Tuesday, 8 December 2015

कांग्रेस में जान फूंकी सोनिया गांधी ने


कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी का आज 69वां जन्म दिन है। इटली के एक छोटे से गांव की एक साधारण सी लड़की के भारत के सबसे बड़े राजनीतिक घराने की बहू बनने की कहानी किसी परी कथा से कम नहीं है। सोनिया गांधी और राजीव गांधी की जिंदगी के शुरुआती 13 साल कई सियासी उतार-चढ़ावों से होकर गुजरे क्योंकि पूरा परिवार एक के बाद एक दुखद घटनाओं से जूझ रहा था। पहले विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मौत, उसके बाद इंदिरा गांधी की हत्या और सात साल बाद खुद राजीव गांधी की हत्या। हर बार सोनिया गांधी को शिद्दत से ये एहसास हो रहा था कि ये राजनीति ही थी जो राजीव गांधी और उनकी जिंदगी की दुश्मन साबित हुई थी, पर विकल्प कोई नहीं था। बाद के सालों ने दिखाया कि विदेश में पैदा हुई ये गांधी अपनी जिंदगी और इस देश की सियासत की किताब नए सिरे से लिखने को तैयार हो रही थी। उनकी भावना की तुलना बाद में उन्हें मिली फतह से की जा सकती है।

साल 2004 में बीजेपी ने सोनिया गांधी की ताकत को अनदेखा किया था और अब बीजेपी के सामने ही सोनिया गांधी एक खास अंदाज में अपने लिए लिखे भाषण पढ़कर उस भारत तक पहुंच रही थीं जो उतना चमकदार नहीं था जितना दावा किया जा रहा था। सोनिया गांधी की लगातार एक ही कोशिश थी कि कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए सहयोगी मिल जाएं। पुराने दुश्मन अब दोस्त का दर्जा पा गए थे। कुछ जातियों और समुदायों में सोनिया ने भी अपनी पैठ बना ली थी अचानक सोनिया एम करुणानिधि, वायको, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान जैसे नेताओं की भी पसंद बन गई थीं।
हरकिशन सिंह सुरजीत से उनकी काफी बनती थी। एक बार वो सुरजीत के घर भी गई थीं। गर्मियों के दिन थे। सुरजीत ने कहा कि उनके घर में अंदर के कमरे में एक एयरकंडिश्नर है तो क्या तुम अंदर जा सकती हो और सोनिया गांधी तुरंत चली गईं। जिस कुर्सी पर वो बैठीं वो टूटी हुई थी। सोनिया गांधी ने उस पर तकिया रखा और बैठकर बातचीत करती रहीं। तब से सुरजीत से सोनिया गांधी की अच्छी दोस्ती हो गई और याद रखें कि ये कोई राजनीतिक दोस्ती नहीं थी, जिसके लिए वो पांच साल से मोलतोल कर रही थीं।
2004 चुनावों ने दिखाया कि दांव पर क्या लगा था। कांग्रेस का अस्तित्व ही नहीं बल्कि भारत की राजनीति में शायद एक गांधी की औकात भी दांव पर लगी थी। देश ने कांग्रेस को चुना और कांग्रेस ने सोनिया गांधी को और सोनिया गांधी ने उस शख्स को चुना जो सियासतदान कम था वफादार ज्यादा। उनके घर के बाहर कांग्रेसियों का हुजूम लग गया। पर सोनिया गांधी की तरफ से न हो चुकी थी। सोनिया गांधी के त्याग की कहानी देशभर में टेलीकास्ट हुई। सत्ता त्यागकर सोनिया और भी ताकतवर बन गई थीं। यहां तक कि बीजेपी ने भी माना कि ये सोनिया गांधी का मास्टरस्ट्रोक था।
ये उस नेता की कामयाबी थी, जिसे 1999 में सियासत का नौसिखिया कहा जाता था। राष्ट्रपति भवन के सामने कभी न भूलने वाली वो प्रेस कांफ्रेंस जब सोनिया गांधी ने जादुई आंकड़ों का ऐलान किया और कहा कि हमें यकीन है कि हमें 272 सीटें मिलेंगी। चुनाव अभियान का कर्ताधर्ता गलती कर सकता था, पर संसद में पार्टी प्रमुख के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। पता चला कि आंकड़ा 272 तक नहीं पहुंच पाया और 40 कम है तो चुनाव मजबूरी बन गए और सोनिया ने पाया कि उनके लिए अब अपनी छवि बनाए रखना बहुत जरूरी था। सोनिया गांधी से दोबारा गलती नहीं हुई। अब उन्होंने अपनी हर रुकावट को अपने फायदे में बदलना शुरू कर दिया। इस हद तक कि उनके विरोधी भी चौंक जाते थे।
राष्ट्रपति चुनाव, लाभ के पद के संकट और न्यूक्लियर करार पर तकरार जैसे जोखिम से गुजरकर सोनिया गांधी सत्ता में भागीदारी की कला अच्छी तरह जान गई थीं। एक सर्वशक्तिमान नेता और एक आज्ञाकारी प्रधानमंत्री के गठबंधन ने सत्ता में भागीदारी की नई परंपरा को जन्म दिया। सोनिया गांधी पार्टी के लिए जिम्मेदार थीं तो मनमोहन सरकार के लिए। ऐसी हिस्सेदारी पहले नहीं देखी गई थी फिर भी बहुत से लोग कहते हैं कि सत्ता सिर्फ सोनिया गांधी के पास ही रहती थी।
सोनिया गांधी ने १९९७ में कोलकाता के प्लेनरी सेशन में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की और उसके ६२ दिनों के अंदर १९९८ में वो कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयीं। उन्होंने सरकार बनाने की असफल कोशिश भी की। राजनीति में कदम रखने के बाद उनका विदेश में जन्म हुए होने का मुद्दा उठाया गया। उनकी कमज़ोर हिन्दी को भी मुद्दा बनाया गया। उन पर परिवारवाद का भी आरोप लगा लेकिन कांग्रेसियों ने उनका साथ नहीं छोड़ा और इन मुद्दों को नकारते रहे।
सोनिया गांधी अक्टूबर १९९९ में बेल्लारी, कर्नाटक से और साथ ही अपने दिवंगत पति के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी, उत्तर प्रदेश से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ीं और करीब तीन लाख वोटों की विशाल बढ़त से विजयी हुईं। १९९९ में १३वीं लोक सभा में वे विपक्ष की नेता चुनी गयी। २००४ के चुनाव से पूर्व आम राय ये बनाई गई थी कि अटल बिहारी वाजपेयी ही प्रधान मंत्री बनेंगे पर सोनिया ने देश भर में घूमकर खूब प्रचार किया और सब को चौंका देने वाले नतीजों में यूपीए को अनपेक्षित २०० से ज़्यादा सीटें मिली। सोनिया गांधी स्वयं रायबरेली, उत्तर प्रदेश से सांसद चुनी गईं। वामपंथी दलों ने भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर रखने के लिये कांग्रेस और सहयोगी दलों की सरकार का समर्थन करने का फ़ैसला किया जिससे कांग्रेस और उनके सहयोगी दलों का स्पष्ट बहुमत पूरा हुआ। १६ मई २००४ को सोनिया गांधी १६-दलीय गंठबंधन की नेता चुनी गई जो वामपंथी दलों के सहयोग से सरकार बनाता जिसकी प्रधानमंत्री सोनिया गांधी बनती। सबको अपेक्षा थी की सोनिया गांधी ही प्रधानमंत्री बनेंगी और सबने उनका समर्थन किया। परंतु एन डी ए के नेताओं ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर आक्षेप लगाए। सुषमा स्वराज और उमा भारती ने घोषणा की कि यदि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो वे अपना सिर मुँडवा लेंगीं और भूमि पर ही सोयेंगीं। १८ मई को उन्होने मनमोहन सिंह को अपना उम्मीदवार बताया और पार्टी को उनका समर्थन करने का अनुरोध किया और प्रचारित किया कि सोनिया गांधी ने स्वेच्छा से प्रधानमंत्री नहीं बनने की घोषणा की है। कांग्रेसियों ने इसका खूब विरोध किया और उनसे इस फ़ैसले को बदलने का अनुरोध किया पर उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री बनना उनका लक्ष्य कभी नहीं था। सब नेताओं ने मनमोहन सिंह का समर्थन किया और वे प्रधानमंत्री बने पर सोनिया को दल का तथा गठबंधन का अध्यक्ष चुना गया।

राष्ट्रीय सुझाव समिति का अध्यक्ष होने के कारण सोनिया गांधी पर लाभ के पद पर होने के साथ लोकसभा का सदस्य होने का आक्षेप लगा जिसके फलस्वरूप २३ मार्च २००६ को उन्होंने राष्ट्रीय सुझाव समिति के अध्यक्ष के पद और लोकसभा का सदस्यता दोनों से त्यागपत्र दे दिया। मई २००६ में वे रायबरेली, उत्तरप्रदेश से पुन: सांसद चुनी गई और उन्होंने अपने समीपस्थ प्रतिद्वंदी को चार लाख से अधिक वोटों से हराया। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने फिर यूपीए के लिए देश की जनता से वोट मांगा। एक बार फिर यूपीए ने जीत हासिल की और सोनिया यूपीए की अध्यक्ष चुनी गई। महात्मा गांधी की वर्षगांठ के दिन २ अक्टूबर २००७ को सोनिया गांधी ने संयुक्त राष्ट्र संघ को संबोधित किया।
सोनिया गांधी ने बार-बार सरकार का फोकस आम आदमी की तरफ मोड़ने की कोशिश की। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, सूचना का अधिकार अधिनियम ये सभी तब आए जब 2006 तक वो नेशनल एडवाइजरी काउंसिल की अध्यक्ष थीं। इधर, दो साल से कम वक्त में दूसरी बार कांग्रेस अध्यक्ष फिर बाहर निकलीं और अपने पारिवारिक गढ़ रायबरेली में चुनावी समर के लिए वापस लौटीं।
2009 में सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने देश के दूसरे हिस्सों पर भी ध्यान देना शुरू किया। बेशक दोनों देश के दूसरे इलाकों का दौरा करके पार्टी की नींव मजबूत करने में लगे हों, लेकिन रायबरेली और अमेठी में तो मानो जीत गांधी परिवार के खाते में पहले से ही लिख दी गई है।  साल 2013 के बाद एक के बाद एक हुए चुनावों में पार्टी की हार से नेहरू-गांधी की जमीन धीरे-धीरे उनके पैरों से खिसकने लगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की पकड़ कमजोर पड़ गई और देश की जनता ने उसे नकार दिया एनडीए को जहां एक ओर भारी बहुमत मिला वहीं कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई, ये कांग्रेस के लिए बेहद शर्मनाक हार थी, लगने लगा कि अब कांग्रेस के लिए दोबारा उभरना आसान नहीं होगा, लेकिन एक बार फिर सोनिया गांधी ने पार्टी को हार से उभारने के लिए पूरी तरह एक्टिव हो गई हैं। गिरती सेहत के बावजूद सोनिया गांधी आज भा कांग्रेस की ढाल बनकर खड़ी हैं।

संसद में दहाड़ी सोनिया गांधी



पटियाला हाउस कोर्ट में नेशनल हेराल्ड केस में सुनवाई टल गई है। अब सुनवाई 19 दिसंबर को होगी। आज कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अदालत में पेश होना था। कल दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए सोनिया और राहुल को निचली अदालत में पेश होने को कहा था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि जो करना है कोर्ट को करना है। साथ ही उन्होंने कहा कि मै मैं इंदिरा गांधी की बहू हूं, मैं किसी से नहीं डरती। मैं क्यों अपसेट होऊं।
कोर्ट में सोनिया-राहुल गांधी की तरफ से कहा गया कि हम कोर्ट में पेश होने के लिए तैयार हैं। लेकिन चूंकि राहुल चेन्नई में हैं और सोनिया गांधी संसद सत्र में व्यस्त हैं, सैम पित्रोदा अमेरिका में हैं, इसलिए कुछ दिन की मोहलत चाहिए। इस पर कोर्ट ने 19 दिसंबर को पेशी की तारीख तय कर दी।
राज्यसभा में कांग्रेसी सांसदों ने 'तानाशाही नहीं चलेगी', 'बदले की राजनीति नहीं चलेगी' के नारे लगाए। वहीं लोकसभा में मोदी सरकार होश में आओ के नारे लगे।
 नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी कोर्ट में पेशी को लेकर कांग्रेस सरकार पर हमलावर रही। सोनिया गांधी के बाद राहुल ने भी इसे लेकर सरकार पर वार किया। राहुल ने पार्टी की तर्ज पर इसे सरकार का राजनीतिक बदला करार दिया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी  तमिलनाडु में बाढ़ के हालात का जायजा लेने पुड्डचेरी पहुंचे। नेशनल हेराल्ड केस के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि हां ये राजनीतिक बदला है। केंद्र सरकार मुझे ऐसे ही सवाल पूछने से रोकती है, लेकिन मैं चुप नहीं बैठूंगा। मैं सवाल पूछता रहूंगा और केंद्र सरकार पर दबाव बनाता रहूंगा।
 कांग्रेस ने इस मामले में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से दाखिल याचिका को राजनीतिक बदला बताया। प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी, गुलाम नबी आजाद और रणदीप सुरजेवाला ने सरकार पर जमकर हमला बोला। इसे लेकर संसद के दोनों सदनों में भी जमकर बवाल मचा।

Wednesday, 2 December 2015

Honoring and Dutiful Advocates' Day



Advocate's day is celebrated in India by the lawyer community on the 3rd of December to mark the birth anniversary of Rajendra Prasad, First President and a very eminent lawyer.  Dr. Rajendra Prasad, the First President of India and a very eminent lawyer himself. Advocates' Day brings together labor officials, labor representatives, public and private sector managers, management representatives and labor relations neutrals from across the States and Territories to hear national and regional speakers addressing the key issues of the day. Dr. Rajendra Prasad (December 3, 1884 – February 28, 1963) was the first President of Independent India. He was an independence activist and as a leader of the Congress Party, played a prominent role in the Indian Independence Movement. He served as President of the Constituent Assembly that drafted the constitution of the Republic from 1948 to 1950. He had also served as a Cabinet Minister briefly in the first Government of Independent India.
He was born in Zeradei, in the Siwan district of Bihar near Chapra. His father, Mahadev Sahai, was a Persian and Sanskrit language scholar; his mother, Kamleshwari Devi, was a devout lady. He was married at the age of 12 to Rajvanshi Devi. His dauntless determination towards the service of nation impressed many prominent leaders of his genre who came under his tutelage. He passed in 1915 with a Gold medal in Masters in Law examination with honors and went on to complete his Doctorate in Law. Dr. Rajendra Prasad used to practice his Law and studies in Bhagalpur (Bihar), and was a very popular and eminent figure over there during that ceremonious era. Rajendra Prasad was greatly moved by the dedication, courage and conviction of Mahatma Gandhi and he quit as a Senator of the University in 1921 and was drawn into the Indian freedom struggle.
He was elected as the President of Indian National Congress during the Bombay session in October 1934 and took active role in meeting its objectives. After India became independent he was elected as the President of India. As the first President, he was independent and unwilling to allow the Prime Minister or the party to usurp his constitutional prerogatives. However, following the tussle over the enactment of the Hindu Code Bill, he moderated his stance. He set several important precedents for later Presidents to follow. In 1962, after 12 years as President, he announced his decision to retire and was Succeeded by Dr. Sarvepalli Radhakrishnan. He was subsequently awarded the 'Bharat Ratna', the nation's highest civilian award in 1962, the order which was established by himself, on January 2nd, 1954. Advocates' day is observed in India to commemorate his birthday.

Wednesday, 18 November 2015

सशक्त देश की पहचान इंदिरा गांधी

देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जन्म आज ही के दिन, 17 नवंबर 1917 को हुआ था। भारतीय राजनीति के इतिहास में इंदिरा गांधी को विशेष रूप से याद रखा जाता है। एक तेज तर्रार, त्‍वरित निर्णयाक क्षमता और लोकप्रियता ने इंदिरा गांधी को देश और दुनिया की सबसे ताकतवर नेताओं में शुमार कर दिया। इंदिरा को तीन कामों के लिए देश सदैव याद करता रहेगा। पहला बैंकों का राष्ट्रीयकरण, दूसरा राजा-रजवाड़ों के प्रिवीपर्स की समाप्ति और तीसरा पाकिस्तान को युद्ध में पराजित कर बांग्लादेश का उदय।

गुलाम भारत को आजादी की कितनी जरूरत है यह इंदिरा ने अच्छे से समझ लिया था। बचपन से ही वो भी भारत की आजादी की लड़ाई में जुट गई थीं। उन्होंने अपने हमउम्र बच्चों के साथ एक वानर सेना बनाई जिसका उद्देश्य देश की आजादी के लिए लड़ रहे क्रांतिकारी एवं आंदोलनकारियों तक गुप्त सूचनाएं पहुंचाना था। 1969 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश के 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इंदिरा गांधी का कहना था कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण की बदौलत ही देश भर में बैंक क्रेडिट दी जा सकेगी। उस वक्त के वित्त मंत्री मोरारजी देसाई इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर चुके थे। 19 जुलाई 1969 को एक अध्यादेश लाया गया और 14 बैंकों का स्वामित्व राज्य के हवाले कर दिया गया। उस वक्त इन बैंकों के पास देश का 70 प्रतिशत जमापूंजी थी। 1969 में इंदिरा गांधी ने भूमिहीन और समाज के कमजोर वर्ग के लिए भूमि सुधार नीति बनाई। हरित क्रांति इंदिरा के अथक प्रयास का फल था। बीस सूत्रीय कार्यक्रम की शुरुआत भी इंदिरा गांधी ने ही की थी।
1967 के आम चुनावों में कई पूर्व राजे-रजवाड़ों ने सी.राजगोपालाचारी के नेतृत्व में स्वतंत्र पार्टी का गठन लिया था। इनमें से कई कांग्रेस के बागी भी थे। इस कारण इंदिरा ने प्रिवीपर्स समाप्ति का संकल्प ले लिया। 1971 के चुनावों में सफलता के बाद इंदिरा ने संविधान में संशोधन कराया और प्रिवीपर्स की समाप्ति कर दी। इस तरह राजे-महाराजों के सारे अधिकार और सहूलियतें वापस ले ली गईं। 1971 के चुनाव में इंदिरा जी ने नारा दिया था ‘गरीबी हटाओ’। इस नारे का जादू देश भर में लोगों के सिर चढ़कर बोला। पाकिस्तान के साथ युद्ध में विजयी होने के बाद वे संसद में पहले ही दुर्गा की परिभाषा से विभूषित हो चुकी थी। उनकी लोकप्रियता अपने चरमोत्कर्ष पर थी। चुनाव में कांग्रेस भारी बहुमत से जीती। भारत पाकिस्तान के बीच तीसरे युद्ध ने दक्षिण एशिया का भूगोल ही नहीं इतिहास भी बदल दिया। ये इंदिरा की अगुवाई का ही कमाल था कि भारत ने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर भी मजबूर तक दिया जब महाबली अमेरिकी खुद उसका खुलकर साथ दे रहा था।पाकिस्तान से लड़ाई के तीन साल बाद 18 मई 1974 को भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण कर विश्व पटल पर अपनी सैन्य ताकत दर्ज कराने की कोशिश की। इसके साथ ही अमरीका, सोवियत संघ (तत्कालीन), ब्रिटेन, फ्रांस और चीन के बाद भारत छठा ऐसा करने वाला देश बन गया।साल 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर सैन्य हमले पर विचार किया था। वह पड़ोसी देश को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए ऐसा करना चाहती थीं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के सार्वजनिक किए गए एक दस्तावेज में यह दावा किया गया।
 बांगलादेश के उदय को इंदिरा गांधी के राजनीतिक जीवन का उत्कर्ष कहा जा सकता है, वहीं 1975 में रायबरेली के चुनाव में गड़बड़ी के आरोप और जेपी द्वारा संपूर्ण क्रांति के नारे के अंतर्गत समूचे विपक्ष ने एकजुट होकर इंदिरा गांधी की सत्ता के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। इस पर इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया। आपातकाल में नागरिक अधिकार रद्द हो गए और प्रेस और मीडिया पर सेंसरशिप लागू हो गई। कई विपक्षी नेता जेल भेज दिए गए। संजय गांधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी अभियान और सत्ता पक्ष द्वारा दमन के कारण आपातकाल को इंदिरा गांधी के राजनीतिक जीवन का निम्न बिंदु कहा जाने लगा।
दरअसल, 1971 में ही हाईकोर्ट ने रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी का निर्वाचन अवैध ठहरा दिया था। इस चुनाव में राजनारायण थोड़े ही मतों से हार गए थे। इंदिरा गांधी ने इस निर्णय को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी तो उन्हें स्टे मिल गया। वे प्रधानमंत्री के पद पर बनी रह सकतीं थी लेकिन सदन की कार्रवाई में भाग नहीं ले सकती थीं और न ही सदन में वोट दे सकती थीं। इन्ही परिस्थितियों के मद्देनजर इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगा दिया था। इसका जनता ने माकूल जवाब दिया। 1977 में इमरजेंसी हटा ली गई और  आम चुनाव हुए जिसमें इंदिरा गांधी की अभूतपूर्व हार हुई।
जनता पार्टी के नेतृत्व में चार घटक दलों के साथ मोरराजी देसाई प्रधानमंत्री बने। हालांकि दो साल ही जनता पार्टी में खींचतान शुरू हो गई। चरण सिंह 64 सांसदों को साथ जनता पार्टी से अलग हो गए। मोरारजी देसाई ने सदन में विश्वासमत का सामना करने से पहले् ही इस्तीफा दे दिय़ा।
चरणसिंह कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए। चरणसिंह भी सदन में विश्वास मत हासिल करते इसके पहले ही कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और राष्ट्रपति से नए चुनाव करने का अनुरोध किया । 1980 के चुनावों में कांग्रेस को जबर्दस्त जीत हासिल हुई और कांग्रेस सत्ता में लौटी। जाहिर है इंदिरा के शासनकाल में हुई ये ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाओं ने भारत में न केवल राजनीतिक बल्‍कि सामाजिक परिवर्तन भी किए। आज भी देश और दुनिया इंदिरा गांधी को एक मजबूत नेता के रूप में जानती है।

Friday, 13 November 2015


जय जवाहरलाल की

'हम कोटि-कोटि कुटुम्बियों की और विश्व विशाल की,
सुख-शांति-चिंता थी, तुम्हारी सहचरी चिरकाल की।
तुम जागते थे रात में भी, जबकि सोते थे सभी,
जन-मात्र की सच्ची विजय है, जय जवाहरलाल की।'
- मैथिलीशरण गुप्त की कविता 'जय' से



नेहरू जी यह जानते थे कि देश को आजादी मिलने के बाद देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ देश को मजबूत बनाया जाना बड़ा जरूरी है। भारत के आजाद होने के पहले ही चीन भी साम्राज्यवादी राजतंत्र से आजाद हुआ था। नेहरू की सर्वभौम वैश्विक दृष्टि थी। उनकी सोच यही थी कि नए आजाद हुए एशियाई देशों में सहयोग और भाईचारे की भावना जरूरी है तभी वे गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी जैसी चुनौतियों से पार पा सकेंगे। उन्होंने चीन के साथ पंचशील का समझौता इसी उद्देश्य से किया था कि देश के सैन्य संसाधनों का अनाश्यक विस्तार न करते हुए देश निर्माण पर ध्यान दिया जाए। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू एक गांव में पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों से सवाल किया कि आप अक्सर भारत माता की जय का नारा लगाते हैं, क्या आप बता सकते हैं भारत माता कौन है। कोई जवाब नहीं मिला तो नेहरू बोले हमारे पहाड़, नदियां, जंगल, जमीन, वन संपदा,खनिज... यही तो भारत माता है।
आप भारत माता की जय का नारा लगाते हैं तो आप हमारे प्राकृतिक संसाधनों की जय ही करते हैं। नेहरू कहते थे हिन्दुस्तान एक ख़ूबसूरत औरत नहीं है। नंगे किसान हिन्दुस्तान हैं। वे न तो ख़ूबसूरत हैं, न देखने में अच्छे हैं- क्योंकि ग़रीबी अच्छी चीज़ नहीं है, वह बुरी चीज़ है। इसलिए जब आप 'भारतमाता' की जय कहते हैं- तो याद रखिए कि भारत क्या है, और भारत के लोग निहायत बुरी हालत में हैं- चाहे वे किसान हों, मजदूर हों, खुदरा माल बेचने वाले दूकानदार हों,और चाहे हमारे कुछ नौजवान हों। नेहरू की इसी सोच के चलते उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है। उन्होंने भाखड़ा नंगल डेम, बीएचईएल (बिजली के भारी उपकरणों का उद्योग) आईआईटी, एम्स, नेशनल इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी की स्थापना की। नेहरू ने गांधी की आर्थिक संकल्पना को व्यवहारवादी रुख देते हुए देश में बड़े कारखानों, तकनीकी प्रगति और वैज्ञानिक सोच को समाविष्ट किया।
देश के प्रथम प्रधानमंंत्री की घरेलू नीति चार स्तंभों पर थी लोकतंत्र, समाजवाद,एकता और धर्मनिरपेक्षता। नेहरू ने अपने कार्यकाल के दौरान इन चारों स्तंभों को मजबूती प्रदान की। नेहरू एक आइकॉन थे। उनके आदर्श और राजनीतिक कुशलता का सम्मान विदेशों में भी किया जाता था। देश के जनमानस को आधुनिक मूल्य और विचारों से नेहरू ने ही संपृक्त कराया। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को सदा ही महत्व दिया। उन्होंने हमेशा देश की एकता बनाए रखने का प्रयास किया। वे जातीय अस्मिताओं और विविध धार्मिक समूहों वाले इस देश को वैज्ञानिक नवाचार और तकनीकी प्रगति के आधुनिक युग में लेकर गए। समाज में हाशिए के लोग और गरीब उनकी चिंता के केंद्र थे। लोकतात्रिंक मूल्यों में नेहरू ने सदैव पूर्ण आस्था रखी।
नेहरू को खास तौर पर हिंदू सिविल कोड लागू करने के लिए याद किया जाता है, इसी की बदौलत हिंदू औरतें उत्तराधिकार और संपत्ति में पुरुषों के साथ बराबरी का दर्जा पा सकीं। नेहरू ने ही हिंदू कानून में बदलाव लाकर जातिगत भेदभाव को आपराधिक कृत्य की श्रेणी में ला दिया। नेहरू ने ही पांच वर्षीय योजना में देश के सभी बच्चों को अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा देने की गारंटी दी।
नेहरू के अनुसार भारत की सेवा का अर्थ, करोड़ों पीड़ितों की सेवा है। इसका अर्थ दरिद्रता और अज्ञान, और अवसर की विषमता का अन्त करना है। नेहरू की आकांक्षा यही रही कि प्रत्येक आँख के प्रत्येक आँसू को पोंछ दिया जाए, ऐसा करना हमारी शक्ति से बाहर हो सकता है, लेकिन जब तक आँसू हैं और पीड़ा है, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा।
पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने घर पर निजी शिक्षकों से प्राप्त की। पंद्रह साल की उम्र में वे इंग्लैंड चले गए और हैरो में दो साल रहने के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया जहाँ से उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। 1912 में भारत लौटने के बाद वे सीधे राजनीति से जुड़ गए। यहाँ तक कि छात्र जीवन के दौरान भी वे विदेशी हुकूमत के अधीन देशों के स्वतंत्रता संघर्ष में रुचि रखते थे। उन्होंने आयरलैंड में हुए सिनफेन आंदोलन में गहरी रुचि ली थी। उन्हें भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनिवार्य रूप से शामिल होना पड़ा।
1912 में उन्होंने एक प्रतिनिधि के रूप में बांकीपुर सम्मेलन में भाग लिया एवं 1919 में इलाहाबाद के होम रूल लीग के सचिव बने। 1916 में वे महात्मा गांधी से पहली बार मिले जिनसे वे काफी प्रेरित हुए। उन्होंने 1920 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में पहले किसान मार्च का आयोजन किया। 1920-22 के असहयोग आंदोलन के सिलसिले में उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा।
पंडित नेहरू सितंबर 1923 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव बने। उन्होंने 1926 में इटली, स्विट्जरलैंड, इंग्लैंड, बेल्जियम, जर्मनी एवं रूस का दौरा किया। बेल्जियम में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में ब्रुसेल्स में दीन देशों के सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने 1927 में मास्को में अक्तूबर समाजवादी क्रांति की दसवीं वर्षगांठ समारोह में भाग लिया। इससे पहले 1926 में, मद्रास कांग्रेस में कांग्रेस को आजादी के लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध करने में नेहरू की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन के खिलाफ एक जुलूस का नेतृत्व करते हुए उन पर लाठी चार्ज किया गया था। 29 अगस्त 1928 को उन्होंने सर्वदलीय सम्मेलन में भाग लिया एवं वे उनलोगों में से एक थे जिन्होंने भारतीय संवैधानिक सुधार की नेहरू रिपोर्ट पर अपने हस्ताक्षर किये थे। इस रिपोर्ट का नाम उनके पिता श्री मोतीलाल नेहरू के नाम पर रखा गया था। उसी वर्ष उन्होंने ‘भारतीय स्वतंत्रता लीग’ की स्थापना की एवं इसके महासचिव बने। इस लीग का मूल उद्देश्य भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से पूर्णतः अलग करना था।
1929 में पंडित नेहरू भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन के लाहौर सत्र के अध्यक्ष चुने गए जिसका मुख्य लक्ष्य देश के लिए पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना था। उन्हें 1930-35 के दौरान नमक सत्याग्रह एवं कांग्रेस के अन्य आंदोलनों के कारण कई बार जेल जाना पड़ा। उन्होंने 14 फ़रवरी 1935 को अल्मोड़ा जेल में अपनी ‘आत्मकथा’ का लेखन कार्य पूर्ण किया। रिहाई के बाद वे अपनी बीमार पत्नी को देखने के लिए स्विट्जरलैंड गए एवं उन्होंने फरवरी-मार्च, 1936 में लंदन का दौरा किया। उन्होंने जुलाई 1938 में स्पेन का भी दौरा किया जब वहां गृह युद्ध चल रहा था। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने से कुछ समय पहले वे चीन के दौरे पर भी गए।
पंडित नेहरू ने भारत को युद्ध में भाग लेने के लिए मजबूर करने का विरोध करते हुए व्यक्तिगत सत्याग्रह किया, जिसके कारण 31 अक्टूबर 1940 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें दिसंबर 1941 में अन्य नेताओं के साथ जेल से मुक्त कर दिया गया। 7 अगस्त 1942 को मुंबई में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में पंडित नेहरू ने ऐतिहासिक संकल्प ‘भारत छोड़ो’ को कार्यान्वित करने का लक्ष्य निर्धारित किया। 8 अगस्त 1942 को उन्हें अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर अहमदनगर किला ले जाया गया। यह अंतिम मौका था जब उन्हें जेल जाना पड़ा एवं इसी बार उन्हें सबसे लंबे समय तक जेल में समय बिताना पड़ा। अपने पूर्ण जीवन में वे नौ बार जेल गए। जनवरी 1945 में अपनी रिहाई के बाद उन्होंने राजद्रोह का आरोप झेल रहे आईएनए के अधिकारियों एवं व्यक्तियों का कानूनी बचाव किया। मार्च 1946 में पंडित नेहरू ने दक्षिण-पूर्व एशिया का दौरा किया। 6 जुलाई 1946 को वे चौथी बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए एवं फिर 1951 से 1954 तक तीन और बार वे इस पद के लिए चुने गए।

Tuesday, 10 November 2015

कांग्रेस की सात गुना छलांग

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार विजय के सूत्रधार हैं और राहुल गांधी गठबंधन के सूत्रधार हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की प्रभावशाली भूमिका के बिना महागठबंधन संभव नहीं होता।  जिस समय राजद प्रमुख को इस बारे में आपत्तियां थी, तब राहुल ने नीतीश कुमार और लालू प्रसाद को साथ लाने में बड़ी भूमिका निभाई। बिहार की विजय राहुल गांधी के पार्टी प्रमुख बनने का सही समय है।  वैसे इस मुद्दे पर कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी और राहुल गांधी को फैसला करना है।
कांग्रेस के लिए बिहार चुनावों में गठबंधन का रास्ता काफी फायदेमंद साबित हुआ है। परिणाम दर्शाते हैं कि पार्टी ने जिन 41 सीटों पर चुनाव लड़ा था उनमें से 27 पर वह जीत दर्ज करने में कामयाब रही। 2010 के विधानसभा चुनावों में इसे सिर्फ चार सीटें मिली थीं जबकि उसने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इस बार कम सीट पर चुनाव लड़ने के कारण उसका मत प्रतिशत भी कम हो गया जो 2010 में 8.37 फीसदी के मुकाबले 6.7 फीसदी रहा । पिछले चुनावों में पार्टी के 216 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी।
इस चुनाव में पार्टी के हिसाब से देखें तो मत प्रतिशत के मामले में कांग्रेस चौथे स्थान पर है। पिछले वर्ष मई के लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी के लिए बिहार एक बड़ी जीत है। लोकसभा चुनावों में पार्टी महज 44 सीटों पर सिमट कर रह गई है। पार्टी ने महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था. दिल्ली में तो कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला था।
भारत की आजादी के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अविभाजित बिहार की 324 विधानसभा सीटों में से 239 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2010 में बिहार के विभाजित होने के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस ने अपना सबसे खराब प्रदर्शन दिया और 243 विधानसभा सीटों में से मात्र 4 सीटें हासिल कीं। साल 2014 के उपचुनावों में कांग्रेस ने एक और सीट जीती।
ऐसे में इन चुनावों में 5 से 27 सीटों तक का सफर तय करके कांग्रेस ने शानदार कमबैक किया है. मंडल दौर के बाद लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक कद में दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ोतरी हुई। साल 1995 के चुनावों में कांग्रेस मात्र 29 सीटों पर सिमट गई। बीजेपी इन चुनावों में 41 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी पार्टी बनने में सफल हुई।  साल 2000 में लालू यादव ने कांग्रेस के 23 विधायकों को राबड़ी देवी कैबिनेट में शामिल किया। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सदानंद सिंह को असेंबली स्पीकर भी बनाया गया।
इसके बाद कांग्रेस ने दोबारा कभी बिहार में अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने की मजबूत कोशिश नहीं की। प्रदेश स्तर पर किसी ओबीसी या महादलित नेता को भी तैयार नहीं किया गया। कांग्रेस को बिहार की राजनीति में की हुईं गलतियों से सबक नहीं लेने का परिणाम 2005 के चुनावों में मिल गया। इन चुनावों में कांग्रेस के हाथ मात्र 5 सीटें आईं, अगले चुनावों (2010) में कांग्रेस सिर्फ चार सीटें हासिल कर सकी।
इसके पांच साल बाद 2015 में कांग्रेस ने न चुनावों में लालू और नीतीश ने कांग्रेस के उम्मीदवारों को चुना। यही नहीं चुनाव के दौरान सोनिया गांधी ने 6 और राहुल गांधी ने 10 रैलियां कीं। इस चुनाव की पूरी जिम्मेदारी लालू और नीतीश ने अपने कंधों पर संभाली और कांग्रेस को 41 में से 27 सीटों पर जीत दिलाई।
हालांकि, कांग्रेस ने बिहार की राजनीति में वापसी की है लेकिन इसे बरकरार रखने के लिए कांग्रेस को बिहार में नेताओं की नई फौज तैयार करनी पड़ेगी.

Saturday, 7 November 2015

जीती जनता, नीतीश कुमार को बधाई

विभिन्न लोगो की राय अलग अलग है लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि हमारा समाज परिपक्व है व चुनाव में धन बल व प्रचार का महत्व होते हुये भी निर्णायक नही है ।निर्णायक भूमिका है वर्तमान सरकार के नेतृत्व की कार्यप्रणाली व उसकी छवि तथा उसके विपरीत मैदान में मुख्य विपक्षी दल के नेतृत्व व स्वीकार्यता । गत चुनावों में केन्द्र ,राजस्थान,महाराष्ट्र व हरियाना में सरकारों को बुरी तरह हराना,झारखण्ड में दोनो पक्षों मे किसी का विश्वसनीय न होनेपर निर्णायक बहुमत किसी को न देना तथा मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में अच्छा कार्य करने वाले नेतृत्व को जनता ने आशीर्वाद दिया था ।उसी क्रम में नितिश के नेतृत्व में अपना मत देकर जनता ने उनकी कार्य प्रणाली की स्वीकार्यता पर मुहर लगाया है क्योंकि उनके सामने कोई विश्वसनीय स्थानीय नेतृत्व नहीं था । पर नितिश जी को लालू की छवी व उनके तौर तरीक़ों से सतर्क रहना होगा ।लेकिन बिहार अभी भी जातिवाद के कोढ़ से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाया है ।देखे शायद नई पीढ़ी इस कोढ़ से मुक्ति दिला दे क्योकि जातिवाद राजनिति के पोषक नेताओं का अस्पताल अब पास ही है ।

बिहार के 243 सदस्यीय विधानसभा चुनाव केजो नतीजे सामने आ रहे हैं वो बता रहे हैं कि नीतीश कुमार और लालू यादव के बवंडर में मोदी लहर पूरी तरह हवा हो गई। महागठबंधन बंपर बहुमत की तरफ बढ़ रहा है। एनडीए गठबंधन 100 सीटों से भी कम पर सिमटता दिख रहा है। रुझानों के बाद जहां बीजेपी खेमे में खामोशी है और बैठकों का दौर शुरू हो गया है, वहीं महागठबंधन  खेमे में जबरदस्त उत्साह और जश्न का माहौल है। आज सुबह लालू यादव ने कहा था, गुड मॉर्निंग हम जीत रहे हैं। लालू की ये बात सही भी साबित हुई। 
बिहार विधानसभा चुनाव के लिए पिछले एक माह से जारी चुनाव नतीजों  के रुझानों से तय हो गया है कि जेडीयू नीत महागठबंधन को बहुमत मिल रहा है। बीजेपी के लिए ये नतीजे किसी झटके से कम नहीं। बीजेपी गठबंधन 100 से भी कम सीटों पर सिमट गया। आइए उन कारणों के बारे में जानते हैं जिससे महागठबंधन को इतनी बड़ी कामयाबी मिलती दिख रही है। बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह इस बार पूरी तरह विफल रहे। बीजेपी की चुनावी रणनीति शुरुआत से ही संदेहों के घेरे में रही। विकास के मुद्दे से शुरू हुआ चुनाव प्रचार हर चरण के साथ बदलते हुए आरक्षण के रास्ते कब ध्रुवीकरण और बदजुबानी तक पहुंच गया पता ही नहीं चला। बीजेपी नेता कभी बीफ तो कभी पाकिस्तान में पटाखे छूटने की बात करते रहे और नीतीश कुमार मीडिया हलचल से दूर अपनी रणनीति को अमल में लाते रहे। नीतीश ने लालू को बीजेपी का मुकाबला करने के आगे बढ़ाकर अपनी योजना को सफल बनाने में लगे रहे और यहां बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह नीतीश के चुनावी रणनीति को समकझने में नाकाम रहे। बीजेपी कभी पीएम मोदी के जाति बताकर जातीय समीकरण साधते दिखी तो कभी संघ के संग ध्रुवीकरण लेकिन कुल मिलाकर चुनावी रमनीति स्पष्ट न होने के खामियाजा भुगतना पड़ा।
एक बात स्पष्ट है कि मात्र लफ्फाबाजी व अनर्गल / दुष्प्रचार से चुनाव जीत पाना सम्भव नहीं है व जनता के आशिर्वाद के लिये सरकारों को काम करना होगा व अपनी छवि में सुधार करना होगा यानि विकास, नेतृत्व की सत्यनिष्ठा प्रदर्शित करनी होगी ।
यह देश व देशवासियों के लिये शुभ संदेश /समाचार है ।
जय भारत,जय लोक तन्त्र,जय समाजवाद व जय जनता जनार्दन ।।