तय किया जाये तो इससे बचत करने वाले उपभोक्ताओं को प्रोत्साहन मिलेगा। यदि बिजली के उपयोग की दर 24 घंटे के लिए अलग अलग तीन स्लेब बनाकर निर्धारित की जायें तो इसके परिणाम निश्चित ही अच्छे देखने को मिलेगें।
प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि बिजली उपभोक्ता उत्पादन तो नहीं बढ़ा सकते लेकिन बिजली के अपव्यय को रोककर उसकी बचत अवश्य कर सकते हैं। यह सच है कि बिजली की बचत से ही बिजली उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। बचत के लिए बिजली उपभोक्ताओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। ‘पीक आवर्स’ में बिजली की दरें बढ़ाने का प्रस्ताव एक ऐसा प्रलोभन है जो विद्युत के बेहिसाब खर्च को नियंत्रित कर सकता है। बिजली उपभोक्ता अपना बिल कम करने के लिए इस प्रलोभन का लाभ अवश्य लेना चाहेगें।

फूल खिलते हैं तो आवाज कहाँ होती है


जीवन को सौंदर्य से आप्लावित करना है, उसे कलापूर्ण बनाना है तो सहजता का दामन थामना ही होगा और वो भी बाहरी नहीं, आंतरिक सहजता का। असली सौंदर्य सहजता में ही है। कली से फूल बनने में सहजता है, तभी फूल में असीम सौंदर्य है। जिसे हम तहजीब कहते हैं वह भी जीवन की सहजता ही है।
अधिकतर लोगों को अपने शारीरक व्यक्तित्व से शिकायत रहती है. कई बार मामूली शारीरक भिन्नताओं वाले लोग अपने खूबसूरत जीवन को इसी चिंता में बिता देते हैं. उन्हें लगता है कि सारी दुनिया सिर्फ उन्हें देखकर उन पर व्यंग्य कर रही है. वह कल्पनाओं में भी यही सोचते हैं कि वह जीवन में कभी प्रगति कर ही नहीं सकते ऐसा सोचना गलत है. सफलता के लिए जरुरी है आप खुद से प्रेम करें और सकारात्मक सोच रखें.
जो लोग सहज भाव से निरंतर प्रयास करते हैं, वे जीवन में बहुत आगे जाते हैं। सहजता का अनुगामी जीवन में कभी पीछे नहीं रहता। पिछड़ता नहीं। एक झटके में शिखर पर पहुँच जाने में आनंद नहीं है। लेकिन कई लोग सहज होते हुए भी अपेक्षित उन्नति क्यों नहीं कर पाते? वे जीवन में क्यों पिछड़ जाते हैं? यहाँ एक प्रश्न और उठता है कि क्या ऊपर से सहज दिखने वाला व्यक्ति वास्तव में सहज है? कई बार व्यक्ति ऊपर से तो सहज दिखलाई पड़ता है लेकिन वास्तव में सहज नहीं होता। उसके अंदर एक तूफान चलता रहता है। वह बाहर भी थोड़ा-बहुत झलकना चाहिए, लेकिन नहीं झलकता। अंदर द्वंद्व है, पीड़ा है, राग-द्वेष है, नकारात्मक भावों का तूफान है, लेकिन बाहर फिर भी खामोशी है। इसका ये अर्थ हुआ कि बाहर की खामोशी अभिनय मात्र है। अब यदि अभिनय ही करना है, तो आंतरिक शांति का कीजिए। बाहर की खामोशी बेकार है।बाहर की मुखरता और चंचलता से अंदर की सहजता प्राप्त की जा सकती है। किसी भी प्रकार का शारीरिक श्रम, व्यायाम, योगासन, खेल-कूद, शिल्प और कलाएँ इन सभी के द्वारा आंतरिक सहजता प्राप्त की जा सकती है। किसान-मजदूर प्रायरू अंदर से सहज ही होते हैं। तथाकथित बुद्धिजीवी या प्रफेशनल कई बार ऊपर से तो सहज दिखते हैं, लेकिन अंदर से उतने ही असहज होते हैं। मानसिक अशांति के शिकार, तनाव व दबाव से पीड़ित, हमेशा दुश्चिंताओं व द्वंद्व में घिरे हुए।

Sunday, 12 October 2014

जीवन में बढ़ेगा प्रेम और खुशहाली


आज सुहागिन महिलाओं का महापर्व करवा चैथ है। इस दिन पत्नियां अपने पति की लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन के लिए व्रत रखती हैं। रात को जब चांद निकलता है तो चंद्र पूजा की जाती है फिर पति की पूजा का विधान है। महिलाओं के लिए ये पर्व बहुत ही खास होता है। ज्योतिष के अनुसार करवा चैथ पर यदि पत्नी विशेष रंग के कपड़े पहनें और पति राशि के अनुसार अपनी पत्नी को उपहार दें तो पति-पत्नी के दांपत्य जीवन में सदैव खुशहाली रहेगी और प्रेम भी बढ़ेगा
करवा चैथ व्रत दीर्घायु पति एवं दांपत्य सुख प्रदाता करवा चैथ व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्थी को किया जाता है। विवाहित स्त्रियों के लिए यह व्रत अखंड सौभाग्य का कारक होता है। विवाहित स्त्रियां इस दिन अपने प्राण बल्लभ की दीर्घायु एवं स्वास्थ्य की कामना करके चंद्रमा को अघ्र्य अर्पित कर व्रत को पूर्ण करती हैं। इस व्रत में रात्रि बेला में शिव, पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश और चंद्रमा के चित्रों एवं सुहाग की वस्तुओं की पूजा का विधान है। इस दिन निर्जल व्रत रखकर चंद्र दर्शन और अघ्र्य अर्पण कर भोजन ग्रहण करना चाहिए। पीली मिट्टी की गौरी भी बनायी जाती है। कुछ स्त्रियां परस्पर चीनी या मिट्टी के करवा का आदान- प्रदान भी करती हैं। लोकाचार में कई स्त्रियां काली चिकनी मिट्टी के कच्चे करवे में चीनी की चासनी बनाकर डाल देती हैं अथवा आटे को घी में सेंककर चीनी मिलाकर लड्डू आदि बनाती हैं। पूड़ी-पुआ और विभिन्न प्रकार के पकवान भी इस दिन बनाए जाते हैं। नव विवाहिताएं विवाह के पहले वर्ष से ही यह व्रत प्रारंभ करती हैं। चैथ का व्रत चैथ से ही प्रारंभ कराया जाता है। इसके बाद ही अन्य महीनों के व्रत करने की परम्परा है। नैवेद्य (भोग) में से कुछ पकवान ब्राह्मणों को दक्षिणा सहित दान करें तथा अपनी सासू मां को 13 लड्डू, एक लोटा, एक वस्त्र, कुछ पैसे रखकर एक करवा चरण छूकर दे दें। शेखावाटी (राजस्थान) में एक विशेष परम्परा है। वहां स्त्रियां कुम्हारों के यहां से करवा लाकर गेहूं या बाजरा भूनकर सथिया करके आटे की बनी हुई 13 मीठी टिक्कियां, एक गुड़ की डली और चार आने के पैसे या श्रद्धानुसार विवाह के साल टीका चावल लगाकर गेहूं के 13 दाने हाथ में लेकर कहानी सुनती हैं। करवा तथा पानी का लोटा रोली पाटे पर रखती हैं और कहानी सुनकर करवा अपनी सास के पैरों में अर्पित करती हैं। सास न हो तो मंदिर में चढ़ाती हैं। उद्यापन करें तो 13 सुहागिन स्त्रियों को जिमावें। 13 करवा करें 13 जगह सीरा पूड़ी रखकर हाथ फेरें। सभी पर रुपया भी रखें। बायना जीमने वाली स्त्रियों को परोस दें। रुपया अपनी सास को दे दें। 13 करवा 13 सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराने के दौरान दे दें। वास्तव में करवा चैथ का व्रत भारतीय संस्कृति के उस पवित्र बंधन या प्यार का प्रतीक है जो पति-पत्नी के बीच होता है। भारतीय संस्कृति में पति को परमेश्वर माना गया है। यह व्रत पति पत्नी दोनों के लिए नव प्रणय निवेदन और एक-दूसरे के प्रति हर्ष, प्रसन्नता, अपार प्रेम, त्याग एवं उत्सर्ग की चेतना लेकर आता है। इस दिन स्त्रियां नव वधू की भांति पूर्ण शृंगार कर सुहागिन के स्वरूप में रमण करती हुई चंद्रमा से अपने अखंड सुहाग की प्रार्थना करती हैं। स्त्रियां शृंगार करके ईश्वर के समक्ष व्रत के बाद यह प्रण भी करती हैं कि वे मन, वचन एवं कर्म से पति के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना रखेंगी तथा धर्म के मार्ग का अनुसरण करती हुई धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करेंगी। कुंआरी कन्याएं इस दिन गौरा देवी का पूजन करती हैं। शिव पार्वती के पूजन का विधान इसलिए भी है कि जिस प्रकार शैलपुत्री पार्वती ने घोर तपस्या करके भगवान शंकर को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया वैसा ही सौभाग्य उन्हें भी प्राप्त हो। इस संदर्भ में एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार पांडवों के बनवास के समय जब अर्जुन तप करने इंद्रनील पर्वत की ओर चले गए तो बहुत दिनों तक उनके वापस न लौटने पर द्रौपदी को चिंता हुई। श्रीकृष्ण ने आकर द्रौपदी की चिंता दूर करते हुए करवा चैथ का व्रत बताया तथा इस संबंध में जो कथा शिवजी ने पार्वती को सुनाई थी, वह भी सुनाई। कथा इस प्रकार है। इंद्रप्रस्थ नगरी में वेद शर्मा नामक एक विद्वान ब्राह्मण के सात पुत्र तथा एक पुत्री थी जिसका नाम वीरावती था। उसका विवाह सुदर्शन नामक एक ब्राह्मण के साथ हुआ। ब्राह्मण के सभी पुत्र विवाहित थे। एक बार करवा चैथ के व्रत के समय वीरावती की भाभियों ने तो पूर्ण विधि से व्रत किया, किंतु वीरावती सारा दिन निर्जल रहकर भूख न सह सकी तथा निढाल होकर बैठ गई। बहन को जल्दी खाना खिलाने के लिए उसके भाइयों ने बाहर खेतों में जाकर आग जलाई तथा ऊपर कपड़ा तानकर चंद्रमा जैसा दृश्य बना दिया और जाकर बहन से कहा कि चांद निकल आया है, अघ्र्य दे दो। यह सुनकर वीरावती ने अघ्र्य देकर खाना खा लिया। नकली चंद्रमा को अघ्र्य देने से उसका व्रत खंडित हो गया तथा उसका पति अचानक बीमार पड़ गया। वह ठीक न हो सका। एक बार इंद्र की पत्नी इंद्राणी करवा चैथ का व्रत करने पृथ्वी पर आईं। इसका पता लगने पर वीरावती ने जाकर इंद्राणी से प्रार्थना की कि उसके पति के ठीक होने का उपाय बताएं। इंद्राणी ने कहा कि तेरे पति की यह दशा तेरी ओर से रखे गए करवा चैथ व्रत के खंडित हो जाने के कारण हुई है। यदि तू करवा चैथ का व्रत पूर्ण विधि-विधान से फिर से करेगी तो तेरा पति ठीक हो जाएगा। वीरावती ने करवा चैथ का व्रत पूर्ण विधि से संपन्न किया जिसके फलस्वरूप उसका पति बिलकुल ठीक हो गया। करवा चैथ का व्रत उसी समय से प्रचलित है। अतः सौभाग्य, पुत्र-पौत्रादि और धन-धान्य के इच्छुक स्त्रियों को यह व्रत विधिपूर्वक करना चाहिए और इस दिन विभिन्न प्रकार के बधावे गाने चाहिए।

Wednesday, 8 October 2014

समाज को समर्पित जीवन गुरु रामदास का



गुरु रामदास सिक्खों के चौथे गुरु थे। इन्होंने सिक्ख धर्म के सबसे प्रमुख पद गुरु को 1574 ई. में प्राप्त किया था। इस पद पर ये 1581 ई. तक बने रहे थे। ये सिक्खों के तीसरे गुरु अमरदास के दामाद थे। इन्होंने 1577 ई. में 'अमृत सरोवर' नामक एक नये नगर की स्थापना की थी, जो आगे चलकर अमृतसर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गुरु रामदास ने 'सतोषसर' नामक पवित्र सरोवर की खुदाई भी आरंभ कराई थी। गुरु रामदास के समय में लोगों से 'गुरु' के लिए चंदा या दान लेना शुरू हुआ। वे बड़े साधु स्वभाव के व्यक्ति थे। इस कारण सम्राट अकबर भी उनका सम्मान करता था। गुरु रामदास के कहने पर अकबर ने एक वर्ष पंजाब से लगान नहीं लिया। इस कारण गुरु की गद्दी को लोगों से पर्याप्त धन प्राप्त हो गया था। गुरु रामदास के बाद गुरु की गद्दी वंश-परंपरा में चलने लगी। उन्होंने अपने पुत्र गुरु अर्जुन देव को अपने बाद गुरु नियुक्त किया।
राम दास या गुरू राम दास  सिखों के गुरु थे और उन्हें गुरु की उपाधि 30 अगस्त 1574 को दी गयी थी। उन दिनों जब विदेशी आक्रमणकारी एक शहर के बाद दूसरा शहर तबाह कर रहे थे, तब 'पंचम् नानक' गुरू राम दास जी महाराज ने एक पवित्र शहर रामसर, जो कि अब अमृतसर के नाम से जाना जाता है, का निर्माण किया।

गुरू राम दास (जेठा जी) का जन्म चूना मण्डी, लाहौर (अब पाकिस्तान में) में कार्तिक वदी २, (२५वां आसू) सम्वत १५९१ (२४ सितम्बर १५३४) को हुआ था। माता दया कौर जी (अनूप कौर जी) एवं बाबा हरी दास जी सोढी खत्री का यह पुत्र बहुत ही सुंदर एवं आकर्षक था। राम दास जी का परिवार बहुत गरीब था। उन्हें उबले हुए चने बेच कर अपनी रोजी रोटी कमानी पड़ती थी। जब वे मात्र ७ वर्ष के थे, उनके माता पिता की मृत्यु हो गयी। उनकी नानी उन्हें अपने साथ बसर्के गाँव ले आयी। उन्होंने बसर्के में ५ वर्षों तक उबले हुए चने बेच कर अपना जीवन यापन किया। एक बार गुरू अमर दास साहिब जी, रामदास साहिब जी की नानी के साथ उनके दादा की मृत्यु पर बसर्के आये और उन्हें राम दास साहिब से एक गहरा लगाव सा हो गया। रामदास जी अपनी नानी के साथ गोइन्दवाल आ गये एवं वहीं बस गये। यहाँ भी वे अपनी रोजी रोटी के लिए उबले चने बेचने लगे एवं साथ ही साथ गुरू अमरदास साहिब जी द्वारा धार्मिक संगतों में भी भाग लेने लगे। उन्होंने गोइन्दवाल साहिब के निर्माण की सेवा की।

रामदास साहिब जी का विवाह गुरू अमरदास साहिब जी की पुत्री बीबी भानी जी के साथ हो गया। उनके यहाँ तीन पुत्रों -१. पृथी चन्द जी, २. महादेव जी एवं ३. अरजन साहिब जी ने जन्म लिया। शादी के पश्चात रामदास जी गुरु अमरदास जी के पास रहते हुए गुरु घर की सेवा करने लगे। वे गुरू अमरदास साहिब जी के अति प्रिय व विश्वासपात्र सिक्ख थे। वे भारत के विभिन्न भागों में लम्बे धार्मिक प्रवासों के दौरान गुरु अमरदास जी के साथ ही रहते।

गुरू रामदास जी एक बहुत ही उच्च वरीयता वाले व्यक्ति थे। वो अपनी भक्ति एवं सेवा के लिए बहुत प्रसिद्ध हो गये थे। गुरू अमरदास साहिब जी ने उन्हें हर पहलू में गुरू बनने के योग्य पाया एवं 1 सितम्बर १५७४ को उन्हें ÷चतुर्थ नानक' के रूप में स्थापित किया। गुरू रामदास जी ने ही ÷चक रामदास' या ÷रामदासपुर' की नींव रखी जो कि बाद में अमृतसर कहलाया। इस उद्देश्य के लिए गुरू साहिब ने तुंग, गिलवाली एवं गुमताला गांवों के जमींदारों से संतोखसर सरोवर खुदवाने के लिए जमीनें खरीदी। बाद में उन्होने संतोखसर का काम बन्द कर अपना पूरा ध्यान अमृतसर सरोवर खुदवाने में लगा दिया। इस कार्य की देख रेख करने के लिए भाई सहलो जी एवं बाबा बूढा जी को नियुक्त किया गया।

जल्द ही नया शहर (चक रामदासपुर) अन्तराष्ट्रीय व्यापार का केन्द्र होने की वजह से चमकने लगा। यह शहर व्यापारिक दृष्टि से लाहौर की ही तरह महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। गुरू रामदास साहिब जी ने स्वयं विभिन्न व्यापारों से सम्बन्धित व्यापारियों को इस शहर में आमंत्रित किया। यह कदम सामरिक दृष्टि से बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ। यहाँ सिक्खों के लिए भजन-बन्दगी का स्थान बनाया गया। इस प्रकार एक विलक्षण सिक्ख पंथ के लिए नवीन मार्ग तैयार हुआ। गुरू रामदास साहिब जी ने ÷मंजी पद्धति' का संवर्द्धन करते हुए ÷मसंद पद्धति' का शुभारम्भ किया। यह कदम सिक्ख धर्म की प्रगति में एक मील का पत्थर साबित हुआ।

गुरू रामदास साहिब जी ने सिख धर्म को ÷आनन्द कारज' के लिए ÷चार लावों' (फेरों) की रचना की और सरल विवाह की गुरमत मर्यादा को समाज के सामने रखा। इस प्रकार उन्होने सिक्ख पंथ के लिए एक विलक्षण वैवाहिक पद्धति दी। इस प्रकार इस भिन्न वैवाहिक पद्धति ने समाज को रूढिवादी परम्पराओं से दूर किया। बाबा श्रीचंद जी के उदासी संतों व अन्य मतावलम्बियों के साथ सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किये। गुरू साहिब जी ने अपने गुरूओं द्वारा प्रदत्त गुरू का लंगर प्रथा को आगे बढाया। अन्धविश्वास, वर्ण व्यवस्था आदि कुरीतियों का पुरजोर विरोध किया गया।
उन्होंने ३० रागों में ६३८ शबद् लिखे जिनमें २४६ पौउड़ी, १३८ श्लोक, ३१ अष्टपदी और ८ वारां हैं और इन सब को गुरू ग्रन्थ साहिब जी में अंकित किया गया है। उन्होंने अपने सबसे छोटे पुत्र अरजन साहिब को ÷पंचम्‌ नानक' के रूप में स्थापित किया। इसके पश्चात वे अमृतसर छोड़कर गोइन्दवाल चले गये। भादौं सुदी ३ (२ आसू) सम्वत १६३८ (१ सितम्बर १५८१) को ज्योति जोत समा गए।

रु रामदास जी भिक्षा मांग कर अपना निर्वाह किया करते !एक गाँव में एक गली ऐसी थीजिसमे एक वृद्धा गुरु समर्थ रामदास जी को देखते ही गालिया देने लग जाया करती !समर्थ गुरु रामदास जी चुपचाप नीचे मुख कर बिना कुछ कहे आगे निकल जाया करते !सोचते अवश्य ही इस बूढी माँ के साथ पिछले जन्म का लेना देना शेष है अन्यथा इस जन्म में तो मैंने इनका कुछ बिगाड़ा नहीं है !
एक दिन वह बुढिया इतनी ज्यादा बिगड़ी हुई थी कि जो पोंचा वो लगा रही थी समर्थ गुरु रामदास के आते ही श्री गुरु मुख पर दे मारा !समर्थ रामदास ने चुपचाप वह पोंचा उठाया ;आज भिक्षा भी नहीं मांगी ,घर वापिस आ गए है !ठाकुर के समक्ष रोना शुरू कर दिया है -हे मेरे राम इस बूढी माँ का क्रोध रूपी राक्षस मार दो -२!साथ -२ पोंचे को भी साफ़ करते रहे ;पोंचे की बतिया बना कर के तो उन्हें जलाना शुरू कर दिया है;प्रार्थना भी करते रहे ! सच मानियेगा साधकजनों ज्यो -२ बतिया जल रही है उस बुढिया का क्रोध रूपी राक्षस भी जलना शुरू हो गया है !कई दिनों से इंतजार कर रही है कि कब समर्थ रामदास जी आयेगे और मैं अपना अपराध क्षमा करवाउंगी !आज आये है तो आंसुओ से चरण-कमलो को धो दिया है ;बड़ा मान सम्मान दे कर के तो भोजन कराया है !